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जैनेंद्र कुमार: व्यक्ति की गुम होती पहचान को उकेरने वाले उपन्यासकार

प्रेमचंदोत्तर उपन्यासकारों में जैनेंद्र कुमार (2 जनवरी 1905-24 दिसंबर 1988) का विशिष्ट स्थान है। जैनेंद्र कुमार के उपन्यासों में घटनाओं की संघटनात्मकता पर बहुत कम बल दिया गया मिलता है। चरित्रों की प्रतिक्रियात्मक संभावनाओं के निर्देशक-सूत्र ही मनोविज्ञान और दर्शन का आश्रय लेकर विकास को प्राप्त होते हैं। जैनेन्द्र अपने पथ के अनूठे अन्वेषक थे। उन्होंने प्रेमचन्द के सामाजिक यथार्थ के मार्ग को नहीं अपनाया, जो अपने समय का राजमार्ग था, लेकिन वे प्रेमचन्द के विलोम नहीं थे, जैसा कि बहुत से समीक्षक सिद्ध करते रहे हैं; वे प्रेमचन्द के पूरक थे। प्रेमचन्द और जैनेन्द्र को साथ-साथ रखकर ही जीवन और इतिहास को उसकी समग्रता के साथ समझा जा सकता है।

जैनेन्द्र कुमार ने हिन्दी उपन्यास को प्रेमचंद-युग में ही नयी दिशा देने का सफल प्रयास किया। उन्होंने हिन्दी उपन्यास साहित्य को नई दिशा प्रदान की। उपन्यास को सामाजिक यथार्थ ही नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक यथार्थ के क्षेत्र में भी प्रवेश करने की राह सुझाई। उन्होंने व्यक्ति की गुम होती पहचान को उभारकर सामने रखा। उनके उपन्यासों में अनमेल विवाह या दहेज-प्रथा जैसी समस्याएं नहीं हैं, बल्कि विवाह स्वयं में एक समस्या है। उनके उपन्यासों में मनुष्य-जीवन के अनेक नवीन पहलु उद्धृत हुए हैं।

जैनेन्द्र कुमार हिंदी उपन्यास के इतिहास में मनो-विश्लेषणात्मक परंपरा के प्रवर्तक के रूप में मान्य हैं। जैनेन्द्र अपने पात्रों की सामान्य-गति में सूक्ष्म संकेतों की निहिति की खोज करके उन्हें बड़े कौशल से प्रस्तुत करते हैं। उनके पात्रों की चारित्रिक विशेषताएं इसी कारण से संयुक्त होकर उभरती हैं। जैनेन्द्र, गांधी जी के जीवन दर्शन से प्रभावित थे, परन्तु कहीं भी उन्होंने ऐसा कुछ नहीं लिखा जो उनका स्वयं चिंतित न हो। जैनेन्द्र का सबसे बड़ा योगदान हिन्दी गद्य के निर्माण में था। भाषा के स्तर पर जैनेन्द्र द्वारा की गई तोड़-फोड़़ ने हिन्दी को तराशने का अभूतपूर्व काम किया। जैनेन्द्र का गद्य न होता तो अज्ञेय का गद्य संभव न होता। हिन्दी कहानी ने प्रयोगशीलता का पहला पाठ जैनेन्द्र से ही सीखा। जैनेन्द्र ने हिन्दी को एक पारदर्शी भाषा और भंगिमा दी, एक नया तेवर दिया। जैनेंद्र के प्राय: सभी उपन्यासों में दार्शनिक और आध्यात्मिक तत्वों के समावेश से दुरूहता आई है, परंतु ये सारे तत्व जहां-जहां भी उपन्यासों में समाविष्ट हुए हैं, वहां वे पात्रों के अंतर का सृजन प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि जैनेंद्र के पात्र बाह्य वातावरण और परिस्थितियों से अप्रभावित लगते हैं और अपनी अंतर्मुखी गतियों से संचालित।

उनकी प्रतिक्रियाएं और व्यवहार भी प्राय: इन्हीं गतियों के अनुरूप होते हैं। इसी का एक परिणाम यह भी हुआ है कि जैनेंद्र के उपन्यासों में चरित्रों की भरमार नहीं दिखाई देती। पात्रों की अल्पसंख्या के कारण भी जैनेंद्र के उपन्यासों में वैयक्तिक तत्वों की प्रधानता रही है। उनके सभी उपन्यासों में प्रमुख पुरुष पात्र सशक्त क्रांति में आस्था रखते हैं। बाह्य स्वभाव, रुचि और व्यवहार में एक प्रकार की कोमलता और भीरुता की भावना लिए होकर भी ये अपने अंतर में महान विध्वंसक होते हैं। उनका यह विध्वंसकारी व्यक्तित्व नारी की प्रेम-विषयक अस्वीकृतियों की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप निर्मित होता है। इसी कारण जब वे किसी नारी का थोड़ा भी आश्रय, सहानुभूति या प्रेम पाते हैं, तब टूटकर गिर पड़ते हैं और तभी उनका बाह्य स्वभाव कोमल बन जाता है। जैनेंद्र के नारी पात्र प्राय: उपन्यास में प्रधानता लिए हुए होते हैं।

उपन्यासकार ने अपने नारी पात्रों के चरित्र-चित्रण में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय दिया है। स्त्री के विविध रूपों, उसकी क्षमताओं और प्रतिक्रियाओं का विश्वसनीय अंकन जैनेंद्र कर सके हैं। ‘सुनीता’, ‘त्यागपत्र’ तथा ‘सुखदा’ आदि उपन्यासों में ऐसे अनेक अवसर आए हैं, जब उनके नारी चरित्र भीषण मानसिक संघर्ष की स्थिति से गुजरी हैं। नारी और पुरुष की अपूर्णता तथा अंतर्निर्भरता की भावना इस संघर्ष का मूल आधार है। वह अपने प्रति पुरुष के आकर्षण को समझती है, समर्पण के लिए प्रस्तुत रहती है और पूरक भावना की इस क्षमता से आह्लादित होती है, परंतु कभी-कभी जब वह पुरुष में इस आकर्षण मोह का अभाव देखती है, तब क्षुब्ध होती है, व्यथित होती है। इसी प्रकार से जब पुरुष से कठोरता की अपेक्षा के समय विनम्रता पाती है, तब यह भी उसे असह्य हो जाता है।

नारी, उनके उपन्यासों में प्रधान चरित्र है। उन्होंने अपने उपन्यासों में सामाजिक मर्यादाओं के बीच अपनी पहचान बनाने वाले नारी पात्रों की सृष्टि की है, जो सामाजिक दबावों और व्यक्तिगत आग्रहों के चलते द्वन्द्वग्रस्त होकर आत्म-यातना के शिकार हो गये हैं। वे समाज को न तोड़कर, स्वयं टूटते हैं। इनके उपन्यासों में आदमी टूटता है समाज बचता है। मेरा मानना है कि अभी के समय में मनुष्य को थोड़ा और सामाजिक होना है, समाज को थोड़ा और मानवीय होना है, तभी देश की दशा और दिशा संतुलित रह सकती है। कहा जा सकता है कि उनके उपन्यास, विषय और शिल्प दोनों दृष्टियों से संवेदनशील वयस्क पाठकों के लिए लिखे गए उपन्यास हैं।

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