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नवीन पटनायक के बदले सुर : राष्ट्रीय दलों को बाहरी बताया

नवीन पटनायक के बदले सुर : राष्ट्रीय दलों को बाहरी बताया

भारतीय जनता पार्टी द्वारा देश के सभी क्षेत्रों में दल को मजबूत करने के प्रयासों और विभिन्न हालिया चुनावों में दल  की बढ़ती सफलता ने अनेक क्षत्रपों को आतंकित कर दिया है। हैदराबाद, राजस्थान, गोआ, केरल, जम्मू कश्मीर में हुए स्थानीय चुनावों में भाजपा के बढ़े प्रभाव ने क्षेत्रीय दलों में हड़कंप मचा दिया है। आगामी छह महीनों में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, पुडुचेरी जैसे गैर हिंदी भाषी राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। इन राज्यों के चुनाव के लिए भाजपा ने अभी से जिस तरह से तैयारी शुरू कर दी है, विशेषकर पश्चिम बंगाल में, उससे खलबली मच गई है। भाजपा के आक्रामक तेवरों ने ममता बनर्जी जैसी जमीनी पकड़ रखने वाली नेता को भी हतप्रभ कर दिया है। वो महसूस करने लगी है कि इसबार मुकाबला कड़ा होने वाला है। भाजपा के हर राज्य में पैठ बढ़ाने की कोशिशों का सीधा प्रभाव बीस वर्षों से ओडिशा  सत्ता पर काबिज नवीन पटनायक पर भी दिखाई देने लगा है। भाजपा के सहयोग  व गठबंधन कर राजनीति की शुरुआत करने वाले नवीन पटनायक के लिए भाजपा अब सबसे बड़ी शत्रु बन गई है। गत वर्ष के आम चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेल कर मुख्य विपक्षी दल के रूप में नवीन पटनायक के सामने खड़ी हो गई है। इसने नवीन पटनायक को बेचैन कर दिया है। भाजपा से सीधा मुकाबला करने की कल्पना से ही वे इतने व्याकुल हो गए हैं कि उनके समक्ष घोर क्षेत्रीयवाद का कार्ड

खेलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। अपने दल के विभिन्न मंचों से से दिए गये उनके हालिया बयानों ने कई राजनैतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। उन्होंने राष्ट्रीय दलों को ‘बाहरी’ दल बताते हुए राज्य वासियों को केवल बीजू जनता दल पर भरोसा करने का आह्वान किया है।

राज्य का आम चुनाव फिलहाल चालीस महीने दूर है। ऐसे में राष्ट्रीय दलों को ‘बाहरी’ दल बताते हुए अपने बीजू जनता दल को ही ओडिशा का एकमात्र हितैषी दल जतलाना कइयों को अटपटा लगा है।

राजनीतिक रणनीति के लिहाज से नवीन पटनायक के वक्तयों से राष्ट्रीय दल बनाम क्षेत्रीय दल को लेकर एक नई बहस छिडऩे का अंदेशा बना है। लगता है नवीन पटनायक ने अभी से चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है और वे अभी से चुनावी मुद्दों को तराशने में जुट गये हैं। भाजपा के डबल इंजिन की रणनीति का तोड़ निकालने के लिए बीजद ने नई रणनीति बनाई है।

नवीन पटनायक के बयानों से साफ झलकने लगा है कि घोर क्षेत्रीयतावाद, ओडिशा के प्रति केंद्र का सौतेला व्यवहार और संसद व विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण बीजू जनता दल का मुख्य मुद्दा होगा।

26 दिसंबर को बीजद की 24वें स्थापना दिवस पर नवीन पटनायक ने महिला सशक्तिकरण को नया मुद्दा बनाने की घोषणा की। बीजद सुप्रीमो ने घोषणा की बीजद संसद, विधानसभा, स्थानीय निकायों में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण की मांग को तेज करेगी। बीजद ने राज्य में पंचायतों, नगर निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण दिया है। राज्य में 80 लाख महिलाओं को महिला मिशन शक्ति आंदोलन  में शामिल किया है। उन्होंने कहा बीजद एक सामाजिक आंदोलन है और महिलाएं इसकी धुरी में हैं। भविष्य में संसद के हर सत्र में इस मांग को उठाएंगे।

राष्ट्रीय दलों पर निशाना साधते हुए कहा उनके लिए यह सिर्फ चुनावी मुद्दा है।

इससे पहले 18 दिसंबर को नवीन पटनायक ने बीजद युवा कार्यकारिणी को संबोधित करते हुए वंहा क्षेत्रीयतावाद को हवा दी। कहा की राष्ट्रीय दलों को ओडिशा की चिंता कभी नहीं रही। राष्ट्रीय दलों – कांग्रेस व भाजपा- को कोई भी काम करने के लिए अपने राष्ट्रीय बॉस से अनुमति लेनी पड़ती है जबकि बीजू जनता दल ओडिशा माटी की पार्टी है और  उनका बॉस ओडिशा की जनता है।

