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”राष्ट्र के विकास को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए’’

”राष्ट्र के विकास को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए’’

आज एएमयू से तालीम लेकर निकले सारे लोग भारत के सर्वश्रेष्ठ स्थानों पर और संस्थानों में ही नहीं बल्कि दुनिया के सैंकड़ों देशों में छाए हुए हैं। मुझे विदेश यात्रा के दौरान अक्सर यहां के एलुमनाई मिलते हैं जो बहुत गर्व से बताते हैं कि मैं एएमयू से पढ़ा हूं। एएमयू के एलुमनाई कैंपस से अपने साथ हंसी-मजाक और शेरो-शायरी का एक अलग अंदाज लेकर आते हैं। वो दुनिया में कहीं भी हों, भारत की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं।

प्राउड अलीगस, यही कहते हैं ना आप, पार्टनर्स आपके इस गर्व की वजह भी है। अपने सौ वर्ष के इतिहास में एएमयू ने लाखों जीवन को तराशा है, संवारा है, एक आधुनिक और वैज्ञानिक सोच दी है। समाज के लिए, देश के लिए कुछ करने की प्रेरणा जगाई है। मैं सभी के नाम लूंगा तो समय शायद बहुत कम पड़ जाएगा।

अभी कोरोना के इस संकट के दौरान भी एएमयू ने जिस तरह समाज की मदद की, वो अभूतपूर्व है। हजारों लोगों का मुफ्त टेस्ट करवाना, आइसोलेशन वार्ड बनाना, प्लाज्मा बैंक बनाना और पीएम केयर फंड में एक बड़ी राशि का योगदान देना, समाज के प्रति आपके दायित्वों को पूरा करने की गंभीरता को दिखाता है। अभी कुछ दिन पहले ही मुझे चांसलर डॉ. सैयदना साहब की चिट्ठी भी मिली है। उन्होंने वेक्सिनेशन ड्राइव में भी हर स्तर पर सहयोग देने की बात कही है। देश को सर्वोपरि रखते हुए ऐसे ही संगठित प्रयासों से आज भारत कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का सफलता से मुकाबला कर रहा है।

मुझे बहुत सारे लोग बोलते हैं कि एएमयू कैंपस अपने-आप में एक शहर की तरह है। अनेको डिपार्टमेंट्स, दर्जनों होस्टल्स, हजारों टीचर, प्रोफेसर्स, लाखों स्टूडेंट्स के बीच एक मिनी इंडिया भी नजर आता है। एएमयू में भी एक तरफ उर्दू पढ़ाई जाती है तो हिन्दी भी, अरबी पढ़ाई जाती है तो यहां संस्कृत की शिक्षा का भी एक सदी पुराना संस्थान है। यहां की लायब्रेरी में कुरान की मैनुस्क्रिप्ट है तो गीता-रामायण के अनुवाद भी उतने ही सहेज कर रखे गए हैं। ये विविधता एएमयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की ही नहीं, देश की भी ताकत है। हमें इस शक्ति को न भूलना है न ही न ही इसे कमजोर पडऩे देना है। एएमयू के कैंपस में एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना दिनों-दिन मजबूत होती रहे, हमें मिलकर इसके लिए काम करना है।

बीते 100 वर्षों में एएमयू ने दुनिया के कई देशों से भारत के संबंधों को सशक्त करने का भी काम किया है। उर्दू, अरबी और फारसी भाषा पर यहां जो रिसर्च होती है, इस्लामिक साहित्य पर जो रिसर्च होती है, वो समूचे इस्लामिक वल्र्ड के साथ भारत के सांस्कृतिक रिश्तों को नई ऊर्जा देती है। मुझे बताया गया है कि अभी लगभग एक हजार विदेशी स्टूडेंट्स यहां पढ़ाई कर रहे हैं। ऐसे में एएमयू की ये भी जिम्मेदारी है कि हमारे देश में जो अच्छा है, जो बेहतरीन है, जो देश की ताकत है, वो देखकर, वो सीखकर, उसकी यादें ले करके ये छात्र अपने प्रदेशों में जाएं। क्योंकि एएमयू में जो भी बातें वो सुनेंगे, देखेंगे, उसके आधार पर वो राष्ट्र के तौर पर भारत की आइडेंटिटी से जोड़ेंगे। इसलिए आपके संस्थान पर एक तरह से दोहरी जिम्मेदारी है।

