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असंतुष्टों के निशाने पर एक बार फिर कांग्रेस नेतृत्व

असंतुष्टों के निशाने पर एक बार फिर कांग्रेस नेतृत्व

कांग्रेस क्या एक बार फिर टूट की कगार पर है या फिर कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व के खिलाफ बगावत करने वाले नेताओं का यह कोई ऐसा दांव है, जिसके जरिए वे पार्टी में अपनी ताकत हासिल करना चाहते हैं? यह सवाल इन दिनों बार-बार उठ रहा है। इसकी वजह बना है, बिहार विधानसभा चुनावों के साथ ही राज्य विधानसभाओं के उपचुनावों में हुई कांग्रेस की करारी हार के बाद जी 23 नेताओं की ओर से उठ रहे सवाल। कांग्रेस के राज्यसभा में नेता गुलाम नबी आजाद ने एक बार फिर कहा है कि कांग्रेस में सांगठनिक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। इसके साथ ही पार्टी में फाइव स्टार संस्कृति घर कर गई है। जिसकी वजह से पार्टी लगातार आमजन से दूर होती जा रही है। कांग्रेस में एक और असंतुष्ट नेता माने जा रहे कपिल सिब्बल ने भी बिहार चुनावों के बाद कहा था, कि पार्टी को आत्मसाक्षात्कार करना चाहिए। सिब्बल ने यह भी कहा था कि पार्टी लगातार गिरावट की ओर है। दोनों नेताओं ने प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर पार्टी के संगठन में आमूलचूल बदलाव लाने की वकालत की है।

कांग्रेस की एक परंपरा रही है। जब भी वह हारती है, तब उसके अंदर ऐसे सवाल उठते हैं। अगर कांग्रेस में गांधी-नेहरू परिवार के इतर कोई नेतृत्व रहा तो ऐसी आवाजों को खूब हवा दी जाती है। लेकिन जब पार्टी की कमान कांग्रेस के प्रथम परिवार के हाथ में होती है, तब ऐसे बयानों को सीधे-सीधे विद्रोह माना जाता है। तब पार्टी अपने बुनियादी सवालों से जूझने की बजाय अपने नेतृत्व के प्रथम परिवार की बचाव में जुट जाती है। गुलाम नबी आजाद और कपिल सिब्बल के बयानों के प्रतिकार में जिस तरह छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद सामने आए हैं, उसके संकेत साफ हैं। दोनों ने आजाद और सिब्बल को सुझाव दिया कि उन्हें अपनी बात कांग्रेस के अंदरूनी फोरम पर रखनी चाहिए। सलमान खुर्शीद ने तो यहां तक कह दिया कि पार्टी में नेतृत्व का कोई संकट नहीं है और सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी के लिए पार्टी में पूरे सहयोग को ‘‘हर वह व्यक्ति देख सकता है, जो नेत्रहीन नहीं है।

पार्टी में असंतुष्ट नेताओं के इन बयानों को कांग्रेस के भावी अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ माना जा रहा है, जिन्होंने 2019 के आम चुनावों में पार्टी की बुरी गत के बाद इस्तीफा दे दिया था और भविष्य में भी कांग्रेस अध्यक्ष पद न संभालने का ऐलान कर दिया था। तब से उनकी मां सोनिया गांधी कांग्रेस की कार्यवाहक अध्यक्ष हैं। हालांकि कांग्रेस में एक बार फिर राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। कांग्रेस का एक बड़ा घटक मानता है कि राहुल गांधी की ही अगुआई में कांग्रेस आगे बढ़ सकती है। लेकिन जिस तरह चुनाव-दर-चुनाव कांग्रेस की हार हो रही है, उसके कद्दावर नेता पार्टी छोडक़र जा रहे हैं, उससे पार्टी के एक धड़े को लगता है कि जब तक संगठन में आमूल-चूल बदलाव नहीं लाया गया, तब तक देश की इस सबसे पुरानी पार्टी का भला नहीं होने वाला।

पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल के साथ सत्तर सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में जहां राष्ट्रीय जनता दल को अच्छी कामयाबी मिली, गठबंधन में शामिल कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई, वहीं कांग्रेस अपनी पिछली संख्या 27 को भी नहीं छू पाई, बल्कि उल्टे उसकी संख्या घटकर 19 रह गई। इसके बाद ही कपिल सिब्बल बिफर पड़े थे। कपिल सिब्बल उन 23 नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने अगस्त में कांग्रेस में पूर्णकालिक अध्यक्ष चुनने और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में आमूलचूल बदलाव लाने के लिए खुला पत्र लिखा था। कपिल सिब्बल ने बिहार चुनाव नतीजों के बाद एक इंटरव्यू में कहा, ‘दिक्कत ये है कि राहुल गांधी डेढ़ साल पहले यह बात साफ कर चुके हैं कि वे अब कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनना चाहते। उन्होंने यह भी कहा था कि मैं नहीं चाहता कि गांधी परिवार का कोई भी व्यक्ति उस पद पर काबिज हो। इस बात के डेढ़ साल बीत जाने के बाद मैं ये पूछता हूं कि कोई राष्ट्रीय पार्टी इतने लंबे समय तक अपने अध्यक्ष के बिना कैसे काम कर सकती है।’ सिब्बल ने कहा कि उन्होंने पार्टी के भीतर आवाज उठाई थी। उन्होंने अगस्त में चिट्ठी भी लिखी। लेकिन किसी ने उनसे बात नहीं की। कपिल सिब्बल ने उसी इंटरव्यू में कांग्रेस नेतृत्व से पूछा कि वे जानना चाहते हैं कि डेढ़ साल बाद भी हमारा अध्यक्ष नहीं है, ऐसे में कार्यकर्ता अपनी समस्या लेकर किसके पास जाएं।

बहरहाल पत्र लिखने के बाद पुनर्गठित कांग्रेस कार्यसमिति से गुलाम नबी आजाद बाहर किए जा चुके हैं। कपिल सिब्बल भी इन दिनों साइडलाइन हैं। इस वजह से कांग्रेस का एक वर्ग मानता है कि ये नेता दरअसल पार्टी के ताकतवर मंचों में अपनी स्पष्ट भागीदारी चाहते हैं। कांग्रेस के एक कद्दावर नेता नाम ना लिखने की शर्त पर कहते हैं कि गुलाम नबी आजाद का राज्यसभा का कार्यकाल फरवरी 2021 में खत्म होने वाला है। उस नेता के मुताबिक, चूंकि आजाद जैसे नेता संसद, विधानमंडल या ऐसी ही किसी कुर्सी के बिना नहीं रह सकते। चूंकि अब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा नहीं रही, लिहाजा वहां से उनका चुनकर आना संभव भी नहीं। इसलिए वे अपने बयानों के जरिए दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि कांग्रेस नेतृत्व उन्हें अगले साल होने वाले राज्यसभा चुनावों में राजस्थान या छत्तीसगढ़ जैसे सुनिश्चित जीत वाले राज्यों से उम्मीदवार बना सके।

