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गरीब किसानों को मिली संजीवनी

गरीब किसानों को मिली संजीवनी

मंडी माफिया, धनवान जमींदार और हारी थकी पार्टीयां किसानों को आत्मनिर्भर बनानें में रोड़े अटका रही है। यही लोग पिछले 70 साल से सीधे साधे किसानों को लूट रहे हैं और यही व्यवस्था घूसखोर अधिकारियों को भी रास आती है। इसी का एक हिस्सा है गांव के ब्याज खोर साहूकार जो किसानों की अच्छी फसल न होनें पर उन्हें ब्याज पर उधारी देता है और अंगूठा लगवा कर उनकी जमींन कब्जा लेता है। आजादी मिलनें के बाद से ही ये होता आ रहा है। इसको रोकने के लिये पूर्ववत सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाये। नतीजा ये हुआ कि मझोला किसान पिस गया छोटा गरीब किसान सडक़ पर आ गया। ये किसान से धीरे धीरे मजदूर बनते चले गये। छोटे किसानों के पास आज भी ट्रेक्टर नहीं है, बड़े किसानों के पास चार चार ट्रेक्टर है। बैलों से खेती मंहगी पडऩे के कारण धीरे धीरे लुप्त हो गयी। किसानों को मजबूरी में बड़े किसानों से ट्रेक्टर लेकर जुताई, ढुलाई आदि करवाना पड़ती है उनसे अनाप शनाप किराया वसूला जाता है। नई नई टेक्नोलोजी का इन किसानों को ज्ञान नहीं है इसलिये उनकी फसल अन्य उन्नत प्रदेशों के मुकाबले में कम होती है जैसे पंजाब, हरयाणा का किसान उन्नतिशील होता गया और कई प्रदेशों का पिछड़ता गया। गरीब से और गरीब हुआ और सारी जिन्दगी मेहनत करके भी आज नंगे बदन रहता है, न कपड़े, न जूते, न पक्के मकान और बच्चों को शिक्षा देने के लिये न ही पैसे।

भारत की गरीबी के लिये हमारे व्यवस्था ही जिम्मेदार है देश में संसाधनों की कमी नहीं है, न ही मेहनतकश लोगों की। विचौलियों और धनवान किसानों ने गरीब किसान को चूस डाला। उनकी जमींने गिरवी रख रख कर कब्जा ली। सरकार ने उसे रोकने के लिये कोई कदम नहीं उठाये। गांधी जी का कथन है कि ‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है’ को हम भूल गये। यदि देश की 75 प्रतिशत आजादी राष्ट्र की मुख्यधारा में नहीं जुड़ेगी उसे विकास के उजाले से दूर रखा जायेगा, उसे नई नई टेक्नोलोजी से अनभिज्ञ रखा जायेगा। वे भूखे पेट सोयेंगे तो देश कैसे विकास और प्रगति के रास्ते पर चल सकेगा। विश्व स्पर्धा में हमारे पीछे रहने का यह सबसे बड़ा कारण है।

नया कृषि बिल किसानों को शोषण से बचायेगा, उन्हें आत्म निर्भर बनायेगा और उन्हें सुरक्षा प्रदान करेगा। किसानों के चेहरे भी खिल उठें और उन्हें भी दो जून की रोटी चैन से मिले। उन्नतिशील बीज नई टेक्नोलोजी और वित्तीय मदद ये सब कर सकती है। जब इस ओर सरकार ने कदम बड़ाया तो उसी बिल का जो कांग्रेस के खुद के घोषणा पत्र में था, कांग्रेस ही ने विरोध शुरू कर दिया।

