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बंगाल में दीदी का सिकुड़ता प्रभाव भाजपा ने तेज की मुहिम

बंगाल में दीदी का सिकुड़ता प्रभाव  भाजपा ने तेज की मुहिम

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले ही तृणमूल कांग्रेस का किला ढहने लगा है। तृणमूल विधायक दीदी का साथ छोड़ रहे हैं। इसका परिणाम क्या होगा? कैसे बचा पाएगी दीदी अपनी पार्टी और सरकार को? इन्हीं बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा है इस आलेख में।

 

पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस के किले को भेदना शुरू कर दिया है। ममता बनर्जी का किला दरकता जा रहा है और उनके खेमे का सिपहसालार एक-एक करके भाजपा के खेमे में आते जा रहे हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने बंगाल में 200 से अधिक विधानसभा सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जबकि सत्ता के सिंहासन पर पहुंचने के लिए जादुई आंकड़ा 148 का ही है। केंद्रीय गृहमंत्री व भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने जब यह लक्ष्य निर्धारित किया था तो तृणमूल के नेताओं ने इसे दिवास्वप्न करार दिया था, लेकिन भाजपा निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है। बंगाल का चुनावी महासमर हर दिन दिलचस्प मोड़ लेता जा रहा है। भगवा ब्रिगेड की रणनीति सिर्फ मुख्यमंत्री व तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी के वोट बैंक में सेंधमारी की ही नहीं है, बल्कि उनके संगठन को कमजोर करने की भी है।

32यही वजह रही है कि थोक के भाव में तृणमूल के छोटे-बड़े नेताओं, कार्यकर्ताओं को भगवा कैंप में शामिल कराया जा रहा है। हालांकि इन सबके बावजूद भाजपा के लिए सत्ता के शिखर पर पहुंचने की राह आसान नहीं होगी, क्योंकि ममता ने पिछले डेढ़ दशक में दक्षिण और मध्य बंगाल में अपना ऐसा किला तैयार कर रखा है, जिसे भेदे बिना भाजपा का सपना साकार नहीं हो सकेगा। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पिछला लोकसभा चुनाव है। उत्तर बंगाल और जंगलमहल में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद दक्षिण बंगाल में भाजपा को महज छह सीटें ही हाथ लगी और मध्य बंगाल में तो खाता भी नहीं खुला। पिछले लोकसभा चुनाव में बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से भाजपा को 18 और तृणमूल को 22 सीटें मिली थीं। यदि इन लोकसभा सीटों पर मिली जीत में विधानसभावार नतीजों को देखें तो भाजपा 121 और तृणमूल 164 सीटों पर आगे थी, जबकि सत्तासीन होने के लिए 148 सीटें चाहिए। वर्ष 2019 में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन तृणमूल दक्षिण और मध्य बंगाल में अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रही। यह ममता का पारंपरिक गढ़ माना जाता है। विगत लोकसभा चुनाव में जिन 121 सीटों पर भाजपा आगे रही, उनमें से 67 सीटें पहाड़ी, उत्तर बंगाल और जंगलमहल क्षेत्र की थीं। इन क्षेत्रों में कुल 94 विधानसभा सीटें हैं। वहीं दक्षिण की 167 और मध्य बंगाल की 33 सीटों में से भाजपा महज 48 और छह सीटों पर आगे रही थी। तमाम गुणा-भाग और समीकरण को ध्यान में रखते हुए भाजपा बंगाल के इलाकों को पांच जोन में बांटकर अपनी रणनीति को अमलीजामा पहना रही है। उत्तर बंगाल जोन में आठ जिले हैं, जहां 54 सीटें हैं= नवद्वीप जोन में मुर्शीदाबाद, नदिया और उत्तर 24 परगना जिले के कुछ हिस्से को शामिल किया है, जिसमें 63 सीटें हैं। राढ़बंग जोन में दोनों बर्द्धमान, बांकुड़ा, पुरुलिया और बीरभूम जिले को शामिल किया गया है, जहां 57 सीटें हैं। मेदिनीपुर जोन में दोनों मेदिनीपुर, हावड़ा और हुगली जिले को शामिल किया है, जहां 69 सीटें हैं और कोलकाता जोन में महानगर, दक्षिण 24 परगना और उत्तर 24 परगना जिले के कुछ हिस्सों को शामिल किया गया है, जहां 51 विधानसभा सीटें हैं। हर जोन में अधिक से अधिक सीटें जीतने के लिए भाजपा ने पांच राज्यों के संगठन महामंत्रियों के साथ-साथ राष्ट्रीय महासचिव व सचिवों को भी तैनात किया है। गुजरात के संगठन महामंत्री भीखूभाई दलसानिया नवद्वीप जोन देख रहे हैं और वहां प्रभारी की जिम्मेदारी राष्ट्रीय सचिव विनोद तावड़े संभाल रहे हैं।


