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सरिस्का में बाघिन की ममता

सरिस्का में बाघिन की ममता

हिमालय से भी प्राचीन अरावली पर्वत श्रृंखला की सुरम्य वादियों की प्राकृतिक छटा को समेटे सरिस्का टाइगर रिजर्व के भगानी क्षेत्र के घने जंगल में गर्भवती सांभर का शिकार कर बाघिन ‘रानी’ उसे धीरे-धीरे खाने में जुटी है। नर बाघ ‘महाराजा’ करीब 7 मीटर दूर बैठा है। रानी ज्यादा नहीं खा पाती और महाराजा के लिए शिकार छोड़ देती है। लगता है महाराजा को भी भूख नहीं है। दोनों बेरी वाली डाह ‘वाटर पूल’ की तरफ बढ़ जाते हैं। रानी ठंडे पानी में बैठ गई और महाराजा नाला पार कर पहाड़ी की तरफ अदृश्य हो जाता है। उधर मृत सांभर के पास नवजात भू्रण पड़ा हुआ है जो सम्भवत: बाघ द्वारा शिकार के बाद मादा सांभर का पेट फाड़े जाने पर गर्भाशय से बाहर निकल आया था। घोर आश्चर्य यह कि उस नवजात भू्रण पर बाघ बाघिन के नाखून या किसी तरह की खरोंच का कोई निशान तक नहीं।

आए दिन नवजात इंसानी भू्रणों की दुर्दशा की खबरों से शर्मसार मानव समाज जंगल के इन बादशाहों की मानवीय संवेदना के इस उदाहरण से कुछ सीख पाएगा? इस सवाल के साथ सरिस्का टाइगर फाउन्डेशन के अध्यक्ष सुनयन शर्मा ने जब यह रोमांचक किस्सा सुनाया तो वन्यजीव प्रेमियों के रोंगटे खड़े हो गए। जंगल के इस ऐतिहासिक दुर्लभ क्षण को अपने कैमरे में समेटने वाले सुनयन और उनके सहयोगियों की तब की मनोदशा की तो महज कल्पना ही की जा सकती है। भारतीय वन सेवा के अधिकारी सुनयन तब वहां फील्ड डायरेक्टर रहे थे। वर्ष 2008-2010 के इसी कार्यकाल में राजस्थान के विश्वविख्यात रणथम्भौर टाइगर रिजर्व से पांच नर-मादा बाघ को सरिस्का लाया गया था। दुनिया में पहली बार राजस्थान में बाघों के स्थानांतरण का सफल प्रयोग किया गया था। सुनयन की टीम ने भारत और राज्य सरकार की बाघ पुर्नवास योजना को सफलता के शिखर तक पहुंचाया। 2004 के अंत में बाघविहीन हो चुके सरिस्का टाइगर रिजर्व में अभी तेरह बाघ स्वच्छंद विचरण कर रहे हैं।img218

राज्य के सेवानिवृत्त मुख्य वन्य जीव संरक्षक आर. एन. मल्होत्रा ने गत 30 अप्रैल को स्याही संस्था के तत्वावधान में सुनयन शर्मा से सरिस्का के अनुभवों के साथ उनकी पुस्तक ‘सरिस्का : द टाइगर रोर्स अगेन’ पर चर्चा की। सुनयन ने वन्य जीव प्रेमियों के सवालों का खुलकर जवाब दिया। राज्यसभा सांसद वी.पी. सिंह, पूर्व मंत्री भरत सिंह, पूर्व वन सचिव रूक्मणी हल्दिया और राज्य वन्य जीव बोर्ड के सदस्य राजपाल सिंह ने भी चर्चा में हिस्सेदारी की। सरिस्का और बाघ को बचाने के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति के साथ-साथ बेहतर वन प्रबंधन के लिए स्टाफ की वृद्धि, अभयारण क्षेत्र में बसे गांवों का विस्थापन और खनन गतिविधियों की रोकथाम की जरूरत बताई गई।

