ब्रेकिंग न्यूज़ 

प्रतिस्पर्धात्मक बाजार ही कुंजी है

प्रतिस्पर्धात्मक बाजार ही कुंजी है

यह बड़ा दुर्भाग्य हैं कि आज वे राजनीतिक दल और राजनेता इन किसान कानूनों का विरोध कर रहे हैं, जिन्होंने अपने चुनाव घोषणा पत्र में किसानो की आमदनी बढ़ाने के लिए ऐसे ही कानूनों का वादा किया था। ऐसा नहीं की इन तीनों कानूनों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं हैं, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों ने इस किसान आंदोलन के माध्यम से अपना असली चेहरा दिखा दिया है। वे इन तीनों किसान कानूनों को पूरी तरह से खत्म करने की माँग कर रहे हैं। इसी के साथ ही विपक्षी दलों का राजनीतिक दिवालियापन भी अब खुलकर सामने आ चुका हैं। क्योंकि न तो ये नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकते हैं और न ही भाजपा को। फिर भी यहां यह कहना आवश्यक हैं कि अभी तक इस किसान आंदोलन ने इन राजनीतिक नेताओं को पूरी तरह जगह नहीं दी है। अभी तक इस आंदोलन में किसी  प्रकार की हिंसा भी नहीं देखी गई है। और इसके लिए किसानों की प्रशंसा की जानी चाहिए। हालांकि यह चिंता की बात है कि भारत विरोधी सोच रखने वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग के कुछ लोग इस आंदोलन में घुस चुके हैं। यहां सरकार की भी प्रशंसा की जानी चाहिए की इसने किसानों से बातचीत का दरवाजा अभी भी खुला रखा है। इसलिए यह कहा जा सकता हैं कि इस मामले का समाधान निकलने में अधिक समय नहीं लगेगा। यह बिल्कुल सच है कि देश के 50-60 करोड़ किसानो की हालत काफी नाजुक है। लेकिन भाजपा सरकार ने भी किसानों की हालत सुधारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इस सरकार ने पिछले छ: वर्षों में किसानों के कल्याण के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। हां फिर भी किसानों में गरीबी है। यहां यह भी बताना आवश्यक हैं कि केवल 6 प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठाते हैं, बाकी 94 प्रतिशत किसान खुले बाजार में ही अपना माल बेचते हैं। अत: इस आंदोलन में न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ उठाने वाले किसान ही शामिल हैं। यदि हम सभी किसानों की हालत को सुधारना चाहते हैं, तो भारतीय कृषि व्यवस्था में सुधार लाना अति आवश्यक है। यदि यह सरकार भी समर्थन मूल्य पर आश्रित रहती  है, तो पिछड़ापन वैसे ही बरकरार रहेगा। हां कुछ वर्षों तक समर्थन मूल्य को बरकरार रखना चाहिए। लेकिन फिर भी उन किसानों को रोल मॉडल माना जाना चाहिए, जो अपनी उपज, फल-सब्जियों को खुले बाजार में बेचते हैं। अनाज, फल-सब्जी की उपज भारत को विश्वभर में सबसे बड़े खाद्यान्न निर्यातक देशों की श्रेणी  मे लाकर खड़ा कर सकता है। यहां यह कह सकते है की सरकार ने केवल इतना ही गलती की कि किसानों को बिना इस बिल के बारे में समझाए ही इसे सदन में पास करवा लिया गया। सरकार को किसानों को इससे होने वाले लाभों के बारे में बता देना चाहिए था। हालांकि अभी भी समय नहीं गुजरा है।

सुधार विकास का हिस्सा हैं। एपीएमसी, या मंडी प्रणाली ने इसको रेखांकित किया है। मंडियों में बिचौलियों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है और वही इन मंडियों को चलाते है। पंजाब जैसे राज्यों में कुछ मुट्ठीभर लोगों का सभी मंडियों पर कब्जा है जो छोटे और मझोले किसानों से वसूली करते हैं। छोटे किसानों को अपनी स्वेच्छा से फसल बेचने का अधिकार होना ही चाहिए, जो वर्तमान में नहीं है। यहां यह बताना आवश्यक है कि पंजाब के मुख्यमंत्री यह भूल गए की कांग्रेस पार्टी के लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र में इन सुधारों का जिक्र था। मुझे यह बात समझ में नहीं आती कि जब पूरा विश्व बेहतर सामाजिक कल्याण और मुक्त बाजार की ओर बढ़ रहा है तो हमारे तथाकथित बुद्विजीवी राज्य के नियंत्रण पर ही कैसे अड़ सकते हैं। यह कभी भी कारगर नहीं रहा है। छोटे किसानों के दु:ख और पीड़ा को भी समझना पड़ेगा। हम पुन: उसी सिस्टम की ओर नहीं जा सकते, जिसकी वजह से बहुत से किसान आत्महत्या पर मजबूर हो जाते हैं। और इसीलिए कृषि क्षेत्र में निजी निवेश न आने का कारण इस क्षेत्र में मंडियों का दबदबा होना रहा है। संक्षेप में, इन तीन कृषि कानूनों को भारत में कृषि क्षेत्र के उदारीकरण के रूप में वर्णित किया जा सकता है। क्योंकि भारत के सभी क्षेत्रों–शिक्षा, स्वास्थ्य, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस से लेकर सैन्य क्षेत्र तक का उदारीकरण हो चुका हैं, तो कृषि क्षेत्र ही क्यों पिछड़ा रहे? किसानों को भी खुशहाल और सामथ्र्यवान होने का मौका दिया जाना चाहिए।

Deepak Kumar Rath

 दीपक कुमार रथ

 (editor@udayindia.in)

Leave a Reply

Your email address will not be published.