ब्रेकिंग न्यूज़ 

बिहार चुनाव नतीजों के संकेत

बिहार चुनाव नतीजों के संकेत

बिहार के चुनाव नतीजों ने एक बार फिर साबित किया है कि गौतम सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बनाने वाली बिहार की धरती के लोगों के मन को एक्जिट पोल के कर्ता-धर्ता नहीं समझ पाए। एक्जिट पोल नतीजों में बिहार में उस लालू यादव के बेटे तेजस्वी की अगुआई में महागठबंधन की सरकार बनती नजर आ रही थी, जो कुख्यात चारा घोटाला केस में रांची के रिम्स में बतौर सजायाफ्ता कैदी वक्त गुजार रहे हैं। लेकिन बिहार ने सारे एक्जिट पोल नतीजों को धत्ता बताते हुए एक बार फिर उस नीतीश कुमार की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन पर भरोसा जताया है, जिन्होंने 2013 में भारतीय जनता पार्टी की ओर से नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार और उम्मीदवार घोषित करते ही गठबंधन से अलग राह चुन ली थी।

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को 124 सीटें मिली हैं। जिनमें भारतीय जनता पार्टी को 74 सीटें मिली हैं, जबकि जनता दल यू सिर्फ 43 सीटों पर ही कामयाब रही। गठबंधन में शामिल हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा यानी हम को जहां चार सीटें मिली हैं, वहीं विकासशील इन्सान पार्टी को भी चार ही सीटें मिली हैं। सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रहे महागठबंधन के प्रमुख राष्ट्रीय जनता दल को 75 सीटें हासिल हुई हैं। जबकि उसके सहयोगी कांग्रेस को 19 स्थानों पर जीत मिली है। इस बार राजद के साथ गठबंधन में शामिल कम्युनिस्ट पार्टियों को अच्छी-खासी सफलता मिली है। महागठबंधन में शामिल बंदूक की गोली से सत्ता निकलने की सिद्धांतवाली कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) को जहां 12 सीटें मिली हैं, वहीं भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को दो-दो स्थानों पर जीत हासिल हुई है।

बिहार की जनता ने इस बार कई चौंकाने वाले नतीजे दिए हैं। पहला चौंकाने वाला नतीजा यह है कि हैदराबाद के सांसद ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन यानी एमआईएम ने पांच सीटें जीत ली है। बिहार की राजनीति में कद्दावर माने जाते रहे केंद्रीय मंत्री रामबिलास पासवान के बेटे ने इस चुनाव के दौरान जनता दल यू की सत्ता की सीढ़ी में हर कदम पर तेल गिराया, फिसलन पैदा किया, इसके बावजूद वह सिर्फ मटिहानी की सीट ही जीत पाने में कामयाब रही है। बिहार में अक्सर आपदा में मेहनत करने वाले बाहुबली पप्पू यादव की पार्टी का खाता तक नहीं खुला। वे खुद मधेपुरा से तीसरे स्थान पर रहे। कभी नीतीश कुमार के साथी रहे उपेंद्र कुशवाहा का लगातार ठीया बदलते रहना भी बिहार की जनता को पसंद नहीं आया है। पिछली लोकसभा के दौरान केंद्र में मंत्री और तीन सांसदों के मुखिया रहे उपेंद्र की पार्टी का खाता तक नहीं खुला। जबकि बसपा के साथ मिलकर उन्होंने खुद को राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर प्रस्तुत किया था।

बिहार के चुनाव के आंकड़ों पर तो चर्चा खूब होगी। लेकिन इस चुनाव ने कुछ संकेत दिए हैं। राजनीतिक बिसात पर ये संकेत बरसों तक की राजनीति का नजरिया पेश कर रहे हैं। बिहार के सीमांचल में एमआईएम की जीत ने मुसलमानों की राजनीति करने वाले दलों को तो चेतावनी दी ही है, मुसलमान मतदाताओं को लेकर बनी अवधारणा को भी तोड़ा है। अब तक माना जाता है कि मुस्लिम मतदाता भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए उसके सामने खड़े मजबूत दल या उम्मीदवार के पक्ष में गोलबंदी करते हैं। लेकिन एमआईएम की जीत ने यह बीजेपी के नाम पर मुसलमानों को डराने वाले दलों को चेतावनी दी है। इसका संकेत यह भी है कि जो दल भारतीय मुसलमानों के हक की बात ईमानदारी से मजबूत ढंग से करेगा, उसे वे समर्थन देंगे। अब माना जा रहा है कि देश के सबसे ज्यादा मुस्लिम वोटरों वाले राज्य पश्चिम बंगाल के अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनावों में एमआईएम उतरेगी और अपनी ताकत ऐसे ही दिखाएगी।

बिहार चुनावों ने यह भी संकेत दिया है कि महिलाओं में नरेंद्र मोदी का जादू चल रहा है। इस चुनाव में महिलाओं के मिले समर्थन को खुद प्रधानमंत्री ने भी याद किया है। माना जा रहा है कि अब महिलाएं अपने घर-परिवार के पुरूषों की तरह ना तो सोचती हैं और ना ही उनके कहने के मुताबिक वोट देती है। नीतीश कुमार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को विभाजित करने में एनडीए का नेतृत्व कामयाब रहा। माना जा रहा है कि चिराग पासवान ने जिस तरह पूरे चुनाव अभियान में सिर्फ और सिर्फ नीतीश कुमार पर हमला किया, उससे नीतीश विरोधी वोटों में बंटवारा हुआ। हालांकि उन्होंने जिस तरह सिर्फ जनता दल यू के उम्मीदवारों के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतारे, भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता रहे राजेंद्र सिंह, रामेश्वर चौरसिया और उषा विद्यार्थी जैसे नेताओं को मैदान में उतारा, उससे स्पष्ट हुआ कि उनकी मंशा सिर्फ और सिर्फ जनता दल यू को ही नुकसान पहुंचाने की थी। इसमें वे कामयाब रहे। वैसे कुछ राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर चिराग ने यह रणनीति नहीं अपनाई होती तो उन्हें मिले छह प्रतिशत मतों में से अगर आधे भी महागठबंधन को मिल जाते तो पांसा पलट सकता था। जबकि जनता दल यू खेमा मानता है कि अगर चिराग ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे होते तो जनता दल यू कम से कम 28 से 35 सीटें और जीतता। कुछ राजनीतिक जानकारों का दावा है कि अगर लोक जनशक्ति पार्टी ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा होता और राजग का वह हिस्सा होती तो राजग कम से कम चालीस सीटें और जीतता।