सरिस्का के अनुभवों की स्मृति में खोये सुनयन शर्मा ने जब 28 अप्रैल 2009 को बाघिन रानी और बाघ महाराजा द्वारा गर्भवती सांभर के शिकार एवं उससे जुड़ी कथा सुनाई तो श्रोताओं के चेहरे पर बाघिन की ममता के प्रति कृतज्ञता के भाव पढ़े जा सकते थे। इसी श्रृंखला में उन्होंने बाद में उदय इंडिया से बाचचीत में 5-6 अप्रैल को बाघिन रानी एवं बाघ महाराजा की प्रणयलीला तथा सहवास (कोर्टशिप) से जुड़े दृश्य को विस्तार से रेखांकित किया और इस दौरान लिए गए संबंधित फोटो की जानकारी दी। सुनयन ने बताया कि यह जोड़ा करीब एक माह से जंगल के भगानी हिस्से में था। वन अधिकारियों की मान्यता के अनुसार, बाघों के जोड़े के शिकार की अधिक संभावना रहती है। इसलिए पूरी टीम ने पल-पल की जानकारी रखी और खुद सुनयन ने भी मौके के अनुसार रातें भी जंगल में काटी।

सुनयन बताते हैं कि जब वे 1991 में सरिस्का आये तब वहां 18 बाघ थे और 1996 में उनके लौटने पर यह संख्या 23 थी। वन विभाग की ओर से जून 2004 की जनगणना में टाइगरों की संख्या 16 बताई गई थी, लेकिन 2004 के खत्म होते होते सरिस्का में एक भी टाइगर नहीं बचा। यदि यह मान लिया जाये कि जनगणना के वक्त टाइगरों की संख्या बढ़ा कर 16 बता दी गई हो और हकीकत में उनकी संख्या नौ-दस तक तो मानी जा सकती है। फिर महज पाच छ: माह में इतने सारे बाघों का नामोनिशान तक मिट जाना सवाल दर सवाल तो खड़े करता है। बाघविहीन सरिस्का को लेकर मीडिया में सुर्खियां छायी रहीं। राज्य सरकार ने वी.पी. सिंह समिति बनाई और केन्द्र सरकार ने टाइगर टास्क फोर्स का गठन किया। इनकी यही सिफारिश रही कि सरिस्का में बाघों को लाकर उनका पुर्नवास किया जाये। यदि वक्त रहते ऐसा नहीं किया गया तो फिर सरिस्का में बसे ग्रामीण विरोध शुरू कर देंगे तब मुश्किलें बढ़ जायेंगी। देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों की देख-रेख में रणथम्भौर से बाघों को सरिस्का लाया गया। दुनिया में पहली बार ऐसे चुनौतीपूर्ण कार्य की जिम्मेदारी सुनयन को सौंपी गई। इसके लिए एक हेक्टेयर में एन्क्लोजर बनाया गया।

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‘सॉफ्ट पेड लॉचिंग’ की इस प्रक्रिया में बाघों को नये परिवेश में ढलने के बाद खुले जंगल में छोड़ा गया।

रणथम्भौर से पहला नर बाघ 28 जून 2008 को सरिस्का लाया गया जिसे ‘महाराजा’ नाम दिया गया। इसे आठ दिन बाद छोड़ा गया। यह अत्यंत रोमांटिक किस्म का था। सुनयन के अनुसार, कई बार देखा गया कि वह शिकार तो करता लेकिन खुद इलाके से बाहर चला जाता, ताकि बाघिन उस शिकार को खा सके। रानी से सहवास तथा उसके गर्भधारण के दौरान महाराजा ने कई बार ऐसा करके मानवीय व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत किया। ढाई साल की रानी एन्क्लोजर में चार दिन में ही बैचेन हो उठी तो उसे खुले में छोडऩा पड़ा, लेकिन अपने से बड़े बाघों से सुरक्षित रहने की खातिर वह पहाड़ी की तरफ से खेतों एवं आबादी की ओर बढ़ती गई। परंपरागत हाका लगाकर उसे अपने क्षेत्र में लाने की जब कोशिश की गई तो वह चिढ़ गई। उसने वन स्टाफ का पीछा किया और यह नौबत आ गई कि वनकर्मियों ने पेड़ों पर चढ़कर अपनी जान बचानी पड़ी। रानी करीब आधे घंटे बाद हटी तब लोगों की जान में जान आयी। इसी तरह एक अन्य बाघिन महारानी भी वनकर्मियों की आंखों से ओझल होकर दूर-दराज इलाके में चली गई। अच्छी-खासी बरसात तथा लम्बी, ऊंची वनस्पति के बीच उसका पीछा करते-करते तो सुनयन और उनके साथी एकदम महारानी के समीप तक जा पहुंचे, तभी अकस्मात चीतल के शिकार को झपटी महारानी से उन लोगों की जान बच पायी और उनका दिल धक-धक होता रहा।

