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सत्ता से समाधि की ओर बढ़ती कांग्रेस

सत्ता से समाधि की ओर बढ़ती कांग्रेस

आजादी की लड़ाई में हीरो बनी कांग्रेस पार्टी आज जीरो हो रही है। कांग्रेस पार्टी का जन्म भले ही 1885 में सर ह्नयूम के नेतृत्व में हुआ हो, दादा भाई नारोजी और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी जैसे महान नेताओं ने नेतृत्व दिया हो पर पार्टी को मजबूत पहचान दी, सशक्त बनाया लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने। जब मोहनदास करम चन्द्र गांधी दक्षिण अफ्रीका में असहयोग और अहिंसक आन्दोलन चला कर दुनिया को एक नई राह दिखा चुके थे। भारत लौट कर उन्होनें कांग्रेस पार्टी को पूरे देश में गांव गांव चप्पे चप्पे में घूम कर लोकप्रिय और शक्तिशाली बनाया। जगह जगह सेवा आश्रम खोले। देश के तमाम नेताओं को इकट्ठा कर राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोया। फिर वही कांग्रेस गांधी जी के नेतृत्व में देश को आजादी दिलानें में हीरो बनी और हीरो से एक दिन जीरो बन जायेगी, ऐसी कल्पना किसी ने नहीं की होगी।

कांग्रेस पार्टी निरंतर अपनी समाधि की ओर बड़ती जा रही है, ये रास्ता उसनें स्वयं चुना है। कोई पार्टी केवल नेतृत्व कमजोर हो जाने से नहीं मरती है पर विचारधारा के मरनें से अवश्य मरती है। नेतृत्व तो फिर पैदा हो सकता है यदि विचारधारा जिन्दा है। पार्टी का कार्यकर्ताओं को दिशा न दे पाने के कारण संगठन कमजोर हो जाना, पार्टी को सत्ता से दूर ले जा सकता है पर उससे पार्टी सदा के लिये नहीं मरती है। प्रभावशाली नेतृत्व के मिलते ही पुनर्जीवित हो जाती है। कांग्रेस अपनी विचारधारा और गांधी के दिखाये मार्ग से दूर हो गयी है। राष्ट्रीय एकता, समाज कल्याण ग्राम विकास और आखिरी आदमी के आंसू पोछनें की सोच से बहुत दूर हो गयी है। गांधी जी के अहिंसा का पाठ भूल कर अहिंसक, अपराधिक पृष्ठभूमि की पार्टियों के साथ समझौता करने लगी। इस तरह उसनें धीरे धीरे अपनी पहचान खो दी। जो पार्टी कभी देश को नेतृत्व देती रही अब कुर्सी के लालच में क्षेत्रीय पार्टियों की पिछलग्गू बन गयी। उसकी विचारधारा मर गयी, दिशाविहीन हो गयी। बिहार में राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया, जेल काट रहे लालू यादव के बेटे की अगवायी में चुनाव लड़ा तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के नेतृत्व में चुनाव लड़ी। चाटूकार और स्वार्थी नेताओं ने उस पर कब्जा कर लिया। पार्टी की बर्बादी में आखिरी कील लगी जब पूरी की पूरी पार्टी केवल और केवल परिवार केन्द्रित हो गयी।

विपक्ष की भूमिका में फेल

आज देश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व को टक्कर देने वाला कोई नेता उनके आस पास भी नहीं लगता। इसी तरह भाजपा के समकक्ष कोई राजनैतिक पार्टी भी दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रही है। कांग्रेस पार्टी देश के प्रत्येक कोने में है और सबसे बड़ी पार्टी है पर उसकी साख दिनों दिन गिरती जा रही है हालत यहां तक पहुंच गयी कि लोक सभा में पिछले लगातार दो चुनाव में उसे मान्यता प्राप्त विरोधी दल बननें के लिये दस प्रतिशत सीटें भी न मिल सकी। हालांकि लोक सभा में सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते मुख्य विरोधी दल कांग्रेस ही है।

