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पर्यावरण असंतुलन का जिम्मेदार कौन ?

पर्यावरण असंतुलन का जिम्मेदार कौन ?

दिल्ली को दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में सबसे आगे रखा गया है। एन्वॉयर्नमेंट मॉनिटरिंग की सारी स्टडीज यह बताती हैं कि यहां की आबोहवा सांस लेने के काबिल नहीं है। इस बात की पुष्टि सेंटर फॉर साईट एण्ड एन्वॉयर्नमेंट के इस अनुमान से होती है कि यहां वायु प्रदूषण के कारण असमय होने वाली मौतों में सौ फीसदी वृद्धि हुई है।

प्रदूषण शब्द से आज सभी परिचित हैं, परन्तु इस शब्द की निश्चित परिभाषा अभी तक नहीं बन पाई है। अमेरिकी राष्ट्रीय विज्ञान परिषद (1966) के अनुसार वायु, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे तथा जानवर सभी मिलकर पर्यावरण अथवा वातावरण को बनाते हैं। ये सभी घटक एक-दूसरे के सहयोग से वातावरण को संतुलित रखते हैं और जब इनका उपयोग करने के लिए वातावरण के साथ छेड़छाड़ की जाती है, अर्थात विज्ञान का सहारा लिया जाता है तो प्रकृति प्रदत्त वातावरण में कुछ परिवर्तन हो जाता है, जिससे पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। इससे पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों के  के लिए खतरा उत्पन्न हो जाता है।

इस प्रकार पर्यावरण में होने वाले असंतुलन को प्रदूषण कहा जाता है। पृथ्वी, जल, वायु आदि के भौतिक, रासायनिक, जैविक गुणों से होने वाला अवांछनीय परिवर्तन ही प्रदूषण है। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, पेड़-पौधे, जानवर आदि के सम्यक समन्वय से ही सृष्टि बनी है। यही सृष्टि के आधार हैं। इनमें से किसी एक तत्व की न्यूनता या अधिकता से पर्यावरण को हानि पहुंचती है। सच बात तो यह है कि हम अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए इन तत्वों से छेड़छाड़ कर रहे हैं और विकास के नाम पर हम प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं और इसके परिणाम भी सामने हैं। हमें सारी सुविधाएं तो प्राप्त हो गईं, परन्तु हवा-पानी का बहुत बड़ा संकट उपस्थित हो गया है।

आज हर तरह से विकास की कीमत प्रकृति को ही चुकानी पड़ रही है। संसाधनों की क्षतिपूर्ति के लिए इतनी गंभीरता से नहीं सोचा जाता, जितनी गंभीरता से प्रकृति का दोहन किया जा रहा है। बढ़ती जनसंख्या के कारण जीवनोपयोगी सामग्री की मांग भी बढ़ जाती है और उस मांग की पूर्ति करने के लिए विज्ञान प्रतिदिन नए-नए आविष्कार कर रहा है और इसकी वजह से वह प्रकृति का दोहन करने में लगा हुआ है। प्रकृति के दोहन करने की प्रक्रिया अनेक प्रकार के प्रदूषण को जन्म दे रही है। विज्ञान के नए-नए आविष्कारों ने हमारे पर्यावरण को प्रदूषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज पर्यावरण प्रदूषण हमारे लिए एक भयंकर चुनौती बन गई है।

वायु प्रदूषण इनमें सबसे प्रमुख प्रदूषण है, क्योंकि वायु हमारे जीवन का आधार है। अपनी उत्पति काल से ही जब से मानव ने अग्नि का प्रयोग करना आरंभ किया तभी से वह वायुमंडल को दूषित करता आ रहा है, परन्तु उस समय प्रकृति अपने संतुलन को बिगडऩे नहीं देती थी, क्योंकि वह वायुमंडल को स्वत: ही शुद्ध कर देती थी।

आज अधिकांश लोग वायु प्रदूषण से परिचित हैं। वायु प्रदूषण ने ही हमें सबसे ज्यादा जकड़ रखा है। इस प्रदूषण ने मनुष्य के चारो ओर का वातावरण इतना दूषित कर दिया है कि वह मनुष्य के जीवन के लिए सबसे अधिक घातक सिद्ध हो रहा है। चिकित्सकों का मानना है कि लगातार गिरती राख के कारण लोगों को श्वसन संबंधी बीमारियां जैसे कि दमा, खांसी आदि हो जाते हैं। नेत्र विशेषज्ञों का कहना है कि राख के कारण आंखों के संक्रामण तथा आई फ्लू, कंजकिट बाईटिस के मरीजों की संख्या बढ़ी है।

