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राष्ट्रहित से बड़ा एनजीओ नहीं

राष्ट्रहित से बड़ा एनजीओ नहीं

हमारे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ सक्रिय हजारों गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), खासकर ग्रीनपीस और फोर्ड फाउंडेशन के विदेशी चंदे को रोककर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने सही कदम उठाया है। सरकार को अब इसे तार्किक परिणति तक पहुंचाना चाहिए। यानी उन एनजीओ पर प्रतिबंध लगे जो किसी और मकसद के लिए हासिल चंदे की रकम का इस्तेमाल राजनैतिक या ऐसी ही दूसरी गतिविधियों के लिए करते हैं। आखिरकार लोकतंत्र का मतलब सिर्फ सरकार और सत्तारूढ़ लोगों का एनजीओ के जरिए विरोध ही नहीं है, बल्कि इसमें आम लोगों और सरकार के द्वारा एजनीओ के दावों को चुनौती देने का अधिकार भी आता है। बेशक, यह चुनौती तथ्यों, मुद्दों और पुख्ता दावों पर ही आधारित होनी चाहिए।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा विदेशी चंदे की प्राप्ति और उसके इस्तेमाल संबंधी रिपोर्ट आंखें खोलने वाली है, ”विदेशी चंदे पाने वाले और उसका इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं की तादाद लगातार बढ़ रही है, लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि बड़ी संख्या में पंजीकृत संस्थाएं अपनी सालाना लेखा-जोखा पेश नहीं कर रही हैं, जो कानूनन अनिवार्य है।’’ इसके अलावा, सीबीआई की देश भर के एनजीओ की एक समीक्षा से पता चलता है कि 20 राज्यों में 22,39,971 एनजीओ सक्रिय हैं, लेकिन सिर्फ 10 प्रतिशत (करीब 2,23,428) ही सालाना लेखा-जोखा पेश कर रहे हैं। छह केंद्र शासित राज्यों में करीब 5,684 एनजीओ सक्रिय हैं, जिनमें सिर्फ आधे ही सालाना रिटर्न दाखिल करते हैं। असम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा में सक्रिय एक भी एनजीओ सालाना रिटर्न दाखिल नहीं करता। एफसीआरए कानून के प्रावधानों में राजनैतिक गतिविधियों में विदेशी चंदे के इस्तेमाल की मनाही है।  फिर भी, विदेशी चंदे से संचालित बड़ी संख्या में एनजीओ कई तरह की राजनैतिक गतिविधियों में जुड़े रहते हैं, खासकर चुनावों के दौरान किसी खास राजनैतिक दल के खिलाफ प्रचार में संलिप्त रहते हैं।

सबसे डरावना तथ्य तो यह है कि कई प्रमुख एनजीओ कथित तौर पर विदेशी एजेंसियों की शह पर देश के लिए महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं के खिलाफ विरोध की अगुआई कर रहे हैं, जिससे देश की प्रगति अवरुद्ध हो रही है। कई एनजीओ दावा तो यह करते हैं कि वे ‘मानवाधिकार’, ‘सामाजिक सशक्तीकरण’, ‘ग्रामीण विकास’ जैसे मुद्दों पर सक्रिय हैं, लेकिन कथित तौर पर देश में स्थित या विदेशी शह से संचालित उग्रवादी राजनैतिक संगठनों के विध्वंसकारी एजेंडे में मदद करते हैं और उन्हें अलगाववादी आंदोलनों की मदद करते पाया गया है। कुछ ईसाई मिशनरियां तो ‘विकास’ संगठनों के नाम पर ऐसी गतिविधियां भी चलाती हैं जिनसे अक्सर सामाजिक शांति प्रभावित होती है और देश का सामाजिक संतुलन बिगड़ता है।  एक आंकलन यह है कि ”देश में पंजीकृत करीब 20 लाख एनजीओ और संस्थाओं में सिर्फ करीब 30,000 (यानी 1.5 प्रतिशत) ही वास्तव में विकास कार्यों से जुड़े हुए हैं।’’ इसमें दो राय नहीं कि सच्ची असहमति लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन अगर यह किसी विदेशी दानदाता से संचालित है, जिसके अपने मकसद हों तो यह देशहित को नुकसान पहुंचाने की कार्रवाई ही है।

