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कानूनी शिकंजे में कानून मंत्री

कानूनी शिकंजे में कानून मंत्री

दिल्ली के कानून मंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता जितेन्द्र सिंह तोमर के पेशानी पर पड़े बल ये बताने के लिए काफी हैं कि उन पर कानून का शिकंजा कस चुका है। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, आम आदमी पार्टी पर लगातार हमले कर रही हैं और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर को तुरंत बर्खास्त करने की जिद्द पर अड़ी हुई हैं। बिहार के भागलपुर स्थित तिलकामांझी विश्वविद्यालय द्वारा लॉ डिग्री प्रमाण-पत्र को फर्जी बताने के बाद 30 अप्रैल को सिग्नेचर ब्रिज के लूप के उद्घाटन के दौरान तोमर के चेहरे पर दबाव को स्पष्ट महसूस किया गया।

मामला दरअसल जितेन्द्र सिंह तोमर की फर्जी डिग्री का है, जो उनके गले की फांस बनी हुई है। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के प्रत्याशी नंदकिशोर गर्ग ने तोमर की फर्जी डिग्री का मामला उठाया था, लेकिन उस समय यह मुद्दा  राजनीतिक आरोप तक सीमित रह गया। विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की भारी जीत के बाद केजरीवाल मंत्रिमंडल में तोमर को कानून एवं न्याय मंत्रालय का पदभार सौंपा गया। तोमर प्रकरण के बाद अरविंद केजरीवाल की ईमानदार छवि और पार्टी में ईमानदार लोगों को तरजीह देने के उनके दावे का भाजपा और कांग्रेस ने खूब मजाक उड़ाया।

इन राजनीतिक चहलकदमी के बीच तोमर का मामला आरटीआई एक्टिविस्टों और वकीलों के बीच छा गया। गाजियाबाद के रहने वाले आरटीआई एक्टिविस्ट प्रदीप ने 22 जनवरी 2015 को डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) से तोमर की डिग्री से संबंधित जानकारियां मांगी। जवाब में विश्वविद्यालय ने कहा कि तोमर की ग्रेजुएशन की डिग्री फर्जी है। इस जानकारी के आने के बाद एडवोकेट संतोष कुमार शर्मा ने दिल्ली हाईकोर्ट में तोमर की फर्जी डिग्री को लेकर 4 फरवरी 2015 को एक रिट याचिका दायर की।

जितेन्द्र सिंह तोमर ने दिल्ली बार कॉन्सिल में पंजीकरण के लिए 2010 में आवेदन दिया और 2011 में पंजीकृत हो गए। पंजीकरण के लिए आवेदन के साथ आवेदक की लॉ डिग्री के सर्टिफिकेट की कॉपी, स्नातक की डिग्री का सर्टिफिकेट, जन्मतिथि के लिए दसवीं का सर्टिफिकेट और अध्ययन के दौरान किसी अंतराल (यदि हो तो) के लिए एक एफिडेविट देना अनिवार्य होता है। तोमर ने जो स्नातक का सर्टिफिकेट संलग्र किया था, उसके अनुसार उन्होंने सीनियर सेकेंड्री की परीक्षा दिल्ली के अशोक विहार स्थित गवर्नमेंट ब्वॉज सीनियर सेकेंड्री स्कूल से 1983 में पास किया। विज्ञान में दो वर्षीय स्नातक की परीक्षा 1988 में का. सु. साकेत पी.जी. कॉलेज, फैजाबाद से प्रथम श्रेणी में पास की है, जिसका अनुक्रमांक संख्या 31331 है। तोमर के दिए लॉ डिग्री सर्टिफिकेट के अनुसार, उन्होंने तीन वर्षीय एल.एल.बी. पाठ्यक्रम के लिए 1994 में बिहार के भागलपुर स्थित तिलकामांझी विश्वविद्यालय से संबद्ध बिहार के मुंगेर के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टीज में नामांकन कराया। लॉ के प्रथम वर्ष की परीक्षा उन्होंने 1995 में दी और अंतिम वर्ष की परीक्षा 1999 में दी। इस तरह तीन वर्षीय पाठ्यक्रम को उन्होंने पांच वर्षों में द्वितीय श्रेणी में पास किया, जिसका पंजीयन संख्या 1306 है। (सारे सर्टिफिकेट की कॉपी उदय इंडिया के पास मौजूद हैं)।