 

सौमेंदु को अध्यक्ष पद से हटाने पर हाईकोर्ट ने मांगा जवाब


 

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पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री एवं मेदिनीपुर के कद्दावर नेता शुभेंदु अधिकारी के भाई सौमेंदु अधिकारी को पिछले दिनों कांथी नगरपालिका के प्रशासक बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटा दिया था। इसके विरोध में सौमेंदु अधिकारी हाइकोर्ट गये और अब कोर्ट ने बंगाल की ममता बनर्जी सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने  पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह कांथी नगरपालिका के प्रशासक बोर्ड के अध्यक्ष पद से सौमेंदु अधिकारी को हटाये जाने के संबंध में हलफनामा दाखिल करे। जस्टिस अरिंदम सिन्हा ने राज्य सरकार को इस संबंध में 15 जनवरी तक हलफनामा दाखिल करने को कहा है।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता सौमेंदु अधिकारी सरकार द्वारा हलफनामा दाखिल करने के एक सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल कर सकते हैं। अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए 21 जनवरी की तारीख तय की है। सौमेंदु अधिकारी ने अपनी याचिका में पूर्वी मेदिनीपुर जिले में कांथी नगरपालिका के प्रशासक बोर्ड के अध्यक्ष पद से उन्हें हटाने के राज्य सरकार के प्राधिकार को चुनौती दी है। भाजपा नेता सुभेंदु अधिकारी के छोटे भाई सौमेंदु अधिकारी को दिसंबर के अंतिम सप्ताह में पद से हटाया गया था। सौमेंदु, पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस छोडऩे के बाद एक जनवरी को भाजपा में शामिल हो गये थे। सौमेंदु अधिकारी के साथ कांथी नगरपालिका के 15 पार्षदों ने भी भाजपा का दामन थाम लिया था। मेदिनीपुर में सौमेंदु के बड़े भाई शुभेंदु ने ममता बनर्जी और तृणमूल को हराने की ठान रखी है। उल्लेखनीय है कि अप्रैल-मई में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनाव से पहले भारी संख्या में तृणमूल कांग्रेस के विधायक, नेता और मंत्री पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो रहे हैं।


इसी तरह उत्तर प्रदेश के संगठन महामंत्री सुनील बंसल कोलकाता जोन में मोर्चा संभाल रहे हैं और वहां प्रभारी के रूप में राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम हैं। वहीं हरियाणा के संगठन महामंत्री रवींद्र राजू को राढ़बंग जोन में तैनात किया गया है, जहां के प्रभारी विनोद सोनकर हैं। हिमाचल प्रदेश के संगठन महामंत्री पवन राणा मेदिनीपुर जोन में कामकाज संभाल रहे हैं, जहां की कमान सुनील देवधर और उत्तर बंगाल जोन में त्रिपुरा के संगठन महामंत्री पीएन शर्मा कार्य देख रहे हैं और प्रभारी राष्ट्रीय सचिव हरीश द्विवेदी हैं। ये सभी बंगाल में सक्रिय हैं। अपनी स्थिति परखने को भाजपा कई स्तरों पर आंतरिक सर्वे भी करा कर जनता की नब्ज टटोल रही है। अभी हाल में हुए सर्वे में भाजपा को बहुमत के करीब बताया गया है, लेकिन जो लक्ष्य है, उससे अभी दूर है। दूसरी तरफ ममता अभी पूरी तरह से मैदान में नहीं उतरी हैं, क्योंकि उनकी अपनी लोकप्रियता है और बंगाल में उनके स्तर का नेता भाजपा के पास नहीं है। इसके अलावा, चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर तृणमूल की जीत सुनिश्चित करने के लिए दुआरे सरकार, बंग ध्वनि जैसे अभियान चलवा रहे हैं। इसके बावजूद तृणमूल के विधायक पार्टी का साथ छोड़ रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी के बाद पश्चिम बंगाल के खेल राज्य मंत्री लक्ष्मी रतन शुक्ला ने मंत्री पद छोड़ दिया है।

भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व खिलाड़ी व राज्य के खेल राज्य मंत्री लक्ष्मी रतन शुक्ला ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इस्तीफा पत्र सौंप दिया। रतन शुक्ला ने मंत्री पद छोडऩे के साथ ही यह भी कहा है कि वह राजनीति से संन्यास लेना चाहते हैं और फिर से क्रिकेट जगत में लौटना चाहते हैं। लक्ष्मी रतन शुक्ला ने फिलहाल सिर्फ मंत्री पद छोड़ा है। उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया है। इसके साथ ही श्री शुक्ला हावड़ा सदर जिला के तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं। पार्टी के कार्यकलापों से पूर्ण रूप से जुड़े हुए हैं। वह पार्टी का पद छोड़ेंगे या नहीं, इस बारे में श्री शुक्ला ने कोई जानकारी नहीं दी है। हालांकि इस संबंध में तृणमूल कांग्रेस सांसद व प्रवक्ता सौगत राय ने कहा कि लक्ष्मी रतन शुक्ला के इस कदम से काफी दुखी हैं। किस कारण से उन्होंने यह पद छोड़ा है, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी है। अपनी समस्याओं को लेकर उन्होंने किसी से कोई बात भी नहीं की है। उन्होंने कहा कि ऐसा कदम उठाने से पहले उन्हें पार्टी नेतृत्व से बातचीत करनी चाहिए। लक्ष्मी रतन शुक्ला के पार्टी छोडऩे पर भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष जय प्रकाश मजूमदार ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के साथ अब सच्चे राजनेता रहना नहीं चाहते। तृणमूल कांग्रेस में सच बोलने वाले नेताओं को दबा कर रखा जाता है। उन्होंने कहा कि अगर लक्ष्मी रतन शुक्ला भाजपा में शामिल होने की इच्छा जाहिर करते हैं तो उनका स्वागत है। ममता बनर्जी की कैबिनेट से इस्तीफा देने वाले खेल मंत्री लक्ष्मी रतन शुक्ला ने फेसबुक पर टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरभ गांगुली के साथ एक पेंटिंग शेयर की है। इसके साथ उन्होंने जो पोस्ट लिखा है, उसके लोग मायने तलाश रहे हैं। लक्ष्मी रतन शुक्ला ने सौरभ गांगुली के साथ उनकी एक पेंटिंग पोस्ट करते हुए लिखा है, एक सच्चा लीडर न केवल खेलता है, बल्कि अपनी टीम के सदस्यों को भी खेलने में मदद करता है। इस प्यारी सी पेंटिंग के लिए धन्यवाद मेरे दोस्त।’ पश्चिम बंगाल में चल रही दलबदल की राजनीति के बीच इस पोस्ट को लक्ष्मी रतन शुक्ला के इस्तीफा और सौरभ गांगुली की राज्यपाल जगदीप धनखड़ और फिर दिल्ली में अमित शाह की मुलाकात से भी जोड़कर देखा जा रहा है। लक्ष्मी रतन शुक्ला ने  अचानक खेल मंत्री के पद से और तृणमूल कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया।