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प्राकृतिक आपदा झेलती आ रही ओडिशा के लिए बीजद सरकार लंबे समय से विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग करती आ रही है। 2019 में राष्ट्रीय दलों ने अपने घोषणा पत्र में इसे शामिल किया था पर चुनाव समाप्त होते ही वे भूल गए पर बीजद लड़ रही है।  ओडियावाद को आग देते हुए कहा ओड़िया लोगों के लिए ओडिया भाषा हिंदी से अधिक महत्वपूर्ण है। महानदी दूसरी नदियों से अधिक पवित्र है। ओडिशी संगीत शास्त्रीय कला है। कोशली भाषा हमारी भाषा है। आदिवासी परंपरा हमारी शान है। संबलपुरी हस्तकला विश्वस्तरीय है।

राष्ट्रीय दलों के लिए ओडिशा समुद्र में एक बूंद के मांनिद होगा जबकि बीजद के लिए यह समुद्र है। राष्ट्रीय पार्टियां हमें बूंद बना देंगी। उनका इशारा बंगाल के नेताओं  के भाजपा में शामिल होने की ओर था।

राष्ट्रीय दल वृहत राष्ट्रीय हित के नाम पर राज्य हितों को तिलांजलि दे देते हैं। पर बीजद ओडिशा की विशिष्ट पहचान को संरक्षित व प्रोत्साहित  करने के लिए प्रतिबद्ध है। केवल क्षेत्रीय दल ही राज्य के युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा कर सकती है।

20 दिसंबर को बीजद कार्यकारिणी में केंद्र से ओडिशा के लिए न्यायपूर्ण बर्ताव की मांग करते हुए नौ प्रस्ताव पारित किये गये। इन मांगों में स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों अनुसार किसानों को न्यूनतम मूल्य देना, ओडिशा को विशेष राज्य का दर्जा, महिलाओं को विधानसभा और संसद में 33 प्रतिशत आरक्षण, ओडिशा की संस्कृति व विरासत की सुरक्षा ओडिशी नृत्य को शास्त्रीय कला की मान्यता जैसे मांग शामिल हैं।

बैठक के बाद वरिष्ठ बीजद नेता देबी प्रसाद मिश्र ने कहा पार्टी ने स्थापना के बाद से अबतक 1,09,80000 लोगो को सदस्य बनाया।

भाजपा नेता तेल व प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेद्र प्रधान ने मुख्यमंत्री व बीजद के बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मोदी ने देश की महिलाओं की स्थिति सुधारने की जिम्मेदारी ली है। मोदी ने देश में लाखों शौचालय बनवाये हैं। उज्ज्वला योजना के तहत रसोई घरों से महिलाओं को धूएं से मुक्ति के लिए मुफ्त एलपीजी गैस सिलिंडर दिये हैं।। शिशु कन्या के लिए सुकन्या समृद्धि योजना, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजनाएं शुरू की है।

बीजद के पास राज्य के विकास का कोई एजेंडा नहीं है। नरेंद्र मोदी सरकार ने ही ओडिशा उचित उपयुक्त अनुदान दिया है। जो कांग्रेस-नीत सरकार ने कभी भी नहीं दिया।

ओडिशा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष निरंजन पटनायक ने मुख्यमंत्री के कथन को नया ट्विस्ट देते हुए कहा कि यह बीजद और भाजपा के अंदुरूनी संबंधों को चर्चा को छुपाये रखने की चाल है। बीजद जताना चाहती है कि उसकी भाजपा से कोई सांठ-गांठ नहीं है।

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समीर मोहंती ने इसे अपनी असफलता छुपाने की चाल बताया। कहा ‘राज्य की जनता के लिए व यहां की समृद्ध संस्कृति, विरासत की रक्षा के लिए कुछ करने में विफल रहने के बाद नवीन पटनायक दूसरों पर दोषारोपण करने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा सदैव क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान  व मूल्यों को प्रोत्साहित करने को प्रतिबद्ध है।’

राज्य राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि नवीन पटनायक अच्छी तरह जानते हैं कि भाजपा की नजर पूर्वी भारत पर है। असम, त्रिपुरा, बिहार में एक नम्बर का दल बनने के बाद अब उसने नजरें बंगाल पर टिका दी हैं। बंगाल चुनाव के बाद भाजपा का अगला निशाना ओडिशा ही होगा।

दूसरे राज्यसभा में भाजपा की संख्या बढ़ते जाने से बीजद पर उसकी निर्भरता कम होती जाएगी। अत: ओडिशा में वह आक्रामक रुख अपनाएगी।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की प्रकृति वाजपेयी वाली नहीं है। वे अपमान का प्रतिशोध अवश्य लेते हैं। भाजपा 2009 में बीजद द्वारा किये गये अपमान को भूली नहीं है। मौका मिलते ही उसका बदला अवश्य लेगी। शायद इसी चिंता ने नवीन पटनायक को अभी से तैयारी करने व ढाल ढूंढऩे को विवश कर दिया है।

भुवनेश्वर से सतीश शर्मा

 

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