कांग्रेस पार्टी पिछले 6 वर्ष में विरोध में रहकर कभी भी कोई जनहित का मुद्दा ठीक से नहीं उठा सकी, न ही कभी सरकार को किसी समस्या पर घेर पायी। कोई भी घटना हो उसे तो वस विरोध करना है। विरोधी दल का मतलब सदा विरोध करना नहीं होता है विरोध करने की सीमा यहां तक पहुंच गयी कि कई राष्ट्रहित की बातों का ही विरोध कर डाला। एक तो नरेन्द्र मोदी भारी भरकम राजनैतिक कद के नेता और ऊपर से सोनिया गांधी, राहुल गांधी का कमजोर दिशाहीन नेतृत्व जो अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभा पा रहे हैं।

एक जुझारू जिम्मेदार विरोधी दल का होना प्रजातंत्र के जीवित रहने की आवश्यकता होती है सत्ता पक्ष को समय समय पर चेताना, उसकी गल्तियों को उजागर करना उसका कर्तव्य होता है और यही कार्य हारी हुई पार्टी को पुन: सत्ता मे स्थापित कर सकते हैं। कांग्रेस ने तय कर लिया कि जो भी मोदी सरकार करेगी हमें तो बस विरोध करना है। जो मोदी जी कहें या करें उसका भी जी जान से विरोध करना है। मोदी को चाय वाला, मौत का सौदागर, अहंकारी, ना समझ, अल्प-ज्ञानी न जानें क्या क्या कहा पर इन अलंकारों के उपयोग से कांग्रेस अपनी प्रतिष्ठा खोती गयी और लोगों की नजर में गिरती चली गयी। आज हालत ये हो गये कि दो, चार प्रदेशों को छोड़ कर कहीं अपनी दम पर चुनाव लडऩे और जीतने की स्थिति तक में नहीं है। पूरे प्रदेश में एक मात्र यही पार्टी थी जो चुनाव लडऩे और जीतनें में सक्षम रही है। दुनिया में एैसी कोई सरकार नहीं है जो सौ प्रतिशत समस्याओं को सुलझाने का काम कर ले या गल्तियां न करे। उन्हें ही मुद्दा बना कर उठाना विरोधी दलों का काम होता है लेकिन कांग्रेस मुद्दों के बजाय मोदी पर प्रहार करने में लगी रही। राहुल का राफेल राफेल की रट लगाना जनता को अच्छा नहीं लगा।

खुद कांग्रेस ने न जाने कितनी बार देश राष्ट्रहित के खिलाफ बोलकर अपनी किरकिरी करवाई है। तीन तलाक का विरोध वोट बैंक को साधनें की राजनैतिक मजबूरी हो सकती है। जम्मू-कश्मीर से 370 हटाये जाने का विरोध, नागरिकता संशोधन का विरोध तो राष्ट्रहितों का विरोध है। ये तो खुद कभी कांग्रेस का ही एजेंडा था, जिसे कांग्रेस को ही पूरा करना था। नागरिकता संशोधन बिल तो महात्मा गांधी के समय में ही तय किया हुआ एजेंडा था स्वयं इन्दिरा गांधी ने कहा था कि हर सूरत में बंगला देशियों को भारत छोडऩा होगा। 370 अस्थायी था और उसको हटाना भारत की एकता अखंडता के लिये आवश्यक था। लेकिन अब जिस तरह से कोरोना महामारी पर कांग्रेस पार्टी सरकार के हर निर्णय का विरोध कर रही है। उससे तो साफ जाहिर है कि उसे तो वस विरोध करता है देश और लोगों की चिन्ता नहीं है। जैसे ही कोरोना बीमारी शुरू हुई तो सबसे पहले चिल्लाना शुरू कर दिया कि बाजार में दवाईयां ही नहीं मिल रही ब्लैक में मिल रही है जो कि सफेद झूंठ साबित हुआ। देश में किसी समय पर भी दवाईयों की कमी नहीं हुई। फिर सेनेटाईजर के ऊपर और वेन्टीलेटर के ऊपर सरकार को घेरा कि इनकी भारी कमी हैं। ये कमियां तो विश्व के लगभग सभी देशों में थी। इसकी आपूर्ति में थोड़ा बहुत समय तो लगना ही था।