लक्ष्मी रतन शुक्ला ने ममता बनर्जी को लिखी चि_ी में कहा था कि वह राजनीति से संन्यास लेना चाहते हैं। क्रिकेट को वक्त देना चाहते हैं। इसलिए मंत्री और तृणमूल की सदस्यता से इस्तीफा दे रहे हैं। हालांकि, उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है। उन्होंने कहा है कि वह विधायक के रूप में 5 साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। हालांकि, पार्टी की कार्यशैली को लेकर उनके मन में रोष है। बताया जा रहा है कि साढ़े चार साल तक वह मंत्री रहे, लेकिन कभी उनके पास एक फाइल नहीं आयी। अरुप रॉय को हटाकर जब उन्हें हावड़ा जिला का अध्यक्ष बनाया गया, तो उनकी कमेटी को मंजूरी नहीं दी गयी। हालांकि, सौगत रॉय ने कहा है कि लक्ष्मी रतन ने कभी नहीं बताया कि उसे काम करने में दिक्कत हो रही है। आपको बताता चलूं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस ने कहा है कि ‘बंगाली अस्मिता’ के लिए ‘बंगाल बचाओ’ उसके प्रचार अभियान के केंद्र में होगा। राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी के मुख्य मुकाबले में कांग्रेस ने वामदलों के साथ मिलकर अपनी मजबूत उपस्थित दर्ज कराने की कोशिशें अभी से शुरू कर दी हैं।


 

कांग्रेस-वामदल गठबंधन कितना असर डाल पाएगा?


 

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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए बने कांग्रेस-वामदल गठबंधन के नेताओं ने कोलकाता में एक बैठक की। लंबी बैठक के बाद भी कोई अंतिम निर्णय नहीं हो पाया। गठबंधन के घटक दल फिर इस मुद्दे पर बैठक करेंगे। कांग्रेस और माकपा नीत वाम मोर्चा ने अप्रैल-मई में पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सीटों के बंटवारे को लेकर रिपन स्ट्रीट स्थित क्रांति प्रेस में बैठक की। वाम मोर्चा के अध्यक्ष बिमान बोस, कांग्रेस की ओर से विधानसभा में विपक्ष के नेता अब्दुल मन्नान और अन्य नेताओं ने चर्चा में भाग लिया। कांग्रेस और वाम मोर्चा के नेताओं ने सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चाएं कीं। काफी देर तक चर्चा के बावजूद अंतिम सहमति नहीं बन पायी। इसके बाद तय किया गया कि गठबंधन के घटक दल फिर बैठेंगे और सीटों के तालमेल पर चर्चा करेंगे। कांग्रेस आलाकमान और वाम मोर्चा के घटक दलों के केंद्रीय नेतृत्व ने अपनी राज्य इकाइयों को सीट बंटवारे को लेकर बातचीत करने को कहा है। कांग्रेस और वाम दलों ने वर्ष 2016 का राज्य विधानसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा था। लेकिन, वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में वे अलग-अलग हो गये थे। लोकसभा चुनाव में वामदलों को एक भी सीट हासिल नहीं हो पायी थी। हालांकि, कांग्रेस ने 2 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल

की थी। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस आलाकमान ने बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में सीट शेयरिंग के लिए एक समिति का गठन किया है, जिसका अध्यक्ष पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को बनाया गया है। अधीर रंजन चौधरी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं।


अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और बंगाल प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी जितिन प्रसाद एवं पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी की अगुवाई में बंगाल के चुनाव को त्रिकोणीय मुकाबला बनाने में जुटी है। इसलिए पार्टी ने वामदलों के साथ मिलकर चुनाव लडऩे का फैसला किया। सीटों के बंटवारे के लिए अधीर रंजन चौधरी की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन भी कर दिया गया है। कांग्रेस को उम्मीद है कि वह अपने पिछले प्रदर्शन को बरकरार रखेगी। पिछली बार यानी वर्ष 2016 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-वामदल मिलकर लड़े थे। 294 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस के हिस्से में 90 सीटें आयीं थीं। उसे 44 सीटों पर जीत मिली थी। वामदल 32 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाया था। इसलिए पार्टी ने इस बार बंगाली अस्मिता को अपना चुनावी हथियार बनाने का निश्चय किया है। पार्टी को उम्मीद है कि बंगाली अस्मिता और स्थानीय नेता के मुद्दे पर उसे लोगों का समर्थन हासिल होगा और कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन कर पायेगी।

