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करिश्में मानवाधिकार के

करिश्में मानवाधिकार के

बेटा : पिताजी।

पिता : हां, बेटा।

बेटा : ये मानवाधिकार क्या होते हैं?

पिता : बेटा, हम सब मानव हैं और मानव होने के नाते हमारे बहुत से अधिकार हैं जिनकी रक्षा की जानी चाहिए। इन्हें ही मानवाधिकार कहते हैं।

बेटा : अच्छा, ये जो आजकल विदेशों में बड़ी चर्चा चल रही है कि एक दम्पति को बच्चे पैदा करने का तो अधिकार है पर बच्चों पर कोई अधिकार नहीं है?

पिता : कुछ हद तक तो तेरी बात ठीक ही है पर पहले माता-पिता का कत्र्तव्य है कि वह उनकी अच्छी परवरिश करें। उनके शारीरिक और मानसिक विकास केलिए सब कुछ करें।

बेटा : माता-पिता के कत्र्तव्य में उनकी पढाई-लिखाई का प्रबंध करना भी तो आता है।

पिता : बिल्कुल। हर माता-पिता अपनी सन्तान को अपनी सामर्थ्य से भी ज्यादा शिक्षा देने की कोशिश करता है  — कई बार तो ऋण लेकर और कई बार अपनी जमीन-जायदाद बेचकर भी।

बेटा : यह तो ठीक है। यदि कमी रह जाती है तो वह बच्चों के कारण। एक बच्चा बहुत आगे निकल जाता है और दूसरा फिसड्डी रह जाता है। एक अफसर बन जाता है और दूसरा चपरासी।

पिता : यह तो बेटा बच्चे की मेंहनत और किस्मत पर भी निर्भर करता है।

बेटा : और पिताजी उसमें शिक्षक का भी बड़ा योगदान होता है।

पिता : पर अब यह पुराणी बातें लगती हैं। माता-पिता अपने बच्चे पर हाथ भी उठा देते थे यदि बच्चा पढाई पर ध्यान न दे तो। या कोई और गलत बात कर दे तो। उसे कई प्रकार की सजा भी दे देते थे।

बेटा : शिक्षक भी बड़ा ध्यान रखते थे। यदि उनका पढाया बच्चा कल को बड़ा बन जाता है तो वह अपना गर्व समझते थे।

पिता : मुझे तो याद है बेटा कि जब कभी कोई शिक्षक किसी माता-पिता से उनके बच्चे की कोई शिकायत करता था तो माता-पिता स्वयं ही शिक्षक को कहते थे कि उन्होंने स्वयं उसकी पिटाई क्यों नहीं कर दी?

बेटा : अच्छा? पर अब तो ऐसा नहीं हो सकता।

पिता : अब तो बेटा अध्यापक क्या, माता-पिता भी अपने बच्चे को पढाई न करने पर पिटाई तो दूर, उसे घूर कर भी नहीं देख सकते। ऐसा करें तो एक अपराध है।

बेटा : क्या माता-पिता और उसके शिक्षक बच्चे के दुश्मन हैं जो उसकी पिटाई कर देते हैं?

पिता : अब जो हम विदेशी संस्कृति पर चल रहे हैं यह सब उसका ही कमाल है।

बेटा : इस संस्कृति के अनुसार क्या बच्चे के शिक्षक और माता-पिता ऐसा व्यवहार कर उससे दुश्मनी निकालते हैं?

