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वंशवाद की राजनीति को ना

वंशवाद की राजनीति को ना

हाल में आए बिहार चुनाव के परिणाम 20-20 क्रिकेट मैच से भी अधिक रोमांचक रहे। अब जब चुनाव के परिणाम एनडीए के पक्ष में आ चुके हैं, इस पर महागठ्बंधन को बैठकर चिंतन करने की आवश्यकता है। चुनाव से पहले महागठ्बंधन के तेजस्वी यादव की जीत को बड़े जोर-शोर से दिखाने का प्रयास किया गया, जो अंतत: कारगर नहीं हुआ। तेजस्वी यादव द्वारा की गई सैकड़ों रैलियां परिणाम न दे पायी। इस चुनाव में नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे को काउंटर करने के लिए भरपूर जातीय राजनीति की गई। इसलिए यह वास्तव में बिहार के लोगों की जीत है। पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव मे भाजपा की सीटों में वृदि हुई हैं, जबकि इसकी  सहयोगी जदयू के सीटें कुछ घटीं हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि लोगों ने भाजपा के राष्ट्र की एकता-अखंडता और  विकास कार्यों में विश्वास जताया हैं। यह दूसरे दलों के लिए भी एक संदेश हैं की वे अपनी नीतियां, राजनीतिक दृष्टिकोण और गठबंधन को स्पष्ट रखें। बिहार के लोगों ने जमीनी मुद्दों पर अपना मत दिया है न कि अवास्तविक  मुद्दों पर। कहीं  न कहीं इस चुनाव में सुशासन एक बड़ा मुद्दा था, जिसे राज्य में बनाए रखना नई सरकार की एक बार फिर बड़ी प्राथमिकता होगी। यहां यह बताना आवश्यक है कि कांग्रेस और लालू यादव ने केवल वायदे के बल पर राज्य में 58 वर्षों तक शासन किया। और राज्य को इससे कल्पना से भी अधिक नुकसान हुआ। जिस प्रकार चुनाव परिणाम काफी क्लोज रहा, उसका श्रेय लोजपा के चिराग पासवान को जाता हैं, जो एनडीए की बड़ी जीत में रोड़ा बन गए। आखिर उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ चुनाव क्यों लड़ा? जैसा कि राहुल गांधी और लालू यादव के परिवार के सत्ता में आने का कारण केवल वंशवाद  हैं, चिराग के साथ भी वही बात है, जोकि लोकतंत्र के लिए सही नहीं है। राजद ने अपने शासनकाल में बिहार को जंगलराज बनाकर 20 वर्ष पीछे धकेल दिया था। और यदि राजद एक बार फिर जीतता तो ऐसा फिर होता। इन बातों को न भूलते हुए बिहार की जनता ने आखिरकार विकास की राजनीति को ही मौका दिया। अब जब भाजपा-जदयू गठबंधन की जीत हुई है, तो यह कह सकते हैं की लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास को चुना, न की कांग्रेस, राजद और लोजपा की जातीय राजनीति को। और  यह इन दलों के लिए एक बड़ी सीख है। बिहार अब विकासात्मक राजनीति की टेस्ट लेबोरेटरी होगी जिसमें जातिवादी एजेंडे  और वंशवाद के लिए कोई स्थान नहीं होगा।

15 वर्ष तक लालू यादव ने राज्य के विकास की अनदेखीकर केवल वायदे ही करते रहे और उसे भी पूरा करने में असफल रहे। नीतीश कुमार ने उतने वायदे तो नहीं किया, लेकिन जो भी किये उन्हें निभाया। बिहार चुनाव में राजद, लोजपा और कांग्रेस का प्रदर्शन न केवल उनकी विश्वसनीयता के क्षरण को दर्शाता है बल्कि लोगों का मोदी में विश्वास को भी दर्शाता है।तेजस्वी यादव और राहुल गांधी की जोड़ी बहुत कम ही मोदी की छवि को चुनाव में धूमिल कर पायी, क्योंकि लोगों ने वंशवाद की राजनीति करने वाली कांग्रेस को दूसरे वंशवाद की राजनीति करने वाली राजद का सहयोगी पाया। कांग्रेस और राजद दोनो ने एक बार फिर वंशवाद का कार्ड खेला जो असफल रहा। राजनीति में सत्ता, परिवार और सम्बन्धियों के बीच बांटने की चीज़ नहीं होती हैं। लेकिन देश में कई ऐसे दल हैं, जो राजनीति में अपने पुत्र और पुत्री को बढ़ावा देते हैं और बिहार उनमें से एक है। राजद इस चुनाव में भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हैं, लेकिन पहले से सीटें कम हुई हैं। सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह रही की सभी टीवी चैनलों ने अपने एग्जिट पोल में महागठबंधन को विजयी घोषित कर दिया था। और तेजस्वी को मुख्यमंत्री तक घोषित कर दिया था। मीडिया ने इस चुनाव में तेजस्वी को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दे दी थी। कुछ ने तो सोशल मीडिया पर तेजस्वी के पक्ष में लोगों को रिझाने से लेकर, तेजस्वी को मुस्लिमों का साथ, दलित के घर भोजन करने आदि जैसी बातों को ख़ूब दिखाया। सबसे बड़ी बात तो यह रही की राहुल गांधी की कई रैलियों के बावजूद भी कांग्रेस का प्रदर्शन सबसे निचले स्तर का रहा। किसी भी नेता को  ऐसे प्रदर्शन के बाद  बाहर का रास्ता दिखा दिया गया होता। लेकिन गांधी परिवार अपवाद हैं। शायद इसलिए ही कांग्रेस की इस प्रकार पराजय हो रही है। यहीं यदि कांग्रेस की  सीटों में अच्छी बढ़ोत्तरी हो गयी होती तो बिहार में जीत का सारा श्रेय राहुल गांधी को चला गया होता। यह दिलचस्प हैं कि हमने लोकतांत्रिक भारत में साम्राज्यों को ध्वस्त करने की कोशिश की, लेकिन हमने फिर देश की लोकतांत्रिक पार्टी के भीतर ही वंशवाद का साम्राज्य बनाने का तरीका ढूंढ लिया!

 

Deepak Kumar Rath

 दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

 

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