उन्होंने अपने दिए गए एफिडेविट में 1983 से 1986 के बीच के तीन साल के शैक्षिक अंतराल में सिर्फ एक साल, 1984 से 1985 के बीच के अंतराल को ही प्रदर्शित किया है। तोमर ने 83 से 84 और 85 से 86 के बीच के साल के बारे में उन्होंने एफिडेविट में कुछ नहीं बताया है। 1984 से 1985 के बीच के अंतराल के बारे में उन्होंने कहा है कि इस दौरान वे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। उसी तरह, 1988 से 1994 के बीच छ: साल के अंतराल में से सिर्फ 1989 से 1993 के बीच के चार वर्षों के बारे में दिए गए एफिडेविट में उन्होंने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के बारे में तैयारी ही बताया है। उन्होंने स्नातक के बाद के पहले एक वर्ष और लॉ में नामांकन के पहले एक वर्ष के बारे में कुछ नहीं बताया है। एफिडेविट में उन्होंने यह भी कहा है कि इस दौरान उन्होंने किसी भी विश्वविद्यालय में नामांकन नहीं कराया।

इन तमाम शुरूआती खामियों के बावजूद जितेन्द्र सिंह तोमर को दिल्ली बार कॉन्सिल का सदस्य बना लिया गया। पंजीकरण के लिए आवेदन के साथ बार कॉन्सिल के एक सदस्य के रेफरेंस की भी आवश्यकता होती है। रेफरेंस यह अर्थ लगाया जाता है कि रेफरेंस देने वाला व्यक्ति आवेदक को अच्छी तरह जानता है और उसके चरित्र से पूरी तरह वाकिफ है। यदि उसे संस्था का सदस्य बनाया जाता है तो इससे संस्था पर किसी तरह का धब्बा नहीं आएगा। तोमर के इस अपूर्ण आवेदन पर पंजीकरण का अनुशंसा करने वाले व्यक्ति के रूप में एडवोकेट मुरारीलाल तिवारी के हस्ताक्षर हैं, जो बार कॉन्सिल के सदस्य के साथ-साथ उस वक्त एनरॉलमेंट कमिटी के सदस्य थे। मुरारीलाल तिवारी पर भी उंगली उठनी ही थी, क्योंकि जाहिर सी बात है कि दिल्ली बार कॉन्सिल ने पंजीकरण करने से पहले उन सारे कागजातों की जांच और उनका सत्यापन निश्चित रूप से की ही होगी। अगर ऐसा नहीं किया था तो निश्चित रूप से दिल्ली बार कॉन्सिल के प्रशासनिक अधिकारियों पर उंगली उठेगी। बावजूद इसके, असली मामला इससे भी अधिक संदेहास्पद और जटिल है।

जब आरटीआई एक्टिविस्ट ने राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से जितेन्द्र सिंह तोमर के प्रमाण-पत्र से संबंधित सूचना मांगी, तब जवाब में विश्वविद्यालय ने कहा कि बी.एस.सी. द्वितीय वर्ष अनुक्रमांक 31331, वर्ष 1988, का.सु. साकेत पी.जी. कॉलेज, फैजाबाद की उपाधि एवं अंकपत्र की जांच गोपनीय विभाग की सारणीयन पंजिका द्वारा जांचोपरांत ज्ञात हुआ कि उक्त उपाधि, अंकपत्र एवं अनुक्रमांक पूर्णतया फर्जी हैं। इसी संबंध में जब पाटियाला हाउस कोर्ट के एडवोकेट रिपुदमन सिंह भारद्वाज ने राममनोहर लोहिया विश्वविद्यालय, फैजाबाद से आरटीआई के तहत जितेन्द्र सिंह से संबंधित अन्य सूचनाएं मांगी, तब विश्वविद्यालय ने 31 मार्च 2015 को दिए जवाब में यह कहते हुए असमर्थता जताई कि जितेन्द्र सिंह तोमर को वर्ष 1988 में बी.एस.सी. की अंकतालिका व उपाधि विश्वविद्यालय से प्रदत्त नहीं की गई है, इसलिए उसकी कोई भी सूचना प्रदान किया जाना संभव नहीं है।

