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किसान आंदोलन के किंतु-परंतु

किसान आंदोलन के किंतु-परंतु

नए भारत की नई संसद के भवन का शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक पते की बात कही है। उन्होंने किसान आंदोलन को लेकर कहा कि संवाद से बात निकलेगी। लेकिन सवाल यह है कि संवाद किससे होगा। जिस तरह किसान संगठनों के नेता नए तीनों कृषि कानूनों की वापसी पर अड़े हैं, उससे बात कैसे निकलेगी। जाहिर है कि मोदी जी ने यह बात कहकर कोई बड़ा संकेत दिया है। यह संकेत क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली पर गहरी नजर रखने वाले राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि प्रधानमंत्री किसान संगठनों की बजाय इस मामले में हो सकता है कि संसद का विशेष सत्र बुला लें। कोरोना के चलते संसद का शीतकालीन अधिवेशन नहीं होने जा रहा है। सरकार की मंशा सीधे बजट सत्र बुलाने और उसमें जरूरी विधायी और आर्थिक कामकाज करने की है। लेकिन प्रधानमंत्री ने संवाद का संकेत देकर संभवत: इस मसले पर संसद की बैठक बुलाने और उसमें इस पर चर्चा कराने की तैयारी में है। इससे एक तीर से केंद्र सरकार दो-दो निशाने साध सकेगी। पहला निशाना यह कि वह किसान संगठनों के नाम पर राजनीति कर रहे विपक्ष के गुब्बारे की हवा निकालने की कोशिश करेगी, वहीं बेजा मांगों को लेकर अड़े किसान संगठनों की मंशा का संसद की चर्चा के जरिए देशव्यापी खुलासा करने की कोशिश करेगी। किसानों का दावा है कि उन्हें भले ही विपक्षी दलों का समर्थन मिल रहा है, लेकिन उन्होंने अपना मंच राजनीतिक दलों को नहीं दिया है। लेकिन हकीकत यह है कि वामपंथी किसान संगठनों की ओर से नेतृत्व संभाल रहे हन्नान मोल्ला 2004 तक सीपीएम के लोकसभा से सदस्य रहे हैं। सीपीएम संसदीय दल के नेता सोमनाथ चटर्जी और उपनेता बासुदेव आचार्य के बाद वे पार्टी की ओर से संसदीय मोर्चे पर हन्नान मोल्ला खूब सक्रिय रहा करते थे। इसलिए यह कहना कि किसान आंदोलन में राजनीतिक दलों का हाथ नहीं है, बेमानी होगा। केंद्र सरकार किसान संगठनों के नाम पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले विपक्ष की इस जवाब को संसद के मंच पर इस तरह से जवाब दे सकती है।

किसान संगठनों को सरकार ने हर दौर की बातचीत के बाद एक तरह से संदेश दे दिया है कि वह कृषि कानूनों में सुधार को तैयार तो है, लेकिन वह उन्हें खत्म करने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री का ट्वीटर के जरिये किसानों को यह संदेश देना कि वे उनके मंत्रियों की बातें सुनें, का भी मकसद यही है। इस बीच कृषि कानूनों के समर्थक किसान संगठनों को भी आगे लाने की राजनीति तेज हो गई है। माना जा रहा है कि मौजूदा किसान आंदोलन का सबसे ज्यादा असर पंजाब, हरियाणा और किंचित उत्तर प्रदेश में है। लेकिन हरियाणा से करीब एक लाख बीस हजार किसान नए कृषि कानूनों के समर्थन में आगे आ गए हैं। बेशक खेती और किसानी के लिए सबसे ज्यादा नाम पंजाब और हरियाणा ने कमाया है। लेकिन यह भी सच है कि देश में सबसे ज्यादा दस प्रतिशत की विकास दर हासिल करने वाला राज्य मध्य प्रदेश है। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। यहां के कृषि मंत्री कमल पटेल ने तो कृषि कानूनों के समर्थन में किसानों से उतरने का आह्वान तक कर दिया है। जाहिर है कि आने वाले दिनों में यह कवायद और तेज होगी और सरकार की ओर से विपक्ष और किसान संगठनों को इस तरह से जवाब देने की कोशिश और तेज होगी।

कृषि कानूनों का विरोध करने वाले पंजाब में साल 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसी साल सबसे ज्यादा गेहूं उत्पादन करने वाले राज्य उत्तर प्रदेश और पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में विधानसभा के चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि यहां के व्यापक किसान समुदाय को उकसाकर विपक्षी दल सत्ता में वापसी के मंसूबे पाले हुए हैं। पंजाब के किसानों का समर्थन हासिल करने के लिए वहां की सत्ताधारी कांग्रेस, प्रमुख विपक्षी दल आम आदमी पार्टी के साथ ही अतीत में सत्ता में रही शिरोमणि अकाली दल ने एक तरह से हाथ मिला चुके हैं। चुनाव के वक्त वे यह दिखाने की कोशिश करेंगे कि उन्होंने किसानों का ज्यादा साथ दिया। इस बहाने वे किसानों का ज्यादा से ज्यादा समर्थन हासिल करने की कोशिश करेंगे। यह बात और है कि अगर किसान आंदोलन किसी तार्किक परिणति तक ना पहुंचेगा, तब तक देर हो चुकी होगी। फिर अगर किसान उनसे हिसाब मांगने लगेंगे तो उसका वे क्या जवाब देंगे, इसकी मुकम्मल रणनीति राजनीतिक दलों के पास नजर नहीं आ रही है।