अपना रेस्पेक्ट बढ़ाने की और अपनी रिस्पांसिबिलिटी बखूबी निभाने की। आपको एक तरफ अपनी यूनिवर्सिटी की सॉफ्ट पावर को और निखारना है और दूसरी तरफ नेशन बिल्डिंग के अपने दायित्व को निरंतर पूरा करना है। मुझे विश्वास है, एएमयू से जुड़ा प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक छात्र-छात्रा, अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखते हुए ही आगे बढ़ेगा। मैं आपको सर सय्यद द्वारा कही गई एक बात की याद दिलाना चाहता हूं। उन्होंने कहा था- ‘अपने देश की चिंता करने वाले का पहला और सबसे बड़ा कर्तव्य है कि वो सभी लोगों के कल्याण के लिए कार्य करे। भले ही लोगों की जाति, मत या मजहब कुछ भी हो’।

अपनी इस बात को विस्तार देते हुए सर सय्यद ने एक उदाहरण भी दिया था। उन्होंने कहा था- ‘जिस प्रकार मानव जीवन और उसके अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर के हर अंग का स्वस्थ रहना जरूरी है, वैसे ही देश की समृद्धि के लिए भी उसका हर स्तर पर विकास होना आवश्यक है’।

बिना किसी भेदभाव, 40 करोड़ से ज्यादा गरीबों के बैंक खाते खुले। बिना किसी भेदभाव, 2 करोड़ से ज्यादा गरीबों को पक्के घर दिए गए। बिना किसी भेदभाव 8 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को गैस कनेक्शन मिला। बिना किसी भेदभाव, कोरोना के इस समय में 80 करोड़ देशवासियों को मुफ्त अन्न सुनिश्चित किया गया। बिना किसी भेदभाव आयुष्मान योजना के तहत 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज संभव हुआ। जो देश का है वो हर देशवासी का है और इसका लाभ हर देशवासी को मिलना ही चाहिए, हमारी सरकार इसी भावना के साथ काम कर रही है।

कुछ दिनों पहले मेरी मुलाकात अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के ही एक एलुमनाई से हुई थी। वो एक इस्लामिक स्कॉलर भी हैं। उन्होंने एक बहुत इंटरेस्टिंग बात मुझे बताई, जो मैं आपसे भी शेयर करना चाहता हूं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत जब देश में 10 करोड़ से ज्यादा शौचालय बने, तो इसका लाभ सभी को हुआ। ये शौचालय भी बिना भेदभाव ही बने थे। लेकिन इसका एक आस्पेक्ट ऐसा है, जिसकी न उतनी चर्चा हुई है और न ही अकादमिक वल्र्ड का इस पर उतना ध्यान गया है। मैं चाहता हूं कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का भी हर स्टूडेंट इस पर गौर करे।

एक समय था जब हमारे देश में मुस्लिम बेटियों का ड्रॉप आउट रेट 70 प्रतिशत से ज्यादा था। मुस्लिम समाज की प्रगति में, बेटियों का इस तरह पढ़ाई बीच में छोडऩा हमेशा से बहुत बड़ी बाधा रहा है। लेकिन 70 साल से हमारे यहां स्थिति यही थी कि 70 परसेंट से ज्यादा मुस्लिम बेटियां, अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती थीं। इन्हीं स्थितियों में स्वच्छ भारत मिशन शुरू हुआ, गांव-गांव शौचालय बने। सरकार ने स्कूल जाने वाली गर्ल स्टूडेंट्स के लिए मिशन मोड में अलग से शौचालय बनवाए। आज देश के सामने क्या स्थिति है? पहले मुस्लिम बेटियों का जो स्कूल ड्रॉप आउट रेट 70 प्रतिशत से ज्यादा था, वो अब घटकर करीब-करीब 30 प्रतिशत रह गया है।

पहले लाखों मुस्लिम बेटियां, शौचालय की कमी की वजह से पढ़ाई छोड़ देती थीं। अब हालात बदल रहे हैं। मुस्लिम बेटियों का ड्रॉप रेट कम से कम हो, इसके लिए केंद्र सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। आपकी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ही स्कूल-ड्राप आउट छात्र-छात्राओं के लिए ‘ब्रिज कोर्स’ चलाया जा रहा हैं। और अभी मुझे एक और बात बताई गई है जो बहुत अच्छी लगी है। एएमयू में अब फीमेल स्टूडेंट्स की संख्या बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई है। मैं आप सबको बधाई देना चाहूंगा। मुस्लिम बेटियों की शिक्षा पर, उनके सशक्तिकरण पर सरकार का बहुत ध्यान है। पिछले 6 साल में सरकार द्वारा करीब-करीब एक करोड़ मुस्लिम बेटियों को स्कॉलरशिप्स दी गई है।