घनी आबादी व औद्योगिक नगरों की सड़कों में उडऩे वाली धूल में विभिन्न प्रकार के वायरस तथा जीवाणु होते हैं जो अनेक तरीकों से धूल में मिल जाते हैं और जब यह धूल आंधी या वाहनों की सहायता से हमारे शरीर में पहुंचती है तो अनेक प्रकार के श्वसन संबंधी रोगों को जन्म देती है। मोटर कारें, जो कार्बन मोनोऑक्साइड विसर्जित करती हैं, वह तो प्राणी-मात्र के लिए बहुत ही घातक है, क्योंकि यह हमारे शरीर में पहुंचकर ऑक्सीजन की कमी कर देता है। महानगरों में लोगों में श्वसन रोग, नेत्र रोग, तपेदिक, दमा, आंत्ररोग, ब्राफाइट्स आदि रोगों की जड़ वायु प्रदूषण ही है। वायु प्रदूषण के अन्य ठोस कारणों में आर्सेनिक, लैड, कैडमियम, पारा आदि शामिल है।

कोयले के जलने से अत्यधिक घातक गैसें – आर्सेनिक तथा पारा का उत्सर्जन होता है। इनसे उत्र्सजित होने वाली गैसें खून में पहुंच जाती हैं। आर्सेनिक से त्वचा कैंसर होता है, जिससे मस्तिष्क और गुर्दे पर हानिकर प्रभाव पड़ता है। केडमियम गुर्दों और फेफड़ों को क्षतिग्रस्ति कर देता है। लैड या सीसे से गुर्दे और पाचन तंत्र खराब हो जाते हैं। मोटर गाडिय़ों में उपस्थित टैट्राइथाइल लैड मनुष्य की स्नायु में प्रवाहित होकर मनुष्य के दिमाग पर प्रभाव डालता है। लैड या सीसा अधिक नाइट्रिकऑक्साइड और मोटर वाहनों से निकलने वाला धुआं हाइड्रोक्लोरिन गैसों के बीच सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में रासायनिक क्रिया होने पर ओजोन गैस का निर्माण करती है, जिससे जोड़ों के दर्द का रोग, फेफड़ों में पानी भरने जैसे गंभीर रोगों का जन्म होता है। यह उसी तरह कार्य करता है जैसे एक्सरे या अन्य रेडियोधर्मी विकिरणें काम करती हैं। सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे ने फरवरी 2014 में एयर पॉल्यूशन पर एन्वॉयर्नमेंट पॉल्यूशन प्रिवेशन एण्ड कंट्रोल ऑथिरिटी की जो रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत की, वह चौंकाने वाली है।

इस रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण प्रदूषण के चलते राजधानी दिल्ली में हर साल तीन हजार बच्चे बेमौत मारे जाते हैं। जाहिर है लगभग चौदह वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ऑटो-टैक्सी, बसों में सी.एन.जी. को अनिवार्य करने की जो पहल की गई थी, उससे मिलने वाले लाभ हम गवां चुके हैं। ताजा रिपोर्ट बताती है कि बीच में थोड़ा नीचे आया वायु प्रदूषण 2001 के स्तर को कब का पार कर चुका है। 2007 के बाद वायु प्रदूषण पहले वाली स्थिति में पहुंच चुका है।

दिल्ली की हवा में जहर और सेहत पर उसका असर जानने के लिए कई अहम अध्ययन हुए हैं। द एनर्जी एण्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टैरी) के अनुसार, हवा में घुल रहा जहर इलाहाबाद और ग्वालियर जैसे टू टायर शहरों में काफी पहले दस्तक दे चुका है। दिल्ली और इन शहरों के बीच का अंतर जल्द ही समाप्त हो जाएगा। इसका कारण यह है कि देश में फ्यूल क्वालिटी के तय स्टेन्डर्ड का हाल किसी जंग खाए कनस्तर जैसा है। मेगा सिटीज से लेकर छोटे शहरों में गाडिय़ां पुराने स्टेन्डर्ड पर सरपट दौड़ रही हंै और जहर भी उसी रफ्तार से चौबीसों घंटे उगला जा रहा है। ट्रक और कारों से निकलने वाला धुआं धड़ल्ले से कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और ग्रीन हाऊस गैसें पैदा कर रहा है। हवा में घुल रहे इस जहर की अहम वजह हैवी ट्रक और कार है। देश के 53 बड़े शहरों में कुल रजिस्टर्ड वाहनों की संख्या 33 प्रतिशत है।

