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विकासवादी राजनीति को सर्वसमावेशी राजनीति में होगा बदलाव

विकासवादी राजनीति को सर्वसमावेशी राजनीति में होगा बदलाव

‘बिहार में नीतीश कमजोर हो चुके हैं, मोदी पहले से कहीं ज्यादा बिहार के जन-मन में बस गए हैं।’ सिवान से पटना तक दूरदराज के गांवों में जन-मन यही एक पंक्ति दुहरा रहा है। कोविड-19 यानी कोरोना की महामारी में आम प्रवासी बिहारियों ने येन-केन-प्रकारेण बिहार की सीमा में दाखिल होने के बाद नीतीश कुमार और उनके तंत्र को कोसना शुरू कर दिया था, तभी संकेत मिलने लगा था कि शायद इस बार नीतीश कुमार के लिए वापसी आसान नहीं होगी। चुनावी रैलियों में नीतीश कुमार अपने खिलाफ जनता के रूख को भांप चुके थे, इसलिए उन्हें बार बार आखिरी समय में जनता से यह भावुक अपील करनी पड़ी कि ‘आखिरी बार चुनावी मैदान में हूं, कहा-सुना माफ करिए, एक मौका और दे दीजिए। नीतीश कुमार ने मतदाताओं को कोरोना महामारी के दौरान किए गए सहायता कार्य की बार-बार याद दिलाने की कोशिश भी की। मसलन-प्रत्येक परिवार को मुफ्त 5 किलोग्राम राशन, बाहर से रोजगार खोकर लौटे श्रमिकों को 1000 रुपये भत्ता, बाढ़ पीडि़तों को नगद भुगतान।’ सवाल है कि क्या नीतीश कुमार के भाषण का जनता पर असर पड़ा? बीजेपी के रणनीतिकारों के मुताबिक, नीतीश कुमार का चेहरा सुशासन का प्रतीक जरूर बना हुआ है लेकिन यह चेहरा बीजेपी के विकास पुरूष नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर ही अब राजनीति में पूरा रूप बनाता है। नीतीश बिहार में अगर दोबारा सरकार बनाने की ओर बढ़ रहे हैं तो निश्चित ही इसके पीछे नरेंद्र मोदी की चमत्कार है।

चुनाव विश्लेषक उमेश चतुर्वेदी इस तथ्य को दोहराते हैं कि बिहार ने बीजेपी-जेडीयू सरकार को दोबारा जरूर मौका दिया लेकिन चुनाव नतीजों की हकीकत यही है कि मौका नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के कारण नीतीश कुमार को मिल रहा। बिहार भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता रहे आनंद झा इस बात को स्वीकार करते हैं। झा नीतीश कुमार को दोबारा मुख्यमंत्री बनाने के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी की राय से भी सहमत हैं। उनके अनुसार, बीजेपी दो बात नहीं करती है। जो चुनाव के पहले ऐलान हो चुका है पार्टी उस पर कायम है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे, इसमें दोमत नहीं हालांकि उनका कहना ये भी है कि बिहार में बीजेपी अकेले भी लड़ती तो पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लेती क्योंकि नरेंद्र मोदी ने बिहार के जन-जन में गहरी पैठ बना ली है।

दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार आमोद राय कहते हैं कि नीतीश कुमार की नीयत में कभी कोई खोट नहीं थी, वह बिहार और बिहारियों के हित के लिए ही जिन्दगी भर जूझते रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने 2015 के चुनाव में जब राजद के साथ गठबंधन के परिणामस्वरूप बिहार की राजनीति को फिर से भटकाव की ओर बढ़ते देखा तो भूलसुधार करने में देर नहीं लगाई। राजनीति तो अंतत: जनता के लिए और राज्य के हित के लिए ही की जाती है, नीतीश कुमार ने जो किया वह राज्य के हित के लिए किया है, भारतीय जनता पार्टी ने विकास की राजनीति को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बिहार के जन-जन तक पहुंचाया है, लिहाजा जो थोड़ी बहुत जनता की नाराजगी थी, वह भारतीय जनता पार्टी की विराट सफलता के कारण अब प्रसंग से बाहर की बात है।

