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क्या ये बेबाक पत्रकारिता का अंत है?

क्या ये बेबाक पत्रकारिता का अंत है?

देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रेस की आजादी जैसे विषय एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। दरअसल एक न्यूज चैनल जो कुछ समय से लगातार सनसनीखेज खुलासे और राज्य सरकार के खिलाफ खबरें प्रसारित कर रहा था आज खुद खबर बन गया है। इस विषय को लेकर सोशल मीडिया के मंचों से लेकर देशभर में विमर्श चालू है। जैसा अमूमन होता है समाज दो पक्षों में बंट गया है। एक पक्ष का मानना है कि उस न्यूज चैनल का एडिटर-इन-चीफ देश में होने वाली साजिशों को बेनकाब करते-करते आज खुद एक साजिश का शिकार हो गया। यह पक्ष उस चैनल के एडिटर-इन-चीफ के प्रति सहानुभूति रखता है जो खुद को जनता की आवाज कहता था लेकिन आज अपनी आवाज देश के सामने रखने से लाचार है। जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि सबकुछ कानून के दायरे में हो रहा है और कानून के आगे सब बराबर हैं।

ये तो हुई देश के आम लोगों की बात लेकिन जो पत्रकार जगत किसी भी पत्रकार पर सरकार की कार्यवाही को प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़कर लामबंद हो जाता था आज वो चुप है। सम्भव है सबके अपने-अपने स्वार्थ हों। हो सकता है कि उनकी व्यापारिक प्रतिद्वंद्वीता उन्हें निष्पक्षता का आवरण ओढऩे के लिए मजबूर कर रही हो। इसलिए अपनी इस चुप्पी का उन्होंने एक बेहद मासूम सा तर्क भी ढूंढ़ लिया है कि वो इस मामले में इसलिए नहीं बोलेंगे क्योंकि जिस मामले में वो पत्रकार सलाखों के पीछे है उसका पत्रकारिता से कोई संबंध नहीं है।

दरसअल जब किसी सभ्यता में सही और गलत होने की परिभाषा पॉलिटिकली और लीगली करेक्ट यानी राजनैतिक अथवा कानूनी रूप से सही होने तक सीमित हो जाती है तो नैतिकता का कोई स्थान नहीं रह जाता। इतिहास गवाह है कि सभ्यता के विकास के साथ-साथ नैतिक और सामाजिक मूल्यों का पतन होता जाता है।

रामायण के काल में राजा द्वारा नीति-नैतिकता के तराजू में तोली जाती थी और जो नैतिक रूप से सही हो उसी नीति का अनुसरण किया जाता था। लेकिन महाभारत का काल आते आते नीति महत्वपूर्ण हो गई और नैतिक मूल्य पीछे छूट गए। यही कारण था कि भीष्म पितामह गुरु द्रोण और विदुर जैसे विद्ववानों की सभा में इतिहास के सबसे अनैतिक कृत्य को अंजाम दिया गया। नीति के विद्वान विदुर को भी दुर्योधन के तर्कों ने बेबस और असहाय कर दिया था। इतिहास का शायद वो पहला ऐसा उदाहरण था जिसमें सत्ता के नशे में ऐसे कृत्य को अंजाम दिया गया जो नीति के तर्कों से भले ही सही रहा हो लेकिन मूल्यों के तराजू पर अधर्म था।

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आज नीति ने कानून का रूप ले लिया है। तो क्या आज हमारी सभ्यता उस मोड़ पर खड़ी है जहां कानून की धाराएं महत्वपूर्ण है, उनके पीछे छुपे भाव नहीं? इस पत्रकार की गिरफ्तारी ने देश में इस विमर्श को जन्म दे दिया है कि जिस कानून का सहारा आम आदमी न्याय की आस में लेता है कैसे आज वो खुद अपने दुरुपयोग से असहाय नजर आ रहा है। क्योंकि यहां प्रश्न एक पत्रकार की गिरफ्तारी पर नहीं है बल्कि गिरफ्तारी के तरीके पर है। प्रश्न कानूनी प्रक्रिया का नहीं है बल्कि उस प्रक्रिया का सहारा लेकर समय टालने और उसके दुरुपयोग पर है। और इन प्रश्नों को तब और हवा मिलती है जब मीडिया में इस प्रकार की खबरें आती हैं कि उस पत्रकार की दीवाली जेल में मनेगी या फिर राज्य सरकार के एक मंत्री का यह कथन सामने आता है कि वो पत्रकार आत्महत्या कर लेगा। इससे पहले उस चैनल के 1000 पत्रकारों पर एफआईआर भी दर्ज की गई थी। शायद आजाद भारत के इतिहास में यह अपने प्रकार का पहला वाक्या था। इसी प्रकार उस चैनल के प्रसारण को बंद करवाने के प्रयास संबंधी भी कई  बातें सामने आई थीं। यह सभी तथ्य उस पत्रकार पर हुई कानूनी कार्यवाही के कारण और नियत दोनों पर निश्चित ही प्रश्नचिन्ह लगाते हैं।

कुछ बुद्धिजीवीयों का कहना है कि पालघर में साधुओं की हत्या हाथरस कांड और बहुचर्चित सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या जैसे केसों में सच की तलाश उन्हें इस मोड़ पर ले आई। शायद यही वजह है कि देश भर में आम लोगों की सहानुभूति उस पत्रकार के साथ है। आज देश को लगता है कि यहां बात एक आम आदमी के मूलभूत अधिकारों की है। यहां बात देश के उस लोकतंत्र की है जो किताबों में तो दिखाई देता है लेकिन धरातल पर नहीं। लेकिन यह सब देखते हुए भी कुछ बुद्धिजीवी खुद को किसी विचारधारा में कैद कर लेते हैं और चुप रहते हैं। वे कल भी सच के साथ नहीं थे और आज भी सच को स्वीकार नहीं करना चाहते। ये वो लोग हैं जिन्हें बात बात में संविधान खतरे में नजर आता था लेकिन आज सबकुछ ठीक लग रहा है। ये वो लोग हैं जो असहिष्णुता की संकल्पना लेकर आए थे और आज सहिष्णुता का प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन उन्हें समझ लेना चाहिए कि आज सोशल मीडिया का दौर है जहां खबरें दबती नहीं हैं बल्कि वायरल होती हैं। आज उस पत्रकार से देश का आम आदमी खुद को जोड़कर देख रहा है। वो कह रहा है कि उसने अपराध किया है तो उसे कठघरे में खड़ा करके सजा दो लेकिन देश की न्यायव्यवस्था को तो कठघरे में खड़ा मत करो। क्योंकि इस देश की न्यायव्यवस्था का मूलमंत्र है कि भले ही सौ गुनहगार छूट जाएं पर किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। यही वजह है कि आज देश के पत्रकार और बुद्धिजीवी भले ही दो धड़ों में बंटे हैं लेकिन देश का आम आदमी इस लड़ाई में एक है।

 

डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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