इस तरह ‘ईमानदार’ मुख्यमंत्री के कैबिनेट में एक व्यक्ति कानून मंत्री बन गया, जिसने फर्जी बी.एस.सी. के प्रमाणपत्र पर एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की। इस संबंध में दिल्ली पाटियाला हाउस कोर्ट के एडवोकेट रिपुदमन सिंह भारद्वाज और एडवोकेट विजय जोशी ने 10 मार्च 2013 को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को पत्र लिखा और साथ ही पत्र की एक-एक प्रति दिल्ली के उप-राज्यपाल एवं आम आदमी पार्टी के तत्कालीन लोकपाल एडमिरल (सेवानिवृत्त) एल. रामदास को भी भेजी, लेकिन मुख्यमंत्री की तरफ से कोई जवाब नहीं दिया गया। इसके पहले भारद्वाज ने 9 मार्च को दिल्ली बार कॉन्सिल को यह कहते हुए तोमर का पंजीकरण समाप्त करने के लिए शिकायत-पत्र लिखा था कि पंजीकरण के समय आवश्यक एल.एल.बी. की प्रोविजनल सर्टिफिकेट और उपस्थिति प्रमाणपत्र कॉन्सिल को नहीं सौंपा, जो कि अनिवार्य है।

दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर जांच के बाद जब तिलकामांझी विश्वविद्यालय, भागलपुर ने अपनी रिपोर्ट भेजी, वह और भी अधिक चौंकाने वाली है। चांसलर के निर्देश पर विश्वविद्यालय ने 17 मार्च 2015 को एन्क्वायरी की थी। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय द्वारा जारी किया गया प्रोविजन सर्टिफिकेट (अनुक्रमांक 3687) संजय कुमार चौधरी के नाम पर है, जो कि जितेन्द्र कुमार तोमर के नाम पर जारी किया गया है। संजय कुमार चौधरी 1998 में विश्वविद्यालय से बी.ए. ऑनर्स (राजनीति शास्त्र) से उत्तीर्ण हुए थे। जितेन्द्र सिंह तोमर द्वारा जमा कराए गए प्रोविजनल सर्टिफिकेट पर विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह का हस्ताक्षर और मुहर है, जबकि विश्वविद्यालय द्वारा जारी रिपोर्ट में संजय कुमार चौधरी को जारी इस सर्टिफिकेट पर डॉ. मोहम्मद गुलाम मुस्तफा का हस्ताक्षर और मुहर है।

तिलकामांझी विश्वविद्यालय द्वारा जांच के बाद जारी रिपोर्ट में एक और बात खुलकर सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वविद्यालय में जितेन्द्र सिंह तोमर, पुत्र बलबीर सिंह तोमर, गांव – धपरी, डाकघर-गोबड्डा, मुंगेर से जिस व्यक्ति का पंजीकरण है उसका पंजीयन संख्या 1306 है, जो 1994 में कराया गया था। उसमें पंजीकरण के जिस माइग्रेशन सर्टिफिकेट (संख्या-156, जारी दिनांक-20 मार्च 1993) बुंदेलखंड विश्वविद्यालय का लगाया गया है, जो झांसी से जारी किया गया है। विश्वविद्यालय ने अपनी जांच में कहा है कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी ने इस तरह के किसी माइग्रेशन सर्टिफिकेट को जारी करने से इंकार किया है।