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं बंगाल प्रदेश के प्रभारी जितिन प्रसाद ने कहा है कि भाजपा के पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं है, जिसे वह अपना मुख्यमंत्री बना सके। जबकि कांग्रेस के पास अधीर रंजन चौधरी जैसे दमदार बंगाली नेता हैं। जितिन प्रसाद ने यह भी कहा कि बंगाल में उनके पास फायरब्रांड नेता अधीर रंजन चौधरी हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी जैसे दमदार नेता मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर भाजपा के पास कोई लोकल चेहरा नहीं है, तो तृणमूल कांग्रेस के शासन में पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति चरमरा गयी है। बिगड़ती कानून-व्यवस्था के चलते बंगाल की संस्कृति मिट रही है। उधर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और तृणमूल कांग्रेस  के सांसद अभिषेक बनर्जी ने केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी  पर जोरदार हमला बोला है और भाजपा नेताओं को चुनौती दी है कि अगर वो मुझे कट-मनी का दोषी पाते हैं तो सीधे फांसी पर चढ़ा दें।

दक्षिणी मिनाजपुर में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए अभिषेक बनर्जी ने कहा कि वे लोग रोज-रोज ‘भाइपो-भाइपो और तोलेबाज’ कहकर मुझे बदनाम करने की कोशिश करते हैं लेकिन सीधे मेरा नाम नहीं लेते। उन्होंने कहा, ‘वे रोज मुझ पर हमला कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जबरन भतीजे को हटाओ। मैंने पहले भी यह कहा है और मैं यहां कैमरों के सामने फिर से यही कह रहा हूं। यदि आप यह साबित कर सकते हैं कि मैं जबरन वसूली में शामिल हूं और यदि आप साबित कर सकते हैं कि मैं किसी गलत काम में शामिल हूं, तो आपको ईडी और सीबीआई को भेजने की जरूरत नहीं है। सार्वजनिक रूप से फांसी के फंदे पर चढ़ा दो, मैं मौत को गले लगा लूंगा।’ भारी भीड़ के बीच युवा नेता ने बीजेपी नेताओं को सीधे नाम लेने की चुनौती दी। उन्होंने बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय का नाम लेते हुए उन्हें गुंडा कहा। टीएमसी नेता ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को भी गुंडा करार दिया। बनर्जी ने अमित शाह समेत बीजेपी के सभी केंद्रीय नेताओं को बहरा कहा। अभिषेक बनर्जी ने कहा, ‘मेरे खिलाफ केस करो और मुझे जेल भेजकर दिखाओ, यह साबित हो जाएगा कि कौन सच बोल रहै है और कौन झूठ बोल रहा है?’

बनर्जी ने पीएम मोदी पर भी निशाना साधा और कहा कि 2014 में पीएम बनने के बाद सात साल हो गए लेकिन उन्होंने देश में कोई बदलाव नहीं लाया। खुद दस लाख के सूट पहनने लगे और महंगी गाडिय़ों में चलने लगे जबकि ममता बनर्जी 2011 में मुख्यमंत्री बनीं लेकिन आज भी सादी साड़ी और हवाई चप्पल में रहती हैं। उसी घर में रहती हैं, जहां पहले रहती थीं। उसी गाड़ी में चलती हैं, जिसमें पहले चलती थीं। उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी लागू करने के लिए भी पीएम मोदी की आलोचना की। इन तमाम बातों के बीच बस एक ही बात उभरती है कि इस बार का बंगाल विधान सभा चुनाव में बहुमत हासिल करना बहुत मुश्किल होगा।

कोलकाता से संजय सिन्हा

 

 

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