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खाद्य पदार्थो में मिलावट का गोरखधंधा

खाद्य पदार्थो में मिलावट का गोरखधंधा

दिसंबर के आरंभ में नकली मसाले की एक फैक्ट्री उत्तर प्रदेश के हाथरस में पकड़ी गई। असली मसालों की पैकिंग में नकली मसाला बेचने वाले खच्चर की लीद और भूसे के चूर्ण का इस्तेमाल कर रहे थे। हालांकि यह किसी नामचीन ब्रांड का मसाला नहीं था, पर अपने देश में हेराफेरी का ऐसा धंधा भी धड़ल्ले से चल रहा है। इसके पहले ही नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) ने शहद में मिलावट की पोल खोल कर रख दी थी। इस पड़ताल के अवलोकन से स्पष्ट होता है कि बाजार में उपलब्ध तमाम नामचीन ब्रांड के शहद में मिलावट है। इसी बीच आगरा में नकली देशी घी बनाने की एक फैक्ट्री पकड़ी गई। निरीक्षण के दौरान पशुओं की चर्बी, हड्डियां और खुर मिलते हैं। ये सभी मुनाफा कमाने के लिए लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ का संगीन मामला है। इसे रोकने में प्रशासन की सक्रियता के बावजूद आंकड़ों में वृद्धि हो रही है।

उत्तर प्रदेश का यह वाकया देश भर में मिलावटखोरी के सवाल पर चिंता खड़ी करता है। हाथरस के इस मसाला फैक्ट्री का मालिक अनुप वाष्र्णेय हिन्दू युवा वाहिनी के मंडल सह-प्रभारी बताये जाते हैं। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अ_ारह साल पहले शुरु किये इस संगठन के पदाधिकारी का नाम आने के कारण यह मामला राजनीतिक रंग पकड़ता है। किसी समय आगरा में पकड़ी गई नकली देशी घी की फैक्ट्री चलाने वाले बहुजन समाज पार्टी के विधायक रहे। पब्लिक लाइफ वाले लोगों का ऐसै कार्यों में शामिल होना लोक सेवा के संस्थानीकृत होने का दुष्परिणाम है। शासन और प्रशासन की तमाम कोशिशों के बावजूद इस पर पूर्ण नियंत्रण मुमकिन नहीं रह गया है। दुग्ध में मिलावट से पैदा हुई संकट की स्थिति का देश एक अर्से से सामना कर रहा है। दिवाली के सीजन में मिलावट के इस धंधे में तेजी दिखती है। देश के तमाम हिस्सों में प्रशासन की सख्ती के बावजूद बड़े पैमाने पर इस तरह के प्राणघातक प्रयोग चल रहे हैं। इसके कारण न केवल नैतिकता का पतन और कानून का उल्लंघन होता है, बल्कि कई तरह के घातक रोगों का भी सृजन होता है। इसकी वाली पड़ताल में आधुनिकता परत-दर-परत चादर उतारती जाती है।

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सीएसई की निदेशक सुनीता नारायण की टीम लंबी पड़ताल के बाद चीन से आयात किये जाने वाले सीरप और भारत में बन रहे ऐसे ही उत्पादों के बारे में सनसनीखेज खुलासा करती हैं। इसके कारण यह संस्थान शहद विक्रेता और नियामक प्राधिकरण के निशाने पर है। शहद में की जाने वाली इस मिलावट का पता भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण की जांच में सामने नहीं आता। परिणामस्वरूप बाजार इश्तहारों से भरा है, जिसमें नामचीन ब्रांड के शहद की शुद्धता के दावे किये गये हैं। इस मामले का संज्ञान लेकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल को पत्र भी लिखा। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष विवेक देबरॉय भी इस रिपोर्ट का संज्ञान लेते हैं। जून 2019 में केन्द्र सरकार द्वारा जारी किये गये मधुमक्खी पालन विकास समिति के अध्ययन पर ध्यान केंद्रित करते हैं। और इस क्रम में शहद को स्वादिष्ट बनाने के लिए सीरप मिलाना अनिवार्य मानते हैं।

भारत दुनिया में आठवां सबसे बड़ा शहद उत्पादक है। इस मामले में चीन पहले स्थान पर है। तथापि अमरीका, कनाडा, जर्मनी, जापान और मध्य पूर्व के देशों में भारतीय शहद की खूब मांग है। सही मायनों में प्राकृतिक तरीके से निर्मित शहद स्वास्थ्य के लिए हितकारी है। शहद निर्माण की इस प्रक्रिया में जीवन का चक्र सन्निहित दिखता है। पश्चिम में एक कहावत है, यदि मधुमक्खी पृथ्वी से गायब हो जाय तो मानव जाति चार साल में ही नष्ट हो जाएगी। इस कहावत से पहले साहित्य का नोबल पुरस्कार 1911 में जीतने वाले बेल्जियम के विद्वान मौरिस मैटरलिंक ने 1901 में एक किताब लिखी थी, द लाइफ ऑफ द बी। इसमें उन्होंने लिखा कि मधुमक्खियों के खत्म होने से एक लाख से ज्यादा प्रजातियों की वनस्पतियां भी नष्ट हो जाऐंगी। मधुमक्खी के छत्ते से निकलने वाले द्रव में कृत्रिम तरीके से बनाये गये सीरप के मिलाने पर वह वास्तव में शहद नहीं रह जाता। अत: निश्चय ही इस कुदरती तरीके का भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण को ध्यान रख कर ही मधु के प्रसंस्करण का नियम बनाना चाहिए।

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दूध और इससे बने उत्पादों में मिलावट के अलावा मसाले, शहद और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट से देश में बड़े पैमाने पर मुनाफाखोरी का गोरखधंधा सामने है। चीन से आयातित सीरप ही नहीं, बल्कि भारत में उत्पादित ऐसे पदार्थों का मिलावटखोरी में इस्तेमाल रोकना होगा। इस लक्ष्य को साधने के लिए सरकार को ही नहीं, बल्कि आम लोगों को भी संवेदनशीलता का परिचय देना होगा।

कौशल किशोर

 

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