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हलाल पर हंगामा

हलाल पर हंगामा

इन दिनों हलाल मांस को लेकर विवाद बढ़ गया है। विवाद की वजह दो हैं। एक तो दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने अपने अधिकार के दायरे में आने वाले इलाकों के रेस्टोरेंट और दुकानों के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि वे ग्राहकों को बेचे या परोसे जाने वाले मांस के बारे में स्पष्ट करें कि वह मांस हलाल है या झटका। दूसरी वजह यह है कि केंद्र सरकार की संस्था कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी एपीडा ने बेचे जाने वाले ‘लाल मांस’ से जुड़ी अपनी नियमावली में संशोधन करके ‘हलाल’ शब्द हटा दिया है। इस नियमावली में इसकी जगह लिखा गया है ‘जानवरों को आयात करने वाले देशों के नियमों के हिसाब से काटा गया है।’ यहां ये बता देना जरूरी है कि एपीडा केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन आता है।

विवाद की वजह यह है कि अभी तक मांस के कारोबार पर मुस्लिम समुदाय का कारोबारियों का दबदबा है। दरअसल धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से मुस्लिम समुदाय सिर्फ हलाल यानी धीरे-धीरे काटे गए जानवर का ही मांस खा सकता है। वहीं सिखों के लिए हलाल मांस खाना निषिद्ध है। हिंदुओं में भी जो मांसाहारी हैं, वे हलाल मांस नहीं खा सकते। बल्कि दोनों को झटका यानी अचानक से मारे जाने वाले जानवर का ही मांस खाने का विधान है। मुस्लिम समुदाय तो किसी भी कीमत पर झटका मांस नहीं खाता। उसकी धार्मिक मान्यताएं ऐसी अनुमति नहीं देतीं।

बहरहाल झटका और हलाल के इस चक्कर में मांस के कारोबार में हलाल मांस का ही दबदबा है। इसकी वजह यह है कि मुस्लिम समुदाय की मांस के कारोबार में ज्यादा हिस्सेदारी है। इसकी वजह से हलाल मांस को ही निर्यात में भी प्रधानता है। निर्यात व्यवस्था के तहत अब तक वही मांस विदेशों में भेजा जा सकता था, जिसे हलाल का प्रमाण पत्र हासिल हो। लेकिन हाल के दिनों में इस पर सवाल उठने लगा था। ऐसी मान्यता रही है कि सबसे ज्यादा मांस मुस्लिम देशों को निर्यात होता है और वहां झटका मांस चल नहीं सकता, लिहाजा निर्यात होने वाले मांस के लिए हलाल का प्रमाण होना जरूरी था। चूंकि इस कारोबार पर मुस्लिम समुदाय का पारंपरिक रूप से दबदबा रहा है, इसलिए इस प्रमाणन का अधिकार भी मुस्लिम संस्था ‘जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद’ को दिया गया था। इसीलिए एपीडा की नियमावली में पहले लिखा था, ‘सारे जानवरों को इस्लामिक शरियत के हिसाब से काटा जाता है और वो भी जमीयत-उल-उलेमा-ए-हिन्द की देखरेख में। इसके बाद जमीयत ही इसका प्रमाण-पत्र देता है।’ माना जाता है कि इस वजह से देश में बिना जमीयत के सर्टिफिकेशन के छोटा-मोटा मांस कारोबार चल तो सकता था, लेकिन विदेशों में निर्यात करने के लिए मांस का हलाल प्रमाणन जरूरी था। इसकी वजह से इसका विरोध बढ़ रहा था। बाकायदा इसके खिलाफ संघर्ष के लिए हलाल नियंत्रण मंच का गठन किया गया है। इसी मंच का कहना है कि एपीडा की नियमावली में ही ऐसे प्रावधान किये गए हैं, जिसकी वजह से तब तक कोई बूचडख़ाना नहीं चल सकता, जब तक उसमें हलाल प्रक्रिया से जानवर ना काटे जाएं। मंच की ही कोशिश का नतीजा है कि एपीडा की नियमावली में बदलाव किया गया है।

Hogg meat market 1

ऐसे में सवाल यह है कि आखिर इस बदलाव को लेकर विवाद क्यों हैं? दरअसल अब तक के ना सिर्फ मांस कारोबार, बल्कि हलाल प्रमाणन की व्यवस्था पर भी मुस्लिम समुदाय का इसी नियम की वजह से दबदबा है। लेकिन नियम में बदलाव के बाद अब यह दबदबा खत्म होगा। अब जिन कारोबारियों को सिर्फ मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों में ही मांस का निर्यात करना होगा, उनके लिए ही हलाल प्रमाण की जरूरत होगी। लिहाजा मांस कारोबार के बड़े हिस्से को इससे अब छूट मिल जाएगी। हलाल नियंत्रण मंच के मुताबिक, करीब 11 हजार करोड़ का सालाना मांस निर्यात कारोबार हलाल के नाम पर चलने वाली व्यवस्था के चलते चुनिंदा हाथों में है। जबकि देश में सबसे ज्यादा मांस निर्यात चीन को होता है, जहां के लिए यह मायने ही नहीं रखता कि झटका मांस चाहिए या हलाल। वित्तीय साल 2019-2020 के आंकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं कि देश से निर्यात होने वाले मांस में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी वियतनाम को रही। इस आंकड़े के मुताबिक देश से लगभग 23 हजार करोड़ रुपये का भैंस का मांस का निर्यात हुआ, जिसमें सबसे ज्यादा निर्यात 7600 करोड़ का निर्यात अकेले वियतनाम को हुआ। इसके बाद नंबर हांगकांग और चीन का रहा।

