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किसान आंदोलन के पीछे कौन

किसान आंदोलन के पीछे कौन

कृषि विधेयक सहित विभिन्न कृषि कानूनों के विरोध के चलते पंजाब-हरियाणा और यूपी के किसानों का आंदोलन उग्र होता जा रहा है। आंदोलन के तीसरे दिन दिल्ली पहुंचे किसानों ने बड़ा ऐलान किया है। किसानों ने कहा कि अगर उनकी बात नहीं मानी गई तो वह दिल्ली का मेन हाईवे जाम करके आवाजाही पूरी तरह से बंद कर देंगे।

मेन हाईवे जाम करने की खबर से दिल्ली पुलिस के अफसरों में खलबली मच गई हैं। किसानों का कहना था कि जैसा उनकी कमेटी कहेगी किसान वही करेंगे। रविवार को भारी मांत्रा में ट्रैक्टर-ट्रॉली और गाडिय़ों से किसानों के कई संगठन शंभू बॉर्डर पहुंचे। हालांकि प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली में कई जगहों पर भारी फोर्स तैनात है, लेकिन किसानों के तेवर के आगे पुलिस के पसीने छूटते दिखाई दिए। अलग-अलग राज्यों से दिल्ली बॉर्डर पर पहुंचे किसानों को रोकने के लिए उन पर पानी की बौछारें, आंसू गैस और कुछ जगहों पर लाठियां भी भांजी गईं, लेकिन दिल्ली की ओर किसानों के बढ़ते कदम पीछे नहीं हटे।

यहां यह कहना जरुरी है की कोरोना महामारी की अधिक खतरनाक होती जटिल स्थितियों के बीच किसानों के आंदोलन का जो उग्र स्वरूप दिल्ली की सीमाओं एवं दिल्ली में दिखा है, जो उन्हें दिल्ली में प्रवेश एवं बुराड़ी ग्राउंड में प्रदर्शन की अनुमति मिली है, वह दुखद ही नहीं, चिंताजनक भी है। यह आन्दोलन किसानों के हितों से अधिक राजनीतिक कुचेष्टाओं का षडय़ंत्र है। किसानों के जीवन को संकट में डालना एवं उन्हें आन्दोलन के लिये उकसाना राजनीतिक विसंगति एवं षडय़ंत्र को ही उजागर कर रहा है। वर्तमान की स्वास्थ्य एवं जीवन-रक्षा जरूरतों को देखते हुए केंद्र सरकार यह नहीं चाहती कि किसी भी तरह का विरोध मार्च दिल्ली में आयोजित हो, इसलिए पंजाब से होते हुए हरियाणा के रास्ते दिल्ली में घुसने की कोशिश करने वाले किसानों के खिलाफ कुछ बल प्रयोग भी किया गया है। सीमा पर बैरिकेडिंग के चलते दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और सिंघु बॉर्डरों पर वाहनों के लंबे जाम की समस्या देखी गई है। मेट्रो सेवाओं पर भी असर पड़ा है। बड़ी संख्या में आन्दोलन में शामिल किसानों ने कोरोना के लिये जारी निर्देशों की धज्जियां उडाते हुए न मॉस्क का प्रयोग किया हैं, न सामाजिक दूरी का।

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कोरोना के कहर को देखते हुए पुलिस ने स्पष्ट कर दिया था कि किसान अगर कोरोना महामारी के समय में दिल्ली आने की कोशिश करते हैं, तो वह कानूनों का उल्लंघन है। उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। बहरहाल, आम लोगों या किसानों को हुई परेशानी के लिए राजनीति को भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। यह समय ऐसे आन्दोलनों से राजनीतिक लाभ लेने का समय नहीं है। समूचा राष्ट्र कोरोना से जुड़ी अन्तहीन समस्याओं से घिरा है, दिल्ली के हालात तो अधिक बदतर है। ऐसे समय में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल का किसानों को रोकने के लिये किये प्रयोगों पर राजनीति करना विडम्बनापूर्ण है। बात केवल केजरीवाल की ही नहीं है बल्कि पंजाब के मुख्यमंत्री भी इसके लिये जिम्मेदार है।