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चरमराया संगठात्मक ढ़ांचा

कांग्रेस पार्टी के खुद के संगठन के अलावा उसके संगठन की सहयोगी शाखायें धीरे धीरे विलुप्त होती गयी। एक जमानें में इन्टक (ट्रेड यूनियन), महिला कांग्रेस, सेवादल, युवक कांग्रेस और एनएसयूआई (छात्र संगठन) आदि पूरे देश में छाये हुये थे, जिलों जिलों में, ब्लॉक और गांव स्तर पर उसकी शाखायें थी। आज ये सारे संगठन गायब हो गये। उन्हें कोई दिशा देने वाला नेता ही नहीं बचा। शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें पुन: जिन्दा करने का कोई प्रयास नहीं किया। दसकों से इन संगठनों ने कभी कोई कार्यक्रम नहीं किया, कोई रैली धरना प्रदर्शन या सम्मेलन राष्ट्रीय स्तर पर नहीं किया। नतीजा पूरा का पूरा संगठन धीरे धीरे चरमरा गया। आज जिला, प्रदेश छोडिय़े राष्ट्रीय स्तर पर उनके पदाधिकारियों के नाम तक कोई नहीं जानता। मीडिया तक को पता नहीं होंगे। उसका मुख्य कारण है राहुल गांधी के पास रहनें वाली पार्टी की कोटरी जो हर जगह अपने अपने लोग बैठाने का काम करती रहती है। राहुल गांधी पार्टी के सर्वेसर्वा हैं, उनके सलाहकार दिग्विजय सिंह जो मध्य प्रदेश में पार्टी की एैसी लुटिया डुबो कर आये कि दुबारा उसे सत्ता में आने के लाले पड़ गये। उन्ही की सलाह पर राहुल ने अर्जुन सिंह जैसे राष्ट्रीय कद्दावर नेता को घर बैठा दिया था। लोक सभा और विधानसभा चुनाव में जमानत जब्त करा चुके पार्टी प्रवक्ता सुरजेवाला राहुल के चहेते होने के कारण स्टार प्रचारक बनकर चुनाव में जाते हैं।

दिग्गी राजा को पार्टी महामंत्री बनने पर उत्तर प्रदेश का प्रभार मिला था, पूरी कांग्रेस को उत्तर प्रदेश से मिटा कर चले आये, फिर भी कोटरी के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है। दिग्गी राजा की करतूतों से ही मध्य प्रदेश कांग्रेस ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में दो फड़ों में बंट गयी और उपचुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हारी। वहां भी सत्ता में पुन: आने का सपना चकनाचूर हो गया। दिग्गी खुद को राज्य सभा की सीट पानें में सफल हो गये, जिसके लिये उसके लिये उन्होंनें पार्टी को बर्बाद करनें में भी कसर नहीं छोड़ी।

राष्ट्रहितों की अवहेलना 

कांग्रेस पार्टी ने सत्ता तुरन्त वापिस पाने के लिये राष्ट्रहितों से एक बार नहीं कई बार समझौता किया। वोटों की चाह में मुस्लिम समुदाय की तुष्टीकरण करनें के लिये देशहित को ताक में रख दिया। कुछ लोग इसे राष्ट्रद्रोह के रूप में भी देखते हैं। पार्टी ये भूल गयी कि जमाना बदल चुका है, गांव गांव में टीवी और स्मार्टफोन है। लोग देखते हैं कि देश में क्या हो रहा है। देश क्या पूरा विश्व जानता है कि कश्मीर में तीन दशकों से क्या हो रहा है। वहां के मुसलमानों ने एक एक कर हिन्दुओं की जमींन जायजाद पर कब्जा कर उन्हें बेघर कर निकाल दिया। इतना बड़ा जुर्म हुआ और सजा किसी को भी नहीं मिली कांग्रेसी नेता गुलाम नवी आजाद जब कश्मीर के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने एक कदम भी उनकी वापिसी के लिये नहीं उठाया। कश्मीर में अलग नियम कानून चलते रहे जब उसे ठीक करने के लिये 370 धारा हटायी गयी तो उसका भी पुरजोर कांग्रेस ने विरोध किया। यहां तक बात पहुंची कि कश्मीरी नेता फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि 370 की वापिसी के लिये चीन की मदद लेंगे। कांग्रेस उन्ही के साथ गुपकार ग्रुप से समझौता कर जिला स्तरीय चुनाव लडऩा चाहती थी। फजीहत होने पर अब अलग चुनाव लडऩे की बात कर रही है।

