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मुस्लिम मोह ले डूबा ममता को ममता राज का अंत, बंगाल में खिलेगा कमल

मुस्लिम मोह ले डूबा ममता को  ममता राज का अंत, बंगाल में खिलेगा कमल

ममता बनर्जी का नाम लेते ही एक राजनीतिक गिरोह की तस्वीर लोगों के मन में उतरने लगती है। अपने दम पर हुंकार भरते हुये मिडिल क्लास परिवार से आयी ममता बनर्जी राजनीति की सीढिय़ां चढ़ते हुये बंगाल जैसे बड़े और जागरूक प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर पहुंच गयी। उन्होंने राजनीति की शुरूआत बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी की महिला शाखा से शुरू की, बाद में बंगाल प्रदेश युवक कांग्रेस की कमान उन्होने संभाली। 1955 में जन्मी ममता मात्र 30 वर्ष की उम्र में 1985 में लोकसभा पहुंच गयी। उसके बाद वे सात बार लोकसभा का चुनाव जीतीं। नरसिम्हा राव के समय में केन्द्रीय मंत्री रही बाद में कांग्रेस पार्टी छोड़कर 1997 में ममता जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और लोकसभा में चुन कर पहुंची, वे रेलवे मंत्रालय में भी मंत्री रही।

बंगाल की ये नेत्री जो कभी बंगाली जनमानस के मन में बसती थी, अब कम्यूनिष्टों की तरह दादागिरी की राजनीति करनें लगेगी ऐसा कभी किसी ने सोचा तक नहीं होगा। आज वे माफिया बन कर गुंडागर्दी एवं आतंक की राजनीति के लिये आरोपित हो रही हैं। वे भूल गयी कि ऐसा तो कम्यूनिष्ट करते रहे और फिर विकल्प मिलते ही कम्यूनिष्टों को लोगों ने उखाड़ फेंका। अब वही हाल फिर बंगाल का हो गया। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस का सफाया होना निश्चित दिखाई दे रहा है। घबरा कर या नर्वस होकर शायद एैसा कर रही हैं। देश में आतंकवादी राजनीति का नया अध्याय शुरू हो गया है।

हताशा और निराशा से भरी ममता को अब अगले 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में हारने का भय सताने लगा है सत्ता जाने का भय राजनीति में क्या क्या करा सकता है, इसका – उदाहरण इंदिरा गांधी द्वारा 1974 में लगायी गयी इमरजेंसी से समझा जा सकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी को रायबरेली की सीट पर जीते चुनाव को अवैध घोषित कर दिया था। घबरा कर इन्द्रा जी ने इमरजेंसी लगायी। उन्होंने देश के बड़े छोटे सभी विरोधी नेता जेल में डाल दिये थेे। जैसे ही 1977 में आम चुनाव हुये, जनता ने इंदिरा गंाधी की कांग्रेस पार्टी को सड़क पर कर दिया। आज बंगाल की स्थिति उससे कहीं बदतर है। भय से भरी हुयी ममता शक्ति के नशे में चूर होकर सभ्यता और कानून की सभी सीमायें पार कर गयी है। बंगाल के लोग तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को चन्दा और वसूली देते-देते तंग आ गये है। उन्हें किसी विकल्प की तलाश थी और भाजपा के रूप में विकल्प मिलते ही पिछले साल हुये लोकसभा के चुनाव में लोगों ने ये बता दिया। बंगाल में 18 लोकसभा सीट जीत कर भाजपा ने लगभग आधे बंगाल पर कब्जा कर लिया। ये भी तब जब ममता का हंटर चल रहा था। भाजपा समर्थकों को सताया गया उन्हें जगह-जगह पिटवाया गया। पर ममता के कोई कारनामें काम नहीं आये।