ऐसा प्रतीत होता है की पंजाब के मुख्यमंत्री चाहते हैं कि किसान दिल्ली में विरोध मार्च करके अपनी ताकत दिखाएं। यह बात छिपी हुई नहीं है, पिछले दिनों में पंजाब के मुख्यमंत्री ने भी दिल्ली में विरोध जताया था, पर उनकी मांग नहीं मानी गई। आनन-फानन में वह किसानों को खुश करने के लिए अपनी ओर से ऐसे कानून बनाने की कोशिश कर चुके हैं, पर वह जानते हैं कि केंद्र सरकार की सहमति के बिना यह कानून मंजूर नहीं होगा। पंजाब में किसानों का प्रदर्शन लगातार जारी है, अत: प्रदर्शन का स्थान बदलने की राजनीति कतई अचरज का विषय नहीं है। पंजाब के बजाय अगर दिल्ली में किसान अपनी आवाज उठाएं, तो यह पंजाब के अनुकूल है, लेकिन यह दिल्ली के लिये कैसे अनुकूल हो सकती है? एक तरह से साबित हो गया, भारतीय राजनीति में परस्पर विरोध कितना जड़ एवं अव्यावहारिक है। हमारे राजनेता जब टकराव पर उतरते हैं, तो शायद नहीं सोचते कि देश में क्या संदेश जा रहा है। क्या भारतीय राजनीति आज इतनी अशालीन एवं असंवेदनशील हो गयी है कि असंख्य लोगों के जीवन को संकट में डालने से उन्हें कोई गुरेज नहीं रहा?

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यहां यह समझना जरुरी है की पंजाब और हरियाणा के किसान ही क्यों विरोध कर रहें है? सरकार जो अनाज की खरीद करती है उसका सबसे अधिक हिस्सा यानी करीब 90 फीसदी तक पंजाब और हरियाणा से होता है। जबकि देश के आधे से अधिक किसानों को ये अंदाजा ही नहीं है कि एमएसपी क्या है। ऐसे में उन्हें ये समझने में वक्त लगेगा कि उनकी बात आखिर क्यों हो रही है। ये समझने की जरूरत है कि जिस पर सीधा असर होगा वो सबसे पहले विरोध करेगा। एक अनुमान के अनुसार देश में केवल 6 फीसदी किसानों को एमएसपी मिलता है। लेकिन 94 फीसदी किसानों को तो पहले ही एमएसपी नहीं मिलता और वो बाजार पर निर्भर हैं। ऐसे में ये समझा जा सकता है कि पंजाब और हरियाणा के किसान विरोध क्यों कर रहे हैं।

इस बात से  किया जा सकता की भारत में शांतिपूर्वक आंदोलन करने का अधिकार सभी को है लेकिन कोरोना महामारी के दौरान किसान आंदोलन लम्बा न खिंचे, इसके लिए गम्भीर प्रयासों की जरूरत है। देश के अनेक किसान संगठनों जैसे अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति, राष्ट्रीय किसान महासंघ और भारतीय किसान संघ के विभिन्न धड़ों द्वारा किये जा रहे इन प्रदर्शनों का मुख्य उद्देश्य नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा पारित तीनों नए कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए केन्द्र सरकार पर दबाव बनाना है। किसान तभी मजबूत होगा वह देश के किसी दूसरे कोने में जाकर अपना उत्पाद बेच सकेगा, पर इसके साथ ही, मंडी और एमएसपी की मौलिक भारतीय व्यवस्था को भी मजबूत रखने की जरूरत है। केंद्र सरकार इन्हीं बातों को बार-बार दोहरा चुकी है कि मंडी और समर्थन मूल्य की व्यवस्था बनी रहेगी। ऐसे में, अविश्वास एवं विरोध गैरभाजपा सरकारों या किसान समाज में क्यों पैदा हो रहा है? उसे दूर करने की जिम्मेदारी भले केन्द्र सरकार पर ज्यादा हो, लेकिन इस कार्य में विपक्ष को भी सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। तमाम किसान संगठनों के साथ मिलकर देश को आश्वस्त करने का समय है, ताकि किसानों के नाम पर शुरू हुई राजनीति का संतोषजनक पटाक्षेप हो। समय रहते निर्णायक मंचों पर किसानों को सुनने और संतुष्ट करने के प्रयास तेज होने चाहिए।

 

उदय इंडिया ब्यूरो

 

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