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मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया…

मैं जिन्दगी का साथ निभाता चला गया…

अब तुमसे रुखसत होता हूं आओ संभालो साजे-गजल, नए तराने छेड़ो, मेरे नग्मों को नींद आती है।’

अपने जमाने के मशहूर अभिनेता दिलीप कुमार, राजेंद्र कुमार, देवानंद एवं शम्मी कपूर की आवाज को अपने सुमधुर स्वर से नवाजने वाले तथा हिन्दुस्तानी सिनेमा जगत में संगीत के मुख्तलिफ विधाओं में अपने उम्दा गायन से प्रसिद्धि और लोकप्रियता का इतिहास रचने वाले पाश्र्व गायक तथा बहुमुखी प्रतिभा के धनी मोहम्मद रफी ने जब अपने गायन करियर का आगाज हिंदी फिल्म ‘गांव की गोरी’ से की थी तो किसी ने यह  कल्पना में भी नहीं सोचा होगा कि  पाश्र्व गायकी में अपने जीवन का पहला कदम रखने वाला यह फनकार आने वाले वर्षों में अपने फन का वह सूरज साबित होगा जिसकी रौशनी काफी फीकी नहीं पड़ेगी। अपने प्रोफेशनल जीवन के प्रथम फिल्म से मोहम्मद रफी ने जिस मुकाम की राह का पहला कदम रखा, उसके बाद उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और रफ्ता-रफ्ता अपनी कामयाबियों के मील – स्तम्भ स्थापित करते चले गये।

24 दिसंबर 1924 को अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह में जन्म लेने वाले मोहम्मद रफी में विलक्षण गायन प्रतिभा की पहचान उनके बड़े भाई हामिद साहेब ने तब की थी जब वे अपने ही गांव में फकीरों के द्वारा गाये गीतों की बखूबी नकल कर लिया करते थे। महज सात वर्ष की उम्र में ही उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खान तथा अब्दुल वाहिद खान से हासिल कर ली थी। कहते हैं कि मोहम्मद रफी के स्वर में एक अजीब कशिश और बेपनाह दर्द था और उनके इसी कशिश के तिलिस्म को देखकर तब के प्रसिद्ध सिनेमा कलाकार नासिर ने उन्हें मुंबई बुला लिया था और उनके जीवन की यही घटना उनके लिए वह दहलीज साबित हुई जिसको पार करने के बाद वे अंतत: हैरतंगेज और अविश्वनीय कामयाबियों के शीर्ष पर पहुंच गये।

रफी साहब अपने समय के तमाम पाश्र्व – गायकों की आकाशगंगा में सबसे अधिक असाधारण तथा प्रतिभाशाली गायक थे। उन्होंने जिस सधे स्वर में रूमानी गाने गाये तो उसी मखमली लय एवं ताल में कव्वाली, गजल, भजन तथा देशभक्ति के नगमों को भी अपने चाहने वालों के दिलो-दिमाग में रचा-बसा दिया। कदाचित रफी साहब सरीखे अद्भुत तथा अविश्वसनीय गायक की गायन प्रतिभा की यही विविधता तथा दिलकश खुबसूरत आवाज उन्हें अपने समय के अन्य गायक कलाकारों से जुदा करती हैं तथा उन्हें खास बनाती हैं।

वैसे तो मोहम्मद रफी ने तात्कालीन मशहूर संगीत निर्देशकों मसलन, ओ. पी. नैय्यर, नौशाद अली, शंकर जयकिशन, एस डी बर्मन, रौशन के निर्देशन में कई नगमों को अपनी दिलकश आवाज देकर उन्हें अमर बना दिए किन्तु ऐसा कहा जाता है कि नौशाद साहब ने उनके संगीत के करियर निर्माण में नींव के पत्थर सरीखा अहम भूमिका निभायी। नौशाद साहब के फिल्मों के सारे गाने तलत महमूद साहब गाया करते थे। किन्तु एक दिन जब नौशाद साहब ने तलत महमूद को गाने के रिकॉर्डिंग के वक्त धूम्रपान करते देख लिया तो वे बहुत नाराज हुए और उनसे उनका मोह भंग हो गया। तभी से नौशाद साहब के फिल्मों के सारे गाने रफी साहब ने ही गाये। उस समय फिल्म बैजू बावरा के सारे गाने मोहम्मद रफी ने ही गाये। कहते हैं कि जब वे इस फिल्म के गाने ‘ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले’, तथा ‘मन तरपत हरी दर्शन को आज’ की रिकॉर्डिंग कर रहे थे तो उस समय वहां उपस्थित सबलोगों की आंखें भर आयीं। मोहम्मद रफी अपने नगमों में इसी प्रकार के दर्द के ऐहसास तथा आत्मा में अलौकिक शुकून भर देने के लिए ही जाने जाते थे। अपने नगमों के हर शब्द को शिद्दत से स्वरबद्ध करने वाले तथा उसके भाव तथा गूढ़ार्थ में खुद को आत्मसात करने वाले रफी साहब के गाने केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि श्रोताओं को आध्यात्मिकता की दुनिया में डुबो जाते थे, जहां वे परमानन्द के सागर में गोते लगा रहे होते थे।

