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राष्ट्रीय मीडिया और नैतिकता

राष्ट्रीय मीडिया और नैतिकता

मैं इस बात को स्वीकार करूंगा कि पत्रकारिता में औपचारिक रूप से प्रवेश करने के बाद पेशेवर रूप से आगे बढऩे से पहले फील्ड रिपोर्टिंग या सब-एडिटिंग जैसे कठिन कार्यों से मैं नहीं निखरा। ऐसा भी नहीं है कि पत्रकारिता की बुनियादी बातों को सिखने के लिए मैंने किसी पत्रकारिता स्कूल में प्रवेश लिया। बावजूद इसके, वरिष्ठ पत्रकार के तौर पर अपने कार्यों के कारण में मीडिया स्कूल का निदेशक और प्रमुख भी रहा। लेकिन, वह पूरी तरह प्रशासनिक कार्य था। जो मैं कहना चाहता हूं, वह यह है कि हालांकि पेशे से मैं पत्रकार जरूर हूं, लेकिन मुझे पत्रकारिता का सैद्धांतिक ज्ञान नहीं है। आज मैं जो भी हूं वह अन्य शैक्षिक पृष्ठभूमि के कारण हूं। एक प्रमुख दैनिक अखबार में समाचार प्रबंध समिति के सदस्य और बाद में अन्य जगह संपादक की हैसियत से मैंने मीडिया में नैतिकता को हमेशा महत्व दिया। मेरे मजबूत विचारों ने मेरे संपदकीय निर्णय को कभी प्रभावित नहीं किया। मैंने हमेशा ही अन्य विचारों को रखने का अवसर दिया। समाचार और विचार के बीच के अंतर को हमेशा बनाए रखा। मैंने हमेशा अपने रिपोर्टरों से तथ्यों की जांच करने के लिए कहा। मैं विश्वसनीय सूत्रों की गोपनीयता को बनाए रखने का हिमायती हूं और खबरें बनाने के लिए मैंने कभी भी उसका दुरूपयोग नहीं किया। सूत्रों के साथ ऑफ द रिकॉर्ड की गई बातचीत को छापना या प्रसारित करने को मैं धोखा मानता हूं।

दुर्भाग्य है कि दिल्ली आधारित मीडिया में इस नैतिकता का पालन करने वाले अल्पसंख्यक के रूप में मैं स्वयं को पाता हूं। इस कॉलम में मैं यह बताने का प्रयास करूंगा कि भारत की राष्ट्रीय मीडिया (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल) में नैतिकता को किस तरह समय-समय पर तिलांजली दी गई है। मीडिया तथ्यों को सामने लाने के बजाय धरणा बनाने के लिए लगातार पक्षपातपूर्ण होती जा रही है। मैंने हमेशा ही कहा है कि राष्ट्रीय मीडिया, संक्षेप में कहें तो दिल्ली आधारित मीडिया, पेशेवर होने की बजाय वैचारिक ज्यादा है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि इसके शीर्ष पदों पर वामपंथियों और कथित धर्मनिरपेक्षतावादियों का कब्जा है। इसलिए मीडिया वत्र्तमान सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (जिसके बारे में कहा जाता है कि दक्षिणपंथी दल है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है) के खिलाफ है और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के।

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यह देखना लाजिमी है कि किस तरह मीडिया ने दावा किया कि सोनिया गांधी के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणी करने के कारण प्रधानमंत्री मोदी ने गिरीराज सिंह को डांट पिलाई और संसद के गलियारों में वे रोते हुए दिखे। अब जरा इस कहानी की कड़ी को देखते हैं। कुछ दिन पहले बिहार के वैशाली में गिरीराज सिंह का एक आधिकारिक कार्यक्रम था। अपने कार्यक्रम को पूरा करने के बाद वे नजदीक के स्थानीय सर्किट हाउस में विश्राम करने के लिए पहुंचे। उसके बाद उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद कुछ पत्रकार अनौपचारिक बातचीत के लिए वहीं बैठ गए। बातचीत शुरू करने से पहले गिरीराज सिंह ने आग्रह किया – ”सभी लोग अपना कैमरा और सारे रिकॉर्डिंग डिवाईस बंद कर लें। यह पूरी तरह से अनौपचारिक बातचीत है, जो न लिखी जाएगी और न ही प्रसारित की जाएगी।’’ कुछ देर बाद गिरीराज सिंह ने महसूस किया कि उनमें से एक का कैमरा ऑन था। हालांकि यह अलग मामला है कि मंत्री को पूरा विश्वास था कि उनके भरोसे को किसी भी कीमत पर तोड़ा नहीं जाएगा। उसके बाद मंत्री ने एक मौलिक गलती कर दी, जो कि सोनिया गांधी के खिलाफ रेसिस्ट, सेक्सिस्ट कमेंट था। उन्होंने कहा – यदि राजीव गांधी ने किसी नाइजीरियन महिला से शादी की होती और सोनिया गोरी चमड़ी वाली नहीं होती, तो क्या कांग्रेस उन्हें स्वीकार करती?

