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अन्नदाता पर भारी आपदा

देश के अनाज के कटोरे में फसल चौपट होने से किसानों की दुर्दशा से पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों में राजनैतिक पारा चढऩे लगा है।

खेत में फसल सुनहरी हो गई थी, जो अच्छी पैदावार का छलावा दे रही थी। लेकिन पिछले तीन महीने में रह-रहकर बारिश, ओलावृष्टि और तेज हवाओं ने फसल बर्बाद कर दी और किसान कर्ज में आ गया। पंजाब में तो हालात काफी खराब हो गए, क्योंकि सरकार ने समय पर खरीद के नियमों में ढील नहीं दी और अनाज से भरी मंडियों को खाली नहीं किया। पैसे की तंगी के कारण सरकार किसानों को अनाज का दाम भी समय पर नहीं दे पाई।

इस साल पश्चिमी विक्षोभ की असामान्य तेजी की वजह से दुनिया भर में मौसम बिगड़ा रहा है। इसने देश का अनाज का कटोरा कहे जाने वाले इलाके में किसानों को पूरी तरह तबाह कर दिया है। इस बार पंजाब में पैदावार प्रति एकड़ 14 क्विंटल तक गिर गई, जबकि सामान्य वर्ष में पैदावार प्रति एकड़ 30 क्विंटल और अच्छे मौसम वाले वर्ष में 45 क्विंटल तक होती है।

केंद्र सरकार के अनाज भंडार में पंजाब हर साल 125 लाख टन गेंहू देता है तो हरियाणा करीब 70 लाख टन का इजाफा करता है। हालांकि इस साल पंजाब से बमुश्किल 100 लाख टन गेंहू की ही उम्मीद है। हरियाणा से भी 70 लाख टन का आंकड़ा छूने की उम्मीद कम है। पंजाब के पटियाला के राजुपरा गांव के किसान राजबीर सिंह अपनी बर्बाद फसल के बीच खड़े हैं। वे कहते हैं, ”किसानों को तो खेतों में लगी लागत की भी भरपाई की उम्मीद नहीं है, मुनाफे की बात कौन करे। पैदावार तो प्रति एकड़ काफी कम हुई ही है, दाने भी पतले, टूटे और भींगे हुए हैं।’’

पंजाब के किसानों की नाराजगी के निशाने पर सरकार भी आ गई है। वे न सिर्फ गेहंू खरीद के नियमों में ढील देने की मांग कर रहे हैं, बल्कि फसल बीमा और बेमौसम बारिश से बर्बाद हुई फसल के लिए प्रति एकड़ 35,000 रु. मुआवजा भी मांग रहे हैं। यही नहीं, उनकी मांगों में खुदकशी करने वाले किसानों के परिवार को 10 लाख रु. मुआवजा और एक व्यक्ति को नौकरी की भी मांग कर रहे हैं। पंजाब सरकार मंडियों से गेंहू तो उठा नहीं पाई और मंडियों में जाम लगने से ही किसान परेशान नहीं हैं, बल्कि सरकार खरीद की गई गेंहू का भुगतान भी समय पर करने में नाकाम रही है। अप्रैल के आखिरी हफ्ते तक शिरोमणि अकाली दल सरकार ने 50 लाख मैट्रिक टन गेहूं खरीद के एवज में सिर्फ 76 लाख रु. ही अदा कर पाई थी, जबकि कुल रकम 7,250 करोड़ रु. बैठती है। पंजाब मे अनाज खरीद हर साल 1 अप्रैल से शुरू हो जाती है और यह मई के मध्य तक चलती है। सरकारी नियमों के हिसाब से किसानों का बकाया 48 घंटे के भीतर दे दिया जाना चाहिए।