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बिहार राजनीति की हर महीन चाल पर बारीक नजर रखता है। लिहाजा नतीजों का रुझान क्या होगा, यह रामविलास पासवान की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी और उसके वर्तमान अगुवा चिराग पासवान की रणनीति से भी ज्यादा प्रभावित हुआ। लोक जनशक्ति पार्टी को कुल मतों में 5.66 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए, हालांकि उसे महज़ एक विधानसभा सीट पर विजय मिली लेकिन उसने करीब 20 सीटों पर नीतीश कुमार के उम्मीदवारों को तगड़ा झटका देकर नीतीश कुमार के ग्राफ को इस कदर नीचे पहुंचा दिया कि सवाल उठने लाजिमी है कि क्या नैतिकता के आधार पर नीतीश कुमार को खुद ही मुख्यमंत्री पद का मोह नहीं छोड़ देना चाहिए?

बहरहाल, बिहार में बीजेपी-जेडीयू की इस आन्तरिक राजनीति से इतर चौंकाने वाली खबर ये भी है कि सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी की बड़ी जीत और भोजपुर इलाके में कम्यूनिस्ट गठबंधन को मिली भारी सफलता क्या इस बात का संकेत नहीं है कि बिहार की राजनीति का भविष्य आने वाले समय में बड़े भूचालों से भरा हुआ होगा? सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने बिहार में महज 1.2 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 5 सीटें जीत ली हैं, जबकि लोजपा को 5.66 प्रतिशत वोट के साथ महज एक सीट हासिल हुआ है। लोजपा को मिले इन्हीं मतों ने जेडीयू की जहां लुटिया डुबो दी, वहीं ओवैसी को सीमांचल में मुस्लिम मतों के समर्थन ने कांग्रेस और आरजेडी के महागठबंधन को भी सत्ता से दूर कर दिया। जाहिर तौर पर ओवैसी के सियासत के पक्ष में मुस्लिम मतदाता लामबंद हो रहे हैं, और मुस्लिम समुदाय का बड़ा हिस्सा कांग्रेस, आरजेडी आदि सेक्युलर पार्टियों से मुंह मोड़ रहा है तो इसका सीधा फायदा किसे प्राप्त होगा? राजनीतिक विश्लेषक उमेश कुमार मानते हैं कि चुनावी राजनीति के तहत मुस्लिमों का यह धु्रवीकरण बीजेपी को फायदा पहुंचाएगा, क्योंकि अगर यह लामबंदी बंगाल में भी हुई तो हिन्दू मतों का सीधा ध्रुवीकरण बीजेपी के पक्ष में होने की संभावना बढ़ेगी। किन्तु यदि बात राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर दूरगामी राजनीति के लक्ष्यों को लेकर की जाएगी तो मुस्लिम मतों का यह ध्रुवीकरण 20 साल बाद के भारत के लिए एक बड़ी चुनौती से कम नहीं होगा जिसमें मुस्लिम राजनीति सेक्युलरवादी दलों के हाथ से निकलकर सीधे उन हाथों में सिमट जाएगी जो इसका उपयोग सत्ता से इतर उद्देश्यों के लिए भी कर सकते हैं। भारतीय राजनीति को इसके समाधान का मार्ग भी तलाशना होगा, नहीं तो 2047 आते-आते 1947 से भी विकट हालात देश में पैदा होंगे, इससे कौन इन्कार कर सकेगा। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार में वामदलों का उभार हालात को और ज्यादा गंभीर ही बनाएगा क्योंकि वामदलों की राजनीति ने राष्ट्रीय मूल्यों और राष्ट्रीय भावनाओं को विभाजनकारी राजनीति की तुलना में हमेशा हाशिए पर ही रखा है।