सन् 2011 तक देश में रजिस्टर्ड वाहनों की संख्या  चौदह करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी थी और हर महीने 1500 नई गाडिय़ों का रजिस्ट्रेशन हो रहा है। सेंटर फॉर साईंस एण्ड एन्वॉयर्नमेंट  (सी.एस.एस.ई.) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, एक अक्टूबर 2013 से 31 जनवरी 2014 तक हवा में पी.एस.एम. 2.5 का लेवल तय स्टेन्डर्ड से चार गुना से सात गुना अधिक था। 16 जनवरी 2014 को पी.एम. 2.5 का लेवल 10 गुना तथा 5 जनवरी को आठ गुना अधिक था। यह फेफड़ों को खराब करता है। जनवरी 2014 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली ने पेइचिंग (चीन) को पीछे छोड़ दिया है। इस प्रकार वह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है।

अमेरिका की येल युनिवर्सिटी की 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की 5 बड़ी राजधानियों में सबसे ऊपर दिल्ली का स्थान है, उसके बाद पेइचिंग, फिर काहिरा, फिर सेंटियागो और फिर मैक्सिको सिटी का स्थान आता है। पता चलता है कि दिल्ली की हवा से ताजगी खत्म हुए जमाना बीत गया है। हवा दिन-प्रतिदिन जहरीली होती जा रही है। इसे सुधारने का प्रयास असफल हो गया है। राजधानी दिल्ली अपनी विकास की रफ्तार से आगे तो बढ़ रही है, परन्तु बीमारियों को साथ लेकर। एन्वॉयर्नमेंट की ताजा स्थिति पर येल युनिविर्सटी (अमेरिका) ने जो आंकड़े जारी किए, उनमें 178 देशों की सूची में भारत का 155वां स्थान है। बांग्लादेश का 169वां, पाकिस्तान का 148वां, नेपाल का 139वां, चीन का 118वां और श्रीलंका का 69वां स्थान है, जबकि सिंगापुर सबसे स्वच्छ एवं प्रदूषण-विहिन देश है। टैरी के महानिदेशक आर.के. पचौरी ने कहा है कि देश में बढ़ रही आबादी के साथ गाडिय़ों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। हवा में घुल रहे जहर को कंट्रोल करने के लिए टैक्नोलॉजी तथा सख्त रेग्यूलेशन अतिआवश्यक है।

टैरी युनिवर्सिटी की डॉ. लीना श्रीवास्तव का कहना है कि सवाल यह नहीं है कि हम अपनी हवा, ईंधन एवं गाडिय़ों की क्वालिटी ठीक कर सकते हैं या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि तेजी से बढ़ रही बीमार आबादी के साथ हम आगे कैसे बढ़ेंगे? आई.आई.टी. के प्रो.दिनेश मोहन के अनुसार अगर फ्यूल पॉलिसी स्टेन्डर्ड अगले पांच साल में पूरे देश में लागू नहीं हुआ तो इसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ेगा।

दिल्ली को दुनिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में सबसे आगे रखा गया है। एन्वॉयर्नमेंट मॉनिटरिंग की सारी स्टडीज यह बताती है कि यहां की आबोहवा सांस लेने के काबिल नहीं है। इस बात की पुष्टि सेंटर फॉर साईट एण्ड एन्वॉयर्नमेंट के इस अनुमान से होती है कि यहां वायु प्रदूषण के कारण असमय होने वाली मौतों में सौ फीसदी की वृद्धि हुई है। राजधानी दिल्ली के इस वायु प्रदूषण का कारण केवल चलने वाले वाहन, यहां के उद्योग धंधे ही नहीं हैं, बल्कि घरों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा और सूखी पतियां भी हैं।

खुले में कूड़ा-कचरा या सूखी पत्तियां जलाना जितना पर्यावरण के लिए हानिकारक है, उतना ही स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। इन्हें जलाने से कार्बन डाईऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, पार्टिकुलेट और बेहद जहरीले पोली एरोमेटिक हाइड्रोकार्बन गैस निकलते हैं। यह धुआं तब सबसे ज्यादा खतरनाक हो जाता है, जब पार्टिकुलेट 10 माइक्रोन से भी ज्यादा छोटे होते हैं और आसानी से फेफड़ों में पहुंच जाते हैं। पार्टिकुलेट मेटर (पी.एम.) दो तरह के होते हैं, पी.एम. 2.5 तथा पी.एम. 10। वाहनों से निकलने वाले धुएं में प्रदूषन के कण 2.5 होते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वाहनों से प्रतिदिन 60 से 70 प्रतिशत पी.एम. 2.5 जमा होता है, लेकिन कूड़े-कचरे एवं सुखी पत्तियों के जलाने से पी.एम. 10 जमा हो जाता है।  कूड़े-कचरे में यदि प्लास्टिक, रबड़, टायर जैसी चीजें हों तो यह और भी हानिकारक हो जाता है। पी.एम. 10 बढऩे से श्वास और दिल की बीमारियां बढऩे का खतरा हो जाता है। इससे अस्थमा का अटैक, सांस लेने में कठिनाई, उच्च रक्तचाप, हार्ट अटैक, स्ट्रोक तथा असमय मौत का खतरा बढ़ जाता है।

