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एकाग्र मन सफलता की कुंजी

एकाग्र मन सफलता की कुंजी

मनुष्य अपने जीवन में उन्नति के लिए अनेक रास्ते अपनाता है। कोई कितना भी प्रयास करे, कोई भी रास्ता अपनाए एकाग्रचित हुए बिना कोई भी कार्य सफल हो पाना दुश्कर है। एक सफल आदमी का यह प्रधान लक्षण है कि वह हर कार्य को पूरी एकाग्रता के साथ करता है। उसका मन सदैव दृढ़ रहता है। इससे उसे काम करने के लिए अधिक-से-अधिक शक्ति मिलती है।

मन एक ऐसी चीज है जिसको वश में रखना वास्तविक रूप से बहुत कठिन है। हमें खुद को भी यह ज्ञान नहीं होता कि मन कितनी जल्दी भटक जाता है। असल में मन इंद्रियों द्वारा परिचालित है। जब तक हम अपनी इंद्रियों को बस में नहीं करते तब तक हम अपने मन को स्थिर नहीं कर सकते। हम अपने आपको जितना विषय-वासना में डुबो कर रखते हैं, हमारा मन उतना क्षीण होता जाता है। क्षीण मन छोटी-से-छोटी चीज के लिए विचलित हो जाता है। एक बार मन को वश में रखने का अभ्यास करेंगे तो मन में एकग्रता बढ़ती जाएगी। मनुष्य की सफलता की चाबी उसके मन की एकाग्रता में ही निहित है। एकाग्रचित व्यक्ति कोई भी कार्य करता है तो निसंदेह उसे सफल प्राप्त होती है।

दुख का विषय यह है कि हम में से ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जिन्हें इसका ज्ञान होकर भी जीवन में कुछ नहीं कर पाते हैं। अपने चारों तरफ बिछे हुए मायाजाल में फंस जाते हैं। खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं। मन को नियंत्रण में रखना कोई छोटी बात नहीं है, लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास करने से यह संभव हो सकता है। हम जितना बाहरी दुनिया से दूर रहते हैं, उतना ही अधिक अपने मन की गहराई तक पहुंच पाते हैं। हमेशा दर्शाते हैं कि हम कार्य को पूर्ण एकाग्रता के साथ कर रहे हैं। वास्तव में कार्य करते समय हमारा मन कहीं और होता है। बिना एकाग्रता के की हुई पूजा भी मूल्यहीन मानी जाती है।

एक छोटी सी कहानी है। एक मुसलमान बादशाह शिकार पर गया था। जंगल में घूमते-घूमते उसके नमाज का समय हो गया। उसने वहीं पर एक चादर बिछाकर नमाज पढऩे लगा। उसी जंगल में एक महिला अपने पति के घर वापसी में देर हो जाने का कारण बेचैनी से इधर-उधर दौड़ रही थी। वह एकाग्रचित होकर अपने पति को ढूंढ़ रही थी। उसका ध्यान रास्ते में बिछाई बादशाह की चादर पर नहीं गया और उसका पैर उस चादर पर पड़ गया। नमाज पढऩे के बाद गुस्से से उठकर बादशाह ने महिला को बुलाया और उसके इस दु:साहस का कारण पूछा। महिला विनम्रता से बोली, ”मेरा मन तो एकाग्रचित होकर अपने पति को ढ़ूढ़ रहा था, इसलिए अपका चादर दिखाई नहीं दिया, लेकिन आप एक सच्चे मुसलमान होकर भी नमाज के समय अपना ध्यान अल्लाह में नहीं लगा पाए और आपका ध्यान अपने चादर पर रहा।’’ तत्क्षण ही बादशाह को अपनी गलती का एहसास हुआ। भगवान का स्मरण करं तो पूर्ण एकाग्रता के साथ करें, नहीं तो भगवान के पास हमारी बात नहीं पहुंच पाती है।

साधना का मूल एकाग्रचितता है। एक साधक एकाग्रचित होकर अपनी दृष्टि द्वारा जड़ वस्तु को भी क्रियाशील बना सकता है। ईश्वर प्राप्ति का माध्यम कोई भी हो, बिना एकाग्रता के हर प्रयास व्यर्थ हो जाता है। इसलिए हमेशा अपने मन को एकाग्र रखें। इससे न केवल हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है, बल्कि ईश्वर प्राप्ति का मार्ग भी मिल जाता है।

  उपाली अपराजिता रथ

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