कांग्रेस की कुटिल चालें 

60 वर्ष सत्ता भोगने के बाद सडक़ पर आयी कांग्रेस कुर्सी की चाह में राष्ट्रहितों को बार बार ताक पर रख रही है। उनके थिंक टैंक का भट्टा बैठ गया है। सरकार का निर्णय कोई भी हो उसका विरोध करना उसकी आदत बन गयी है। राफेल में राहुल की रट काम नहीं आयी, चौकीदार को चोर कहना भारी पड़ गया, नोटबन्दी पर कांग्रेस द्वारा फैलायी गयी बातों को जनता ने नकार दिया और अंतत: पार्टी को सडक़ पर कर दिया। पार्टी ने फिर भी कोई सीख नहीं ली। उसकी सारी चालें नाकामयाब रही, अब कृषि बिल पर बड़ी ही कुटिलता और चालाकी से एक योजना बना कर काम किया। पहले अफवाह फैलायी कि ये काला कानून है, इससे किसान के अधिकार छीन लिये जायेंगे जबकि बिल में छीनने का तो कुछ ही नहीं केवल देने देने की बात कही गयी है।

विरोधी दल भी इस कुटिलता में धीरे धीरे शामिल हो गये। पंजाब की राजनीति में दखल रखने वाले अकाली दल के नेता इस बिल के खिलाफ शुरू से ही थे पर भाजपा सरकार इस बिल को किसानों  के विकास के लिये अमृत तुल्य समझती है। अकाली दल तो शुरू से ही बड़े बड़े किसानों की जमात से बना है। पंजाब में वैसे भी फसलें बम्पर होती है। इसका कारण है पानी की आपूर्ति पूरी होना और उपजाऊ जमींन। ऊपर से सबसे पहले आधुनिक साधनों से खेती पंजाब से ही शुरू हुई। आज भी पंजाब से दूर दूर प्रदेशों खाशकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में हार्वेस्टर आदि पंजाब से जाते हैं जो फसलों की कटाई आदि करते हैं। पंजाब और पश्चिमी प्रदेशों का किसान धनवान है और छोटे किसानों पर उनकी पकड़ बनी रहती है। मंडियों पर उनका कब्जा भी है और खेतीहरों पर दादागिरी भी इसलिये अकालियों को तो विरोध करना ही था। एनडीए सरकार में शामिल अकाली दल ने गठबंधन छोडऩें की धमकी दी पर भाजपा उनके दबाव में नहीं आयी। आखिर अकाली दल ने एनडीए सरकार से किनारा कर लिया और उस दल की केन्द्र में एक मात्र मंत्री ने इस्तीफा भी दे दिया। पर भाजपा ने बिल नहीं रोका।

कांग्रेस पार्टी की सबसे महफूज सरकार केवल पंजाब में ही है। पार्टी को लगा कि अकाली दल किसानों से मिलकर कहीं अगले चुनाव में पटक न दे ंतो तुरन्त कांग्रेस भी किसानों को इक_ा कर उकसाने लगी और एक योजना के तहत पूरी तैयारी कर दिल्ली में आंदोलन का रास्ता बनाया गया। उसी के तहत पंजाब के किसानों के नेताओं के जत्थे बना कर दिल्ली कूच किया गया। ये आन्दोलन या दिल्ली में जमावड़ा इन्ही बड़े किसानों और राजनैतिक पार्टियों की चालों का नतीजा है। किसानों को गुमराह कर इक_ा किया गया, राशन पानी की सारी व्यवस्था इन्हीं पार्टियों और मंडी माफिया द्वारा की गयी। इस आंदोलनकारियों को किसानों की भलाई से कोई लेना देना दिखाई नहीं दे रहा।

उधर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से किसानों के कद्दावर नेता रहे महेन्द्र सिंह टिकैत के जाने के बाद भारतीय किसान यूनियन संगठन की कमान संभालने वाले उनके पुत्र राकेश टिकैत लम्बे अरसे से अपनी जमींन तलाश रहे थे। वे उत्तर प्रदेश में कई क्षेत्रों में गये कई कई बार बुन्देलखण्ड भी गये पर उन्हें अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण ये पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित रह गये। उन्होंने देखा ये अच्छा अवसर है राजनीति चमकाने में वे तुरन्त उसमें कूद पड़े जबकि वहां के किसानों को बिल से कोई तकलीफ नहीं थी। जब टिकैत आ गये तो पूर्व प्रधानमंत्री किसानों के हमदर्द समझे जाने वाले चौ. चरण सिंह के पुत्र अजीत सिंह जो राजनीति में बुरी तरह पटकनी खाने के बाद एक दम हाशिये में आ गये थे, उन्हें मजबूरन इसका समर्थन करना पड़ा।