खुले में कूड़ा-कचरा जलाना आसानी से रोका जा सकता है। घरों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा या पेड़-पौधों की सूखी पत्तियों का उपयोग खाद के तौर पर किया जा सकता है। पर्यावरण संबंधित विषयों को अदालत में उठाने वाले वकील गौरव कुमार बंसल ने बताया कि एन्वॉयर्नमेंट ऐक्ट 1986 के सेक्शन 15 में साफ लिखा है कि खुले में कूड़ा जलाना अपराध है, जिसकी सजा एक लाख रूपये जुर्माना के साथ पांच साल की सजा का प्रावधान है।

दिल्ली वालों के लिए पॉल्यूशन-फ्री सोसायटी बनाने की पहल हो चुकी है। वायु प्रदूषण को रोकने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर एयर फिल्टर लगाने की योजना है। इससे वाहनों से निकलने वाला धुआं हवा में मौजूद प्रदूषित कणों को रोकने में आसानी होगी। ये फिल्टर बारिश में भी काम करते रहेंगे, क्योंकि ये वाटरप्रूफ  होंगे। एन.जी.टी. की गाइडलाईंस को दिल्ली छावनी बोर्ड ने स्वीकृति प्रदान कर दी है। इन फिल्टर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे शुद्ध वायु प्राप्त होगी।

विशेषज्ञ बताते हैं कि दिल्ली में बीते कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा पॉल्यूशन लेवल दर्ज हुआ है। दिल्ली की एयर क्वालिटी पर नजर रख रहे प्रोजेक्ट ‘सफर’ के डायरेक्टर और प्रसिद्ध मैसम वैज्ञानिक डॉ. गुफरान बेगम ने बताया कि मार्च 2015 तक पॉल्यूशन के सारे रिकार्ड टूट गए हैं। इसी को देखते हुए एन.जी.टी. ने पॉल्यूशन फ्री बनाने के लिए एयर फिल्टर लगाने की योजना बनाई है। बोर्ड के सी.ई.ओ श्री ए.वी. धर्मरेड्डी ने बताया कि इस एयर फिल्टर से 10,791 एकड़ एरिया पॉल्यूशन फ्री हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे की पर्यावरण प्रदूषण संबंधी ऑथिरिटी की रिपोर्ट को आवेदन मानकर उस पर कार्रवाई शुरू कर दी है। आशा है सुप्रीम कोर्ट की यह कोशिश एक बार फिर राजधानी की हवा को सांस लेने लायक बनाएगी।

पॉल्यूशन फ्री योजना को अंजाम देने के लिए हमें चीन, संयुक्त अरब अमीरात तथा कोरिया जैसे देशों का अनुकरण करना होगा। सच्चें अर्थों में दुनिया के पहले इको फेंरडली शहर की शुरुआत संयुक्त अरब अमीरात से होने जा रही है। अबू धाबी से बीस मील की दूरी पर समुद्र तट पर बसने वाला यह शहर एक रत्ती भी कार्बन उत्सर्जित नहीं करेगा, न कोई कचरा पैदा करेगा और हर लिहाज से आत्मनिर्भर होगा।

मज्दर सिटी नाम का यह प्रयास दुनिया के लिए एक उदाहरण होगा। पचास हजार की आबादी वाले इस शहर में लगभग पचास इको फ्रेंडली कंपनियों के कार्यालय होंगे और वहीं उनके कर्मचारियों के आवास होंगे। यहां मजदूर इंस्टिट्यूट ऑफ साईंस एण्ड टेक्नोलॉजी की रिसर्च युनिवर्सिटी होगी। कोई भी गली 70 मीटर से ज्यादा लंबी नहीं होगी। शहरी ढांचा और 45 मीटर ऊंची एक विंड टॉवर मिलाकर शहर को बाहरी माहौल से लगभग 20 डिग्री ठंडा रखने का प्रावधान है। मकान पकी हुई मिट्टी की इंटों से बनाए गए हैं, जिनमें नारियल तथा खजूर के तने इस्तेमाल किए गए हैं। शहर को एक ऊंची चार दीवारी से घेरा गया है, ताकि उसे रेतीले तूफानों से बचाया जा सके। शहर के भीतर सौर ऊर्जा से चलने वाले सार्वजनिक वाहन यातायात के साधन होंगे। यह शहर मेट्रो से जुड़ा होगा। यह शहर दिसम्बर, 2015 तक बनकर तैयार हो जाएगा।

