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दुर्लभ बीमारियां और संवेदनशीलता

दुर्लभ बीमारियां और संवेदनशीलता

आज जब सारी दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है, तो अभी तक सही से खोज नहीं हो पाई है कि यह बीमारी कहां से और कैसे शुरू हुई। 26 दिसम्बर 2019 को चीन के वुहान प्रांत में कोरोना वायरस होने की जानकारी मिली  थी और देखते ही देखते कुछ महीनों के अंदर यह सारी दुनिया में फैल गया। पिछले एक साल के अथक प्रयासों से कुछ दवा कम्पनियों ने कोरोना वायरस पर विजय पाने का एलान किया है, लेकिन उन की दवा यानी इंजेक्शन कितना कामयाब होगा, और एक बार लगा इंजेक्शन कितने समय तक कारगर रहेगा, यह तो समय ही बताएगा। हो सकता है कि दवा कम्पनियों के दावे गलत साबित हो, और कोरोना वायरस भी उन बीमारियों की सूची में शामिल हो जाएं, जिन का सही इलाज अभी भी नहीं ढूंढा जा सका है। ऐसी कई बीमारियां है, जिन का इलाज तो क्या कारण भी नहीं खोजे जा सके हैं। चूंकि याद बहुत बड़े मास लेवल पर फैलने वाली बीमारी थी इसलिए दुनिया की सभी सरकारें व दावा कंपनिया तुरंत सक्रिय हो गईं, किंतु खासकर ऐसी बीमारियां जो दुर्लभ श्रेणी में आती हैं और बहुत कम लोगों को होती है, उनका इलाज खोजने के प्रति संवेदनशीलता का अभाव पाया जाता है। इसका प्रमुख कारण यह होता है कि दुर्लभ बीमारी होने के कारण दबाव सरकारों पर नहीं होता है और प्राइवेट कंपनियों को लाभ की उम्मीद नहीं दिखती है। और ऐसी बीमारियों से ग्रसित मरीज अपने आपको नितांत असहाय पाते है।

याद आता है जून 2018, जब अभिनेता इरफान खान ने खुद एलान किया था कि वह एक दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है, जिस का इलाज भी दुर्लभ है, या नहीं ही है। कितने समय तक पूरा देश उस समय सकते और सदमे में आ गया था जब इरफान खान ने घोषणा की। वह अपने इलाज के लिए लन्दन भी गए थे, लेकिन वहां भी सफलता नहीं मिली। दुर्लभतम बीमारी के सफल इलाज उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण एक बेहतरीन इंसान व अभिनेता असमय कालकललित हो गया। उन्हें न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर नामक बीमारी थी। बीमारी के नाम में जरूर न्यूरो लिखा हुआ है, पर इस बीमारी का न्यूरो यानी तंत्रिका तन्त्र या दिमाग से कोई सम्बंध नहीं है। यह दुर्लभ बीमारी कुछ ही लोगों को होती है, किसी को भी हो सकती हैं, इसका कोई खास कारण भी नहीं होता। चिकित्सा जगत अभी तक इस बीमारी के कारणों को लेकर किसी भी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया हैं।

कोरोना वायरस क्योंकि पूरी दुनिया में छूत की बीमारी की तरह फैल गया, इसलिए बड़ी-बड़ी दवा कम्पनियों को भविष्य में मुनाफे का सौदा लगा। वे सब वैक्सीन यानी टीका बनाने की खोज में जुट गईं, लेकिन न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर जैसी दुर्लभ बीमारियां होती भी कम हैं, उस की दवा बनाने का काम मुनाफे का सौदा नहीं हो सकता, इसलिए इसलिए इस पर शोध ही नहीं हुआ है। न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर होने के अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन ये आनुवांशिक रूप से भी होती है। माना जाता है कि जिनके परिवार में इस तरह के मामले पहले रह चुके हों उन्हें इस रोग की आशंका ज्यादा होती है। अभी तो इस रोग के कारणों के आसपास ही खोज-भ्रमण हो रहा है। अगर यह बीमारी इरफान खान को नहीं होती तो शायद आमजनों को इस बीमारी का पता ही नहीं चल पाता।

इसी तरह की एक और दुर्लभ बीमारी फिल्म ‘पा’ में प्रकाश में आई थी। जिस का नाम था -‘प्रोजेरिया’, फिल्म में अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे बच्चे का किरदार निभाया था जो शरीर से काफी बड़ा दिखता है और ऐसे बच्चे में कम उम्र में भी बुढ़ापे के लक्षण नजर आते है, लेकिन उस का सिर काफी बड़ा होता है। इस फिल्म के रिलीज होने के बाद कुछ ऐसे बच्चे प्रकाश में आए थे जिन्हें यह दुर्लभ बीमारी थी, चूंकि दुनिया में यह बीमारी भी बहुत ही कम लोगों को होती है, तो इसका इलाज खोजने की भी किसी देश की सरकार या किसी ख्यातिप्राप्त दवा कम्पनी ने जहमत नहीं उठाई। इसी तरह ‘तारे जमीं पर’ फिल्म में भी ‘डिस्लेक्सिया’ नामक बीमारी का चित्रण था। ये सभी बीमारियां बहुत ही दुर्लभ हैं जिनका इलाज या तो है नहीं या फिर कम हैं।

