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कैसे हो घरेलू हिंसा का अंत

कैसे हो घरेलू हिंसा का अंत

सभ्य समाज में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। लेकिन प्रत्येक वर्ष घरेलू हिंसा के जितने मामले सामने आते हैं, वे एक चिंतनीय स्थिति को रेखांकित करते हैं। हमारे देश में घरों के बंद दरवाजों के पीछे महिलाओं को प्रताडि़त किया जा रहा है। यह कार्य ग्रामीण क्षेत्रों, कस्बों, शहरों और महानगरों में भी हो रहा है। घरेलू हिंसा सभी सामाजिक वर्गों, लिंग, नस्ल और आयु समूहों को पार कर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के लिये एक विरासत बनती जा रही है। इस आलेख में घरेलू हिंसा के कारणों, समाज और बच्चों पर पडऩे वाले प्रभाव तथा समस्या समाधान के उपाय तलाशने का प्रयास किया जाएगा।

मानसिक प्रताडऩा नारी के जीवन में इस तरह समाई हुई है कि वह निरंतर तनाव, तिरस्कार और अपमान झेलने को ही अपनी स्वाभाविक नियति मान लेती है, किंतु निरन्तर भय, असुरक्षा एवं दमन का उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है और वह अवसादग्रस्त होकर अनेक शारीरिक व्याधियों से भी ग्रस्त हो जाती है। जब वह मानसिक प्रताडऩा या शारीरिक हिंसा अथवा यौन उत्पीडऩ के विरुद्ध आवाज उठाती है तो उसे ज्ञात होता है कि पुलिस, प्रशासन, न्याय प्रणाली और राजसत्ता का चरित्र भी पितृसत्तात्मक है जो उसे गलत सिद्ध कर पराजित करने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है। न कानून उसके पक्ष में हैं न कानूनों को लागू करने वाले लोगों की मंशा उसे न्याय दिलाने की है। हमारे समाज में यह देखा जाता है कि बलात्कार पीडि़ता को दुश्चरित्र ठहराने की होड़ सी लग जाती है। उसे सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। यदि वह अविवाहित है तो उसके विवाह में कठिनाई होती है और यदि वह विवाहित है तो उसका पारिवारिक जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है।

देश एवं दुनिया में विकास के साथ-साथ महिलाओं के प्रति हिंसक सोच थमने की बजाय नये-नये रूपों में सामने आती रही है। इसी हिंसक सामाजिक सोच एवं विचारधारा पर काबू पाने के लिये अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा-उन्मूलन दिवस महिलाओं के अस्तित्व एवं अस्मिता से जुड़ा एक ऐसा दिवस है जो दायित्वबोध की चेतना का संदेश देता है, महिलाओं के प्रति एक नयी सभ्य एवं शालीन सोच विकसित करने का आह्वान करता है। यह दिवस उन चैराहों पर पहरा देता है जहां से जीवन आदर्शों के भटकाव एवं नारी-हिंसा की संभावनाएं हैं, यह उन आकांक्षाओं को थामता है जिनकी हिंसक गति तो बहुत तेज होती है पर जो बिना उद्देश्य समाज की बेतहाशा दौड़ को दर्शाती है। इस दिवस को मनाने के उद्देश्यों में महिलाओं के प्रति बढ़ रही हिंसा को नियंत्रित करने का संकल्प भी है। यह दिवस नारी को शक्तिशाली, प्रगतिशील और संस्कारी बनाने का अनूठा माध्यम है।

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अनुमान है कि दुनिया भर में 35 प्रतिशत महिलाओं ने शारीरिक और यौन हिंसा का अनुभव किसी नॉन-पार्टनर द्वारा अपने जीवन में किसी बिंदु पर किया है। हालांकि, कुछ राष्ट्रीय अध्ययनों से पता चलता है कि 70 प्रतिशत महिलाओं ने अपने जीवनकाल में एक अंतरंग साथी से शारीरिक और यौन हिंसा का अनुभव किया है। दुनियाभर में पाए गए सभी मानव तस्करी के पीडि़तों में से 51 प्रतिशत वयस्क महिलाओं का खाता है। यूरोपीय संघ की रिपोर्ट में 10 महिलाओं में से एक ने 15 साल की उम्र से साइबर-उत्पीडऩ का अनुभव किया है। 18 से 29 वर्ष की आयु के बीच युवा महिलाओं में जोखिम सबसे अधिक है। महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक वैश्विक महामारी है। 70 प्रतिशत महिलाओं की संख्या अपने जीवनकाल में हिंसा का अनुभव करती है। भारत के राजस्थान प्रांत में तो कन्या-शिशुओं को जन्म लेते ही मान देने की भयावह मानसिकता रही है। कुछ चिंतन और मनन करने से हमें पता चलता है कि महिलाओं के विरुद्ध यौन उत्पीडऩ, फब्तियां कसने, छेडख़ानी, वैश्यावृत्ति, गर्भाधारण के लिए विवश करना, महिलाओं और लड़कियों को खरीदना और बेचना, युद्ध से उत्पन्न हिंसक व्यवहार और जेलों में भीषण यातनाओं का क्रम अभी भी महिलाओं के विरुद्ध जारी है और इसमें कमी होने के बजाए वृद्धि हो रही है।

आज  हिंसा एवं उत्पीडऩ से ग्रस्त समाज की महिलाओं पर विमर्श जरूरी है। विकसित एवं विकासशील देशों में महिलाओं पर अत्याचार, शोषण, भेदभाव एवं उत्पीडऩ का साया छाया रहता है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत सहित दुनियाभर में अल्पसंख्यक और संबंधित देशों के मूल समुदाय की महिलाएं अपनी जाति, धर्म और मूल पहचान के कारण बलात्कार, छेड़छाड़, उत्पीडऩ और हत्या का शिकार होती हैं। माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप इंटरनेशनल ने ‘दुनिया के अल्पसंख्यकों और मूल लोगों की दशा’ नामक अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे दुनियाभर में अल्पसंख्यक और मूल समुदाय की महिलाएं हिंसा का शिकार ज्यादा होती हैं, चाहे वह संघर्ष का दौर हो या शांति का दौर। इस संगठन के कार्यकारी निदेशक मार्क लैटिमर ने कहा कि दुनियाभर में अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव के तहत महिलाओं को शारीरिक हिंसा का दंश झेलना पड़ता है।

भले ही भारत सरकार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वर्तमान में महिला सशक्तिकरण के लिए सराहनीय कार्य कर रही है बावजूद इसके आधुनिक युग में हजारों अल्पसंख्यक ही नहीं आम महिलाएं अपने अधिकारों से कोसों दूर हैं। सरकार ने महिलाओं के उत्थान के लिए भले ही सैकड़ों योजनाएं तैयार की हों, परंतु महिला वर्ग में शिक्षा व जागरूकता की कमी आज भी खल रही है। अपने कत्र्तव्यों तथा अधिकारों से बेखबर महिलाओं की दुनिया को चूल्हे चैके तक ही सीमित रखा है। भारत में आदिवासी समुदाय की महिलाएं अपने अधिकारों से बेखबर हैं और उनका जीवन आज भी एक त्रासदी की तरह है।

यदि हम सही मायनों में ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा से मुक्त भारत’ बनाना चाहते हैं, तो वक्त आ चुका है कि हमें एक राष्ट्र के रूप में सामूहिक तौर पर इस विषय पर चर्चा करनी चाहिये। एक अच्छा तरीका यह हो सकता है कि हम राष्ट्रव्यापी, अनवरत तथा समृद्ध सामाजिक अभियान की शुरुआत करें।

उदय इंडिया ब्यूरो

 

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