यदि इसे फस्र्ट पोस्ट पर सबसे पहले पोस्ट करने की खबर सही है तो मैं आज के पत्रकारों को लेकर शर्मिंदा हूं। एक पत्रकार के रूप मे हम लोग मंत्रियों और राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की अनौपचारिक बातचीत का हिस्सा रहते आए हैं। लेकिन पत्रकारिता से जुड़ी नैतिकता इसे समाचार की श्रेणी में लाने की आज्ञा नहीं देती। क्या शयन-कक्ष की  बातचीत का खुलासा कर ब्रेकिंग न्यूज बनाना सही है? मैं मानता हूं कि यह सवाल गौर करने लायक है।

दूसरा, घृणास्पद ईमेल आने के खतरों के बावजूद मैं सिंह के कथन से पूरी तरह सहमत हूं। गोरी चमड़ी वालों के प्रति पूर्वाग्रह के कारण भारतीयों द्वारा किसी काले विदेशी को अपना नेता स्वीकार नहीं किया गया होता। दरअसल अफ्रीकी लोगों को गिरीराज सिंह को अपना हीरो मानना चाहिए, क्योंकि उनके पक्ष में सिंह ने कड़वी भारतीय सच्चाई को बताया है। मेरे मित्र और दिग्गज पत्रकार बालाचंद्रन कहते हैं, ”यदि पूरा अमेरिका रंग के आधार पर ओबामा के जीतने पर बहस कर सकता है तो हम सोनिया गांधी पर क्यों नहीं कर सकते? एक और महत्वपूर्ण सवाल है कि अगर सोनिया काली होतीं या पाकिस्तानी होंती तो क्या इंदिरा गांधी उन्हें स्वीकार करतीं? न्यूनतम कॉमनसेंस की वजह से इस क्वीज से पत्रकारों को बाहर निकाल ही देते। खैर इस बिंदू पर वापस आते हैं कि यदि सोनिया गांधी काली होतीं, जैसा कि गिरीराज ङ्क्षसह ने कहा है, रामचंद्र गुहा और गोपालकृष्ण गांधी (दोनों भारत के नामी धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी लेखक हैं) अपने संपादकीय में उन पर लेख लिखते तो इतना घमासान मचता? मुझे यकीन है वे इस पर सेमिनार का आयोजन करते।’’

उसी तरह, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही राष्ट्रीय मीडिया ने चर्चों पर कथित हमलों के लिए हिंदू कट्टरपंथियों को कसूरवार ठहराना शुरू कर दिया। एक पखवाड़े पहले मैंने लिखा था कि मोदी के खिलाफ घोर दुश्मनी के प्रदर्शन में अधिकांश मीडिया चैनलों ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, बिना इस तथ्य की जांच किए कि यह सुनियोजित सांप्रदायिक हमला है या एक आम आपराधिक कार्य। बाद में पाया गया कि लगभग सभी मामले आम आपराधिक कृत्य थे। वास्तव में इन आपराधिक कृत्यों की तुलना असंख्य हिंदू मंदिरों में तोड़-फोड़ और मस्जिदों से हमलों से की जानी चाहिए थी। लेकिन इन तथ्यों के खुलासों के साथ ये मीडिया वाले अचानक चुप्पी साध गए। मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि उत्तर प्रदेश के आगरा में चर्च पर हमले की खबर को एक अग्रणी अखबार ने 16 अप्रैल को अपने मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया, लेकिन इस घटना में आए नाटकीय बदलाव को, जिसमें एक मुस्लिम युवक द्वारा अपनी ईसाई मित्र से शादी नहीं होने पर चर्च पर हमला किया था, अपने 24 अप्रैल के अंक में भी मुख्य पृष्ठ पर स्थान दिया।

इस मामले की जांच करने वाली पुलिस मुलायम सिंह यादव (नाम के लिए अखिलेश सरकार) सरकार के अधीन है, जो भारत का सबसे ‘धर्मनिरपेक्ष’ नेता कहे जाते हैं। जहां तक एक प्रकाशन का संबंध है (उसका एक टीवी चैनल भी है) वह मोदी के बारे में दुष्प्रचार करने में हमेशा आगे रहा है। इसी प्रकाशन ने मोदी के कथन को तोड़-मरोड़ कर न्यूटन के गति के तृतीय नियम ‘हर क्रिया की विपरीत और समान प्रतिक्रिया होती है’ से जोड़ते हुए 2002 के गुजरात दंगे को न्यायोचित ठहराने का दावा किया था। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एसआईटी ने इस तरह के किसी बयान को नहीं पाया। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कहा था – ”क्रिया और प्रतिक्रिया की एक श्रृंखला चल रही है। मैं चाहता हूं कि न क्रिया हो और न ही प्रतिक्रिया।’’ लेकिन, उस प्रकाशन ने कथन को तोड़-मरोड़कर आग में घी डालने का काम किया।

