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बिहार में लोकतंत्र की विजय

बिहार में लोकतंत्र की विजय

लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति गहरी आस्था हम भारतीयों को विरासत में मिली है। आम भारतीय अपनी चिंतन-प्रक्रिया में लोकतांत्रिक होता है। ‘एकं सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति’ या ‘मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना’ जैसे दार्शनिक वाक्यों में हमारी लोकतांत्रिक आस्था ही परिलक्षित एवं प्रतिध्वनित होती है। और लोकतंत्र के प्रति हमारी यह आस्था केवल दार्शनिक एवं सांस्कृतिक मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है। अपितु यह हमारी दैनिक जीवनचर्या का हिस्सा रही है। एक ही परिवार के लोग अलग-अलग राजनीतिक दलों का समर्थन करते हुए भी एक-दूसरे के साथ समरस जीवन जीते हैं। पास-पड़ोस में रह रहे भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों के समर्थक आपस में सहयोग एवं सहृदयता का भाव रखते हैं, न कि वैर एवं वैमनस्यता के। आम भारतीय भिन्न मतों-दृष्टकोणों के प्रति स्वीकार एवं सम्मान का भाव रखता है। हम भले ही आधुनिक लोकतंत्र का श्रेय प्राचीन वैशाली या लिच्छवी जैसे गणराज्यों को न देकर पश्चिमी जगत को दें। पर ना-ना करते भी हमें यह सत्य तो स्वीकार करना ही होगा कि चुनाव-दर-चुनाव हमारा लोकतंत्र मजबूत एवं परिपक्व हुआ है। जब-जब कोई निर्वाचित सत्ता निरंकुश हुई या लोकतंत्र पर कोई हमला हुआ, आम भारतीयों ने उसका प्रत्युत्तर चुनाव-परिणाम के रूप में सत्ता परिवर्तित करके दिया। जबकि विकसित देशों में भी प्राय: हिंसा के बिना सत्ता का हस्तांतरण नहीं होता। ‘इंदिरा इज इंडिया एंड इंडिया इज इंदिरा’ जैसे उद्घोषों वाले दौर में भी आपातकाल के तत्काल बाद के चुनावों में उनका हार जाना लोकतंत्र के प्रति भारतीय मतदाताओं की आस्था को ही दर्शाता है। क्या किसी ने सोचा होगा कि 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को बुरी तरह पराजित करने के पश्चात मजबूत एवं ताकतवर राष्ट्राध्यक्षा के रूप में उभरीं इंदिरा जैसी लोकप्रिय नेत्री को भी इतनी जल्दी पराजय का मुंह देखना पड़ सकता है?

अभी हाल ही में हुए अमेरिकी चुनावों के समाजशास्त्रीय विश्लेषण से भी आम भारतीयों की लोकतंत्र के प्रति गहरी आस्था झलकती है। जहां एक ओर अमेरिका जैसे विकसित देश में चुनाव-परिणाम के बाद व्यापक पैमाने पर हिंसा भड़कने की आशंका जताई जा रही है, रिपब्लिकंस और डेमोक्रेट्स के समर्थकों के बीच हिंसक झड़पों की खबरें विश्व-मीडिया का ध्यान आकृष्ट कर रही हैं, राष्ट्रपति-भवन से लेकर सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा के लिए चाक-चौबंद किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत जैसे बहुदलीय व्यवस्था वाले विविधता भरे देश में लगभग प्रत्येक वर्ष ही कोई-न-कोई चुनाव कराए जाते हैं, पर बड़े पैमाने पर हिंसा की एक भी तस्वीर सामने नहीं आती। छिटपुट विरोधों, आरोपों-प्रत्यारोपों, आतिशबाजियों आदि को यदि छोड़ दें तो धुर-से-धुर विरोधियों के जीतने या बड़े-से-बड़ा उलटफेर होने के बावजूद भारतीय मतदाता लगभग शांत और संयत ही रहता है। बल्कि इससे आगे तमाम दल और उसके कार्यकर्त्ता-समर्थक हार-जीत के प्रति सहज स्वीकार्यता का भाव रखते हैं। जीतने वाला विनम्रता और हारने वाला थोड़े-बहुत किंतु-परंतु के साथ आत्ममंथन का परिचय देता है। क्या यह हमारी लोकतांत्रिक उपलब्धि नहीं? क्या इस पर हमें गर्व नहीं करना चाहिए?

कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि गुलामी की ग्रंथियों या औपनिवेशिक मानसिकता के कारण हम भारतीय अपनी उपलब्धियों पर गौरव करना भूल गए हैं। विभिन्न राज्यों में हुए उपचुनावों एवं बिहार विधानसभा चुनाव में किस दल की हार हुई और किसकी जीत, यह मीमांसा उन दलों के नेताओं, कार्यकत्र्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों पर छोड़ दें, पर एक नागरिक-वर्ग के रूप में हम अपनी इस उपलब्धि पर गर्व करें कि कोविड-19 से उत्पन्न विषम परिस्थितियों के मध्य भी चुनाव आयोग ने कितनी कुशलता एवं सफलता से चुनावों का प्रबंधन एवं संचालन किया! आयोग की तैयारियों का आकलन इसी से किया जा सकता है कि मतदान के विभिन्न चरणों में संक्रमण की आशंका को देखते हुए चुनाव-व्यवस्था में जुटे कर्मियों को लगभग 13 लाख कोविड किट्स फेस कवर, सैनिटाइजर्स, सुरक्षा सामग्री आदि वितरित की गई। 6.56 करोड़ हैंड ग्लव्स बांटे गए, सुचारु मतदान कराने के लिए 11.56 लाख कर्मियों की नियुक्ति की गई।

