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आखिर हम सफल क्यों नहीं हो पाते हैं?

आखिर हम सफल क्यों नहीं हो पाते हैं?

गुरुकुल की इस बार की परीक्षा में भी वह शिष्य सफल नहीं हो पाया था। क्रोधवश गुरु ने उस शिष्य को आश्रम त्याग कर अपने घर जाने का आदेश दिया, ‘पढ़ाई-लिखाई तुम्हारे वश की नहीं है। अच्छा होगा यदि तुम अपने घर वापस जाकर अपने माता-पिता की उनके घरेलू कार्यों में सहायता करो। यहां पर तुम्हारा बहुमूल्य समय यूं ही बर्वाद होता देखकर मुझे दु:ख होता है।’

गुरुकुल से प्रस्थान करते समय सहपाठियों के साथ गुरु भी बिना रोये नहीं रह पाए। चलते-चलते दोपहर का सूरज काफी गर्म हो चुका था और शिष्य का प्यास के मारे बुरा हाल हो रहा था। थक-हार कर वह एक कुंए के पास आकर बैठ गया। महिलायें कुंए से पानी खींच कर अपने घड़े भर रही थी। अकस्मात शिष्य की नजर कुंए की जगत पर गयी। बाल्टी में बंधी रस्सी की रगड़ से कुंए के जगत पर गहरे निशान और गड्ढे पड़ गये थे।

दुखी बालक के मन में एक विचार कौंधा, ‘लगातार रगड़ से  यदि इस पाषाण पर निशान पड़ सकता है तो क्या मैं इतना जड़बुद्धि हूं कि कठिन मेहनत करके सफल नहीं हो सकता?’ उसी क्षण वह वापस गुरुकुल पहुंचा और अपने गुरु के चरणों में गिर पड़ा, ‘आप मुझे एक अंतिम अवसर दे दीजिये। मैं इस बार अवश्य आपको सफल होकर दिखाऊंगा। असफल होने पर मैं खुद गुरुकुल का त्याग कर वापस लौट जाऊंगा।’

गुरु द्रवित हो गये और उन्होंने अपने शिष्य की प्रार्थना स्वीकार कर ली। शिष्य की आंखें खुल चुकी थीं और उसे जीवन में सफलता का दिव्यज्ञान प्राप्त हो चुका था। कठोर संकल्प और कठिन मेहनत के बल पर इस बार शिष्य गुरुकुल की परीक्षा में सफल हो गया था। अपने शिष्य को मिली सफलता को गहराई से महसूस कर गुरु की आंखें भर आयीं।

क्या आप जानते हैं कि यह अन्तेवासी और कोई नहीं बल्कि संस्कृत भाषा के सबसे बड़े व्याकरणकार पाणिनि थे? संस्कृत व्याकरण पर रचित उनकी पुस्तक अष्टाध्यायी आज भी विश्व की सर्वोत्तम कृतियों में शुमार होती है।

पाणिनि महज एक व्याकरणाचार्य का नाम नहीं है, बल्कि यह नाम है कठोर संकल्प का, यह नाम है कठिन मेहनत का और यह नाम है अपने सपनों को साकार करने के लिए दृढ प्रतिज्ञा का। सच पूछिये तो हम सभी के अन्दर भी एक पाणिनि बैठा होता है जिसे हम दुर्भाग्यवश देख ही नहीं पाते हैं। पाणिनि को देख नहीं पाने की हमारी अयोग्यता ही हमारी असफलता का कारण होती है।

इस दुनिया में हर व्यक्ति सफल होना चाहता है? किन्तु सफलता का मार्ग आसान नहीं होता है। इसके लिए कठिन मेहनत के साथ कठोर संकल्प की दरकार होती है।

पहले खुद से प्रश्न पूछें कि आप कौन हैं

हम इसीलिए भी असफल हो जाते हैं कि हम खुद को ताउम्र पहचान ही नहीं पाते हैं। स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर, क्रिकेट लीजेंड सचिन तेंदुलकर सरीखें व्यक्तित्व ने खुद को बड़ी जल्दी पहचान लिया और फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। हम संपूर्ण जीवन भ्रम में गुजारते हैं- क्या करें, क्या नहीं करें, क्या अच्छा है, क्या खराब है और न जाने क्या-क्या सोचते रहते हैं और इसी कन्फ्यूजन में अपना कीमती वक्त जाया कर लेते हैं।

