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किसान आन्दोलन के निहितार्थ

किसान आन्दोलन के निहितार्थ

भारत एक कृषिप्रधान देश है और यहां किसान आंदोलनों की एक भरपूर परंपरा रही है। आमतौर पर यह माना जाता है कि भारतीय समाज में समय-समय पर होने वाली उथल-पुथल में किसानों की कोई सार्थक भूमिका नहीं रही है, लेकिन ऐसा नहीं है क्योंकि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। स्वतंत्रता से पहले किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए वे गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे, लेकिन अब स्वतंत्रता के बाद जो किसानों के नाम पर आंदोलन या उनके आंदोलन हुए वे हिंसक और राजनीति से ज्यादा प्रेरित थे। देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में जो आंदोलन हुए थे, इन आंदोलनों का नेतृत्व महात्मा गांधी, वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने किया।

लेकिन अब जो किसान आंदोलन हो रहे हैं उनका स्वाभाव ही बदलता जा रहा है। किसानों के अधिकारों की हर हाल में रक्षा होनी चाहिए। यह आंदोलन भारत का आंतरिक मुद्दा है। लेकिन इसकी आड़ में विदेशी ताकतें देश के आंतरिक मामले में दखल दे रही हैं। किसान आंदोलन का स्वरूप जिस तेजी से बदल रहा है उससे इसके राजनीतिक इस्तेमाल की आशंका बढ़ गयी है। शुरुआत में किसान सिर्फ एमएसपी (मैक्सिमम सेलिंग प्राइस) की लिखित गारंटी चाहते थे। लेकिन अब तीनों के तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इसके नाम पर भारत बंद करने, आवश्यक सेवाओं को रोकने का फैसला कहां तक उचित है? वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार शर्मा oneindia.com पर अपने आलेख में बहुत वाजिब सवाल पूछते हैं।  वो लिखते हैं ‘भारत के 19 राजनीति दलों और 12 ट्रेड यूनियन ने किसान आंदोलन को समर्थन दिया है। क्या किसान आंदोलन की आग पर राजनीतिक दल अपनी रोटियां सेंकना चाहते हैं? पंजाब के किसान नेता देश भर के किसानों को इसमें शामिल होने की अपील कर रहे हैं। लेकिन क्या कभी पंजाब के किसान नेताओं ने ओडिशा के कालाहांड़ी, पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी और बिहार के बदहाल किसानों के लिए आवाज उठायी है? क्या पिछड़े राज्यों के किसानों की कोई अहमियत नहीं?’

सारा मामला राजनीति का!

इसमें कोई दो राय नहीं की इस किसान आंदोलन में किसानों के वास्तविक मुद्दों पर राजनीति भारी पड़ गई है। अगर आंदोलन से बहार किसानों की मानें तो यही हो रहा है क्योंकि उनका कहना है की नरेंद्र मोदी सरकार नए कृषि कानूनों में कई वही प्रावधान लागू करने की कोशिश में है जो कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार करने की कोशिश कर रही थी। मनमोहन सिंह सरकार-2 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में एपीएमसी मंडियों को खत्म करने की बात की गई थी। किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत भी खुले बाजार की मांग करते रहे थे।

ऐसे में आज जब सरकार उन्हीं प्रावधानों को लागू करने की कोशिश कर रही है तो इसका विरोध क्यों हो रहा है? ऐसा प्रतीत होता है की कृषि सुधारों पर वामपक्ष की राजनीति भारी पड़ती दिख रही है। हालांकि यह स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं की अगर कानून बनाने से पहले सभी पक्षों से ज्यादा बातचीत कर ली गई होती, और कानून में न्यूनतम समर्थन मूल्य को लिखित कानून बना दिया गया होता तो आज के विवाद से बचा जा सकता था।

मनमोहन सिंह सरकार के समय में भी एपीएमसी मंडियों को खत्म करने की मांग की गई थी। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में 500 किसानों और किसान संगठनों से बातचीत के दौरान यह बात सामने आई थी कि मंडियों में किसानों का शोषण हो रहा है, उन्हें उनकी फसलों के उचित मूल्य नहीं मिल रहे हैं।

इसके लिए आठ मुख्यमंत्रियों की अगुवाई में एक कमेटी का गठन भी किया गया था। हालांकि, यह कोशिश परवान नहीं चढ़ पाई, लेकिन आज जब वर्तमान सरकार उसी कोशिश को पूरा कर रही है तो उसका विरोध किया जा रहा है। इससे तो यही  महसूस होता है की यह विरोध पूरी तरह राजनीति से प्रेरित है।