जेंडर के आधार पर भेदभाव न हो, सबको बराबर अधिकार मिलें, देश के विकास का लाभ सबको मिले, ये एएमयू की स्थापना की प्राथमिकताओं में था। आज भी एएमयू के पास ये गौरव है कि इसकी फाउंडर चांसलर की जिम्मेदारी बेगम सुल्तान ने संभाली थी। सौ साल पहले की परिस्थितियों में ये किया जाना, कितना बड़ा काम था, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आधुनिक मुस्लिम समाज के निर्माण का जो प्रयास उस समय शुरू हुआ था, तीन तलाक जैसी कुप्रथा का अंत करके देश ने आज उसे आगे बढ़ाया है।

पहले ये कहा जाता था कि अगर एक महिला शिक्षित होती है तो पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है। ये बात सही है। लेकिन परिवार की शिक्षा के आगे भी इसके गहरे मायने हैं। महिलाओं को शिक्षित इसलिए होना है ताकि वो अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल कर सकें, अपना भविष्य खुद तय कर सकें। एजुकेशन अपने साथ लेकर आती है एम्प्लॉयमेंट और एंट्रेप्रेन्योरशिप।एम्प्लॉयमेंट और एंट्रेप्रेन्योरशिप  अपने साथ लेकर आते हैं इकनोमिक इंडिपेंडेंस। इकनोमिक इंडिपेंडेंस से होता है एम्पावरमेंट। एक वम्पॉवर्ड वीमेन का हर स्तर पर, हर फैसले में उतना ही बराबर का योगदान होता है, जितना किसी और का। फिर बात चाहे परिवार को डायरेक्शन देने की हो या फिर देश को डायरेक्शन देने की। आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो देश की अन्य शिक्षा संस्थाओं से भी कहूंगा कि ज्यादा से ज्यादा बेटियों को शिक्षा से जोड़ें। और उन्हें सिर्फ एजुकेशन ही नहीं बल्कि हायर एजुकेशन तक लेकर आएं।

एएमयू ने हायर एजुकेशन में अपने कंटेम्पररी क्यूरिकुलुम से बहुतों को आकर्षित किया है। आपकी यूनिवर्सिटी में अन्तर-डिसिप्लिनरी विषय पहले से पढ़ाए जाते हैं। अगर कोई छात्र साइंस में अच्छा है और उसे हिस्ट्री भी अच्छी लगती है तो ऐसी मजबूरी क्यों हो कि वो किसी एक को ही चुन सके। यही भावना नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में है। इसमें 21वीं सदी में भारत के स्टूडेंट्स की जरूरतों, उसके इंटरेस्ट को सबसे ज्यादा ध्यान में रखा गया है। हमारे देश का युवा, नेशन फर्स्ट के आह्वान के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। वो नए-नए स्टार्ट-अप्स के जरिए देश की चुनौतियों का समाधान निकाल रहा है। रैशनल थिंकिंग और साइंटिफिक आउटलुक उसकी पहली प्राथमिकता है।

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत के युवाओं की इसी एस्पिरेशन को प्राथमिकता दी गई है। हमारी कोशिश ये भी है कि भारत का एजुकेशन इको-सिस्टम, दुनिया के आधुनिक शिक्षा व्यवस्थाओं में से एक बने। नई नेशनल एजुकेशन पालिसी में जो मल्टीपल एंट्री है, एग्जिट पॉइंट्स की व्यवस्था है, उससे छात्रों को अपनी शिक्षा के बारे में फैसले लेने में आसानी होगी। हर एग्जिट ऑप्शन के बाद उन्हें एप्रोप्रियेट सर्टिफिकेट भी दिया जाएगा। ये छात्रों को पूरे कोर्स की फीस की चिंता किए बिना, अपना फैसला लेने की आजादी होगी।

सरकार उच्च शिक्षा में एनरोलमेंट की संख्या बढ़ाने और सीटें बढ़ाने के लिए भी लगातार काम कर रही है। वर्ष 2014 में हमारे देश में 16 IITs थीं। आज 23 IITs हैं। वर्ष 2014 में हमारे देश में 9 IITs थीं। आज 25 IITs हैं। वर्ष 2014 में हमारे यहां 13 IIms थे। आज 20 IIms हैं। मेडिकल एजुकेशन को लेकर भी बहुत काम किया गया है। 6 साल पहले तक देश में सिर्फ 7 एम्स थे, आज देश में 22 एम्स हैं। शिक्षा चाहे ऑनलाइन हो या फिर ऑफलाइन, सभी तक पहुंचे, बराबरी से पहुंचे, सभी का जीवन बदले, हम इसी लक्ष्य के साथ काम कर रहे हैं।