पिता : इस विदेशी संस्कृति और मानवाधिकार संस्थाओं के अनुसार तो ऐसा ही लगता है।

बेटा : मतलब अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना उसके माता-पिता व शिक्षकों का उत्तरदायित्व है और साथ ही उनके उत्तरदायित्व को विफल कर देना बच्चों का मानवाधिकार है।

पिता : यही नहीं। ऐसा कर बैठना अपराध है और अनेक शिक्षकों और माता-पिता पर थाने में उनके विरुद्ध आपराधिक मामले दाखिल कर दिए गए हैं।

बेटा : तो पिताजी ऐसी स्तिथि में जब विद्यार्थी कुछ काम न कर आया हो और जो याद करने के लिए दिया है वह ऐसा न करे तो ऐसा करना उन बच्चों का मानवाधिकार बन जाता है।  कोई उन्हें छू नहीं सकता।

पिता : मतलब माता-पिता व शिक्षक का उत्तरदायित्व है बच्चों को पढ़ा-लिखा कर उनका भविष्य बनाना और बच्चों का मानवाधिकार है अपना भविष्य बनाना या बिगाडऩा जिसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता। यह उनका अधिकार है जिसकी रक्षा करना सबका उत्तरदायित्व है।

बेटा : पिताजी, मैंने तो अखबार में एक समाचार भी पढ़ा था जिसमें लिखा था कि दिल्ली के एक स्कूल में एक बच्चे ने घर से एक पिस्तौल लाकर अपने एक शिक्षका की गोली मार कर हत्या कर दी थी क्योंकि शिक्षका ने उसकी मां को यह बताने की हिमाकत कर दी थी कि उसका बेटा होमवर्क कर के नहीं आता।

पिता : वैसे अब कई बड़े स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों के माता-पिता भी बड़े फारवर्ड हो गए हैं। वह भी कई बार प्रिंसिपल से ही शिकायत लेकर आ जाते हैं कि अध्यापक ने उनके बच्चे पर हाथ उठाने की हिम्मत कैसे कर दी?

बेटा : बात तो ठीक है। बच्चा उनका है। चिंता अध्यापक क्यों कर रहा है?

पिता : पर एक और अजीब स्थिति बन गयी है। एक ओर तो अध्यापक स्कूल का काम न कर आने पर बच्चे को कुछ नहीं कह सकता और यदि उसकी क्लास का रिजल्ट बुरा आये तो उसके लिए उसको उत्तरदाई बना दिया जाता है। यही तो ढकोंसला है।

बेटा : पिताजी, जब मैं स्कूल में पढता था तो हमारे मास्टरजी ने अनेकों बार मुझे पीटा। मैंने अव्वल तो घर आकर आपको बताया ही नहीं। पर जब कभी बताया तो उलटे आपने भी मेरी पिटाई कर दी। आपने कभी मेरे मानवाधिकारों की रक्षा नहीं की।

पिता : मैंने ऐसा किया तभी तू यहां तक पढ़ पाया वरन तू किसी हलवाई की दूकान पर जूठे बर्तन साफ करता होता।

बेटा : कुछ भी हो पिताजी। आज की बातें देख-सुन कर तो मैं यह ही महसूस करता हूं कि आपने और समाज ने मुझ जैसे शरीफ व्यक्ति से बड़े अन्याय किये हैं जब मैं छोटा था।

पिता : और क्या हो गया?

बेटा : पिताजी, मैं सात-आठ साल का था और बीड़ी पी रहा था। उसी समय कोई बड़ा आदमी मेरे पास आया और उसने मेरे गाल पर धड़ाधड कई चांटे मार दिए यह कहते हुए कि यह तेरी उम्र है बीड़ी पीने की? मैं चुपचाप घर आ गया और किसी को कुछ नहीं बताया कि मेरे साथ क्या घटा है। मुझे पता था कि यदि मैं बताता तो उलटे आपसे और मार खाता।

पिता : बात तो तेरी ठीक है। तू उस व्यक्ति को जानता-पहचानता भी नहीं जिसने तुझे पीटा था। तू जानता भी होता तो मैं उसे यही कहता कि उसने ठीक किया है और तुझे और भी पीटता।

बेटा : पर इसका एक फायदा यह हुआ कि मैंने बीडी पीनी छोड़ दी।

पिता : और तब यह मानवाधिकारी लोग होते तो तू बीडी-सिगरेट ही नहीं उलटे कुछ और भी बुरी आदतें अपना लेता।

