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वेदों में छिपा पर्यावरण संरक्षण का रहस्य

वेदों में छिपा पर्यावरण संरक्षण का रहस्य

प्रकृति जीवनदायनी है, संपूर्ण संसार इसी से पल्लवित होता है। संसार के समस्त प्राणियों को बिना कीमत के सब कुछ देने वाली प्रकृति का जब पराकाष्टा से परे जाकर शोषण होने लगता है तो यही प्रकृति भीषण रूप धारण कर लोगों के लिए विनाशकारी बन जाती है। आए दिन कहीं भूकंप तो कहीं सुनामी जैसी घटनाओं से साफ पता चलता है कि प्रकृति का दोहन किस हद तक बढ़ गया है। नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा भी यही दर्शाती है कि प्रकृति अपने दोहन से तिलमिला उठी है और वो लोगों को संदेश दे रही है कि अगर वक्त रहते ये दोहन रोका नहीं गया तो वो दिन दूर नहीं जब संपूर्ण संसार को विकराल रूप धारण कर वह निगल जाएगी।

पर्यावरण और जीवन का संबंध सदियों पुराना है। समस्त जीव, वनस्पति जगत और मनुष्य के जीवन के परस्पर सामंजस्य का अद्भुत परिचय प्राचीन भारत में मिलता है। भारत के ऋषि-मुनियों द्वारा अनेक धार्मिक ग्रंथों में पर्यावरण का चित्रण किया गया है। प्रत्येक प्राणी अपने चारो ओर के वातावरण अर्थात बाह्य जगत पर आश्रित रहता है, जिसे सामान्य भाषा में पर्यावरण कहा जाता है। पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘परि’ तथा ‘आवरण’। ‘परि’ का अर्थ है, चारों ओर तथा ‘आवरण’ का अर्थ है ‘ढंका हुआ’ अर्थात किसी भी वस्तु या प्राणी को जो वस्तु चारों ओर से ढंके हुए है वह उसका पर्यावरण कहलाता है। सभी जीवित प्राणी अपने पर्यावरण से निरंतर प्रभावित होते हैं तथा वह उसे स्वयं प्रभावित करते हैं। पर्यावरण के संरक्षण के लिए प्रकृति तथा मानव में उचित सामंजस्य की आवश्यकता है। वेदों में कहा गया है,  ‘पूर्णभद: पूर्णामिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’  इसका स्पष्ट भाव है कि हम प्रकृति से उतना ग्रहण करें जितना हमारे लिए आवश्यक हो तथा प्रकृति की पूर्णता को क्षति न पहुंचे।

पर्यावरण का स्वच्छ एवं सन्तुलित होना मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। पाश्चात्य सभ्यता को यह तथ्य बीसवीं शताब्दी के उत्तारार्ध में समझ में आया है, जबकि भारतीय मुनियों ने इसकी वैदिक काल में ही अनुभूति कर ली थी। हमारे ऋषि-मुनि जानते थे कि पृथ्वी, जल, अग्नि, अन्तरिक्ष तथा वायु इन पंचतत्वों से ही मानव शरीर निर्मित है। उन्हें इस तथ्य का ज्ञान था कि यदि इन पंचतत्वों में से एक भी दूषित हो गया तो उसका दुष्प्रभाव मानव जीवन पर पडऩा अश्यंभावी है। इसलिए उन्होंने इसके सन्तुलन को बनाए रखने के लिए प्रत्येक धार्मिक कृत्य करते समय प्रकृति के समस्त अंगों को साम्यावस्था में बनाए रखने का प्रावधान किया था। ‘दयौ: शान्तिरन्तरिक्षं शान्ति: पृथिवी शान्ति राप: शान्ति रौषधय: शान्ति। वनस्पतय: शान्तिर्विश्वेदेवा शान्तिब्र्रह्मं शान्ति: सर्वशान्तिदेव शान्ति: सामा शान्तिरेधि।।’ यजुर्वेद में सर्वत्र शान्ति की प्रार्थना करते हुए मानव जीवन तथा प्राकृतिक जीवन में एकता का दर्शन बहुत पहले किया जा चुका था।

