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अहिंसा सच्चे मानवीय मूल्यों का मार्ग

अहिंसा सच्चे मानवीय मूल्यों का मार्ग

हिंसा और अहिंसा एक प्रवृत्ति है।  हिंसा का भाव पशुवृत्ति और अहिंसा का भाव मानवीय सदप्रवृत्ति है। दोनों की भावना मन और आत्मा से जुड़ी हैं। हमारे संस्कार और सामाजिक परिवेश का जैसा प्रभाव मनुष्य पर पड़ेगा, वैसी ही उसकी मनोवृति विकसित होगी। इतिहास गवाह है कि भारत में पहले लाखों की संख्या में गुरुकुल थे। बच्चों को तब  यहां बचपन से ही श्रेष्ठ शिक्षा मिलती रही है।  गुरुकुल से दीक्षित बच्चों में अच्छे संस्कार होते। उनमें समाज और देश के प्रति निष्ठा, कर्मठता और राष्ट्रीयता की भावना होती थी। कालांतर में ये गुरुकुल बंद होने से देश की संस्कृति और शिक्षा का ह्रास होता गया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हमें अहिंसा का मार्ग दिखाया है।  अहिंसा के द्वारा उन्होंने इस देश को आजादी दिलाई।

आजकल देश भर में हिंसा की घटनाएं हो रही हैं।  बेटी और महिलाएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं। अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं। कठिन कानूनी प्रक्रिया के कारण महिलाओं पर होने वाले अत्याचार और शोषण संबंधी घटनाओं के बाद उन्हें न्याय मिलने में देरी होती है। जिससे पीडि़त परिवारों का दुख और बढ़ता है। उधर, कार्यवाही के अभाव में अपराधियों का मनोबल बढ़ता है, जबकि  पीड़ितों में  निराशा होती है।

कई राज्यों में इन दिनों किसान आंदोलन कर रहे हैं। इधर उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक लडक़ी से बलात्कार के बाद उसकी जान चली गई। पुलिस प्रशासन ने बलात्कार की घटना से इनकार किया, जबकि पीड़ित परिवार द्वारा मीडिया को बलात्कार की घटना होना बताया गया है। सच जो भी हो, परंतु यहां  हिंसा तो हुई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हिंसक घटनाओं को रोकने के बजाय इन पर सियासत होने लगती है। सत्तापक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर आरोप लगाते रहते हैं। जबकि जनता पीड़ा भोगने को मजबूर होती है। कई राज्यों में किसानों ने आत्महत्या की है। दिल्ली में कुछ माह पहले दंगे हुए।  इसमें अनेक लोगों की जानें गई। यह हिंसा सांप्रदायिक थी। इसमें दो समुदायों के बीच घृणा और वैमनस्यता की भावना सामने आई। इस घटना से समूची मानवता शर्मसार हुई। भाईचारे में भी दरारें पड़ी। इस घटना के बाद दोनों समुदायों के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है। संविधान में प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार दिए गए हैं। यहां यदि जनता के बीच असुरक्षा की भावना होती है, तो यह एक प्रकार से उसके अधिकारों का हनन कहा जाएगा। हिंसा के कई रूप हो सकते हैं। किसी के मन में भय उत्पन्न करना, कठोर वचन बोलना, शारीरिक और मानसिक यातना देना या किसी तरह का शोषण शामिल है, जबकि इसके विपरीत किसी को कष्ट नहीं देना ही अहिंसा है। इसका उदाहरण है गांधीगिरी।

आजादी के पहले भी देश में दो समुदायों के बीच घृणा का बीज बोया गया था। जातिगत हिंसा का दंश अंतत: समाज को ही झेलना पड़ता है। उस समय तो बापू मौजूद थे।  उन्होंने कई सत्याग्रह किए है।  देश को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। तन और मन को स्वस्थ रखने की बात कही। आज बापू नहीं है, परंतु उनकी कहीं बातें हमें सदैव रास्ता दिखाती रहती हैं।  देश में जो लोग गांधी जी के बताए मार्ग पर चलते हुए समाजसेवी कार्य कर रहे हैं, उनमें कहीं ना कहीं बापू की आत्मा वास करती होगी। वे सही अर्थों में गांधी जी के सपने को पूरा कर रहे हैं।