ममता दीदी का बंगाल के 30 प्रतिशत मुसलमानों पर पूरा भरोसा इस चुनाव में टूटने वाला है। मुसलमानों के गढ़ समझे जाने वाले मिदनापुर में कई मुसलमानों ने टीवी पर पूछे जानें पर मोदी के समर्थन की बात कही है। खुल कर टीवी पर कहा है कि उन्हें शौचालय और घर मिले हैं। खाते में पैसा मिला है। ये सोचना कि मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देगा, गलत साबित होगा। अभी जम्मू-कश्मीर में हुये जिला विकास कमेटी के चुनाव में कश्मीर क्षेत्र में भाजपा को मिली 3 सीटें और 2 सीटों पर नम्बर दो पर रहना प्रमाणित करता है कि मुसलमानों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व पर विश्वास हो चला है। कश्मीर में जहां हिन्दू वोट बिल्कुल नहीं है वहां भाजपा का झंडा ऊंचा हो गया।

तृणमूल कांग्रेस का हारना 100 फीसदी तय है उसके अनेंको कारण बन गये है। दीदी की दादागिरी, अत्याचार और जुल्म की राजनीति को बंगाल के लोग देख रहे हैं, समझ रहे हैं। भाजपा के 130 कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या से आमजनों की सहानुभूति भी भाजापा से हो गयी है। लोग गुंडागर्दी के राज से छुटकारा पानें को तरस रहे हैं उन्हें विकल्प की तलाश थी जो अब मिल गया। दीदी ने मुसलमानों को जरूरत से ज्यादा तरजीह देकर हिन्दुओं को नाराज कर लिया। सच तो ये है कि हिन्दू मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण होने की नींव उन्होंने ही रखी। ये तो पहले से ही तय था कि उन्हें मुसलमान वोट मिलेगा और हिन्दू इकट्ठा कभी होता नहीं है। जब एक साथ हिन्दू और मुसलमानों का त्योहार एक ही दिन पड़ा तो ममता ने मुसलमानों के जुलूस और जलसों को प्राथमिकता देते हुये हिन्दुओं के साथ ज्यादतियां की। उनके जुलूसों को रोक दिया गया। उसका खामियाजा उन्होंने लोकसभा चुनाव में भुगता। दीदी ने इस बुरी तरह से लोकसभा में अपनी सीटें गंवाने के बाद कोई सबक नहीं लिया।

तीसरी बात आयुष्मान योजना लागू नहीं करने से जो दूसरे प्रदेशों में गरीबों को मुफ्त इलाज का लाभ मिल रहा है, गंभीर बीमारी से जूझने वाले गरीबों को आशा की किरण मिल गयी है, उसे बंगाल में रोक लिया है। जब पड़ोसी और अन्य प्रदेशों ने उसका लाभ बंगालवासी देखते हैं तो उन्हें अपनी हालत पर तरस आता है। बार-बार केन्द्र सरकार से टकराव करना भी उन्हें भारी पड़ेगा। संविधान और नियमों के विरूद्ध केन्द्र सरकार के बुलावे पर भारतीय सेवा के अधिकारियों को नहीं भेजना उनकी हठधर्मी है। ऐसा वे सीबीआई द्वारा बंगाल सरकार के अफसरों को बुलाने पर भी कर चुकी है। सीबीआई अधिकारियों को बन्द करके रोकना, भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या फिर देश की शीर्ष नेताओं पर पथराव, मारपीट ये सब बंगाल की जनता देख रही है। उनकी सरकार पर चिटफंड में भ्रष्ट होने के कई आरोप लगे हैं अब लोग दीदी को ईमानदार भी नहीं मानते हैं। चिटफंड कांड में उनकी पोल खुली, जिससे उनकी साख गिरी है।