अथर्ववेद में कहा गया है कि अग्नि (यज्ञाग्नि) से धुआं उत्पन्न होता है। धूएं से बादल बनते हैं और बादलों से वर्षा होती है। वेदों में यज्ञ का अर्थ ‘प्राकृतिक चक्र को सन्तुलित करने की प्रक्रिया’ बताया गया है। वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार किया है कि यज्ञ द्वारा वातावरण में ऑक्सीजन तथा कॉर्बन डाइऑक्साइड का सही सन्तुलन स्थापित किया जा सकता है। अत: यह तथ्य भी विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरा है। जून 2009 में भारतीय वैज्ञानिकों ने उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के कुछ खेतों में वैदिक ऋचाओं के समवेत गायन के कैसेट बजाने से पैदावार में दो से तीन गुनी तक अधिक वृद्धि होते देखा है।

वैदिक ऋषि इस वैज्ञानिक धारणा से अवगत थे कि वन ही अतिवृष्टि तथा अनावृष्टि से उनकी रक्षा कर सकते हैं। इसलिए ऋग्वेद में वनस्पतियों को लगाकर वन्य क्षेत्र को बढ़ाने की बात कही गयी है। संभवत: इसी कारण से उन्होंने वन्य क्षेत्र को ‘अरण्य’ अर्थात रण से मुक्त या शान्ति क्षेत्र घोषित किया, ताकि वनस्पतियों को युद्ध की विभीषिका से नष्ट होने से बचाया जा सके। भारतीय संस्कृति में वृक्षों और लताओं को देव-तुल्य माना गया है। जहां अनादिकाल से इस प्रार्थना की गूंज होती रही है- ‘हे पृथ्वी माता तुम्हारे वन हमें आनंद और उत्साह से भर दें।’ पेड़-पौधों को सजीव और जीवंत मानने का प्रमाण भारतीय वेदों में विद्यमान है।

पर्यावरण प्रदूषण की आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा जोर-शोर से होने लगी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि यह शब्द अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अचानक ही दो-चार दशक पूर्व प्रकट हो गया। इसकी अवधारणा भले ही नई लगती हो, किंतु यह तो प्रकृति के प्रारंभ से ही विद्यमान रहा है, क्योंकि मानव द्वारा श्वास और मल-मूत्र तथा पसीना त्यागने के साथ ही प्रदूषण आरंभ हो गया। महर्षि यास्क इसकी व्याख्या में कहते हैं, ”कोई वस्तु तभी अपनी सत्ता बनाए रख सकती है जब वह स्वयं को धारण करने में समर्थ हो। जब उसमें बाहरी हस्तक्षेप अधिक होता है अथवा उसकी नैसर्गिक संरचना विकृत होती है तो उसकी आत्मधारणा शक्ति नष्ट हो जाती है, यही उसका प्रदूषण है। वस्तु के निर्माण का जो अनुपात है, वह स्थित रहना चाहिए। अनुपात भंग हुआ और वस्तु का स्वास्थ्य नष्ट हो गया। वस्तु के स्वास्थ्य का विनष्ट होना ही प्रदूषण है।’’ वायुपुराण में महर्षि वेदव्यास ने अपनी चिंता प्रकट करते हुए कहा है, ”इस सृष्टि के अपने स्वरूप में अधिष्ठित हो जाने पर इसका अंधाधुंध दोहन न किया जाए, क्योंकि मनुष्यों के क्रियाकलापों तथा अतिशय भोगवादिता के कारण प्राकृतिक पदार्थों में समय पूर्व वे दोष उत्पन्न हो जाते हैं, जो कल्प के अंत में आने वाली प्रलय का कारण बनते हैं।’’ भूमि प्रदूषण निवारण हेतु अनेक उपाय वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। उन उपायों में यज्ञ महत्वपूर्ण है, जिससे पृथ्वी पुष्ट होकर सुख देने वाली बनती है। करीर (एक पौधा) की यज्ञ में आहुति देने से शीघ्र वृष्टि होती है। पलाश को ब्रह्मतुल्य कहा गया है, जो यज्ञ में आहुति से व्यापक प्रदूषण को दूर करता है।

आज प्राकृतिक स्रोतों के अतिरिक्त कृत्रिम स्रोत औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण यह समस्या विकाराल होती जा रही है। उद्योग-धंधे और मशीनें, स्थल तथा वायु परिवहन के सघन, तीव्र ध्वनि वाले मनोरंजन एवं सामाजिक क्रियाकलापों को अनुशासित एवं नियंत्रित करना आवश्यक है, तभी पर्यावरण को स्वस्थ और पुष्टिकारक बनाया जा सकता है। प्रदूषण से मुक्ति के लिए वेदों में दी विधा, यज्ञ आदि को बढ़ावा देकर भी पर्यावरण के विनाश को रोका जा सकता है।

 प्रीति ठाकुर

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