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जय हो किसान आन्दोलन की

जय हो किसान आन्दोलन की

बेटा : पिताजी।

पिता : हां बेटा।

बेटा : पिताजी, मैं जब भी कभी और कहीं मौज करने जाने की सोचता हूं, आप सदा मुझे रोक देते हैं। मुझे इस बात का बड़ा दु:ख है।

पिता : अब क्या हो गया?

बेटा : मैं किसान आन्दोलन में शामिल होना चाहता था पर आप ने उसमें भी मुझे मना कर दिया। मैं तो अब समझता हूं कि मैं जो हर बात में आपसे अनुमति मांगता हूं या सलाह लेता हूं, वही मेरे लिए अभिशाप बन गया है। अब तो कई बार मैं सोचने लगता हूं कि हर बात में आपसे अनुमति लेकर चलना ही गलत है।

पिता : उसमें मैंने क्या गलत कहा? तू कौनसा किसान है कि इस आन्दोलन में शामिल हो जाये।

बेटा : किस कानून में लिखा है कि किसी आन्दोलन में वही शामिल हो सकता है जिसका धंधा भी वही हो जो आन्दोलनकारियों का हो।

पिता : यह कानून की बात नहीं है। कुछ मर्यादाएं भी होती हैं। अगर कल को कोई महिलाओं का संघर्ष हो तो तू कैसे उसमें कूद जायेगा?

बेटा : समर्थन में तो कोई भी जा सकता है न।

पिता : शहर में तू रहता है, वह भी मेरे साथ। हमारे पास दस गज तो खेती के लिए जमीन नहीं है जहां तू खेती करता हो और बनने चला हुआ है बड़ा किसान।

बेटा : लेकिन पिताजी मैंने घर में एक गमले में पुदीना उगा रखा है और दूसरे में हरी मिर्च का एक पौधा, यह भी तो खेती ही है। मैं बड़ा नहीं, छोटा किसान ही समझ लो।

पिता : ऐसे तो हर एक ही किसान होने का दावा करने लगेगा।

बेटा : तो उसमें बुराई भी क्या है?

पिता : तब तो मुझे याद आती है वह लोकोक्ति।

बेटा : क्या?

पिता : चूहे को एक छुहारा क्या मिल गया कि वह पंसारी ही बन बैठा।

बेटा : आप तो पिताजी मेरी हर बात काटते रहते हो, मजाक उड़ाते फिरते हो। आपको पता नहीं कि जो मैं करता हूं उसे सुसंस्कृत भाषा में किचन गार्डनिंग कहते हैं।

पिता : चलो मान लिया कि तू एक किसान ही है तो वहां जाकर तू करेगा क्या?

बेटा : वही जो मेरे अन्य किसान भाई कर रहे हैं। जो नारे वहां लगाये जा रहे हैं, मैं उनको दोहराता फिरूंगा।

पिता : पर तेरे को किसानों के बीच धरना देने और प्रदर्शन करने की यह सूझी क्या?

बेटा : मुझे तो पिताजी प्रेरणा मिली बहुत से महान नेताओं से।

पिता : बेटा, विपक्षी दलों का तो धर्मं ही है कि उन्हें तो उस सब का विरोध करना है जो सरकार करती है और करने जा रही है। एक प्रकार से विपक्षी दलों का सरकार का विरोध करना तो उनका धर्म ही है। तू वहां क्या करेगा?

बेटा : पिताजी, मैंने तो बताया तो है कि मैं वहां सब कुछ करूंगा जो वहां अन्य लोग करेंगे।

पिता : पर तू किसान तो लगना चाहिए ही न।

बेटा : पिताजी, आजकल पहनावे से तो किसी का व्यवसाय तो जाना नहीं जा सकता। आजकल जीन की पैंट और कमीज तो सभी पहनते फिरते हैं चाहे वह कुछ भी कर अपनी रोटी कमाते हों।

पिता : चल फिर तूने जाना ही है तो मैं तुझे अपनी एक पुरानी धोती और कुर्ता दे दूंगा जो अब मैं नहीं पहनता। उस से एक लाभ तुझे यह होगा कि तू एक गरीब किसान लगेगा।

बेटा : आप तो फिजूल में ही मेरी चिंता कर रहे हैं। आन्दोलन कर्ताओं को यह नहीं जानना है कि में कौन हूं। उन्हें तो इस बात की खुशी होगी कि उनके समर्थन में एक और आदमी की वृद्धि हो गयी है।