त्रिनगर से तत्कालीन भाजपा विधायक नंदकिशोर गर्ग ने आरटीआई ऐक्ट के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज से जितेन्द्र सिंह तोमर के बारे में सूचना प्राप्त की। जवाब में राजधानी कॉलेज ने बताया कि कॉलेज के रिकॉर्ड के मुताबिक जितेन्द्र सिंह तोमर, पुत्र बलबीर सिंह तोमर कॉलेज में बी.एस.-सी. के विद्यार्थी के तौर पर नहीं, बल्कि बी.ए. (पास) के रेगुलर विद्यार्थी के रूप में 1985 से 1988 के रूप में पंजीकृत थे। कॉलेज छोडऩे के बारे में कॉलेज के पास कोई सूचना उपलब्ध नहीं है, जबकि इसी दौरान तोमर राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद में बी.एस.-सी. पाठ्यक्रम के लिए पंजीकृत थे (जैसा की दिल्ली बार कॉन्सिल को दिए गए सर्टिफिकेट से ज्ञात होता है।)। एक ही सत्र में दो संस्थानों से नियमित विद्यार्थी के रूप में पंजीकरण नहीं हो सकता। तोमर ने ऐसा किया और कॉन्सिल को दिए गए एफिडेविट में कहा है कि उन्होंने अन्य किसी विश्वविद्यालय में पंजीकरण नहीं कराया है।

जितेन्द्र सिंह तोमर के फर्जीवाड़े को लेकर वकीलों, सामाजिक कार्यकत्र्ताओं और आरटीआई एक्टिविस्टों के सक्रिय होने के बाद तोमर ने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए वकीलों को भी प्रलोभन दिया। तोमर के वकील और दिल्ली बार कॉन्सिल के सदस्य राजीव खोसला ने अधिवक्ताताओं से कहा कि कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना की तर्ज पर दिल्ली के अधिवक्ताओं के लिए दिल्ली स्वास्थ्य योजना की शुरूआत करने वाले हैं। खोसला के प्रलोभन की राष्ट्रीय समाचार-पत्रों मे खबरें भी छपीं हैं, जिसका उन्होंने खंडन तक नहीं किया। खोसला के इस प्रस्ताव को तोमर के खिलाफ मजबूती से खड़े पाटियाला हाउस कोर्ट के अधिवक्ता नीरज गर्ग ने यह कहते हुए नकार दिया कि यह कानून व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मामला है, इसे किसी भी रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

भाजपा नेता नंदकिशोर गर्ग का कहना है कि तोमर की स्नातक की डिग्री के फर्जी होने का एक अन्य आधार यह भी है कि तोमर ने इसे दो-वर्षीय पाठ्यक्रम बताया है, जबकि 4 जून 1986 से स्नातक का पाठ्यक्रम तीन वर्ष को हो चुका था। एफिडेविट में गलत सूचनाएं देने और सारी सूचनाओं के बावजूद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तोमर के साथ मजबूती से खड़े नजर आ रहे हैं। अब न्यायालय की जांच के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि जितेन्द्र सिंह तोमर द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र और सूचनाएं कितनी सही हैं?

वैसे आम आदमी पार्टी के कानून मंत्री हमेशा ही विवादों के केन्द्र रहे हैं। आआपा के पहले शासनकाल में कानून मंत्री रहे सोमनाथ भारती पर पोर्न साइट चलाने के आरोप के साथ-साथ आधी रात में एक विदेशी महिला के साथ बदसलूकी करने का आरोप लगा था। अब वर्तमान कानून मंत्री जितेन्द्र सिंह तोमर फर्जीवाड़े में फंसते नजर आ रहे हैं।


आंतरिक गुटबाजी के कारण तोमर-विश्वास पर कार्रवाई नहीं-टॉम वडक्कन


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आम आदमी पार्टी में तूफान थमने के बाद तोमर व विश्वास प्रकरण ने आम आदमी पार्टी पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। इस विषय पर कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता टॉम वडक्कन से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता सुधीर गहलोत ने लंबी बातचीत की। प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:

जितेन्द्र सिंह तोमर के फर्जी डिग्री मामले में कांग्रेस का क्या रूख है?