समाज में बढ़ती हिंसा के  मुख्य कारण अशिक्षा, बेरोजगारी और जातिगत भेदभाव है। आज की शिक्षा नौकरीपरक हो गई है। इसे पाकर युवा अपने संस्कारों और अपने परिजनों से दूर होते जा रहे हैं। पढ़ाई के बाद उनका एकमात्र लक्ष्य नौकरी पाना रहता है। लगता है कि हमारे युवाओं ने आज  अहिंसा की भावना को तो जैसे भुला ही दिया है। राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना से वे  दूर होते चले जा रहे हैं। यह दुखद सच है कि कम्प्यूटर और मोबाइल की अत्यधिक आदत के कारण हमारे युवा अपने परिवार से दूर होते जा रहे हैं।  उनके पास देश और समाज के विषय में सोचने का समय ही नहीं है। युवाओं में एक वर्ग ऐसा भी है, जो शिक्षित होने के कई साल बाद  भी रोजगार और नौकरी पाने में  विफल रह जाता  हैं, तब उसे  शिक्षा की खामियों का पता चलता है और वह निराश होता हैं। हालांकि यहां विफलता के पीछे उनका अधूरा प्रयास भी हो सकता है। ऐसे लोगों में तनाव और अवसाद की स्तिथि बनती है और वे मार्ग भटक जाते हैं।

समाज में बढ़ती हिंसा का तीसरा कारण जातिगत भेदभाव है। गांव हो या शहर। कमोबेश सभी जगह यह विसंगति देखने को मिलती है। बचपन से ही उनके मन में  जातिगत श्रेष्ठता का बीज बो दिया जाता है। उनमें दूसरे की जाति छोटी और अपनी श्रेष्ठता का भाव जगाया जाता है। इस तरह हमारे समाज में कई तरह के विभाजन देखने को मिलते हैं। मानवता सर्वोपरि होने के बावजूद उन्हें जाति के दायरे में बांध दिया जाता है।  इसका एक कारण राजनीतिक भी है। राजनीतिक दल नागरिक को एक वोटर की तरह इस्तेमाल करना चाहते है, इसलिए उसकी जातियों और उसके समाज के वोट उनके लिए मायने रखते हैं। पहले जब भी सर्वे हुए, उनमें  नागरिकों से उनकी  जाति पूछी गई।  केंद्र और राज्यों के चुनाव में अमूमन उम्मीदवारों को भी जाति के आधार पर टिकट दिए जाते हैं। यह देश में एक बड़ी विडंबना है।  इससे स्पष्ट है कि एक नागरिक का व्यक्तित्व और उसकी विशिष्टता बाद में, पहले उसकी जाति को महत्व दिया जाता है। आरक्षण के कारण भी समाज में भेदभाव की भावना बढ़ी है।  जातिगत भेदभाव के कारण  समाज में वर्ग संघर्ष की आए दिन  घटनाएं होती रहती हैं।

हिंसा की प्रवृत्ति के पीछे और भी कारण हो सकते हैं, परंतु हमें इस जातिगत विद्वेष को रोकने की आवश्यकता है। समाज में व्यक्ति को उसके गुणों और संस्कारों से पहचाना जाना चाहिए।  व्यक्ति को  अच्छी शिक्षा मिले। उसे रोजगार से जोड़ा जाए। समाज में उसे अच्छा वातावरण दिया जाए, तो कोई भी व्यक्ति हिंसा का मार्ग नहीं अपनाएगा। उसका तन और मन दोनों स्वस्थ रहेंगे। बापू की अहिंसा का भाव एक दृष्टि है। मानवता और समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश है। यह बापू का सन्मार्ग है। इसे अपनाकर हम देश और समाज को सुरक्षित रख सकते हैं और यह सदआचरण और  सदप्रवृत्ति से ही जुडक़र  ही संभव है।

 

श्रीराम माहेश्वरी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् हैं)

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