बेटा : यह बात तो ठीक है।

पिता : यह तो तभी हो सका जब ये अधिकारों वाले लोग नहीं थे। तब सामाजिक नियंत्रण ही बहुत प्रभावी था।

बेटा : और उसी कारण समाज में भाईचारा भी था और अपराध पर अंकुश भी।

पिता : कोई लडक़ा या लडक़ी कोई ऐसा काम करना नहीं चाहते थे जिससे कि उनके माता-पिता, परिवार या गांव पर कोई ऊंगली उठे।

पिता : एक समय था जब बच्चे माता-पिता से ज्यादा अपने अध्यापक से डरते थे। जब बच्चा हमारी बात नहीं मानता था तो हम कहते थे कि यह बात हम तेरे टीचर को बतायेंगे तो यह चेतावनी सुनते ही वह बात मान जाता था और हमारे पांव पड़ता था कि टीचर से शिकायत मत करना।

बेटा : अब तो माता-पिता और टीचर दोनों ही बच्चों से डरते हैं।

बेटा : आजकल तो लव-जिहाद भी बड़ी चर्चा में है।

पिता : यह बेटा व्यक्तिगत आजादी का ही तो करिश्मा है। साथ ही यह एक बड़ा षडय़ंत्र भी है।

बेटा : मैंने तो यह भी सुना है कि जब भारत आजाद हुआ तो सामाजिक और धार्मिक मित्रभाव को प्रोत्साहित करने के लिये देश में अंतर-जाति व अंतर-धर्म विवाह करने वालों को कुछ आर्थिक सहायता भी दी जाती थी।

पिता : बिल्कुल ठीक है। पर अब तो कोई ऐसी बात नहीं लगती। अब तो उलटे दंगे भडक़ते हैं।

बेटा : पर पिताजी जब एक व्यस्क लडक़ा और लडक़ी अपनी मर्जी से प्रणयबंधन में बंध रहे हों तो किसी को क्या आपत्ति?

पिता : यह तो बेटा ठीक है। कहावत भी है कि मियां-बीवी राजी तो क्या करेगा

काजी? पर वास्तव में सच्चाई बाद में कुछ और निकल रही है।

बेटा : क्या? प्यार तो अंधा होता है।

पिता : अधिकतर मामलों में लडक़ा मुस्लिम निकल रहा है और लडक़ी हिन्दू। कई लडक़े तो पहले ही विवाहिक निकले। लड़कियों पर धर्म परिवर्तन केलिए भी जोर डाला जा रहा है।

बेटा : यह बात तो मानी कि अपनी मर्जी से अपने मर्जी के साथी से शादी करने के लिए लडक़ा-लडक़ी को किसी से मंजूूरी लेने की आवश्यकता नहीं है, पर दोनों को एक-दूसरे के बारे सच्चाई तो ज्ञात होनी ही चाहिए न।

पिता : यह भी लडक़ा कोई काम करता है कि नहीं। उसके परिवार आदि के बारे भी पूरी सूचना  होनी चाहिए। लडक़ी को अपने बारे अंधेरे में रखना तो धोखा है।

बेटा : पर पिताजी जब प्यार किया तो बाकी चीजों का महत्व नहीं रह जाता।

पिता : तेरी भी कोई ऐसी तमन्ना तो नहीं है?

बेटा : यह काम मैंने पहले नहीं किया तो अब क्या करूंगा?

पिता : यह तो अच्छा है। पर मैं तेरे को यथार्थ की बता दूं ।

बेटा : क्या?

पिता : प्यार तो अंधा ही नहीं एक सपना होता है और विवाह एक सच।

बेटा : और सपने और जीवन के यथार्थ के बीच संघर्ष ही जन्म देता है तलाक को। होने को तो तलाक भी एक मानवाधिकार ही है।

पिता : तू तो बड़ा दार्शनिक बन गया है।

बेटा : सब आपकी कृपा से।

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