इसी प्रकार चीन भी प्रदूषित देशों में गिना जाता है और इसकी राजधानी पेइचिंग (बीजिंग) दिल्ली के बाद दूसरे सबसे प्रदूषित शहरों में है। चीन में पर्यावरण संबंधी दरिद्रता पिछले वर्षों से खूब बढ़ रही थी। यहां के लोग बेहद खराब पर्यावरण में जीने को मजबूर थे। उन्हें शुद्ध हवा नसीब नहीं हो पाती थी। राष्ट्रीय शहरी जनसंख्या की एक चौथाई जनसंख्या दूषित पर्यावरण में रहने को विवश थी। यह एक ऐसी स्थिति है जो कि नागरिकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रोगों की ओर धकेल रही थी। इसलिए चीन के प्रधानमंत्री ली केक्वियांग ने पर्यावरण प्रदूषण के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। नागरिकों को प्रदूषण से बचाने के लिए बड़े शहरों के विकास की योजना पर काम किया जाएगा। यह दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी एवं सख्त योजना है, जिसमें इस तरह के निर्णय लिए गए हैं। चीन में चल रहे इस युद्ध को एक बड़े ग्रीन कंट्रिब्यूशन के रूप में देखा जा रहा है, जिसका असर बाद में सारी दुनिया पर पड़ेगा।

इसी तरह अकेले तीन करोड़ पेड़ लगाने वाली कीनिया की नोबल पुरस्कार विजेता वंगारी मथाई से प्रेरणा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने विलियन ट्री कैम्पेजन शुरू किया है। यह अभियान प्लांट फॉर द प्लेनेट फाऊंडेशन द्वारा चलाया जा रहा है। सन् 2006 में इसने एक अरब पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा था, जो हर वर्ष 56 लाख टन कार्बन सोख रहे हैं। इसी प्रकार सन 1960 में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति पार्क चुंग ने ही राष्ट्रीय वनीकरण अभियान चलाया, क्योंकि उस समय देश की अधिकांश पहाडिय़ां पेड़-पौधों से शून्य हो गई थी। उस अभियान का परिणाम यह निकला कि आज दक्षिण कोरिया की 65 प्रतिशत भूमि वनों से आच्छादित है।

भारत के पर्यावरणविद माधव गॉडगिल इस दिशा में महत्वूपूर्ण कार्य कर रहे हैं। यह अलग बात है कि हमारी सरकार उनकी सेवाओं का लाभ उठाना नहीं चाहती। उनके उल्लेखनीय कार्यों के लिए उन्हें वर्ष 2015 के टेलर प्राइज के लिए चुना गया, जो उनको 24 अप्रैल 2015 को लांस एंजलिस (अमेरिका) में दिया गया। टेलर प्राइज की स्थापना सन 1973 में जॉन तथा एलिस टेलर ने की थी, जो प्रतिवर्ष उस व्यक्ति को दिया जाता है जिसने पर्यावरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय कार्य किया हो।

इस प्राइज का महत्व पर्यावरण क्षेत्र में नोबल प्राइज के समान है। भारत को उनकी पर्यावरण संबंधी गंभीर सलाह पर अमल करना चाहिए। पर्यावरण असंतुलन के लिए जनसंख्या वृद्धि इतनी जिम्मेदार नहीं है जितनी उपभोगवादी संस्कृति जिम्मेदार है। यह संस्कृति हमें विकास नहीं विनाश की ओर धकेल रही है। आखिर ऐसे विकास का क्या अर्थ, जो विनाश को आमंत्रित करता है। इस विकास से समुचित मानवता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता जा रहा है। सरकार समाज और सिविल सोसायटी के स्तर पर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति गंभीर होना पड़ेगा तभी हम सुरक्षित एवं स्वस्थ जीवन जी पाएंगे।

                                                                                                                                                                       श्रीकृष्ण मुदगिल

                (लेखक वरिष्ठ चिंतक है)

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