वैसे किसान आंदोलन की परीक्षा अगले ही साल पांच राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में हो जाएगी। हालांकि ऐन किसान आंदोलन के बीच हुए ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम और राजस्थान के स्थानीय निकायों के चुनावों के नतीजों ने साफ कर दिया है कि विपक्षी दलों की रणनीति कारगर नहीं हो पाई है। हैदराबाद में सबकों चौंकाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने जबर्दस्त प्रदर्शन करते हुए 150 सदस्यीय निगम में 49 सीटों के साथ दूसरा स्थान हासिल किया है। जबकि पिछली बार उसके मात्र चार सभासद जीते थे। इसी तरह राजस्थान के 22 जिला परिषदों में से 13 पर भारतीय जनता पार्टी ने कब्जा जमाया है। इससे स्पष्ट है कि किसान संगठनों के आंदोलन को विपक्षी दलों ने चाहे जितना भी समर्थन दिया हो, राजनीतिक मैदान में उन्हें इसका फायदा नहीं हुआ। वैसे मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में तमिलनाडु के किसानों के जरिए जिस तरह दिल्ली के जंतर मंतर पर लंबा किसान आंदोलन चलाया गया, उसकी भी खास परिणति नहीं हुई। तमिलनाडु के किसानों के आंदोलन के जरिए किसानों की समस्याओं को उभारने और इसके जरिए देश की करीब 67 फीसद उस आबादी को मोदी विरोधी बनाने की कोशिश नाकाम रही, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर खेती-किसानी से सीधे जुड़ी हुई है और गांवों में रहती है।

किसान आंदोलन को बेशक शुरू में पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साथ दिया। लेकिन जिस तरह यह आंदोलन अब दूसरा रूख अख्तियार करने लगा है, उससे वे भी चिंतित नजर आ रहे हैं। जिस तरह इस आंदोलन में खालिस्तानियों के शामिल होने की खबरें आ रही हैं, उससे कैप्टन भी चिंतित हैं। वे नहीं चाहेंगे कि अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में जिस खालिस्तानी आंदोलन से बड़ी मेहनत के बाद पंजाब को मुक्ति मिली थी, वह फिर उसका शिकार बन सके। इसलिए वे भी चाहते हैं कि जल्द से जल्द यह आंदोलन खत्म हो। चूंकि इस मामले को फैलाने में उनका भी हाथ है, लिहाजा वे चाहकर भी इसे समेट नहीं पा रहे हैं। लेकिन गाहे-बगाहे उनकी चिंताएं सामने आ रही हैं। वैसे भी विश्व मानवाधिकार दिवस के दिन जिस तरह एक किसान संगठन ने शरजील इमाम समेत देशद्रोह के तमाम आरोपियों की रिहाई की मांग वाला पोस्टर लेकर प्रदर्शन किया, उससे स्पष्ट है कि यह आंदोलन पहले भले ही दबे-छुपे अन्य राह पर था, अब खुलेआम उसी राह पर जा रहा है, जिस राह पर नागरिकता संशोधन विरोधी आंदोलन था। अब यह आम आदमी भी मानने लगा है कि इस आंदोलन का मकसद दिल्ली को लंबे अरसे तक पंगु करके रखना है ताकि मोदी सरकार बदनाम हो। आंदोलनकारी भी जानते हैं कि मोदी सरकार इस मामले में झुकने नहीं जा रही। उन्हें पता है कि इस वजह से आंदोलन खत्म नहीं होगा और लंबा चलेगा। जब लंबे समय तक दिल्ली की घेरेबंदी जारी रहेगी तो इससे परेशान जनता सडक़ों पर उतरेगी और फिर मोदी सरकार की छवि खराब होगी। ऐसे में देखना यह होगा कि सरकार का अगला कदम क्या होता है और आंदोलनकारी किस दिशा में आगे बढ़ते हैं। फिलहाल दिल्ली का एक हिस्सा तो आंदोलनकारियों के कब्जे में है और उन्हें दिल्ली की स्थानीय राज्य सरकार का उन्हें सहयोग भी है। इसलिए उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होने वाली, बशर्तें कि केंद्र सरकार की ओर से कड़े कदम ना उठाए जाएं।

उमेश चतुर्वेदी

 

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