जाहिर है कि नई नियमावली से चीन, जापान या ऐसे देशों को भेजे जाने वाले मांस के लिए हलाल की जरूरत नहीं रहेगी। इसलिए ऐसे कारोबारी हलाल सर्टिफिकेशन के लिए जमीयत की देखरेख में चलने वाली संस्था के पास नहीं जाएंगे। इस वजह से हलाल प्रमाण देकर सालाना करोड़ों की कमाई करने वाली जमीयत की आय घटना तय है। विवाद की वजह यही है। इसी वजह से नई नियमावली को लेकर खासकर मुस्लिम समुदाय से आवाज उठ रही है।

एपीडा की बदली नियमावली के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के कब्जे वाले दक्षिण दिल्ली नगर निगम ने अपने इलाके के रेस्टोरेंट और दुकानों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे अपने यहां से बेचे और परोसे जाने वाले मांस के बारे में ग्राहक को यह बताएं कि उनके यहां बिक रहा मांस हलाल है या झटका। यहां यह जानकारी देना जरूरी है कि एपीडा ने अपनी नियमावली में बदलाव जहां 6 जनवरी 2021 को किया, वहीं दक्षिण दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति ने यह बदलाव 24 दिसंबर 2020 को किया। दरअसल दक्षिण दिल्ली नगर निगम की स्थायी समिति के अध्यक्ष राजदत्त गहलोत की अध्यक्षता में हुई बैठक में पार्षद अनीता तंवर तथा कमलेश शुक्ला ने इससे जुड़ा प्रस्ताव रखा था।

दक्षिण दिल्ली नगर निगम के फैसले का भी असर मांस कारोबार पर दबदबा रखने वाले मुस्लिम समुदाय के कारोबारी हित पर पड़ेगा। जब यह नियम लागू हो जाएगा तो जाहिर है कि मांसाहार करने वाले हिंदू और सिख धर्मावलंबी हलाल मांस से परहेज करेंगे और झटका मांस को वरीयता देंगे। चूंकि इस्लाम में झटका मांस का निषेध है। लिहाजा मुस्लिम कारोबारी ऐसे मांस का कारोबार नहीं करते। मुस्लिम मान्यता के अनुसार हलाल करने से पहले कलमा पढऩे और गर्दन पर तीन बार छुरी फेरने का विधान है। इस्लामी मान्यता के मुताबिक जानवर हलाल के समय बेहोश नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही हलाल करते वक्त जानवर की गर्दन को धारदार चाकू से रेता जाता है। इस दौरान उसकी सांस की नली काट दी जाती है।

यहां ध्यान देने की बात है कि दुनिया में मुख्यत: तीन तरीकों से जानवरों को काटा जाता है और उनका मांस हासिल किया जाता है। इन तरीकों को हलाल, झटका और शेचिता कहा जाता है। हलाल की तो पहले चर्चा हो गई। झटका शब्द बिजली के झटके से जुड़ा है। वैसे इस तरीके में जानवर को काटने से पहले बिजली का झटका देकर उसे सुन्न कर दिया जाता है और फिर उसी अचेतावस्था में उसे काट दिया जाता है। वैसे झटका में एक प्रचलन यह भी है कि जानवर का ध्यान दाना, चुग्गा के जरिए भटकाकर उसे झटके से मार दिया जाता है। जबकि शेचिता का तरीका यहूदी समुदाय बहुत पुराने समय से इस्तेमाल करता रहा है।

अब तक देश में मांसाहार और शाकाहार को लेकर ही विवाद होता रहा है। लेकिन अब इन दोनों फैसलों से मांसाहार को लेकर अलग तरह का विवाद खड़ा हो गया है। विश्व हिंदू परिषद समेत कुछ संगठनों का कहना है कि परोक्ष तरीके से देश में हलाल संस्कृति को थोपने की कोशिश तेज हुई है। अगर ऐसा नहीं होता तो आटा, दाल, चावल, तेल आदि पर हलाल का सर्टिफिकेट लेने की क्या जरूरत है। इसी कोशिश और इसके जरिए एक खास समुदाय और संस्था को मालामाल करने और उसकी संस्कृति को परोक्ष तरीके से थोपने का विरोध अरसे से हो रहा था। जाहिर है कि एपीडा के नए नियम और दक्षिण दिल्ली नगर निगम का फैसला इसी विरोध का नतीजा है। अगर नई नियमावली ठीक से लागू हुई तो निश्चित तौर पर मांस कारोबार चुनिंदा हाथों से ना सिर्फ बाहर निकलेगा, बल्कि शाकाहारी पदार्थों के लिए जबरिया हलाल सर्टिफिकेट दिए जाने की परंपरा टूटेगी।

 

उमेश चतुर्वेदी

 

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