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कांग्रेस में ग्रुप 23 यानी जी 23 नाम से विख्यात असंतुष्ट नेताओं की मांग उपर से देखने में जायज लगती है। वे चाहते हैं कि कांग्रेस में सचमुच में उपर से नीचे तक संगठनात्मक चुनाव हों। लेकिन सवाल यह है कि जब तक इसी व्यवस्था के तहत ये नेता कांग्रेस कार्यसमिति के लिए मनोनीत होते रहे, राज्यसभा या विधान परिषदों की सुरक्षित सीटें हासिल करते रहे, तब तक उन्हें आखिर क्यों नहीं यह विचार आया कि कांग्रेस में संगठन के सचमुच के चुनाव होने चाहिए, मनोनयन नहीं होना चाहिए। यह सच है कि कार्यकर्ताओं के दम पर चुनकर आया नेता केंद्रीय नेतृत्व के सामने उस तरह चुप नहीं रह सकता, जैसे मनोनीत नेता रहते हैं। इसलिए कांग्रेस नेतृत्व को भी ऐसे ही नेता माकूल नजर आते रहे। जब तक पार्टी के पास सत्ता रही, कांग्रेस नेतृत्व के पास अपने नेताओं को बांटने के लिए रेवडिय़ां रहीं, तब तक ऐसे सवाल नहीं उठे। लेकिन पार्टी की लगातार होती हार के बाद बांटने वाली रेवडिय़ों की संख्या सीमित होती गई है, लिहाजा उन्हीं नेताओं के बोल फूटने लगे हैं, जो खुद परजीवी व्यवस्था की पैदाइश हैं। सांगठनिक ताकत के दम जो खुद नहीं उभर सके, उनका सांगठनिक चुनाव का राग इसी वजह से आम कार्यकर्ता तक को नहीं लुभा पा रहा है।

बेशक सोनिया गांधी के ही बेटे और बेटी राहुल और प्रियंका हैं। हो सकता है कि मां-बेटा-बेटी के बीच ऐसे मतभेद ना हों, जो पार्टी को नुकसान पहुंचा सकें। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि पार्टी में इन दिनों तीनों के नाम पर अलग-अलग सत्ता केंद्र बन गए हैं। कांग्रेस के नेताओं के बीच इन नामों के लिए अलग-अलग प्रतिबद्धता है। इस प्रतिबद्धता के चलते दूसरी पंक्ति और उसके नीचे के नेताओं के बीच खींचतान जारी है। यह भी सच है कि कांग्रेस नेतृत्व उस तरह का दमखम और नैरंतर्य नहीं दिका पा रहा है, जैसा दमखम प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और जयप्रकाश नड्डा की तिकड़ी दिखा रही है। कांग्रेस नेतृत्व उस तरह सक्रिय भी नहीं है, जिस तरह भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अहर्निश संघर्षशील है। जाहिर है कि कांग्रेस के चुनाव नतीजों पर असर पड़ रहा है। कांग्रेस के अंदर असंतोष को थामने के लिए तार्किक मशीनरी भी नहीं है। इसी वजह से ज्योतिरादित्य सिंधिया दल-बल समेत पार्टी का दामन छोड़ देते हैं। सचिन पायलट भले ही जरूरी संख्या बल ना जुटा पाने के चलते दामन छोडऩे में कामयाब नहीं रहे, लेकिन उन्हें कांग्रेस में ही बनाए रखने और उनके असंतोष को थामने की कामयाब कोशिश नहीं हुई, इसलिए उनका हश्र भी असंतुष्ट नेताओं को शह दे रहा है।

ऐसे में देखना यह है कि क्या कांग्रेस फिर टूटेगी। वैसे कांग्रेस में 1948 से लेकर अब तक करीब 70 बार टूट हो चुकी है। अलबत्ता गांधी-नेहरू परिवार की अगुआई वाली कांग्रेस लगातार आगे बढ़ती रही है। लेकिन अब से पहले तक के हालात अलग थे। तब श्रद्धाभाव वाले कार्यकर्ता ज्यादा थे, अब तार्किक सोच वाले कार्यकर्ता भी बढ़ रहे हैं। तब कांग्रेस का मुकाबला करने वाला मजबूत विपक्ष नहीं था, लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी जैसा मजबूत विकल्प भी है। इसलिए कांग्रेस को हर तरफ से सोचना होगा।

इस बीच उसके एक संकटमोचक अहमद पटेल का कोरोना के चलते निधन हो चुका है। ऐसे में देखना होगा कि कांग्रेस के बागी जी 23 वाले नेता सफल होते हैं या फिर कांग्रेस नेतृत्व।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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