राज्य के कानून मंत्री की डिग्री पर प्रश्रचिह्न लगा हुआ है। उन्हें सबसे पहले त्याग-पत्र देना चाहिए और इंवेस्टिगेशन को जारी रखना चाहिए। अब यह मामला कानूनी है। जब तक कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं होती है, तब तक उन्हें अपने पद से हट जाना चाहिए। यही नैतिकता है और राजनीति में नैतिकता जरूरी है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री भी तोमर के साथ खड़े हैं, जबकि मामला उछलते ही आम आदमी पार्टी के तत्कालीन लोकपाल और उन्हें पत्र लिखकर अवगत करा दिया गया था। क्या कहेंगे आप केजरीवाल की ईमानदारी के बारे में?

स्वभाविक है कि आम आदमी पार्टी में भी ग्रुपिज्म है। इनके उप-मुख्यमंत्री मनीष सीसोदिया के गुट के आदमी हैं तोमर। उस गुट को खड़ा करना बहुत जरूरी है।  इसलिए गुट के समर्थन में वह एक फ्रॉडूलेंट व्यक्ति को सपोर्ट कर रहे हैं। मुझे लगता है कि जब तक यह मामला साफ न हो जाए तब तक केजरीवाल को तोमर का समर्थन नहीं करना चाहिए। आम आदमी की जो विचारधारा लेकर ये लोग आए, उन हालातों में समर्थन बिल्कुल नहीं देना चाहिए। अगर समर्थन कर रहे हैं, तो आम आदमी पार्टी सहित प्रश्नचिह्न लगेगा मुख्यमंत्री की नैतिकता पर भी।

तो क्या आपका मतलब आम आदमी पार्टी की आंतरिक गुटबाजी से है, जिसके कारण दागी नेताओं को बचाना पड़ रहा है?

लगता तो ऐसा ही है, लेकिन वो जाने कि क्या है स्थिति। लेकिन, आम लोगों की समझ में यह आता है कि आम आदमी पार्टी के अंदर बहुत लंबी लड़ाई चल रही है। प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को पार्टी से निकाल दिया गया, लेकिन अभी भी वहां लड़ाई खत्म नहीं हुई है। दिल्ली के लोग अभी कुछ सपोर्टिव हैं, लेकिन स्टेट यूनिट से जो खबरें हमें मिल रही हैं, उसके अनुसार गुटबाजी के कारण पार्टी की स्थिति खराब है।

तोमर के बाद अब कुमार विश्वास का मामला तूल पकड़ रहा है। आम आदमी पार्टी और केजरीवाल की नैतिकता और ईमानदारी के दावे से जनता को कितना फर्क पड़ा है?

देखिए कुमार विश्वास का जो मामला है, उसमें महिला ने यही कहा कि विश्वास उनके संबंधों पर रौशनी डालें। महिला ने यह नहीं कहा कि उसका शोषण हुआ या वह पीडि़त है। उसने कहा कि विश्वास को सार्वजनिक रूप से कहना चाहिए कि हमारे-उनके बीच कोई संबंध नहीं है। उस महिला ने कुछ आरोप नहीं लगाया है, लेकिन कुमार विश्वास इसके लिए भी तैयार नहीं हैं। मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि इतना कहने में विश्वास को क्या समस्या है। तो आम आदमी पार्टी में हालात बहुत बिगड़े हुए हैं। कुमार विश्वास का अपने परिवार के साथ संबंध तो खराब हैं ही, उन्होंने एक महिला के परिवार का भी सत्यानाश कर दिया। हैरानी की बात है कि यह सब आम आदमी पार्टी में हो रहा है।