समाजवादी पार्टी जिसने बिल पर कोई जोर दार विरोध नहीं जताया था न कोई धरना, घिराव, आन्दोलन किया था। बिल पास होने के बाद 3 माह तक चुप्पी साधे था। इसके अध्यक्ष अखिलेश यादव ने देखा कि दिल्ली में भीड़ इक_ी हो गयी है। कांग्रेस पार्टी की नेतागिरी चमक न जाये तो तुरन्त समर्थन में ब्यान बाजी करने लगे फिर पार्टी के कार्यकर्ताओं को विरोध करने को कह दिया और जब किसानों के दिल्ली में होने वाले प्रदर्शन के हिस्सेदार बनने का प्रयास करने लगे। इसी तरह आज पार्टी ने आखिरी समय में राजनैतिक लाभ सोचते हुये प्रदर्शन का सहयोग किया और रोड शो करने लगे। कम्यूनिष्टों का तो काम ही धरना, जलूस प्रदर्शन है उन्हें तो साथ रहना था। कांग्रेस के इस प्रदर्शन में बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिये सभी विरोधी पार्टियां एक एक करके किसानों के बिल रोको प्रयास में जुड़ गयी।

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बिल की खिलाफत में सभी इकट्ठे क्यों?

बिल पास होने के लगभग 3 माह तक सभी राजनैतिक पार्टियां चुप्पी साधे रही। कांग्रेस तो शुरू से ही एैसे कानून की पक्षधर थी उसका घोषणा पत्र भी एैसा था। बिल का विरोध का रास्ता उसे सुझाई नहीं दे रहा था। समाजवादी पार्टी इसमें कोई लाभ नहीं समझ रही थी। बात केवल अकाली दल की थी जिसे पार्टी से पंजाब के बड़े किसानों के दूर होने से उनका समर्थन खोने का डर था भारतीय किसान यूनियन के नेता टिकैत को राजनीति चमकाने का अवसर था लेकिन बाकी राजनैतिक पार्टियां क्यों इकट्ठे हो गयी इसका मुख्य कारण है हाल ही में हुये बिहार विधानसभा और अन्य प्रदेशों में हुये उपचुनाव। बिल पास होने के बाद बिहार में भाजपा ने अपनी ताकत बड़ाई और उसकी और सहयोगियों की सरकार बन गयी। उत्तर प्रदेश में 7 उपचुनावों में से 6 भाजपा ने जीत लिये। गुजरात में सभी 8 उपचुनाव जीते यहां तक कि तेलंगाना में हुआ मात्र 1 उपचुनाव भी भाजपा जीत गयी। इससे सभी विरोधी पार्टियों को लगा कि किसान बिल पर किसानों की मुहर लग गयी है। यहीं से षडयंत्र शुरू हुआ। अकाली दल पहले ही तैयार बैठा था। उसके आंदोलन को कांग्रेस ने अन्दर ही अन्दर धार दी और फिर समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी आदि पार्टियां भी शामिल हो गयी। उन्हें किसानों की चिन्ता नहीं है इन्हें सता रहा है डर कि यदि ये बिल लागू रहा तो किसान सदा के लिये भाजपा का हो जायेगा। बस जम गया जमावड़ा।