नागरिकता कानून को खुद कांग्रेस पास करना चाहती थी ये महात्मा गांधी की सोच थी जिसे पार्टी ने पास किया था पर उसे असली जामा पहनाने की हिम्मत मुसलमान वोटों की खातिर नही जुटा सकी। जब ये हिम्मत मोदी सरकार ने दिखायी कानून लाया गया तो उसका भी विरोध किया। जबकि इस कानून की वकालत खुद मनमोहन सिंह जी विपक्ष में रहते हुये पार्लियामेंट में कर चुके थे। खुद कांग्रेस पार्टी अपने 10 साल के शासन में राफेल नहीं खरीद सकी जिसकी नितांत आवश्यकता थी। क्यों नही खरीदा इस पर लोग उंगली उठाते रहे। पार्टी के चीन से तार जुड़े होने की बात भी सामनें आयी। जब राफेल विमान खरीदे गये तो उसका राहुल गांधी ने विरोध किया। मोदी जी को जिताकर लोगों ने कांग्रेस की देश विरोधी गतिविधियंा का चुनाव में जबाब दे दिये।

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बगावत के स्वार्थी सुर

चन्द नेताओं द्वारा बगावात के सुर जो दिखाई दे रहे थे, केवल ये अपना महत्व बनाये रखने के लिये हैं। इनमें कोई दम नहीं है थोड़ा बहुत चिल्ला कर ये मुंह बन्द करने का इनाम चाहते हैं। गुलाम नबी आजाद सदा सत्ता में और महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं  इन्द्रा जी से लेकर राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह की दोनों सरकारे सभी में मंत्री रह चुके हैं। सभी के साथ कांग्रेस के महामंत्री रहे है यहां तक कि उन्हें महाराष्ट्र से लोकसभा फिर राज्यसभा में लाया गया। फिर कश्मीर से राज्यसभा फिर कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया गया। फिर कश्मीर से राज्य सभा में उनमे इतनी हिम्मत नहीं कि वे बगावत कर सके। कश्मीर में जब वहां की क्षेत्रीय पार्टियां आपस में समझौता कर रही है तब आजाद अपनी अहमियत दिखा कर नेतृत्व को बैकफुट पर लाना चाहते थे जो उन्होनें कर लिया। बस अब राहुल के पीछे खड़े हो जायेंगे। चिदम्बरम की गिनती महाभ्रष्ट नेताओं में होने लगी है, जबसे उनके और उनके पुत्र की जमींन जायजाद और विदेशों में प्रोपर्टी की बातें सामनें आयी है। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह पर झूंठे मुकदमें जडऩे में वे बदनाम हो चुके है। कांग्रेस पार्टी द्वन्द में और शायद पार्टी उनसे किनारा कर ले। कपिल सिब्बल ने भी पार्टी की असफलता पर प्रश्न उठाया है उनकी पार्टी और देश में जीरो फोलोहिग है। उनके रहने या जाने से पार्टी को शायद ही कोई फर्क पड़े। वैसे भी वे अयोध्या राम मंदिर प्रकरण में पार्टी को काफी नीचा दिखा चुके है। इन नेताओं के आने जाने से मरी हुयी पार्टी अब और क्या मरेगी।