एएमयू के सौ साल पूरा होने पर मेरी आप सभी युवा ‘पार्टनर्स’ से कुछ और अपेक्षाएं भी हैं। क्यों न 100 साल के इस मौके पर एएमयू के 100 हॉस्टल्स एक एक्स्ट्रा-क्यूरिकुलम टास्क करें। ये टास्क देश की आजादी के 75 साल पूरे होने से जुड़े हों। जैसे एएमयू के पास इतना बड़ा इनोवेटिव और  रिसर्च ओरिएंटेड  टैलेंट है। क्यों न हॉस्टल के छात्र ऐसे स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों पर रिसर्च करके उनके जीवन को देश के सामने लाएं जिनके बारे में अभी उतनी जानकारी नहीं है। कुछ स्टूडेंट्स इन महापुरुषों के जन्मस्थान जाएं, उनकी कर्मभूमि जाएं, उनके परिवार के लोग अब कहां हैं, उनसे संपर्क करें। कुछ स्टूडेंट्स ऑनलाइन रिसोर्सेज को एक्स्प्लोर करें। उदाहरण के तौर पर 75 होस्टल्स एक-एक आदिवासी फ्रीडम फाइटर पर एक एक रिसर्च डाक्यूमेंट्स तैयार कर सकते हैं, इसी तरह 25 हॉस्टल्स महिला फ्रीडम फाइटर पर रिसर्च कर सकते हैं काम कर सकते हैं।

एक और काम है जो देश के लिए एएमयू के छात्र-छात्राएं कर सकते हैं। एएमयू के पास देश की इतनी बेशकीमती प्राचीन पांडुलिपियां हैं। ये सब हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। मैं चाहूंगा कि आप टेक्नोलॉजी के माध्यम से इन्हें डिजिटल या वर्चुअल अवतार में पूरी दुनिया के सामने लाएं। मैं एएमयू के विशाल एलुमनाई नेटवर्क को भी आह्वान करता हूं कि नए भारत के निर्माण में अपनी भागीदारी और बढ़ाएं। आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाने के लिए, वोकल फॉर लोकल को सफल बनाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इसे लेकर अगर मुझे एएमयू से सुझाव मिलें, एएमयू एलुमनाई के सुझाव मिलें, तो मुझे बहुत खुशी होगी।

आज पूरी दुनिया की नजरें भारत पर हैं। जिस सदी को भारत की सदी बताया जा रहा है, उस लक्ष्य की तरफ भारत कैसे आगे बढ़ता है, इसे लेकर पूरी दुनिया में क्यूरिऑसिटी है। इसलिए आज हम सभी का एकमात्र और एकनिष्ठ लक्ष्य ये होना चाहिए कि भारत को आत्मनिर्भर कैसे बनाएं। हम कहां और किस परिवार में पैदा हुए, किस मत-मजहब में बड़े हुए, इससे भी अहम ये है कि हर एक नागरिक की आकांक्षाएं और उसके प्रयास देश की आकांक्षाओं से कैसे जुड़ें। जब इसको लेकर एक मजबूत नींव पड़ेगी तो लक्ष्य तक पहुंचना और आसान हो जाएगा।

समाज में वैचारिक मतभेद होते हैं, ये स्वाभाविक भी है। लेकिन जब बात राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति की हो तो हर मतभेद किनारे रख देना चाहिए। जब आप सभी युवा साथी इस सोच के साथ आगे बढ़ेंगे तो ऐसी कोई मंजिल नहीं, जो हम मिल करके हासिल न कर सकें। शिक्षा हो, आर्थिक विकास हो, बेहतर रहन-सहन हो, अवसर हों, महिलाओं का हक हो, सुरक्षा हो, राष्ट्रवाद हो, ये वो चीजें हैं जो हर नागरिक के लिए ज़रूरी होती हैं। ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर हम अपनी राजनैतिक या वैचारिक मजबूरियों के नाम पर असहमत हो ही नहीं सकते। यहां अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में इन मुद्दों पर बात करना मेरे लिए इसलिए भी स्वाभाविक है क्योंकि यहां से स्वतंत्रता के अनेक सेनानी निकले हैं। इस मिट्टी से निकले हैं। इन स्वतंत्रता सेनानियों की भी अपनी पारिवारिक, सामाजिक, वैचारिक परवरिश थी, अपने-अपने विचार थे। लेकिन जब गुलामी से मुक्ति की बात आई तो, सारे विचार आजादी के एक लक्ष्य के साथ ही जुड़ गए।

