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ना मां… ना मानुष…

ना मां… ना मानुष…

बंगाल एक बार फिर सुर्खियों में हैं। दो बार से बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आज पूरे देश भर मे चर्चा की विषय  बनी हुई है।  2016 में हुए विधानसभा चुनाव में दीदी ने विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था। लेकिन इस बार 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने ममता दीदी को लगभग जमीन पर ला दिया है। पहले तो ममता बनर्जी के पार्टी  कार्यकर्ता ही भाजपा से जुड़ रहे थे, अब तो उनकी सरकार में रहे मंत्री भी भाजपा से जुड़ रहे है, जोकि उनकी नींद उड़ाने के लिए काफी है। अब तो एक सुनामी की तरह तृणमूल कांग्रेस के नेता भाजपा से जुड़े रहे है। यह तो निश्चय ही उनकी पार्टी को आने वाले चुनाव में गंभीर चोट पहुंचाएगा। अब तो हालत यह हो चुकी है की ममता बनर्जी को यह नहीं समझ आ रहा कि वो अपनी पार्टी के काडर को बचायें  या अपने मंत्रियों, को जो भाजपा से आये दिन जुड़ते जा रहे हैं। अब तो वह भाजपा के कार्यकर्ता बनाने के अभियान को रोकने पर उतर आयी हैं। और यह भी बंगाल में बढती हिंसा का एक कारण है। इसके बावजूद भी हजारों तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने भाजपा की सदस्यता ली है। यही कारण है की अब ऐसा माने जाने लगा है कि बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा काफी अच्छा करेगी। तृणमूल के जो विधायक और नेता पार्टी छोड़कर जा रहे है, अब तृणमूल उन्हें गद्दार कह रही है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का यही मानना है कि तृणमूल वही काट रही है, जो इसने बोया था।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि भाजपा को घेरने के लिए ममता बनर्जी भाजपा नेताओं को अब बाहरी कह रही है। भाजपा रामकृष्ण परमहंस, शारदा देवी और विवेकानंद के सिद्धांतों और विचारधारा को मानने वाली पार्टी है। और तो और भाजपा (पूर्व में जनसंघ) की स्थापना करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल से थे। तो आखिर किस तर्क के आधार पर ममता बनर्जी भाजपा को बाहरी कह सकती है? यहां तक की प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी स्वयं रवीन्द्रनाथ टैगोर को अपना गुरु मानते है। सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि एक राज्य की मुख्यमंत्री भारत के ही लोगो को बाहरी कैसे कह सकती है? यह न केवल बंगाल की संस्कृति के विपरीत है, बल्कि यह भारत के संविधान का अपमान करने जैसा है। ऐसा तब ही होता है, जब राजनीतिक स्वार्थ देशहित से पहले आता है। बंगाल के लोग काली और दुर्गा की पूजा करते है। देवी की पूजा का मतलब आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करने के रूप में देखा जाता है। लेकिन यहां  ममता बनर्जी तो  बिलकुल ही विपरीत कार्य कर रही हैं। वह बंगाल में बढ़ रही राजनीतिक हिंसा और हत्या पर बिलकुल ही चुप्पी साधे बैठी हैं। उनके शासनकाल में अभी तक हजारों राजनीतिक हत्याएं हो चुकी है। ऐसा कहा जा सकता है की उनका शासनकाल वामपंथियों के तीन दशक के शासनकाल से भी बुरा रहा है। बंगाल में मानवता तार-तार हो चुकी है।  दीदी ने बंगाल की संस्कृति, मां, माटी और मानुष सभी को हानि पहुंचाई है। जब ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री बनी, बंगाल बेरोजगारी, कम विकास दर और कम होती आमदनी का सामना कर रहा था। लेकिन दीदी ने अपने इस एक दशक के कार्यकाल में राज्य में उद्योग, कृषि और संरचना विकास के विपरीत ही माहौल बना दिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने अभी हाल ही में मिदनापुर में एक रैली में भाग लिया, जहां उन्होंने ममता बनर्जी पर हमला करते हुए कहा कि वह बंगाल में दीदी की सरकार को उखाड़ फेकने के लिए आये हैं। यहां  यह चर्चा करना आवश्यक है कि भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है, जिसके सहारे भाजपा बंगाल में आसानी से प्रवेश कर सकती है। हालांकि भाजपा ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से ही अपनी मजबूत पकड़ बना चुकी है। यहां यह भी चर्चा करना आवश्यक है कि आज ममता बनर्जी का एक ही एजेंडा है और वह है बंगाल की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहना। आज सभी को पता है ममता बनर्जी खुद को कानून से ऊपर मानती है, जो राजनीति में गैर-जिम्मेदाराना रवैये को दर्शाता है। और इसका यह मतलब भी नहीं की कोई राजनीतिक स्वार्थ और राजनीतिक विरोधियों से निपटने के लिए समाज-विरोधी ताकतों का समर्थन करे। इस पृष्ठभूमि में प्रश्न यह उठता है कि क्या ममता बनर्जी की वापसी हो सकती है? प्रश्न का उत्तर ढूंढना काफी कठिन है, लेकिन सच्चाई यह है कि उनका आगे का रास्ता काफी दुर्गम है।

 

Deepak Kumar Rath

 दीपक कुमार रथ

(editor@udayindia.in)

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