दिशाहीन गुमराह नेतृत्व

यदि हम कांग्रेस की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी कमजोर नेतृत्व की बात करें तो हमने कांग्रेस को कमजोर नेतृत्व के बाबजूद भी सत्ता में लौटते देखा है। मनमोहन सिंह जी से ज्यादा कमजोर प्रधानमंत्री शायद ही कभी कोई बना हो, वे तो एक मात्र लोकसभा का चुनाव दिल्ली से लड़े और हार गये फिर भी उनके प्रधानमंत्री रहते हुये पार्टी पुन: 2009 में सत्ता में आयी थी। भौतिक रूप से कमजोर अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने व्हील चेयर में बैठ कर सत्ता चलायी है। कमजोर नेतृत्व हो पर विचारधारा जिन्दा रहे तो पार्टी मरती नहीं है। कांग्रेस की विचारधारा मर चुकी है यही उसका दुर्भाग्य है। सोनिया गांधी से कमजोर पार्टी का अध्यक्ष कोई शायद ही कभी बने। जिन्हें न देश का पता था न समस्यायों का और न कोई भारतीय भाषा ही आती थी फिर भी पार्टी उनकी अध्यक्षता में जीती क्योंकि वे जानती थी कि उन्हें कुछ नहीं आता है और वे प्रत्येक मामले में प्रणव मुखर्जी और अर्जुन सिंह जी से सलाह लेती थी। राहुल गांधी राजनीति समझ नहीं पा रहे वे सोचते है उन्हें सब कुछ आता है यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है। पार्टी को कोई कार्यक्रम या दिशा नहीं दे पा रहे। विचारों की लड़ाई लड़ते नहीं, समस्याओं से जूझतें नहीं केवल नरेन्द्र मोदी जी के खिलाफ बोलना और सरकार की हर नीति का विरोध करना उनकी आदत बन गयी है। कोरोना काल में राहुल गांधी के पास जनता का दिल जीतनें का समय था। उन्हें इस आपदा पर सरकार का साथ देकर पार्टी की खोयी प्रतिष्ठा की वापिसी भी करना चाहिये थी। कंधे से कंधा मिलाकर यदि सरकार द्वारा किये गये कार्यों में हाथ बटाते तो आज पार्टी को लोग दूसरी दृष्टि से रखते। बजाय इसके राहुल पूरे समय संकट काल में केवल कमियों को तलाशते रहे। इस तरह बची खुची साख भी उन्होने खो दी। उनके पास एक बड़ी ताकत थी कि वे नेहरू के वारिसान हैं और दूसरी ताकत थी गांव गांव में कांग्रेस का संगठन और उसकी पहिचान। राहुल गांधी ने ये दोनों ताकतें गंवा दी। सोनिया परिवार अपने आप को नेहरू परिवार का असली झंडा बरदार साबित नहीं कर सका न ही कांग्रेस पार्टी के विचारों का संवाहक। नतीजा पार्टी जमींदोश होती चली गयी।

ये आत्मघाती कदम सोनिया परिवार और उनके स्वार्थी चाटूकार कोटरी सदस्यों ने खुद उठाया जो जल्दी सत्ता पानें को कुछ भी कर सकते हैं। देश के साथ खिलवाड़ तक कुछ भी।

गांधी जी ने पार्टी नेताओं को मंत्री, राज्यपाल, सांसद आदि बन जाने पर कुछ सिद्धान्तों को अमल करने को कहा था। उन्होनें राजधानियों में बड़े बंगलों का, बड़ी कारों का उपयोग करने को मना किया था। घर में नौकर चाकर और सुरक्षा सैनिक रखे जाने को मना किया था। गांधी जी ने भाई भतीजा वाद करने से मना किया था और देश में निर्मित वस्तुओं के उपयोग के लिये कहा था खादी पहनने को कहा था। कांग्रेसी नेताओं ने ठीक इसका उलट किया, गांधीवाद की बात कहते रहे पर उस पर चले नहीं। गांधी जी ने कहा था यदि कांग्रेस इन सिद्धान्तों पर नहीं चल सकती तो उसका समाप्त करना ही उचित है क्योंकि उसने आजादी पाकर अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है। सच मायने में तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरकार को गांधीवादी विचारधारा पर चलाकर नये भारत के निर्माण का रास्ता प्रशस्त्र कर दिया है। स्वच्छता अभियान, सौचालय निर्माण, असाध्य रोग पीडि़तों का मुफ्त इलाज, गरीब विद्यार्थियों को आरक्षण आदि अनगिनत कार्य इसका जीता जागता उदाहरण है। अब देश चल पड़ा है, आखरी आदमी के आंसू पोंछने की राह पर, गांधी के सपनों का भारत बनाने के लिये।

 

डॉ. विजय खैरा

 

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