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‘दलित’ समाज का अहम हिस्सा?

‘दलित’ समाज का अहम हिस्सा?

21दलित हमेशा से ही समाज के लिए एक उपेक्षित वर्ग रहा है, लेकिन बदलते परिवेश में दलित राजनीतिक वर्ग के लिए हथियार बनकर उभरे हैं। ‘हिन्दुत्व का मोहिनी मंत्र’ पुस्तक हिन्दुत्ववादी शक्तियों द्वारा दलितों को अपनी तरफ खींचने की मोहक रणनीतियों का विखंडन करते हुए बताती है कि कैसे ये ताकतें दलित जातियों के लोकप्रिय मिथकों, स्मृतियों और किंवदन्तियों को खोजकर उनकी हिन्दुत्ववादी व्याख्या करती है। सबसे दिलचस्प तथ्य इस पुस्तक में ये है कि दलितों के अतीत की हिन्दुत्ववादी पुनव्र्याख्या को दलित समुदाय एक शक्तिशाली पूंजी के रूप में लेते हैं और उसे एक तरफ ऊपरी जातियों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और दूसरी तरफ सवर्ण प्रभुत्व को क्षीण करने के लिए साथ-साथ इस्तेमाल करते हैं। बद्री नारायण की किताब ‘हिन्दुत्व का मोहिनी मंत्र’ इस षड्यंत्र को उद्घाटित करने की कोशिश में लिखी गई है कि बीजेपी के सांस्कृतिक सहयोगियों ने पिछले दस वर्षों में बड़ी ही सूक्ष्मता से दलितों को अपनी ओर खींचने की रणनीति तैयार की है। अपनी इस किताब में उन्होंने तर्कों, साक्ष्यों, व्यक्तिगत तौर पर जुटाई गई जानकारियों और इतिहासकार-समाजशास्त्रियों के हवाले से यह प्रमाणित करना चाहा है कि विश्व हिन्दू परिषद और संघ जैसी संस्थाओं का एकमात्र उद्देश्य दलितों को हिन्दुत्व के वृहत्तर एजेंडे से जोडऩा है, ताकि उन्हें मुसलमानों के खिलाफ एकजुट किया जा सके और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की स्थिति में दलितों को सवर्ण हिन्दुओं की रक्षा के लिए पेश किया जा सके।

उन्होंने खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में हिन्दूवादी शक्तियों को इस ध्रुवीकरण और गोलबंदी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने संघ और विश्व हिन्दू परिषद के अलावा मुख्यत: दो राजनीतिक पार्टियों – बसपा और भाजपा की दलित विचारधारा का जिक्र किया है। वे लिखते हैं – ‘भाजपा ने दलितों के लिए वंचित शब्द का इस्तेमाल करना चाहा है। वंचित एक निरापद शब्द है, लेकिन प्रजातांत्रिक राजनीति के दबाव में दलित शब्द के प्रयोग से भी परहेज नहीं किया है। वंचित इसलिए कि वो लोग कभी हिन्दू धर्म और संस्कृति के गौरवशाली रक्षक और संरक्षक हुआ करते थे, लेकिन समाज में मुस्लिमों की घुसपैठ के बाद वंचित हो गए। बीजेपी का ये भी कहना है कि पिछले पैंतालीस वर्षों में हुए दंगों में हिन्दुओं के लिए लडऩे वाले और मरने वाले अधिकांश लोग आज की दलित और पिछड़ी जातियों से संबंधित थे। इसका अर्थ यह हुआ कि हिन्दुओं की रक्षा के लिए मुसलमानों से लडऩे वाले वही लोग थे।

अपनी बात को वजनदार बनाने के लिए लेखक ने हिन्दू समाज में मुसलमानों के लिए प्रचलित कहावतों, कविताओं को उद्धरित किया है। जैसे ‘दलित सेना की खोज’ अध्याय के शुरू में एक कहावत को उद्धरित किया गया है – ‘सुअर के बार और तुरुक के दाढ़ी एक जैसा होला’। ये कहावतें और तमाम कविताएं सिर्फ इस बात को प्रमाणित करने के लिए लिखी गई हैं कि संघ और विहिप लगातार इन कहावतों के माध्यम से अपने मतलब का विस्तार दे रहे हैं। लेखक ने भाजपा नेताओं के भाषण पेश किए हैं कि कैसे जाति विशेष को भुनाने के लिए उनके सामने नायकों का गुणगान किया जा रहा है।

किताब के आखिरी हिस्से में लेखक ने लिखा है – ‘ग्रामीण स्तर पर सामाजिक यथार्थ का अध्ययन करने वाले समाजशास्त्री के रूप में इस तथ्य को उद्घाटित करना मेरा कर्तव्य है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के कई अंचलों में लोक-संस्कृति न केवल मानवीय भावनाओं से ओत-प्रोत है, बल्कि उसमें सांप्रदायिकता का भी कुछ रंग है’। आगे वे कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि गांव के लोग सांप्रदायिक हैं, बल्कि सभी समुदायिक सद्भाव के साथ रहते हैं। इस सद्भाव के नीचे का सच ये भी है कि भारत में हिन्दू-मुसलमान एक साथ रहते हुए भी दो भिन्न संस्कृतियों के वाहक के रूप में कभी भी आमने-सामने आ जाते हैं। भारतीय मानस में सदियों की गुलामी की कुंठा बहुत गहरी है। इस कुंठा को पिछले बीस वर्षों में वैश्विक आतंकवाद, देश पर हुए तमाम आतंकी हमलों, पाकिस्तान के घोर इस्लामीकरण और कश्मीर समस्या ने निरंतर बल प्रदान किया है।

 प्रीति ठाकुर

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