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बाजारवाद की संस्कृति पर लगे लगाम

बाजारवाद की संस्कृति पर लगे लगाम

आज की उपभोक्तावादी (बाजारवादी) संस्कृति हमारे जीवन पर हावी हो रही है। मनुष्य आधुनिक बनने की होड़ में बौद्धिक दासता स्वीकार कर रहे हैं, पश्चिम की संस्कृति का अनुकरण किया जा रहा है। आज उत्पाद को उपभोग की दृष्टि से नहीं बल्कि महज दिखावे के लिए खरीदा जा रहा है। विज्ञापनों के प्रभाव से हम दिग्भ्रमित हो रहे हैं। उपभोक्ता संस्कृति से हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का ह्रास हो रहा है। इसके कारण हमारी सामाजिक नींव खतरे में है। मनुष्य की इच्छाएं बढ़ती जा रही है, मनुष्य आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। सामाजिक दृष्टिकोण से यह एक बड़ा खतरा है। भविष्य के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह बदलाव हमें सामाजिक पतन की ओर अग्रसर कर रहा है।

भूमंडलीकरण और उदारीकरण ने जिस मुक्त बाजार की परिकल्पना को हमारे सामने रखा वह मुक्त बाजार अपने साथ उपभोक्तावादी संस्कृति को बाईप्रोडक्ट के रूप में लेकर आया। मुक्त बाजार, जिसने धीरे-धीरे हमारे दैनिक जीवन में प्रवेश कर लिया और हमारा पथ-प्रदर्शक भी बन गया। वैसे देखा जाए तो बाजार का अस्तित्व उतना ही पुराना है जितना मनुष्य का तथा बाजार हर युग तथा सभ्यता में मौजूद रहा है लेकिन तब वह मनुष्य की आवश्यक जरूरतों की पूर्ति के लिए हुआ करता था। लेकिन आज का बाजार वैसा नहीं जहां बुनियादी जरूरत की चीजें मिला करती थीं। पहले बाजार किसी भी समाज का आवश्यक अंग हुआ करता था लेकिन आज पूरा विश्व ही एक बाजार की शक्ल लेता दिख रहा है। दैनिक आवश्यकता की कोई भी वस्तु आज बिना बाजार से गुजरे हमारे पास नहीं पहुंच सकती। सच भी यही है कि बाजार की इस सभ्यता ने मनुष्य को भी एक उत्पाद के रूप में बदल दिया है।

यहां यह कहना आवश्यक है की उपभोक्तावादी संस्कृति ने भोगवादी जीवन जीने के लिए मनुष्य के समक्ष नए आयाम प्रस्तुत किए हैं तथा उसे सुविधाभोगी बना दिया है। भोग्य वस्तुओं का उपयोग ही जीवन का प्रमुख लक्ष्य बन गया है। भोगवाद के कारण सबसे बड़ी हानि यह हुई है कि भोगों के प्रति रुचि या रति का गहरा पोषण हुआ है। बढ़ रही भोगों के प्रति रुचि भोगों से ऊपर नहीं उठने देती। आज के व्यक्ति का मूल्यांकन इन भोग-उपभोग की वस्तुओं के आधार पर होने लगा है। जिसके पास भोग की वस्तुएं अधिक होती हैं उसे समाज में अधिक प्रतिष्ठा मिलती है। भोगियों के बीच अधिक भोगी का महत्व हो, यह अस्वाभाविक भी नहीं है, ऐसा होता आया है, किंतु इससे भोगों को ही बढ़ावा मिलता है। व्यक्ति फिर भोगों के दोषों को गौण करके भी उनकी अभिवृद्धि में ही अपना जीवन अर्पित कर देता है।

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हमें इस बात पर  बल देना चाहिए की पूंजी, प्रौद्योगिकी और बाजार के उच्छृंखल विकास को नियंत्रित कर, व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सादगी एवं संयम को बल देकर, आर्थिक समीकरण एवं मानवीय सोच विकसित करके ही हम नया आदर्श समाज दर्शन प्रस्तुत कर सकते हैं। तभी जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता दी जा सकेगी। इसी में विश्व की अनेक समस्याओं को समाधान निहित है और इसी में हमने कोरोना महाव्याधि से मुक्ति का मार्ग पाया है। असल में कोरोना महामारी ने जीवन को नये रूप में निर्मित करने की स्थितियां खड़ी की है, जिसका आधार बढ़ते उपभोक्तावाद पर नियंत्रण है। जिसने इच्छाएं सीमित रखी, वह कभी दु:खी नहीं होगा। क्योंकि वह इस सचाई को जानता है कि इच्छा को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। तभी तो महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में जैसे-जैसे भोगवाद बढ़ता जारहा है, कोरोना महामारी, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, प्रकृति दोहन, आतंकवाद, युद्ध, संघर्ष की स्थितियों बढ़ती जा रही है। समाज, राष्ट्र एवं विश्व में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण जरूरी है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने कहा भी है कि अगर तुम जितना कमाते हो और उससे कम खर्च करते हो तो तुम्हारे पास पारस पत्थर है।

नया उपभोक्तावाद एक प्रकार से नई हिंसा यानी कोरोना महामारियों का उपक्रम है। हिंसा, प्रतिस्पर्धा, सत्ता की दौड़ एवं आर्थिक साम्राज्य को इससे नया क्रूर आकार मिला है। क्योंकि उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संग्रह, सुविधा, सुख, भोग-विलास एवं स्वार्थ से जोड़ दिया है। समस्या सामने आई- पदार्थ कम, उपभोक्ता ज्यादा। व्यक्तिवादी मनोवृत्ति जागी। स्वार्थों के संघर्ष में अन्याय, शोषण एवं अनैतिकता होने लगी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई तो दूसरी ओर गरीबी एवं अभाव की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में जलने लगा, तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गई। आदमी-आदमी से असुरक्षित हो गया।

उपभोक्तावादी संस्कृति से हमारे रीति-रिवाज और त्यौहार भी बहुत हद तक प्रभावित हुए हैं। आज त्यौहार, रीति-रिवाज का दायरा सीमित होता जा रहा। त्यौहारों के नाम पर नए-नए विज्ञापन भी बनाए जा रहे हैं। आज त्यौहारों पर मिठाई की जगह चॉकलेट ने ले ली है। आज रीति-रिवाज का मतलब एक दूसरे से अच्छा लगना हो गया है। इस प्रतिस्पर्धा में रीति-रिवाजों का सही अर्थ कहीं लुप्त हो गया है। प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है। प्रश्न उठता है कि ये चकाचौंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित उपभोक्तावाद समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है।

‘जो दिखता है वही बिकता है’। आज के युग ने इसी कथ्य को स्वीकारा है। ज्यादातर लोग अच्छे विज्ञापन, उत्पाद के प्रतिष्ठा चिह्न को देखकर प्रभावित होते हैं। दिखावे की इस संस्कृति ने समाज के विभिन्न वर्गों के बीच दूरियां बढ़ा दी है। यह संस्कृति मनुष्य में भोग की प्रवृति को बढ़ावा दे रही है। हमें इस पर नियंत्रण करना चाहिए।

उदय इंडिया ब्यूरो

 

 

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