इस बात को हमेशा अपने जेहन में रखें कि इस दुनिया में हर शख्स अपने आप में अद्भूत है जिसकी बराबरी कोई दूसरा नहीं कर सकता है। लिहाजा अपने टैलेंट की पहचान करें और खुद में यह ढूंढ़ लें कि आप में क्या अद्भुत है और आपको क्या करना अच्छा लगता है। फिर उसमें सफल होने के लिए संकल्प के साथ लग जाएं।

परफेक्ट बनने की कोशिश नहीं करें

गौतम बुद्ध का मानना था, ‘हम जीवन में दो घातक गलतियां करते हैं और जिसके कारण सफल नहीं हो पाते हैं। एक, पूरा न करना, दूसरा शुरू न करना।  अक्सर इन दोनों के पीछे एक ही वजह होती है – परिपूर्ण बनने की चाहत।’ इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति किसी भी विधा में कभी भी पूर्ण नहीं होता है। हर व्यक्ति जीवन के अंतिम सांस तक सीखता ही रहता है। इसलिए परफेक्ट होने की चाहत में सपने देखना बंद नहीं करें, थक-हार कर बैठ नहीं जाएं। इंसान नियमित रूप से अभ्यास करने से ही पूर्ण बनता है।

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सही समय के आने की प्रतीक्षा नहीं करते रहें 

किसी कार्य को शुरू करने के लिए अच्छे समय के आने का इंतजार करना मानवीय फितरत है। जबकि सच्चाई यही है कि जीवन में इस तरह का सही समय कभी नहीं आता है।  महान हिंदी साहित्यकार जयशंकर प्रसाद का मानना था कि जीवन में कोई बड़ा कार्य करने के पूर्व दुर्बल विचार आते हैं। आत्मविश्वास को दृढ रखते हुए जो कार्य किया जाता है उससे अधिक सही समय कोई नहीं होता है।

हार नहीं मानें, निरंतर संघर्ष करते रहें

जीवन में सफलता का जश्न मनाना स्वाभाविक प्रवृत्ति है और इसके लिए किसी स्टिमुलस की जरूरत नहीं होती है। किन्तु अससफलता हमें अन्दर से तोड़ देती है और हमारे सपनों का खुबसूरत संसार किरचों की भांति टूट कर बिखर जाता है। अपने उद्देश्य में फेल होने की स्थिति में केवल चार बातों को कभी नहीं भूलें –

  • असफलता का अर्थ यह कदापि नहीं होता है कि आप काबिल नहीं हैं और आपमें टैलेंट का अभाव है।
  • असफलता सफल होने की कोशिश में एक अस्थायी किन्तु अनिवार्य पड़ाव है। इसको पार किये बिना सपनों को साकार करना संभव नहीं है।
  • असफलता से बड़ा कोई शिक्षक नहीं होता है। यह हमारे लिए सही रोडमैप बताता है और हमारी कमियों को दर्शाता है।
  • असफलताओं की पीड़ा और इसके चुभन को झेलना सीखें। घबराएं नहीं, हिम्मती बनें और फिर से चलने के लिए उठकर खड़े हो जाएं। गिरने पर उठने से इनकार कर देने से बड़ी जीवन में कोई हार नहीं है।

लिहाजा जब कभी आप अपने मकसद में असफल हो जाएं तो हताश होकर डिप्रेशन में जाने की बजाय अपनी कमियों को ईमानदारी से ढूंढें और फिर उन्हें दूर करने में जी-जान से लग जाएं।

कठिन मेहनत का कोई विकल्प नहीं

मौजूदा दौर में प्राय: हर व्यक्ति इंस्टेंट सफलता की चाह रखता है।  इसे ‘क्विक-फिक्स सक्सेस एस्पिरेशन’ भी कहते हैं। किन्तु हम इस तरह के सपनों में छुपी जीवन की एक बहुत कड़वी सच्चाई भूल जाते हैं कि जीवन में सफलता के लिए कठिन मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता है। जितने बड़े हमारे सपने होते है उसे साकार करने के लिए मेहनत भी उतनी ही कठिन करनी होती है।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

(लेखक प्राचार्य, जवाहर नवोदय विद्यालय, मामित, मिजोरम, हैं)

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