आम आदमी पार्टी की सच्चाई को सामने लाएंगे- नंदकिशोर गर्ग


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जितेन्द्र सिंह तोमर की शैक्षिक सच्चाई सामने लाकर दिल्ली की राजनीति में भूचाल लाने के बाद भाजपा की नजर आम आदमी पार्टी के अन्य नेताओं की पृष्ठभूमि पर है। इस बात का वह दावा भी कर रही है। तोमर के मसले पर भाजपा के नेता और त्रिनगर से विधायक रहे नंदकिशोर गर्ग से उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता सुधीर गहलोत ने विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत हैं कुछ अंश:

जितेन्द्र सिंह तोमर की डिग्री के फर्जीवाड़े के बारे में क्या कहेंगे आप?

यह मामला 27 जनवरी से लगातार चल रहा है। इस देश का दुर्भाग्य है कि ऐसे लोग मंत्री बन जाते हैं। तोमर से कोई उम्मीद तो नहीं करता, लेकिन केजरीवाल से जनता उम्मीद करती थी कि शायद वह कुछ करेंगे, लेकिन वह भी तोमर को क्लीनचिट देते हुए उनके साथ खड़े हैं। केजरीवाल बड़े उच्च आदर्शों की बात करते हैं। कहते हैं गांधीजी के सपनों का भारत बनाना है, शहीद भगत सिंह के सपनों का भारत बनना है। इसलिए उम्मीद थी कि वह इस मामले में वह कड़ा रूख अपनाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आपको उनके बारे में ऐसी सूचना कहां से मिली?

जो कुछ तथ्य आ रहे हैं वह उनके दफ्तर से निकले हैं। मुझे भी उनके दफ्तर से ही ये तथ्य मिले हैं। किसी ने तोमर की शिकायत की थी। तोमर 2013 में चुनाव लड़े थे। उन्हीं की पार्टी के लोग जो उनकी टिकट कटवाना चाहते थे, उन लोगों ने शिकायतों का पुलिंदा भेजा था। वहां से एक कॉपी मुझे मिली थी। तब मैंने सीधे तोमर जी से ही पूछा था कि शिकायतें मिल रही हैं, क्या बात है? तुम हमारे बच्चे जैसे हो, कहीं तुम्हारी टिकट न कट जाए। वह मेरा आदर भी बहुत करते हैं, छोटे भाई की तरह। उन्होंने मुझसे दिसम्बर में इस बारे में कहा कि मैं खुद इस बारे में कुछ न बोलूं अपने भाषणों में। कहने लगे कि वे तो मेरे छोटे भाई हैं। मैं उनका गुरू हूं। तो मैंने अपने भाषणों में उनकी डिग्री की चर्चा नहीं की।

इसका अर्थ है कि वे मानते थे कि उनकी डिग्री फर्जी है?

हां…हां… शत प्रतिशत। तभी तो उन्होंने इसका जिक्र नहीं करने के लिए मुझसे कहा। मैं तो कहता हूं कि पत्रकार अगर थोड़ी मेहनत करें तो इस मामले की हर कड़ी सामने आ जाएगी। मैं कहता हूं कि इस मामले को लेकर वह भी दस लाख रूपए रखें और मैं भी रखता हूं। जो सच्चा साबित होगा, वह जीत जाएगा और उस पैसे को पत्रकारों के वेलफेयर फंड में जमा करा देगा। इस मामले में मीडिया बहुत मेहनत कर रही है। मुंगेर से लेकर हर जगह छानबीन की, लेकिन चुनाव के शोर में वह दबकर रह गया। भागलपुर विश्वविद्यालय और अवध विश्वविद्यालय ने रिपोर्ट भेजी है, उसके अनुसार डिग्री फर्जी है। राजधानी कॉलेज में 85 से 88 तक विद्यार्थी रहे हैं तोमर। एक ही समय में दो जगह से कोई विद्यार्थी तो नहीं हो सकता न? तोमर ने खुद बार कॉन्सिल को एफिडेविट दिया है कि वे राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. हैं। तीन साल के लॉ कोर्स को उन्होंने पांच साल में किया। एफिडेविट में लिखा कि ऑरिजिनल प्रमाणपत्र दिखा दूंगा, लेकिन अभी तक दिखाये नहीं।