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा एवं गृहमंत्री अमित शाह का कहना कि अबकी बार भाजपा 200 पार, सच साबित हो सकता है क्योंकि उत्तरी बंगाल में भाजपा परचम लहरा चुकी है। दक्षिणी बंगाल में भी बयार भाजपा के हक में चलने लगी है। वहां के तृणमूल कांग्रेस के भारी-भरकम नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, और भाजपा में शामिल हो रहे हैं। सांसद सुवेन्द्र अधिकारी जिनके पिता और भाई भी सांसद हैं का तृणमूल छोड़कर भाजपा का दामन थामना मामूली राजनैतिक घटना नहीं है। उनका लगभग 50 से अधिक विधानसभा सीटों पर गहरा प्रभाव है। ये मुस्लिम वाहुल्य क्षेत्र है। वे तृणमूल से इस क्षेत्र में कमसे कम 30 सीटें तो भाजपा की झोली में ले ही आयेगे। दूसरे क्षेत्रों में भी सांसद और विधायक भाजपा में शामिल हुये हैं और होते जा रहे हैं। ये साफ दर्शाता है कि ममता अब अकेली पड़ रही है। सांसद अधिकारी की कार पर पथराव और सांसद सुनील मंडल को भाजपा कार्यालय जाने से रोकना भाजपा कार्यकर्ताओं का लगातार उत्पीडऩ आदि घटनाओं के कारण विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी को भारी मूल्य चुकाना पड़ेगा।

प्रशान्त किशोर (पी.के) फैक्टर कोई काम आने वाला नहीं है। पी.के. पहले ही अपनी नाक कांग्रेस को सलाह देकर उत्तर प्रदेश में कटवा चुके हैं। वैसे भी उनका नाम बेवजह राजनीतिक चुनाव एक्सपर्ट के रूप में चल गया। यहां यह भी बता दें कि बिहार में नीतिश के सलाहकार बने थे तो नीतिश कुमार की पार्टी जेडीयू को लालू यादव की आरजेडी से कम सीटें पायी थी।

कुल मिलाकर मुसलमानों का नरेन्द्र मोदी की ओर झुकाव, दीदी की दादागिरी और भाजपा के सैकड़ो से अधिक कार्यकर्ताओं का कत्ल, आयुष्मान योजना को लागू न करना उन पर लगे भ्रष्टता के चार्ज, भ्रष्ट अफसरों को बचाना ही उनकी पार्टी के चुनाव हारने के लिये काफी था। ऊपर से भाजपा के बड़े नेताओं पर हमला, केन्द्र से टकराव ने उनकी छवि को और भी धूमिल कर दिया। चुनाव में भाजपा के 18 सांसदों का प्रभाव, तृणमूल के भारी भरकम सांसदों, विधायकों, नेताओं को भाजपा में शामिल होना भाजपा को जीत दिलाने के लिये ही नहीं उसे विधानसभा में भारी बहुमत दिलाने के लिये वरदान साबित होगा। भाजपा का विजय रथ त्रिपुरा, आसाम से बड़ता हुआ अब बंगाल आ पहुंचा है जहां 7800 बूथ पर बूथ अध्यक्ष बना कर बड़े नेता उनके घर-घर जाकर उनमें उत्साह भर रहे हैं। भाजपा ने अपना संगठन तृणमूल कांग्रेस से कहीं अधिक मजबूत कर लिया है। ममता बंगाल मे अपनी हार देखते हुये संभवत: राष्ट्रपति शासन चाहती हैं ताकि उन्हें सहानुभूति का सहारा मिल जाये पर केन्द्र सरकार फूंक कदम रख रही है और संयम से सब कुछ बर्दाश्त कर रही है।

दीदी ने अपनी हार का अध्याय तो उसी दिन लिख लिया था जब हिन्दुओं को उनके त्यौहार पर रोक कर मुसलमानों को जुलूस आदि की इजाजत दी थी, बाकि बचा-खुचा काम बंगलादेशियों की नागरिकता की वकालत और जिद ने पूरा कर दिया। इतनी बातें उनके खिलाफ हो गयी हैं कि 2021 के चुनाव में उनकी पार्टी बुरी तरह हारेगी। ध्वस्त भी हो जाये तो कोई आश्चर्य नहीं। वे अब सत्ता में रह कर अकेली होती जा रही है तो सत्ताच्युत होने पर तो ‘इकला चलो रे पर आ ही जायेगीं’।

 

डॉ. विजय खैरा

 

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