पंजाब किसान आयोग के परामर्शदाता पी.एस. रांगी ने कहा, ”सराकार बारिश और ओला पडऩे से हुए नुकसान के आंकलन करने में आगा-पीछा कर रही है। चूंकि सरकार नुकसान का सही-सही आंकलन ही नहीं कर पाई है, इसलिए केंद्र से पर्याप्त मुआवजा भी नहीं मांग पाई है। इससे किसान परेशान हैं, भारी संकट से गुजर रहे हैं और कर्ज के जाल में फंस गए हैं।’’ असल में किसानों का दर्द यह भी है कि सरकार मंडियों से गेहंू नहीं उठा पाई है।

हाजरों की तादाद में नाराज किसान अमृतसर से 20 कि.मी. दूर जांदियाला में रेल लाइन पर धरने पर बैठ गए और अमृतसर-नई दिल्ली रेललाइन को रोक दिया। यह धरना किसान संघर्ष समिति की अगुआई में मंडियों से गेंहू न उठा पाने की सरकार की नाकामी के खिलाफ हुआ। पंजाब मे दूसरे इलाकों में भी ऐसे ही प्रदर्शन हुए। तरनतारन में मुख्य राजमार्ग को घंटों तक रोक दिया गया। रेल रोको आंदोलन इतना जबरदस्त था कि अमृतसर-नई दिल्ली फ्लाइंग मेल जांदियाला से आगे नहीं जा पाई और नई दिल्ली से आ रही स्वर्ण शताब्दी को ब्यास में रोकना पड़ा और दिल्ली से आने वाली शाने पंजाब बीच में ही रुकी रही।

सरकार पर वार करने का अच्छा मौका देखकर विपक्षी कांग्रेस भी राजनैतिक फायदे के लिए सक्रिय हो गई। दिल्ली में युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने केंद्र की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन किया और संसद भवन के सामने गिरफ्तारियां दीं। इसके एक दिन बाद राहुल गांधी दिल्ली से रेल पकड़ी और दूसरे दर्जे में आम मुसाफिरों के साथ पंजाब और हरियाणा की मंडियों का दौरा किया और किसानों की सहानुभूति बटोरने की कोशिश की। लोकसभा में कांग्रेस के उप नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मांग की कि मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल गद्दी छोड़ दें और किसानों को उचित मुआवजा दें। पार्टी में उनके प्रतिद्वंद्वी प्रताप सिंह बाजवा भी लुधियाना और जगरांव की मंडियों में गए और किसानों से हमदर्दी दिखाई।

हरियाणा की नई सरकार किसानों के साथ

पंजाब के विपरीत हरियाणा में किसान सिर्फ कुदरत की मार से ही परेशान हैं। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की नई सरकार ने किसानों से फौरन और पर्याप्त मात्रा में खरीद की व्यवस्था की। 26 अप्रैल तक 48 लाख टन गेंहू की खरीद हो चुकी थी, जबकि इसी अवधि में पिछले साल 46 लाख टन खरीदी ही हो पाई थी। पंजाब में नुकसान का आंकलन अभी नहीं किया जा सका है, लेकिन हरियाणा ने अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंप दी है। पिछले तीन महीने में बेमौसम बारिश से हरियाणा में करीब 13 लाख एकड़ की गेंहू की फसल बर्बाद हो गई है। इस साल राज्य में गेंहू की बुआई 63 लाख एकड़ में की गई थी। करीब 3 लाख एकड़ की फसल 75 से 100 फीसदी तक बर्बाद हुई, जबकि 2 लाख एकड़ में बर्बादी 50 से 75 फीसदी के बीच है और 8 लाख एकड़ की फसल 25 से 50 फीसदी तक नुकसान हुई है। हरियाणा में सर्वाधिक प्रभावित जिला पलवल है, जहां 5 लाख एकड़ फसल बर्बाद हुई। इसके बाद अधिक बर्बादी महेंद्रगढ़, हिसार, भिवानी और रेवाड़ी में हुई है।