लेकिन इन आरोपों को तोमर राजनैतिक आरोप बता रहे हैं…

मान लिया जाए कि आरोप झूठे और राजनीति से प्रेरित हैं तो वे ऑरिजिनल डिग्री न्यायालय को दिखा दें, मामला खत्म हो जाएगा। इन्होंने दिल्ली बार कॉन्सिल से एक महीने का समय मांगा था ऑरिजिनल डिग्री दिखाने के लिए, वह भी समय बीत गया। अब 8 मई को कोर्ट में दिखाने के लिए कहा गया है, वहां दिखा दें। अगर यह सत्य सिद्ध हो गया तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा और अपने ऊपर 10 लाख रूपए का जुर्माना स्वयं लगाउंगा। मैं तोमर का इस्तीफा नहीं मागूंगा, बल्कि चाहूंगा कि उन पर आपराधिक मुकदमा चले और वह गिरफ्तार हों। इस्तीफा केजरीवाल दें।

खबरें यह भी आईं कि तोमर ने अपने पद का दुरूपयोग करते हुए वकीलों को प्रलोभन दिया है। कितनी सच्चाई है इसमें?

उस दिन मैं हाईकोर्ट में था। मैंने भी इस तरह की खबरें सुनी। वे सरकारी कर्मचारियों की तरह वकीलों को हेल्थ स्कीम देना चाह रहे हैं। उन्होंने प्रलोभन दिए हैं। लेकिन, वे कितनों को प्रलोभन देंगे? झूठ तो झूठ ही रहेगा। चंडोक साहब को शर्म नहीं आई, जो वरिष्ठ वकील हैं और सॉलिसीटर जनरल रहे हैं, वह तोमर की तरफ से खड़े हुए। राजीव खोसला खड़े हुए। लेकिन, भागलपुर विश्वविद्यालय का कागज मिलने के बाद सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

अरविंद केजरीवाल सरकार के अन्य लोगों के बारे में आप क्या कहेंगे?

अरविंद केजरीवाल सरकार में सिर्फ तोमर ही नहीं, ऐसे और 10 लोगों का रिकॉर्ड मेरे पास है। इनके बारे में रिसर्च के लिए मैंने टीम लगा रखी है। जल्दी सचाई सामने लाउंगा।

भाजपा का क्या रूख है?

भाजपा के वकील लगे हुए हैं इस काम में। 8 मई तक देखते हैं। इसके बाद आगे की रणनीति तय करेंगे और केजरीवाल को बेनकाब करेंगे, क्योंकि अब मुद्दा केजरीवाल हैं, तोमर नहीं।


व्यवस्था पर धब्बा


”जितेन्द्र सिंह तोमर ने भारत की न्याय-व्यवस्था का फर्जी तरीके से हिस्सा बनकर उस पर धब्बा लगाया है। एक नकली वकील दिल्ली का कानून मंत्री बन जाए यह कतई स्वीकार नहीं है, क्योंकि इस पद के लिए उन्होंने वकालत की फर्जी डिग्री का प्रयोग किया। अगर तोमर मंत्री नहीं बने होते तो इन फर्जी प्रमाण-पत्रों के आधार पर वह न्याय-व्यवस्था का हिस्सा बने रहते। अपने वकील राजीव खोसला के माध्यम से लालच देकर मंत्री पद व न्याय व्यवस्था की गरिमा को उन्होंने और भी क्षति पहुंचाई है। मामला न्यायालय में है, इसलिए उम्मीद है इस पर न्याय होगा।’’

नीरज गर्ग (वरिष्ठ अधिवक्ता)


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