5.20 लाख सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए। कोरोना संकट को देखते हुए 1.06 लाख बूथ बनाए गए। 2015 की तुलना में इस वर्ष लगभग 63 फीसदी अधिक मतदान केंद्र बनाए गए। ईवीएम मशीनों की संख्या बढ़ाई गई। पहले जहां हर मतदान केंद्र पर 1500 मतदाताओं को मत डालने की इजाजत दी जाती थी, उसे घटाकर इस बार 1000 कर दिया गया। मतदान के लिए इस वर्ष एक घंटे का अतिरिक्त समय भी दिया गया। कोविड को देखते हुए मतगणना-व्यवस्था में भी आंशिक परिवर्तन किया गया। पहले जहां किसी मतगणना-भवन में 14 मेजें(टेबल्स) होती थीं, वहीं संक्रमण के खतरे को देखते हुए उसे घटाकर 7 कर दिया गया। मतगणना-केंद्रों की संख्या में भी भारी वृद्धि की गई। इसके लिए मतगणना कर्मियों एवं पर्यवेक्षकों की भी संख्या बढ़ाई गई। उन्हें कोविड-काल में संक्रमण के भय से मुक्त सुरक्षित चुनाव करवाने हेतु विधिवत प्रशिक्षण दिया गया। मतदाताओं की सुरक्षा एवं सुविधाओं का ध्यान रखने पर विशेष बल दिया गया। चुनाव आयोग की यह भूमिका केवल प्रशंसनीय एवं सराहनीय ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए अचरज एवं कौतूहल का विषय है। उल्लेखनीय है कि कोविड जैसी वैश्विक महामारी के दौर में हुए इस चुनाव पर पूरी दुनिया की निगाहें थीं। एक ओर संक्रमण  के संकट और आशंकाओं के बीच बेहतर चुनाव-प्रबंधन एवं सुरक्षित मतदान-प्रक्रिया संपन्न कराने की जिम्मेदारी तो दूसरी ओर इन प्रतिकूल परिस्थितियों में आम मतदाताओं को मतदान-केंद्रों तक लाने की चुनौती! मतदान प्रतिशत के आंकड़ों को देखकर यह कहा जा सकता है कि चुनाव-आयोग दोनों ही कसौटियों पर पूर्णत: खरी उतरी। यहां यह कहना भी अतिरंजित नहीं होगा कि आम मतदाताओं ने भी लोकतंत्र के इस महापर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और अपनी नागरिक जिम्मेदारी का सम्यक निर्वाह किया। बल्कि कोविड-काल का यह चुनाव महामारी की आशंका, भय और प्रकोपों पर मनुष्य की अजेय जिजीविषा और समाज की सामूहिक संकल्प-शक्ति की विजय के रूप में जाना-देखा जाना चाहिए।

लोकतंत्र के लिए यह शुभ संकेत है कि प्रतिकूल चुनाव परिणामों के बाद भी प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने ईवीएम को दोष नहीं देने का फैसला लिया है। इसी ईवीएम से हुए चुनावों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पंजाब, दिल्ली जैसे तमाम राज्यों में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा पूर्व में पराजय का परिणाम झेल चुकी है। इसलिए यदि कोई दल हारने के बाद ईवीएम का रोना रोता है तो यह लचर और हास्यास्पद तर्क ही सिद्ध होगा। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हार-जीत का अंतर मामूली होने पर कुछ पार्टियां और उनके कतिपय नेता दबी जुबान में चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठा रहे हैं। तात्कालिक हितों के लिए व्यवस्था या संस्थाओं का अवमूल्यन लोकतंत्र के लिए घातक होता है। यदि चुनाव आयोग जैसी संस्था निष्पक्ष और सक्षम नहीं होती तो कहीं कभी कोई सत्तारूढ़ पार्टी हारती ही नहीं। चुनाव लोकतंत्र का महोत्सव है और इसे महोत्सव बनाने में चुनाव आयोग के सैकड़ों पर्यवेक्षकों के साथ-साथ चुनाव-प्रक्रिया के सुचारु संचालन में योगदान देने वाले हजारों-लाखों कर्मियों की भी महती भूमिका है। नि:संदेह विभिन्न पार्टियों के हजारों-लाखों कार्यकत्र्ताओं का भी इसमें न्यूनाधिक योगदान होता है। आवश्यकता उन सबके योगदान के प्रति कृतज्ञता-भाव व्यक्त करने की है, न कि कड़वी-तीखी प्रतिक्रिया देने की। हार-जीत से परे समाज अपनी सामूहिक एवं लोकतांत्रिक उपलब्धियों पर गर्व भी तो कर सकता है। समाज का यह सामूहिक गौरव-बोध ही भविष्य की चुनौतियों के प्रति पीढिय़ों को सक्षम एवं समर्थ बनाता है। चुनाव आते-जाते रहेंगें, पर संवैधानिक संस्थाओं और लोकतंत्र के प्रति हमारी आस्था अक्षुण्ण रहनी चाहिए। यही हम भारतीयों की सबसे बड़ी ताकत है।

प्रणय कुमार

 

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