आरजेडी-कांग्रेस महागठबंधन हालांकि सत्ता से थोड़े अन्तर से चूक गया है लेकिन एक मजबूत विपक्ष के रूप में अरसे बाद बिहार विधानसभा में विधायकों का जमघट तेजस्वी यादव की अगुवाई में खड़ा हो चुका है। संकेत साफ है कि नई सरकार को हर मोर्चे पर विपक्ष की ओर से तगड़ी चुनौती मिलनी तय है। पटना विश्वविद्यालय के छात्र रविंद्र कुमार के अनुसार, बिहार में युवाओं को तेजस्वी में उम्मीद की किरण दिखाई दी। उन्होंने अपने पिता लालू प्रसाद यादव की सियासत से दूर होकर उनकी परछाई तक से परहेज किया। उनकी यह रणनीति कारगर रही, किन्तु अति पिछड़ों और मुस्लिम मतों के विभाजन ने उन्हें राजतिलक से दूर कर दिया। कांग्रेस की कमजोरी ने भी नतीजों को झटका दिया। ऊंची जातियों की गोलबंदी आखिरकार भाजपा के पक्ष में हो गई, और बाजी तेजस्वी के हाथ में आते आते रह गई। सवाल उस रोजगार का भी है जिसका वायदा तेजस्वी ने हर रैली में किया। पहली कैबिनेट बैठक में 10 लाख युवाओं को नौकरी का वायदा भले ही बीजेपी-जेडीयू के नेताओं के लिए चुटकी का सबब बना है लेकिन हकीकत यही है कि लाखों बेरोजगार युवकों के रहते हुए सत्ता में किसी नेता को चैन की बंसी बजाने का अवसर तो मिलने से रहा। इसलिए रोजगार के मोर्चे पर नई सरकार को कड़ी मेहनत करनी होगी, और कम से कम ग्राम स्तर पर स्किल मिशन के जरिए बड़ी तादाद में युवाओं को आत्मनिर्भर योजना से जोडऩा और सरकारी नौकरियों में तदर्थ नियुक्तियों की जगह लाखों रिक्त पदों पर सीधी भर्ती का अभियान शुरु करना नई सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर दिखना अब इसलिए भी जरुरी हो चुका है कि मजबूत विपक्ष के साथ तेजस्वी यादव, कम्युनिस्ट और मुस्लिम गठजोड़ कभी भी बिहार में बाजी पलट भी सकता है।

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बिहार ने नतीजों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील को अवसर दिया है। मुफ्त कोविड वैक्सीन का सवाल मीडिया में भले ही चर्चा का मुद्दा बना लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल नेतृत्व पर बिहार का भरोसा कायम है, यह हकीकत नतीजों की हर पंक्ति से स्पष्ट है। उनकी अपील कोरोना काल में जन-मन के ऊपर और ज्यादा गहरा असर छोड़ती दिखी है। चुनाव नतीजों का संकेत यही है कि अगर मोदी न होते तो शायद नतीजे एकतरफा तेजस्वी के पाले में चले जाते। सीमांचल में ओवैसी ने ध्रुवीकरण कर दिया, फायदा सीधे बीजेपी को मिला, ओवैसी को 5 सीटें मिलीं है, जबकि मुस्लिम बहुलता वाले इस इलाके में बीजेपी को उम्मीद से अधिक सफलता मिली है।

यही कारण है कि बीजेपी के वोट प्रतिशत में 4 से 5 प्रतिशत कमी होने के बावजूद उसने 74 सीटों पर जीत हासिल की है जो आरजेडी को मिली 75 सीटों के आंकड़े से महज एक कम है।