सवाल यह है कि क्या भारत में दुर्लभ बीमारियों को लेकर कोई स्पष्ट नीति है? यदि हां तो उसमें, किन-किन बीमारियों को सम्मिलित किया गया है। भारत सरकार की दुर्लभ बीमारी नीति में लिखा है कि दुर्लभ बीमारियां क्योंकि बहुत कम लोगों को होती हैं, इसलिए आमतौर पर ऐसी बीमारियों पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छह से आठ प्रतिशत ही रिसर्च हो पाती है। इन दुर्लभ बीमारियों में 80 प्रतिशत बीमारियां तो जेनेटिक यानी आनुवाशिंक है, और अगर होती हैं तो जो बचपन में ही हो जाती हैं। इस के अलावा कुछ दुर्लभ तरह के कैंसर हैं, कुछ इन्फेक्शियस ट्रोपिकल बीमारियां है और डीजेनेरेटिव बीमारियां हैं।

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भारत में अब तक 450 के करीब दुर्लभ बीमारियों को रिकॉर्ड किया जा चुका है। जबकि पूरे विश्व में 6000 से 8000 दुर्लभ बीमारियों को रिकॉर्ड किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुर्लभ बीमारियों का अर्थ उन बीमारियों से है जो प्रति हजार में 1 व्यक्ति को होती हैं। हालांकि हरेक देश की दुर्लभ बीमारियों की परिभाषा अलग-अलग है। अमेरिका में यह प्रति दस हजार की जनसंख्या पर 6.4 व्यक्ति है, तो यूरोपियन यूनियन में यह अनुपात प्रति दस हजार व्यक्तियों में 5 व्यक्ति है। जापान में दुर्लभ बीमारियों की श्रेणी में उन बीमारियों को रखा गया है जो कुल जनसंख्या का 0.4 प्रतिशत लोगों को होती है। भारत में आजादी के बाद दशकों तक इस क्षेत्र में कार्य ना के बराबर हुआ है। दुखद यह भी है कि दुर्लभ बीमारियों के जनसांख्यकीय आंकड़े न होने के कारण उनसे होने वाले नुकसान के आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हैं।

भारत में अभी तक जिन बीमारियों को दुर्लभ बीमारियों को शामिल किया गया है, उनमे से मुख्य हैं हेमोफिलिया, थ्लेसीमिया, सीक्ल सेल अमीनिया और इम्युन की कमी यानि इम्युनो डेफीसेंशी, जो आमतौर पर बच्चों में होती है। इस के अलावा ऑटोइम्युन, लाइसोसोमल स्टोरेज डिसआर्डर – जैसे पोम्पे बीमारी, हिरस्स्प्रंग बीमारी, गोचर्स बीमारी, साईटिक फाइब्रोसिस,  हेमान्गियोम्स और कुछ प्रकार के मस्कुलर स्टोरिफिस। भारत में इन दुर्लभ बीमारियों का न उचित परीक्षण हो पाता है और न ही डायग्नोसिस किया जा सकता है। ऐसे में जब ऐसी बीमारियां होती हैं तो कई बार तो उन लोगों के परिजनों को पता ही नहीं चल पाता कि कुछ रोग भी है, और यदि कोई बीमारी है तो क्या? और यदि खुदा न खास्ता भूले भटके बीमारी का पता भी चल जाए तो उसका इलाज कहां से हो?

दरअसल बीमारियों का यह गणित बहुत ही सरल है। जिन बीमारियों में बढऩे की आशंका अधिक होती है, उन पर शोध भी बहुत होते हैं और उनके लिए इलाज भी जल्द मिल जाता है, उन पर सतत शोध के लिए न केवल सरकारें बल्कि, विश्व स्वास्थ्य संगठन भी ध्यान नहीं देता है। चूंकि इनकी संख्या सीमित होती है तो ऐसे में मेडिकल कंपनियों के लिए भी फायदेमंद सौदा यह नहीं होता कि वह उन पर शोध करें, और जब शोध नहीं होते तो उनका इलाज कहां से होगा? ऐसे में ये बीमारियां इलाज के स्तर पर भी दुर्लभ हो जाती हैं। हालिया रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में दुर्लभ बीमारियों का इलाज पाने के लिए 7.6 साल तो वहीं यूनाइटेड किंगडम में सही बीमारी का पता लगने में ही 5.6 साल का समय लग जाता है, और जब तक यह पता लग पाता है कि आखिर बीमारी क्या है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है और मरीज के दुबारा स्वस्थ की सम्भावना क्षीण हो चुकी होती है।

इस विषय पर पर्याप्त मंथन की आवश्यकता है कि क्या दुर्लभ बीमारियों की चिकित्सा के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन, विभिन्न सरकारों,  मेडिकल-फार्मा कम्पनियों, अस्पतालों, अनुसंधान इकाइयां आदि की कोई मानवीय जिम्मेदारी नहीं बनती, क्या इंसान की कीमत सिर्फ व्यापार के नफा नुक्सान पर निर्भर है।  उपरोक्त सभी इकाईयां इन दुर्लभ बीमारियों के प्रति असंवेदनशील क्यों हैं? क्या आर्थिक लाभ ही इनका एकमात्र लक्ष्य या कसौटी है? यदि आर्थिक हितों की पूर्ति नहीं होगी तो इन दुर्लभ बीमारियों का इलाज नहीं खोजा जाएगा? लम्बे समय तक दुनिया भर की जिम्मेदार इकाईयां दुर्लभ बीमारियों के इलाज की अनदेखी करती रही हैं, लेकिन अब अमेरिका और ब्रिटेन के बाद भारत की मौजूदा मोदी सरकार ने भी दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए कई समितियों का गठन किया है, क्योंकि अगर भारत की भारत फार्मा कम्पनी कोरोना वायरस का टीका बनाने में कामयाब हो सकती है तो दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए भी भारत दुनिया का सिरमौर देश बन सकता है।

 

अरविन्द सिंह

(लेखक मंथन पत्रिका के प्रबंध सम्पादक हैं। ये लेखक के अपने निजी विचार हैं।)

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