कहते हैं कि मोहम्मद रफी को सर्वाधिक सफलता महान संगीत निर्देशक शंकर-जयकिशन के निर्देशन में मिली। उन्हें मिले तमाम   फिल्म फेयर के अवार्ड्स में ऐसे तीन अवार्ड उन्हीं के संगीत निर्देशन में गाये गीतों – ‘तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नजर न लगे’, ‘बहारों फूल बरसाओ’, ‘दिल के झरोखे में तुझको बिठा कर… को मिले थे। महान संगीत निर्देशक रवि के द्वारा निर्देशित तथा साहिर लुधियानवी के द्वारा कलमबद्ध नीलकमल के दर्द से लबरेज मशहूर गीत ‘बाबुल की दुवाएं लेती जा…’ को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

मोहम्मद रफी को पूरी दुनिया एक दिलकश तथा पुरकशिश आवाज के लिए जानते हैं, किन्तु वे महज एक अव्वल दर्जे के गायक कलाकार ही नहीं बल्कि एक उम्दा किस्म के असाधारण तथा साफ दिल के विनम्र इंसान भी थे। खुदा से डरते थे तथा एक पाक-साफ मुसलमान थे। कहते हैं कि मोहम्मद रफी के गायन के शौक से उनके पिता बिलकुल खुश नहीं थे। किन्तु रफी साहब की गाने के प्रति इंतिहा मुहब्बत को देखकर आखिर में उनके पिता राजी हो गये। जब वे संगीत में अपना करियर बनाने के लिए घर छोड़ कर जा रहे थे तो  उनके पिता ने उन्हें तीन सबसे महत्वपूर्ण बातें हमेशा ध्यान में रखने की हिदायत दी। पहली बात उनके पिता ने कहा – ‘देखो बेटा, दुनिया में इंसान कितना भी ऊंचा क्यों ना उड़ ले लेकिन उन्हें अपने पांव जमीं पर ही रखने होते हैं। इसीलिए कभी अपनी काबिलियत तथा कामयाबियों पर घमंड मत करना।’ दूसरी बाते जो रफी साहब को उनके पिता के द्वारा सीखाई गयी थीं, वो यह थी – ‘हमारी नजर हमेशा झुकी रहनी चाहिए’। और अंत में उन्होंने मोहम्मद रफी को इस बात की भी सीख दी थी, ‘चरित्र को हर हाल में पाक-साफ रखना चाहिए, क्योंकि चरित्र से गिरा इंसान कभी भी अल्लाह के दरबार में नहीं पहुंच सकता है।’ कदाचित यही कारण है कि सिनेमा जगत में आज भी किसी कलाकार की दरियादिली तथा निश्चल मन तथा बेदाग चरित्र की बात  होती है तो निस्संदेह मोहम्मद रफी का नाम कभी भी विस्मृत नहीं हो सकता है।

अपने करियर के शुरूआती दिनों में मोहम्मद रफी अत्यंत मुफलिसी की जिन्दगी गुजार रहे थे। कहते हैं कि एक बार रफी साहब को महान संगीत निर्देशक नौशाद के किसी एक गाने की रिकार्डिंग के लिए बुलाया गया, लेकिन किसी आकस्मिक कारणवश उस रिकार्डिंग को रद्द कर देनी पड़ी। इसके बाद यूनिट के सभी कलाकार चले गये, किन्तु मोहम्मद रफी हाथ जोड़े अपनी जगह पर चुपचाप खड़े थे। उन्हें इस हालात में देखकर नौशाद साहब ने उनसे पूछा, ‘तुम अब तक गये क्यों नहीं? चुपचाप खड़े क्यों हो?’ रफी साहब ने निहायत विनम्रता से जवाब दिया, ‘साहब, मैंने यहां तक आने के लिए अपने साथ एक ही रूपया लाया था और उसे मैं यहां तक आने में खर्च कर चुका हूं। अब सोच रहा हूं कि घर कैसे वापस जाऊंगा।’ नौशाद साहब ने उन्हें अपने जेब से एक रूपये निकाल कर दे दिए। कहते हैं कि वे फिर भी पैदल ही घर चले गये। और उस पैसे को अपने ड्राइंग रूम में संभाल कर रख दिया और इस प्रकार अपने संघर्ष भरे दिनों के कष्टों को उस रूपये में अंतिम सांस तक जीवित रखा।

31 जुलाई 1980 को भारतीय संगीत जगत के लिए एक मनहूस वर्ष साबित हुआ जबकि स्वर के सम्राट तथा इंसानियत की मिसाल माने जाने वाले मोहम्मद रफी की आंखें सदा के लिए बंद हो गईं। उनकी मृत्यु के साथ संगीत का एक अनमोल मोती ही हमने नहीं खोया बल्कि संगीत के संसार की एक ऐसी दिलकश आवाज को खो दिया, जिनके स्वर ने उनके चाहने वालों को जीना सिखा दिया था, गमों में भी हंसना सिखा दिया था। अपनी प्रतिभा एवं प्रसिद्धि के शीर्ष पर पहुंचकर उन्हें घमंड छू तक नहीं गया था। उन्होंने एक बार अपने श्रोता से मुखातिब होते हुए कहा था, ‘आप लोग मुझे सुनकर खुश होते हैं और मैं मन्ना डे को सुनता हूं।’ असाधारण एवं अलौकिक गायन प्रतिभा का यह फनकार हमारे बीच आज नहीं हैं, लेकिन जब भी उनके द्वारा गाये गीतों की स्वर लहरी हमारे मन मष्तिष्क पर हिलोरें लेंगी, उनकी मधुर यादें हमारी आंखें नम कर जायेंगी।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

 

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