इसके अलावा  मोटे तौर पर अगर समझा जाए तो किसानों की सबसे बड़ी चिंता न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को लेकर है। किसानों का कहना है वे मंडी में अनाज बेचे या बाहर, लेकिन हर हाल में उन्हें एमएसपी की लिखित गारंटी मिलनी चाहिए। केन्द्र सरकार के नये कानून में एमएसपी का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। किसानों का कहना है कि मंडी (कृषि उत्पाद बाजार समिति) व्यवस्था खत्म कर के एमएसपी को भी खत्म कर दिया गया है। अगर किसानों को अपनी उपज औने पौने दाम पर बेचनी पड़ी तो यह उनके साथ हकमारी होगी। सरकार का तर्क है कि एमएसपी को खत्म नहीं किया गया। एमएसपी का निर्धारण राज्यों का विषय और राज्य इसे अपने स्तर से लागू कर सकते हैं। अब सवाल ये है कि कांग्रेस शाषित राज्यें यह लागू क्यों नहीं कर रही? उनके सामने तो अपने अधीन छत्तीसगढ़ राज्य का उदहारण सामने है।

अशोक कुमार शर्मा बताते हैं की ‘अगर राज्य सरकार चाहें तो किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सकता है। जैसे छत्तीसगढ़ में 1 दिसम्बर 2020 से धान की खरीद हो रही है। यहां धान का समर्थन मूल्य 2553 रुपये प्रति क्विंटल है। पहले इसमें 1750 रुपये केन्द्र सरकार देती थी और 750 रुपये राज्य सरकार अपना अंश मिलाती थी। अब केन्द्र ने प्रति क्विंटल 53 रुपये की बढ़ोतरी की है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। जब छत्तीसगढ़ के किसान को एक क्विंटल धान के लिए 2553 रुपये मिल सकते हैं तो पंजाब के किसानों को क्यों नहीं? कृषि कानून बनने के बाद भी तो छत्तीसगढ़ में किसान एमएसपी पर धान बेच रहे हैं। यहां किसानों से सरकारी दर पर प्रति एकड़ 15 क्विंटल धान खरीदा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में धान की खरीद सोसाइटी के माध्यम से हो रही है। यहां तो कांग्रेस की सरकार फिर भी उसे कोई दिक्कत नहीं। अगर केन्द्र कुछ अड़ंगे लगा भी रहा तब भी तो बघेल सरकार एमएसपी का वादा पूरा करने से पीछे नहीं हट रही।’ इसको देखते हुए तो यह कहने में कोई शंका ही नहीं बची है की कुछ राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए किसान आंदोलन की आग को हवा दे रहे हैं।

भारत बंद के बावजूद सरकार किसानों से बात करने को तैयार है, इससे साफ जाहिर होता है कि सारा मामला अभी अंधेरी सुरंग में नहीं पहुंचा है। सच्चाई तो यह है कि देश के 40-50 करोड़ किसानों की दशा अत्यंत दयनीय है। उन्हें सहारा देने में भाजपा सरकार ने कोई कमी नहीं रखी है। उन्हें तरह-तरह के फायदे और सुविधाएं पिछले छह साल में वह देती रही है लेकिन आज भी हमारा किसान दुनिया के दर्जनों देशों के किसानों की तुलना में चार-छह गुना ज्यादा गरीबी में गुजारा करता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य तो सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों को मिलता है। 94 प्रतिशत किसान खुले बाजार में अपना माल बेचते हैं। वर्तमान किसान आंदोलन की रीढ़ समर्थन मूल्य वाला मालदार किसान ही है। वह ही सबसे ज्यादा घबराया हुआ है।

विरोधाभास देखिए कि जो दल आज नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का समर्थन कर रहे हैं, उनके ही नेता घरेलू स्तर पर इन सुधारों की जमीन तैयार करते आए हैं। वहीं, आज भारत के किसानों के हक में बयान देने वाले जस्टिन ट्रुडो, उस कनाडा के प्रधानमंत्री हैं, जो विश्व व्यापार संगठन (ङ्खञ्जह्र) में भारतीय किसानों के हितों के विरुद्ध संघर्ष करता आया है। किसानों के आंदोलन में शामिल जो एक तबका है, जिसे इन कानूनों से थोड़ा-बहुत नुकसान होगा, वो मौजूदा व्यवस्था में जड़ें जमाए बैठे बिचौलियों और मजदूर संगठनों का है, जिन्हें किसान आंदोलन की शक्ल में सरकार के खिलाफ मोर्चेबंदी का मौका मिल गया है। इन दोनों तबकों ने ही विपक्षी दलों को एक मंच उपलब्ध कराया है, जिसके जरिए वो अपने राजनीतिक हित साधने की कोशिश कर रहे हैं। आज देश में लोकतंत्र का मतलब, सैद्धांतिक और जनता के लाभ पर आधारित परिचर्चा और विरोध से हटकर मौकापरस्ती पर केंद्रित हो गया है। राजनीति ही आज अर्थव्यवस्था से अपने लिए मलाई निकालने का काम कर रही है। अगर इन तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया जाता है, जैसी कि आंदोलनकारी मांग कर रहे हैं, तो किसानों को तिहरा नुकसान होगा।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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