पिता : बस देख लेना बेटा आजकल लोग छोटी-छोटी बात पर मरने-मारने को उतारू हो जाते हैं।

बेटा : ऐसी बात नहीं है पिताजी। आप चिंता मत करो। उन्हें ज्यादा से ज्यादा समर्थकों की आवश्यकता है। फिर मैं ही नहीं अनेक बड़ी-बड़ी हस्तियां भी उनके समर्थन में आ रही हैं। आपने मेधा पातकर का नाम तो सुना ही होगा। वह भी आई थीं।

पिता : यही तो उनका धंधा है। वह तो हर आन्दोलन में अपनी हाजरी लगाती फिरती हैं। यह पता नहीं जब देश में कोई आन्दोलन न चल रहा हो तो वह क्या करती होंगी।

बेटा : पिताजी, योगेन्द्र यादव जी भी तो हैं। उन्हों ने भी अपना समर्थन दिया है।

पिता : वह तो हर आन्दोलन की जान हैं। जब जेएनयू में आन्दोलन हुआ तो भी वह समर्थन देने का अपना कर्त्व्य  निभाने पहुंच गए थे। वह भी तो सर्वव्यापी हैं। नागरिक संशोधन कानून के विरुद्ध दिल्ली में शाहीन बाग का धरना हो, वह सब जगह बिन बुलाये ही पहुंच जाते हैं अपनी हाजिरी लगवाने ताकि लोग उन्हें कहीं भूल ही न जाएं। हर एक की अपनी-अपनी सोच है और अपनी राजनीति हांकने का तरीका। कई बार तो ऐसे नेताओं में होड़ लग जाती है कि कौन पहले पहुंचा।

बेटा : अब तो पिताजी अन्ना हजारे जी ने भी चेतावनी दे दी है कि यदि किसानों की मांगें पूरी न की गयीं तो वह भी इस आन्दोलन के समर्थन में कूद जायेंगे।

पिता : हां बेटा, वह भी देश में लोकपाल की स्थापना के लिए कानून बनाये जाने की जीती हुई बाजी हार बैठने के बड़े योद्धा हैं।

बेटा : वह आन्दोलन तो बहुत कामयाब लगता था।

पिता : उसे भी उनके बहुत बड़े समर्थक ले डूबे। उनके कंधे पर बैठे लोगों ने दिल्ली में सरकार बना ली, मुख्यमंत्री बन बैठे। अब वह स्वयं ही लोकपाल की बात नहीं करते। अन्नाजी की हालत तो अब यह हो गई है कि न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे। अब तो वह बस इस उम्र में किसी प्रकार देश की राजनीती और समाज में अपने आप को जिंदा रखने के प्रयास में हैं।

बेटा : मतलब उन्हें अपनों ने ही धोखा दिया?

पिता : बिलकुल।

बेटा : लगता है कि किसान आन्दोलन के नेताओं ने भी उनके समर्थन पर कोई अपने प्रतिक्रिया की लगती है।

पिता : तू अपने बारे भी सोच ले।

बेटा : इसमें सोचने वाली बात है ही नहीं पिताजी। मैं नेता बन कर नहीं एक किसान के रूप में जाने जा रहा हूं। मैं तो बस कल प्रात: ही निकल जाऊंगा।

पिता : बेटा अपनी बीवी या मां को कह कर प्रात: का नाश्ता कर के जाना। बुजुर्गों ने ठीक ही कहा है कि घर से खाकर निकलो तभी बाहर भी कुछ मिलता है।

बेटा : आप इसकी चिंता मत करो। मैं नाश्ता भी वहीं कर लूंगा।

पिता : क्या बात कर रहा है?

बेटा : पिताजी, लगता है आप टीवी नहीं देखते ध्यान से। वहां जो मुझे शाही नाश्ता मिलेगा मैं तो उसे देख कर ही किसान समस्याओं का जबरदस्त समर्थक बन बैठा हूं।

पिता : कभी-कभी तो मैंने देखा है कि काजू और बादाम भी बांटे जाते हैं।

बेटा : नाश्ते में जो बढिय़ा पूरी, परांठे, साथ सब्जी और दही जो मिलता है उससे तो मेरी जीभ से पानी ही टपकने लगत्ता है।

पिता : दूध, दही, पनीर तो प्रतिदिन मिलता लगता है। ऐसा बढिय़ा खाना तो पिताजी किस्मत वालों को ही मिलता है।

बेटा : मैं भी तो अपनी किस्मत बदलने के लिए जा रहा हूं।

पिता : तब तो मुझे ऐसे लगता है कि तू बढिय़ा खाने के लालच से ही आन्दोलन में शामिल होने जा रहा है।

बेटा : तो पिताजी इसमें बुराई भी क्या है? खाली पेट तो ईश्वर का भजन भी नहीं हो पाता।

पिता : तू लौटेगा कब?