इस सफलता के बावजूद बीजेपी के लिए चिंताजनक पहलू ये भी है कि भोजपुर, बक्सर, औरंगाबाद, सिवान, छपरा, यहां तक कि उसके पुराने गढ़ सारण, चंपारण, मगध, पटना और आस-पास के इलाकों में बीजेपी को कहीं पर वोट प्रतिशत तो कहीं पर सीटों के लिहाज से झटका लगा है। तो क्या स्थापित बीजेपी नेताओं को दरकिनार करना पार्टी को महंगा पड़ा है? बीजेपी के कई समर्थक दबी जुबान इस सत्य को स्वीकार करते हैं कि पार्टी को भविष्य के लिए बेहद सावधानी से रणनीति तैयार करनी होगी ताकि उसका परंपरागत मतदाता और परंपरागत गढ़ अगले लोकसभा चुनाव में कहीं दरक न जाए। इस लिहाज से सिवान की दरौली और मैरवा सीट पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-माले का जीतना बीजेपी के रणनीतिकारों को परेशानी में डाल रहा है। लेफ्ट पार्टियों जिसमें सीपीआई-एम, सीपीआईएम-एल, और सीपीआई ने मिलकर इस चुनाव में 16 विधानसभा सीटों पर कब्जा जमा लिया है। जाहिर तौर पर सफलता के बावजूद बीजेपी और जेडीयू का वोट प्रतिशत उतार की ओर दिखता है, जबकि मुस्लिम सियासत और कम्युनिस्ट राजनीति के लिए बिहार में उर्वर जमीन भी तैयार हो गई दिखती है।

इसका संकेत साफ है कि बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को जमीनी तौर पर भविष्य के खतरों से निपटने के लिए बहुत मेहनत, सूझ-बूझ और समझदारी के साथ काम करने की जरूरत है।

विकासवादी राजनीति को सर्वसमावेशी राजनीति में बदलना, सड़क-बिजली-पानी-दवा-शिक्षा के मुद्दे को जन-जन तक पहुंचाना, आपदा और महामारी से निपटने के लिए स्थायी तंत्र का निर्माण और प्रशिक्षण, चुस्त-दुरुस्त प्रशासन के साथ नवाचार और हुनरयुक्त उद्यमी युवाओं की टोली निचले स्तर पर तैयार कर रोजगार आन्दोलन को गति देना बिहार के सुखद भविष्य की सबसे बड़ी जरुरत है। औद्योगिक निवेश और कानून-व्यवस्था का मुद्दा भी नई सरकार के लिए चुनौती बनकर खड़ा है। मिथिला क्षेत्र में विकास के सवाल ने भी बीजेपी के ग्राफ को मजबूत किया। चुनावी दौर में मोदी सरकार ने दरभंगा से हवाई सेवाओं की हरी झंडी दी तो मिथिला ने उत्साहजनक भरपाई की।

नतीजों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उभरा है कि मुख्यमंत्री कौन? क्या नीतीश कुमार नैतिकता के आधार पर पीछे हट जाएंगे? क्या बीजेपी ने उन्हें प्रचंड जीत हासिल करने के बाद उसी भाव-भावना से मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करेगी जैसा कि वह पहले अनेक अवसरों पर कर चुकी है? सवाल ये भी उठ रहे हैं कि क्या इस बार नीतीश कुमार बतौर मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा कर सकेंगे या फिर केंद्र में मंत्री पद की ओर रूख करेंगे? इस सारे सवालों के लिए लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर मुखातिब थे और उन्होंने सवालों से जुड़ी सारी अटकलों को समय रहते विराम भी दे दिया। बीजेपी कार्यालय में विजय सभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ किया है कि ‘बिहार में एनडीए के नेता नीतीश कुमार हैं, और वही बिहार सरकार का नेतृत्व भी करेंगे।’ जाहिर तौर पर नीतीश की अगुवाई में बिहार प्रगति, सुशासन और विकास के नूतन प्रकाश पर्व की ओर देखने लगा है क्योंकि बिहार में राजनीतिक नेतृत्व के सुदृढ़ हुए बगैर भारत की राजनीतिक यात्रा हमेशा ही डगमग होती रही है। बिहार के समृद्ध हुए बगैर भारतीय राजनीति की ओर गांव-गरीब-किसान को सुखी-समृद्ध बनाने का हर वायदा भी अधूरा है।

डॉ. राकेश उपाध्याय

 

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