बेमौसम बारिश से प्रति एकड़ पैदावार भी गिर गई। कटाई के समय भी बारिश होने से गेंहू के दाने भींग गए और काले पड़ गए। हरियाणा में खेती के बेहतर तौर-तरीकों से पंजाब के मुकाबले अधिक पैदावार होती है। हरियाणा में 2014 में प्रति एकड़ 47 क्विंटल गेंहू पैदा हुआ था, जबकि 2013 में पैदावार प्रति एकड़ 44 क्विंटल थी। इस साल प्रति एकड़ 40 क्विंटल से कम पैदावार रहने का अनुमान है।

दरअसल किसानों की परेशानी करनाल में भारतीय गेहूं और जौ शोध संस्थान के वैज्ञानिकों ने भी मौसम की मार से अप्रभावित रहने वाले बीज तैयार करके दूर की है। संस्थान में मुख्य शोधकर्ता आर.के. गुप्ता ने कहा कि नुकसान के बावजूद दाने पुष्ट हैं और उनकी पौष्टिकता में कमी नहीं आई है। वे कहते हैं, ”दानों की चमक फीकी पड़ गई है और नमी की मात्रा भी ज्यादा है, जिससे उसमें फफंूद लगने का खतरा है। इसके अलावा दाने खाने लायक हैं और पौष्टिकता से भरपूर हैं।’’

पंजाब में असंतोष पर हरियाणा में शांति कैसे

हरियाणा में सरकार फौरन हरकत में आ गई और उसने बिना किसी झंझट के खरीद करने की व्यवस्था की। अप्रैल के अंत तक 65 लाख टन के कुल लक्ष्य में से करीब 50 लाख टन गेंहू उठाया जा चुका था। जैसे ही गेहंू मंडियों में आना शुरू हुआ, भाजपा सरकार ने भारतीय खाद्य निगम से जांच करवानी शुरू कर दी थी। दानों के कमतर होने के अंदाजे के कारण हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार की ही तरह खरीद के नियमों में ढील दी, ताकि किसान बेमतलब परेशान न हों। सरकार टूटे और भींगे दानों के मामलों में ढिलाई दी थी। सरकार ने दानों की बर्बादी का नुकसान का खर्च उठाने का फैसला कर लिया।

पंजाब में अनाज खरीद का मामला जिला खाद्य और आपूर्ति नियंत्रक के जिम्मे है, जो अधिक कुशल नहीं हैं। इसके विपरीत हरियाणा में यह काम उपायुक्तों के जिम्मे है जो हर रोज मंडियों का दौरा करते हैं और समस्याओं को दूर करने की कोशिश करते हैं। खरीद को झंझटों से मुक्त करने के लिए कई स्तरों की व्यवस्था बनाई गई है। इसके तहत प्रशासकीय सचिवों को जिलों का प्रभारी बनाया गया है। ये सचिव दौरा करते हैं और आश्वस्त करते हैं कि उपायुक्तों की व्यवस्था सही ढंग से काम करे।

उधर, पंजाब में किसान फसल बर्बाद होने से परेशान हुए तो सरकार के हाथ-पैर फूल गए। खाद्य मंत्री आदेश प्रताप सिंह कैरों काफी देर से हरकत में आए। मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के दामाद कैरों ने फसल कटाई शुरू होने के करीब महीने भर बाद 22 अप्रैल को केंद्र से खरीद नियमों में ढील देने की मांग की। उस समय तक हरियाणा ने नियमों में ढील की मंजूरी हासिल कर ली थी और तेजी से खरीद कर रही थी।

पंजाब की मंडियों में फैली अराजकता के लिए कुछ हद तक बादल परिवार भी दोषी है। मुख्यमंत्री यह आश्वस्त करते हैं कि उनके दामाद कैरों के कामकाज में कोई दखलंदाजी न हो, लेकिन कैरों समय पर हरकत में नहीं आते। उन्होंने उपायुक्तों की निगरानी व्यवस्था को खत्म करके खरीद प्रक्रिया का केंद्रीकरण कर दिया है। इससे भी अराजकता पैदा हो रही है। इसके अलावा, मंडियों से गेहूं की ढुलाई भी निहितस्वार्थी तत्वों के हाथ में है। मंडियों से गोदाम तक ढुलाई का धंधा काफी फायदेमंद बन गया है। ढुलाई के ठेके खरीद का समय शुरू होने के दो महीने पहले तय हो जाने चाहिए, लेकिन सरकार निहितस्वार्थी नेताओं के चक्कर में कुंडली मारे बैठी रही और मंडियों में अनाज आना शुरू हो गया तब तक ढुलाई के ठेके की नीलामी का काम पूरा ही नहीं हो पाया था।