सरिस्का क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक को लेकर सुनयन शर्मा ने जोरदार किस्सा सुनाया। पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों को लेकर सुनयन वन विभाग की जिप्सी में सवार हुए तो लालकृष्ण आडवाणी ने सरिस्का अभयारण्य के मुख्य द्वार में प्रवेश करते ही कहा – ”शर्मा जी, क्या आप हमें बाघ दिखायेंगे।’’ यह सवाल सुनकर एक बार तो सुनयन को बुरा लगा। थोड़ा सहज होकर उन्होंने सपाट जवाब दिया कि मैं आपको बाघ का घर दिखाने ले जा रहा हूं। इस घर में पहाड़, नदी-नाले, झरने और विभिन्न प्रजातियों के वन्य जीव हैं और बाघ भी उनमें शामिल हैं। यदि बाघ अपने बेडरूम में चला गया तो किसी को दर्शन नहीं होंगे। यदि वह अपने लाउंज में है तो सबके लिये है।

सुनयन का यह अर्थपूर्ण जवाब सुनकर आडवाणी भी सहज हुए।

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अपनी टीम से बाघों के एक क्षेत्र में होने की सूचना मिलने पर सुनयन ने जिप्सी ‘टूरिस्ट रूट’ की अपेक्षा ‘इंसपेक्शन रूट’ की तरफ घुमा दी। बाघ देखने की लालसा में आडवाणी ने कटीली झाडिय़ों की परवाह नहीं की। एक जगह जिप्सी रूकने पर जब आडवाणी तथा उमा भारती उतर गये तो सुनयन ने ऐतराज किया। तब आडवाणी ने मुस्कुराहट के साथ कहा कि चलो हम बाघ का नाश्ता बन जायेंगे। खैर, आडवाणी और उमा भारती जिप्सी में आ बैठे और संयोग बना कि कुछ देर बाद भाजपा के इन नेताओं ने पन्द्रह बीस मिनट तक बाघ के जोड़े को देखा। वापस लौटने पर आडवाणी ने सुनयन को अपने साथ नाश्ता कराया। अगले दिन अटल बिहारी वाजपेयी ने सुनयन से चुटकी ली, आपने हमें तो बाघ दिखाया नहीं।

बकौल सुनयन, 1973 में जयपुर से दिल्ली जाते समय उन्होंने पहली बार सरिस्का को देखा था और जब बाद में वह इससे रूबरू हुए तो अरावली का यह कोहिनूर उनके दिलों-दिमाग पर छा गया। सरिस्का जंगल में सांभर-मोरों की विश्व में सर्वाधिक आबादी है। यहां का फ्लोरो-फॉना अत्यंत समृद्ध है। ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत महत्वूपर्ण है। यहां रहस्मय किला भानगढ़, अजबगढ़, काकवाड़ी, कुशलगढ़, थानागाजी, टहला आदि स्थान है। भगवान महावीर की आदमकद प्रतिमा है तो पाण्डुपोल पांडवों के अज्ञात वनवास की याद दिलाता है। पुरातत्व महत्व की विभिन्न इमारतों के अवशेष भी हैं। सुनयन ने खनन माफिया शिकारियों, सरिस्का के सघन क्षेत्र से घनी आबादी को अन्यत्र बसाने, वन्यजीवों के लिए वाटरहोल तथा चेकपोस्ट बनाने सहित विभिन्न राजनीतिक चुनौतियों तक का मुकाबला किया और सरिस्का पर अंकित बदनुमा दाग को धोते हुए फिर से टाईगर रिजर्व के नक्शे पर इसकी पहचान बनाने में सफलता हासिल की। सरिस्का टाइगर फाउंडेशन के माध्यम से वह परम्परागत शिकारी बाबरिया समुदाय को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे में सक्रिय हैं। कई पीढिय़ों से खेतों और जंगलों की देखभाल करने वाले बाबरिया धीरे-धीरे वन्य जीव जन्तुओं के शिकार के अभ्यस्त हो गये। कालान्तर में राजा-महाराजा तथा अन्य प्रभावशाली वर्गों के लिए शिकार करके लाना उनका पेशा बन गया। विशेषकर बाघों के अवैध शिकार के धंधे में लिप्त माफिया ने भी लोभ-लालच देकर इस वर्ग का बेजा इस्तेमाल किया, लेकिन फाउंडेशन ने अब इन लोगों के मतदाता पहचान पत्र और बीपीएल कार्ड बनवाने में सहायता देकर राज्य और केन्द्र सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित करने का बीड़ा उठाया है। फाउंडेशन के इस रचनात्मक कदम से सरिस्का और बाघों के फलने-फूलने में भी मदद मिलेगी।

सरिस्का से गुलाब बत्रा

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