इस पृष्ठभूमि में यह गौरतलब है कि मोदी सरकार ने करीब 9,000 विदेशी चंदे से संचालित एनजीओ का पंजीकरण रद्द कर दिया है। लिहाजा, आखिरकार देश में एक ऐसी सरकार आई है जो देश में एनजीओ चंदे के मामले में तहकीकात कर रही है, पता लगा रही है कि आखिर इस पैसे का कहां इस्तेमाल होता है। आखिर इतने दशकों से सच्चाई जनता से छुपाई गई है। इस दौरान देश भर में न जाने कितने एनजीओ कुकुरमुत्ते की तरह उग आए और हर मामले में अपनी नाक घुसेड़ते रहे हैं। मिशनरी संगठनों का भारत में व्यापक असर है। यह इसी से जाना जा सकता है कि देश में सेना के बाद उनके पास सबसे अधिक जमीन है। कुछ समय पहले, ग्रीनपीस की एक कार्यकर्ता को विमान से उतार लेने की घटना के बाद काफी हो-हल्ला मचा था, जिसके टिकट का भुगतान ब्रिटेन से हुआ था। सवाल है कि वह किसके हित में लंदन जा रही थीं?

पंडित नेहरू के दौर से ही देश के नेहरू -गांधी खानदानी शासकों का कथित तौर पर दुनिया भर के मिशनरी संगठनों से संबंध रहा है। उन्होंने कभी ऐसा कोई कदम उठाना जरूरी नहीं समझा, जिससे इस देश में उनकी गतिविधियों पर कोई असर पड़े। देश में इस बीच कुछ और सरकारें भी आईं, लेकिन वे भी इन संगठनों के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाईं। पिछले एक दशक (2004-2013) के यूपीए-1 और यूपीए-2 के शासन में तो सबने देखा कि कैसे एनजीओ काफी सक्रिय थे। उन्होंने कुडनकुलम और जैतापुर के परमाणु बिजली संयंत्रों के खिलाफ विरोध आयोजित किया, नर्मदा बांध के निर्माण के विरोध में सक्रिय भागीदारी निभाई। दक्षिण कोरिया की पॉस्को का कारखाना लगाने का विरोध किया। अगर पॉस्को कारखाना लगाने में सफल हो जाता है तो देश में अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश होगा।

ऐसे में यह सच्चाई बड़ी कड़वी है कि एक अखबार के मुताबिक 2013 में एनजीओ संगठनों को 12,500 करोड़ रु. का विदेशी चंदा मिला, लेकिन बमुश्किल दो प्रतिशत ने ही इसकी सूचना सरकार को दी। यह रकम अक्सर उस काम में इस्तेमाल नहीं की जाती, जो उसका घोषित मकसद है। भारत में गैर-मुनाफा संगठनों और संस्थाओं को मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के मुकाबले अधिक आदर से देखा जाता है, क्योंकि उन्हें नि:स्वार्थ भाव से ‘सामाजिक कार्य’ करने वाला माना जाता है और वे बिना किसी फायदे के गरीब और वंचितों की मदद करते हैं। हालांकि यह एक मिथक ही है। मूल इरादों और मकसद के मामले में तो अपने मालिकों और शेयरधारकों के लिए मुनाफा कमाने वाली कंपनियों और किसी खास मकसद (पर्यावरण, आदिवासियों वगैरह) के नाम पर अपना फायदा उठाने वाले इन गैर-मुनाफा संस्थाओं में कोई खास नैतिक फर्क नहीं है। लेकिन, आज हालात बदल गए हैं। अब नई तकनीक से उनकी गतिविधियों की जानकारी आसान हो गई है। फिर, मौजूदा मोदी सरकार पूर्ववर्ती सरकारों से अधिक मजबूत है और ऐसे तत्वों से लडऩे से कतई हिचकती नहीं लगती है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

अभ्यास से उन्नति जीवन का अखंड नियम है, क्योंकि इससे आत्मा की प्राणशक्ति को अधिक क्रिया करनी पड़ती है और वह नित्य व्यवहार में आने वाले चाकू की तरह मुर्छा आदि से मुक्त रहकर तेज ही होती है। शारीरिक और मानसिक विकास के शास्त्रीय सिद्धांतों पर विचार करने से यह सिद्ध होता है कि मानसिक विकास करना, अपनी बुद्धि को बढ़ाना, मनुष्य के अपने हाथ में है और वह प्रयत्नपूर्वक बुद्धिमान् बन सकने में सर्वथा स्वतंत्र है।                                                                                                                                                                                                                                                         -पं.श्रीराम शर्मा आचार्य

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