बेटा : मैं तो पिताजी यही चाहता हूं कि यह संघर्ष लम्बा खिच जाये। किसान कल्याण के साथ हम जैसों का भी कल्याण होता रहे।

पिता : लम्बा खीचने की आशा तो है क्योंकि न सरकार किसान विरोधी तीनो कानूनों को वापस लेने पर मान सकती है और न किसान उनकी मांगें पूरा होने तक अपना संघर्ष स्थगित करने को तैयार हैं।

बेटा : अगर पिताजी सरकार अपने स्टैंड पर अड़ी रही तो किसान भी अपना आन्दोलन समाप्त करना तो दूर उसे कुछ समय के लिए स्थगित करने केलिए भी तैयार नहीं होंगे।

पिता : यह बात तो ठीक लगती है। किसान भी झुकने वाले नहीं हैं? वह भी लम्बी लड़ाई के लिए पूरी तैयारी कर के आये हैं। छ: मास के लिए अपना लंगर-पानी उनके पास है। अगर संघर्ष छ: मास के आगे भी चल जाये तो वह उसके लिए भी प्रबंध कर लेंगे। उनके पास अन्न और धन की कोई परेशानी नहीं है।

बेटा : तो हम कौन सा पीछे हटने वाले हैं। हम भी अपने किसान भाइयों के साथ एक चट्टान की तरह खड़े हैं।

पिता : तो बेटा घर का काम कैसे चलेगा?

बेटा : किसान तो सारा प्रबंध कर सिर पर कफन बांध कर चले हैं। वह तो सरकार से अपनी मांगें मनवा कर ही सांस लेंगे।

पिता : मैं उनकी बात नहीं, अपने घर की बात कर रहा हूं। जब तू यहां नहीं होगा तो घर का खर्चा चलाने का काम भी तो मुश्किल में पड़ जायेगा। तू थोड़ा बहुत तो कुछ कर घर के लिए देता ही है न।

बेटा : आप चिंता मत करो। मैं कोशिश करूंगा कि हर रात को घर ही आ जाऊं। मेरी चली तो कोई बहाना लगाकर कुछ खाना भी पैक कर आप सब के लिए लेता आऊंगा।

पिता : देख लेना ऐसे काम में जोखिम भी बहुत होते हैं।

बेटा : टीवी पर तो यह भी दिखाया है कि किसान बहुत दयावान हैं। वह तो कुछ को दिहाड़ी भी दे रहे हैं। मैं भी उनसे दिहाड़ी लेने की कोशिश करूंगा।

पिता : कैसे?

बेटा : मैं कह दूंगा कि मैं उस परिवार से हूं जिस में एक व्यक्ति ने ऋण के बोझ में दबकर खुदकशी कर ली थी।

पिता : तेरा झूठ तो फिर खुल जायेगा। जब हम किसान परिवार से हैं ही नहीं तो आत्महत्या कैसे हो गई?

बेटा : आप निश्चिन्त रहो। वहां उनके पास यह तसल्ली करने का समय ही कहां है?

पिता : किसान आन्दोलन पर मुझे याद आया कि पंजाब, हरियाणा, यूपी आदि में तो कर्ज के बोझ से अनेक किसानों ने आत्महत्याएं की थीं। इस आन्दोलन में उन गरीबों का तो नाम कहीं सुना ही नहीं।

बेटा : पिताजी, फिलहाल तो किसान आन्दोलन चला रहे नेताओं के पास उन असहाय गरीबों के बारे सोचने का समय ही कहां है?

पिता : आन्दोलनकारियों को उनकी तरफ भी सोचना चाहिए और उनकी सहायता की भी बात करनी चाहिए।

बेटा : आपकी बात तो ठीक है पर हम कौन होते हैं नेताओं को सलाह देने वाले। हमें तो बस अपना ही सोचना चाहिए।

 

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