किसानों की जमींन पहले से अधिक सुरक्षित

कोई भी बड़ा किसान धनाड्य व्यक्ति या औद्योगिक यूनिट या कारपोरेट किसान की जमींन पर खेती करवाता है तो उसे किसान को पूरा पैसा देना होगा। उसकी एक इन्च जमींन भी न गिरवी रख सकेगा न इस पर कब्जा कर सकेगा। अभी किसानों की जमींनें स्थानीय साहूकार बड़े किसान जमींदार लोग, बीज, यूरिया, डीजल आदि के खर्चे या अन्य काम के लिये उन्हें रूपया उधार देते हैं तो उनकी जमींन गिरवी रख लेते हैं और फिर उस पर कब्जा कर लेते हैं यही कारण है कि आज का किसान गरीब हो गया है। देश के लगभग 92 प्रतिशत मझोले और छोटे किसानों पर 8 प्रतिशत, बड़े किसानों का हुक्म चलता है और वही 8 प्रतिशत आज ये धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, करवा रहे हैं। वे किसानों पर अपना राजपाट नहीं खोने देना चाहते हैं। बिल में यह भी सुरक्षा है कि फसल पर घाटा होने पर भी किसान को पूरे पैसे देने पड़ेंगे। ओलावृष्टि, बाढ़, सूखा, पाला आदि से फसल नष्ट होती रहती है इस बिल से खेती में दूसरे लोगों की पूंजी लगी होने के कारण किसान सुरक्षित है।

एमएसपी बन्द होने की भ्रान्ति, अफवाह

जब पार्लियामेंट में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने आश्वासन दिया कि एमएसपी बन्द नहीं होगी। बाद में प्रेस में भी कह दिया। पार्लियामेंट में सरकार द्वारा दिया गया ब्यान, आश्वासन सरकार पर बन्धन है। फिर प्रधानमंत्री ने भी कह दिया कि एमएसपी बन्द नहीं होगी। फिर भी एमएसपी का डर फैला कर किसानों को भ्रमित कर प्रदर्शन के लिये तैयार किया गया और भडक़ाया जा रहा है। यहां बता दे कि एमएसपी पूरे साल नहीं चलती केवल सीजन में चलती है। बाकी 9 माह किसान अपनी फसल अपनी मर्जी से नहीं बेच सकता उसे मंडी ही आना पड़ेगा। बिल ने इस मजबूरी से किसानों को छुटकारा दिया है।

कृषि बिल किसी भी तरह किसानों का अहित नहीं करता है, उनके खेत सुरक्षित रहें, उसी खेत से दुगुनी फसल पैदा हो सके, वे व्यर्थ में कर्जदारी के बोझ से न दवें, उनके खेतों में उन्नतिशील बीज आये और आधुनिक मशीनों से खेती हो ताकि एक ही खेत से साल में 3 फसलें या अधिक लेे सके। फसल को बदल बदल कर मार्केट की जरूरत के हिसाब से उगा सके। राष्ट्रधारा से जुड़ सके, खेती और खेतों का निरंतर विकास हो। खेतों की बंजर या लगी हुयी अनउपजाऊ जमींन का भी उपयोग हो सके कृषि बिल से सारी सुविधायें प्रदान करने का रास्ता खोलता है।

इसलिये जहां तक मैं समझता हूं इस बिल से सरकार पीछे नहीं होगी, छोटे मोटे फेरबदल किये जा सकते हैं। किसानों की शंकाये दूर की जा सकती है। एमएसपी पर किसानों का विश्वास जगाने के लिये कोई ठोस निर्णय हो सकता है जिससे आंदोलनकारियों की संतुष्टि हो जाये।

ये कृषि बिल जहां किसानों के जीवन में गेम-चेंजर हो सकते हैं, तो राजनीति में भी भाजपा के लिये वरदान साबित हो सकते हैं क्योंकि ये बिल देश के 92 प्रतिशत गरीब, छोटे एवं मझोले किसानों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकते हैं और किसान हमेशा-हमेशा के लिये भाजपा के हो सकते हैं। मोदी की लोकप्रियता सदा के लिये पक्की हो सकती है। बस यही डर भाजपा की विरोधी पार्टियों को खाये जा रहा है। इस बिल से किसानों और भाजपा दोनों का भविष्य उज्जवल है। कश्मीर से 370 हटाने पर भी और नागरिकता बिल पर मोदी सरकार पीछे नहीं हटी थी तो अब ये सरकार किसानों के लिये रामबाण औषधि सिद्ध होने वाले बिल वापिसी के लिये कहां मांनेगी।

डॉ. विजय खैरा

 

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