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क्या कपिल सिब्बल गलत कह रहे हैं?

क्या कपिल सिब्बल गलत कह रहे हैं?

किसान बिल को आए लगभग दो माह बीत चुके हैं लेकिन कांग्रेस शासित राज्यों में जिस प्रकार से कृषि सुधारों से संबंधित इन कानूनों का विरोध किया जा रहा है और किसानों को विद्रोह करने के लिए उकसाया जा रहा है उससे लगता है कि कांग्रेस अपनी गलतियों से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है। दरअसल देश की सबसे पुरानी पार्टी शायद अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। वो पार्टी जो देश को विदेशी गुलामी से आजाद कराने में अपना सबसे अहम योगदान होने का दम भरती रही है वो आज खुद को एक परिवार की गुलामी से आजाद नहीं कर पा रही। यही कारण है कि देश से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर वो ना तो कोई सकारात्मक बहस में हिस्सा लेती है ना कोई तर्कपूर्ण सुझाव देती है बस विरोध में सडक़ों पर उतर जाती है। लोकतंत्र में विपक्ष का एक महत्वपूर्ण स्थान होता है। और चूंकि वो सत्ता में नहीं होता इसलिए स्वाभाविक रूप से उसे जनता का भरोसा आसानी से हासिल हो जाता है लेकिन लगातार दूसरी बार कांग्रेस ऐसा करने में चूक रही है।

मोदी विरोध की उसकी नकारात्मक नीतियां उसे सकारात्मक राजनीति के विषय में सोचने ही नहीं दे रहीं। यही कारण है कि चाहे लोकसभा चुनाव हों चाहे विधानसभा, चाहे उपचुनाव हों या फिर नगर निकायों के चुनाव, जिस प्रकार का प्रदर्शन देश के सबसे प्रमुख एवं राष्ट्रीय स्तर के विपक्षी दल कांग्रेस का पिछले कुछ समय से चल रहा है वो कांग्रेस की नीतियों ही नहीं उसके नेतृत्व पर भी प्रश्रचिन्ह लगाने वालों के तर्कों को ठोस तथ्य उपलब्ध करा रहे हैं। चाहे दिल्ली के चुनाव हों जहां कांग्रेस चुनाव लडऩे से पहले ही अपनी हार स्वीकार कर लेती है या फिर हाल के बिहार विधानसभा के चुनाव हों जहां वो 243 में से मात्र 70 सीटों पर चुनाव लड़ती है और उनमें से भी मात्र 19 पर ही जनता का मत हासिल कर पाती है।

इन तथ्यों का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि 2009 में जिस कांग्रेस का लोकसभा चुनावों में वोट प्रतिशत 28.55 प्रतिशत था वो 2019 में मात्र 19 प्रतिशत रह गया है। ये सभी बातें इस ओर इशारा करती हैं कि यह संकट केवल कांग्रेस के अस्तित्व पर ही नहीं है बल्कि कांग्रेस की यह परिस्थिति भारत के लोकतंत्र में विपक्ष के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान लगा रही है। क्योंकि बिहार चुनाव के नतीजों के साथ ही देश के 11 राज्यों में हुए उपचुनावों के भी नतीजे भी सामने आए। कहने की आवश्यकता नहीं कि इनमें भी कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। जहां मध्य प्रदेश में कांग्रेस के हाथ से साल भर से भी कम समय में सत्ता ही फिसल गई, वहां गुजरात, उत्तर प्रदेश मणिपुर जैसे राज्यों में वो इन उपचुनावों में अपना खाता भी नहीं खोल पाई। इससे पहले कुछ माह पहले गुजरात में भी वो बमुश्किल अपनी सत्ता बचा पाई थी।

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जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस रोक पाने में असफल रही वहीं सचिन पायलट को अहमद पटेल जैसे नेताओं ने कांग्रेस में रोक पाने में सफलता अर्जित की। लेकिन कांग्रेस की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रहीं। अहमद पटेल जैसे संकट मोचक का निधन और गुलाब नबी आजाद तथा कपिल सिब्बल जैसे नेताओं का खुलकर कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठना और नेतृत्व परिवर्तन से लेकर पारदर्शी संगठन चुनावों के विषय पर मीडिया में खुलकर सामने आना कांग्रेस पार्टी के लिए निश्चित ही चिंता और चिंतन दोनों का विषय है। लेकिन कांग्रेस की यह परेशानी केवल घरेलू स्तर पर उठने वाले इन मुद्दों तक ही सीमित नहीं है। कांग्रेस नेतृत्व विदेशी मीडिया के भी निशाने पर है।

दरअसल अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पुस्तक में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के बारे में जो लिखा है वो जितना भाजपा और उसके कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने वाला है उतना ही कांग्रेस और उसके कार्यकर्ताओं के मनोबल को गिराने वाला है। क्योंकि जब विश्व के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति देश के सबसे पुराने एवं राष्ट्रीय स्तर के एक राजनैतिक संगठन के नेतृत्व पर व्यक्तिगत टिप्पणी करते हैं और कहते हैं कि सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के तौर पर इसलिए चुना था ताकि राहुल गांधी का भविष्य सुरक्षित रहे। या फिर जब वो राहुल गांधी के बारे में कहते हैं कि वो उस  छात्र के समान हैं जो अपने शिक्षक को प्रभावित करना चाहता है लेकिन उसमें या तो कौशल की कमी है या विषय में निपुणता हासिल करने का जुनून नाम है, तो कपिल सिब्बल जैसे नेताओं की चिंता वाजिब प्रतीत होती है। लेकिन कांग्रेस का सत्य यह है कि अधीर रंजन चौधरी जैसे कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल जैसे नेताओं को पार्टी छोड़ देने की सलाह दे देते हैं।

कांग्रेस की वर्तमान स्थिति पर इतिहास की एक रोचक घटना का स्मरण होता है। जब चाणक्य ने मगध के उत्थान के लिए धनानंद से विद्रोह किया था और उन पर राजपरिवार से विद्रोह करने के आरोप लगाए गए थे तो उन्होंने मगध वासियों से कहा था कि राजपरिवार के प्रति भक्ति और राष्ट्र के प्रति भक्ति में अंतर करना सीखो। आज कांग्रेस को भी गांधी परिवार और कांग्रेस को अलग करके देखना सीखना होगा।

कांग्रेस के नेताओं को समझना होगा कि आज वो जिस कांग्रेस का हिस्सा हैं वो कल तक देश का सबसे बड़ा राजनैतिक दल था लेकिन आज वो लगातार दो लोकसभा चुनावों में संसद में सबसे बड़ा विपक्षी दल बनने लायक जनमत भी नहीं प्राप्त कर पाया। कांग्रेस के नेताओं को यह भी समझना होगा कि देश की सबसे पुराने विपक्षी दल के नाते देश के प्रति उनकी जिम्मेदारी एक परिवार के प्रति जिम्मेदारी से बड़ी है।

 

डॉ. नीलम महेंद्र

(लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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