इस चुनाव के संकेत यह भी हैं कि कांग्रेस को जनता ने नकार दिया है। वह बैसाखियों के सहारे चाहे जितनी भी यात्रा कर ले, जनता उसके बहकावे में नहीं आने वाली। महागठबंधन में उसने 70 सीटों पर किस्मत आजमाई, लेकिन उसके करीब डेढ़ दर्जन उम्मीदवार लड़ाई में ही नहीं रहे। पिछली विधानसभा के मुकाबले 8 सीटें उसे कम हासिल हुईं। इस चुनाव के यह भी संकेत हैं कि राजनीति आसान काम नहीं है। पप्पू यादव ने इन दिनों अपनी छवि खूब बनाई, लेकिन उनकी पार्टी कुछ खास नहीं कर पाई।

बिहार के इन चुनाव नतीजों ने कम्युनिस्ट पार्टियों को उत्साह से भर दिया है। वे इतना उत्साह में हैं कि यहां तक दावे करने लगी हैं कि अगर कांग्रेस के मुकाबले उन्हें ज्यादा सीटें दी जातीं तो वे और ज्यादा जीत सकती थीं। हालांकि उनके बारे में यह भी कहा जा सकता है कि उनका सपना बचा रहे और अगले साल होने वाले पश्चिम बंगाल के चुनाव में वे उसे पूरा कर सकें।

इस चुनाव में कई उलटबांसियां भी दिखीं। जनता दल यू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव समाजवादी राजनीति के पुरोधा डॉक्टर राममनोहर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद की उपज माने जाते हैं। उन्होंने 1974 में मध्य प्रदेश के जबलपुर उपचुनाव से संसदीय राजनीति में कांग्रेसी उम्मीदवार को हराकर कदम रखा था। राजनीति के महारथी रहे शरद इन दिनों विरथ हैं। उनकी बेटी सुभाषिनी गुडग़ांव में शादी के बाद सुभाषिनी राव हो गई हैं। लेकिन उन्होंने राजनीति में आने के लिए उस कांग्रेस का हाथ थामा, जिसके विरोध की उपज उनके पिता हैं। सुभाषिनी को कांग्रेस ने मधेपुरा के बिहारीगंज सीट से उम्मीदवार बनाया, लेकिन वह खेत रहीं। मार्च 1997 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष और आइसा के नेता रहे चंद्रशेखर की उनके गृह जिले सिवान में हत्या कर दी गई। तब वे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की राजनीति में सक्रिय थे। उनकी हत्या का आरोप सिवान के बाहुबली नेता शहाबुद्दीन पर लगा। जो लालू यादव के करीबी बाहुबली नेता थे। उसके खिलाफ आइसा और सीपीआई-एमएल ने जबर्दस्त प्रदर्शन किया। लेकिन विधानसभा में ताकत हासिल करने के लिए वह पार्टी अपने नेता के हत्या तक को भूल गई और राष्ट्रीय जनता दल के साथ चुनाव लड़ गई।

इन चुनाव परिणामों का संकेत स्पष्ट है कि नीतीश सरकार को आगे और गंभीरता से काम करना होगा। अन्यथा विधानसभा के सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल उसे चैन से रहने नहीं देगी। इस चुनाव ने तेजस्वी यादव को स्थापित किया है। बेशक वे हार गए हैं, लेकिन उनके नेतृत्व पर मुहर लग गई है। लालू राज के कुशासन की छाया मौजूदा चुनावों पर ना पड़े, इसके लिए उनके सलाहकारों ने महागठबंधन के पोस्टरों से लालू-राबड़ी के फोटो तक हटा दिए। इसका उन्हें फायदा भी हुआ, लेकिन इतना नहीं कि सत्ता की दहलीज तक पहुंच सकें। तेजस्वी ने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान 251 सभाएं कीं। लेकिन उनका गुस्सैल रवैया भी सामने आया। मौजूदा चुनाव नतीजों ने उन्हें संदेश दिया है कि वे विनम्र बने रहें और आने वाले दिनों में अपने उग्र कार्यकर्ताओं पर काबू पाने की कोशिश करें। तभी बिहार की जनता उन्हें प्यार कर सकती है और उन्हें अपना सिरमौर बना सकती है। हालांकि लालू-राबड़ी के कुशासन की याद उनकी रहा में रोड़ा बनी रहेगी। इन चुनावों ने भारतीय जनता पार्टी को भी संकेत दिए हैं कि उसे राज्य में अपने लिए दूसरी पांत के नेता को उभारना होगा। उसे सुशील मोदी पर निर्भरता कम करनी होगी। इसके साथ ही उसे सवर्ण मतदाताओं को भरोसे में लेने के लिए कोशिश करनी होगी। पहले दौर में भोजपुर और मगध में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को करारी शिकस्त मिलने की वजह है सवर्ण मतदाताओं का गुस्सा।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.