इन सब नाकामियों के कारण मंडियां अनाज से भरती रहीं और ढुलाई रुकी रही। सो, संकट खड़ा हो गया। हताशा में किसानों की खुदकशी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली में राजस्थान के किसान की खुदकशी का नजारा देख पूरा देश सन्न रह गया। असलियत यह है कि हताशा में सिर्फ गजेंद्र सिंह ने ही अपनी जान नहीं दे दी, बल्कि फसल कटाई के पिछले दो महीनों में देश भर में 100 से ज्यादा किसानों ने बर्बादी का आलम देख अपनी जान दे दी।

किसानों की खुदकुशी की खबरें सिर्फ राजस्थान, हरियाणा और पंजाब से ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से भी आईं। भारत में कितने किसान अपनी जान दे रहे हैं, इसका ठोस आंकड़ा किसी एजेंसी के पास नहीं है।

साल भर पहले एक रिपोर्ट में बताया गया कि ”भारतीय किसानों में खुदकुशी की दर बाकी आबादी से 47 फीसदी अधिक है।’’ उस रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 में किसानों की खुदकुशी की दर प्रति एक लाख किसान 16.3 थी, जो बाकी आबादी में 11.1 की दर से पांच अंक ज्यादा थी। यह भी दावा किया गया कि ”1995 से करीब 2,70,940 किसानों ने अपनी जान दे दी है। 1995 से 2000 के बीच छह साल में किसानों की खुदकुशी का सालाना औसत 14,462 था, जबकि 2001 से 2011 के 11 साल मे सालाना औसत 16,743 था। यानी औसतन हर रोज करीब 46 किसान अपनी जान दे रहे हैं या कहें कि 2001 के बाद से हर आधे घंटे में एक किसान अपनी जान दे देता है।’’

जुलाई 2012 में ब्रिटेन की प्रतिष्ठित मेडिकल पत्रिका लैंसेट में एक रिपोर्ट छपी कि 2010 में 19,000 किसानों ने खुदकुशी कर ली। पंजाब में ही, हलफनामों के रिकॉर्ड से पता चलता है कि पिछले एक साल में 4680 किसानों ने खुदकुशी कर ली। उनकी विधवाओं ने सरकार से मुआवजे की मांग की। एक गैर-सरकारी संगठन मूवमेंट एगेंस्ट स्टेट रिप्रेशन ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की तो करीब 2500 विधवाओं को 2 लाख रु. मुआवजा मंजूर भी हुआ।

अब, हरियाणा के कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने यह बयान देकर विवाद खड़ा कर दिया कि ”आत्महत्या करने वाले किसान कायर और अपराधी हैं।’’ धनखड़ ने कहा, ”भारतीय कानून के मुताबिक आत्महत्या अपराध है। आत्महत्या करने वाला अपनी जिम्मेदारियों से भागता है। ऐसे लोग कायर हैं और सरकार ऐसे कायरों और अपराधियों के साथ खड़ी नहीं होगी।’’

इससे विपक्षी दलों ने भारी विवाद खड़ा कर दिया और धनखड़ सफाई देते रहे, लेकिन उनकी बात अनसुनी रह गई।

अब किसानों को शांत करने, उनकी आहत भावनाओं पर मरहम लगाने और मौसम की मार से असुरक्षा की भावना से निजात दिलाने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है। दरअसल विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक की पृष्ठभूमि में मौसम की मार से किसानों का बढ़ता असंतोष केंद्र में नई सरकार के लिए भारी चुनौती लेकर आई है।

चंडीगढ़ से प्रिया यादव

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