हमारे पूर्वजों ने जो आजादी के लिए किया, वही काम अब आपको, युवा पीढ़ी को नए भारत के निर्माण के लिए करना है। जैसे आजादी एक कॉमन ग्राउंड थी, वैसे ही नए भारत के लिए हमें एक कॉमन ग्राउंड पर काम करना है। नया भारत आत्मनिर्भर होगा, हर प्रकार से संपन्न होगा तो लाभ भी सभी 130 करोड़ से ज्यादा देशवासियों का होगा। ये विमर्श समाज के हर हिस्से तक पहुंचे, ये काम आप कर सकते हैं, युवा साथी कर सकते हैं।

हमें ये समझना होगा कि सियासत, सोसायटी का एक अहम हिस्सा है। लेकिन सोसायटी में सियासत के अलावा भी दूसरे मसले हैं। सियासत और सत्ता की सोच से बहुत बड़ा, बहुत व्यापक, किसी भी देश का समाज होता है। पॉलिटिक्स से ऊपर भी समाज को आगे बढ़ाने के लिए बहुत स्पेस होती है। उस स्पेस को भी एक्स्प्लोर करते रहना बहुत जरूरी है। ये काम हमारे एएमयू जैसे कैंपस कर सकते हैं, आप सभी कर सकते हैं।

न्यू इंडिया के विजन की जब हम बात करते हैं तो उसके मूल में भी यही है कि राष्ट्र के, समाज के विकास को राजनैतिक चश्मे से ना देखा जाए। हां, जब हम इस बड़े उद्देश्य के लिए साथ आते हैं तो संभव है कि कुछ तत्व इससे परेशान हों। ऐसे तत्व दुनिया की हर सोसायटी में मिल जाएंगे। ये कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनके अपने स्वार्थ होते हैं। वो अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए हर हथकंडा अपनाएंगे, हर प्रकार की नेगेटिविटी फैलाएंगे। लेकिन जब हमारे मन और मस्तिष्क में नए भारत का निर्माण सर्वोच्च होगा तो ऐसे लोगों का स्पेस अपने आप सिकुड़ता जाएगा।

पॉलिटिक्स इंतजार कर सकती है, सोसायटी इंतजार नहीं कर सकती है। देश का डवलपमेंट इंतजार नहीं कर सकता। गरीब, समाज के किसी भी वर्ग का हो, वो इंतजार नहीं कर सकता। महिलाएं, वंचित, पीडि़त, शोषित, विकास का इंतजार नहीं कर सकते। सबसे बड़ी बात हमारे युवा, आप सभी, और इंतजार नहीं करना चाहेंगे। पिछली शताब्दी में मतभेदों के नाम पर बहुत वक्त पहले ही जाया हो चुका है। अब वक्त नहीं गंवाना है, सभी को एक लक्ष्य के साथ मिलकर, नया भारत, आत्मनिर्भर भारत बनाना है।

सौ साल पहले 1920 में जो युवा थे, उन्हें देश की आजादी के लिए संघर्ष करने का, खुद को समर्पित करने का, बलिदान देने का अवसर मिला था। उस पीढ़ी के तप और त्याग से देश को 1947 में आजादी मिली थी। आपके पास, आज की पीढ़ी के पास आत्मनिर्भर भारत, नए भारत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए बहुत कुछ करने का अवसर है। वो समय था 1920 का, ये समय है 2020 का। 1920 के 27 साल बाद देश आजाद हुआ था। 2020 के 27 बाद, जो कि 2020 से 2047, आपके जीवन के बहुत महत्वपूर्ण साल हैं।

वर्ष 2047 में जब भारत अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरा करेगा, आप उस ऐतिहासिक समय के भी साक्षी बनेंगे। इतना ही नहीं, इन 27 साल में आधुनिक भारत बनाने के आप हिस्सेदार होंगे। आपको हर पल देश के लिए सोचना है, अपने हर फैसले में देशहित सोचना है, आपका हर निर्णय देशहित को आधार बनाते हुए ही होना चाहिए।

मुझे विश्वास है, हम सब साथ मिलकर आत्मनिर्भर भारत के सपनों को पूरा करेंगे, हम सब मिलकर देश को विकास की नई ऊंचाइयों पर पहुंचाएंगे।

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के शताब्दी समारोह पर दिए भाषण के सम्पादित अंशों पर आधारित है)

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