इसी प्रकाशन ने 2013 में मोदी का उपहास उड़ाते हुए मुख्य पृष्ठ पर ‘रैम्बो ऐक्ट’ की खबरें देते हुए दावा किया था कि मोदी ने उत्तराखंड की आपदा के दौरान 15,000 गुजरातियों को बचा लिया। इस आपदा में एक हजार लोग मारे गए थे और 90 हजार लोग भूस्खलन और बाढ़ में फंस गए थे। हालांकि मोदी ने कभी इस तरह का दावा नहीं किया, लेकिन रिपोर्टर ने स्थानीय भाजपा कार्यकत्र्ता के कथन पर इस कहानी को प्रकाशित कर दिया। जब मामले का खुलासा हुआ तो अखबार ने इस कहानी के लिए माफी मांगी, वह भी तीन हफ्ते बाद। लेकिन उस भ्रामक खबर ने मोदी के चरित्र पर और प्राकृतिक आपदा का राजनीतिकरण करने के लिए राष्ट्रीय बहस छेड़ दी।

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में ऐसे पोस्ट वायरल हो रहे हैं जिसमें कहा जा रहा है कि भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और वर्तमान में केरल के राज्यपाल पी. सदाशिवम को फिर से पुरस्कृत करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया जा रहा है। हालांकि सरकार ने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है, लेकिन मोदी विरोधी ब्रिगेड उन्मादी हो रही हैं, क्योंकि उसका मानना है कि फेक एनकाउंटर मामले में अमित शाह को पी. सदाशिवम ने ही जमानत दी थी। जबकि तथ्य यह है कि इस जमानत को न्यायाधीश अफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की खंडपीठ ने स्वीकार किया था। पी. सदाशिवम ने तो सीबीआई के आग्रह पर मामले के ट्रायल को गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दिया था। लेकिन अमित शाह को मदद की भ्रामक खबरें फैलाना मोदी विरोधियों के लिए अभी जारी है, जबकि उस वक्त केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी।

ये कुछ उदाहरण हैं। ऐसा नहीं है कि राष्ट्रीय मीडिया सिर्फ मोदी के खिलाफ कहानियां गढ़ती है या उसे तोड़-मरोड़कर पेश करती है, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि अन्य लोगों की तुलना में मीडिया मोदी और भाजपा के खिलाफ ऐसा ज्यादा करती है। जम्मू-कश्मीर में शांतिपूर्ण मतदान पर मुफ्ती मोहम्मद सईद के बयान को तोड़-मरोड़कर पाकिस्तान की प्रशंसा तक सीमित कर दिया। उसी तरह, कुछ दिन पहले देश के प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए मसूरी स्थित लालबहादुर शास्त्री प्रशिक्षण केन्द्र में एक फर्जी महिला आईएएस अधिकारी की खबरें प्रमुखता से छाई रही। अधिकांश मीडिया ने इस तथ्य की जांच करने की कोशिश नहीं की कि जिस महिला को वह फर्जी आईएएस अधिकारी बता रही है वह एक सुरक्षा गार्ड के कमरे में किराए पर ठहरी थी और पुस्तकालय में नौकरी करती थी। यदि वह आईएएस अधिकारी होती तो पुस्तकालय में स्थायी नौकरी की तलाश क्यों करती? वह आईएएस अधिकारी किस तरह हो गई, अगर उत्तर प्रदेश प्रशासनिक सेवा ने उसे कथित तौर पर सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट का पहचान पत्र जारी किया था? किसी संपादक ने आरोप की सच्चाई खोजने का प्रयास नहीं किया।

इसमें कोई शक नहीं है कि नकारात्मक खबरें हमेशा बिकती हैं और मोदी सरकार के खिलाफ ऐसी खबरें कुछ ज्यादा ही बिक रही हैं। शायद इसीलिए कहा जाता है कि ‘कोई समाचार ना होना अच्छा समाचार है और अच्छा समाचार कोई समाचार नहीं है। यह सच है कि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिस पर मोदी सरकार की आलोचना हो सकती है, जैसे सरकारी पदों को नहीं भरना, प्रशासनिक सुधारों के लिए कोई पहल नहीं, शिक्षा के क्षेत्र में कोई खास प्रयास नहीं आदि। लेकिन हमारी राष्ट्रीय मीडिया की प्राथमिकता अलग है। उसने ऐसी धारणा बना ली है कि नस्लीय और धार्मिक आधारों पर बंटकर भारत जल रहा है। इससे लगता है कि उसका स्पष्ट मत है कि जब तक मोदी और भाजपा को हिंद महासागर में फेंक नहीं दिया जाता तब तक भारत से कोई अच्छी खबर नहीं आ सकती।

प्रकाश नंदा

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