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येदियुरप्पा : भाजपा का खेवनहार

येदियुरप्पा : भाजपा का खेवनहार

कर्नाटक में कैबिनेट विस्तार के तहत सात मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल करने के कुछ समय बाद ही कर्नाटक के 77 साल के मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा को ‘बेटों को लेकर विरोध’ और ‘सीडी के जरिये ब्लैकमेल किए जाने’ के आरोपों का सामना करना पड़ा। बीजेपी के ही कुछ वरिष्ठ नेताओं ने ये आरोप लगाए हैं। मंत्री न बनाए जाने से नाराजगी के बाद ये तेवर सामने आए हैं। येदियुरप्पा के खिलाफ विद्रोही सुर कोई नई बात नहीं है। वास्तव में अपरिहार्य माने जा रहे कैबिनेट विस्तार को करीब 17 माह तक टाला गया। इस पर आखिरी मुहर तब लगी, जब मुख्यमंत्री ने पार्टी के ‘चाणक्य’ और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से एक पखवाड़ा पहले दिल्ली में मुलाकात की। ऐसे में जब असंतुष्टों ने हाल ही में आलोचना शुरू की तो येदियुरप्पा ने उन्हें दिल्ली जाने और गृहमंत्री से बात करने की नसीहत दी।

कैबिनेट विस्तार के लिए हरी झंडी ऐसे वक्त मिली थी जब बी.एस. येदियुरप्पा के नाम से गृह राज्य में मशहूर येदियुरप्पा के नेतृत्व में बीजेपी को हालिया उप-चुनाव में दो ऐसी सीटों पर जीत मिली, जो कभी पहले पार्टी की झोली में नहीं रहीं। हालिया पंचायत चुनाव में भी बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया।

ऐसे में जब न सिर्फ विपक्ष बल्कि अपनी ही पार्टी के लोग येदियुरप्पा की जड़ खोदने में लगे हैं, इसके बावजूद कर्नाटक में उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सिर्फ लिंगायत के नेता कहकर येदियुरप्पा को खारिज करना आसान नहीं है। कर्नाटक के मांड्या जिले के बुकानाकेरे में सिद्धलिंगप्पा और पुत्तथयम्मा के घर 27 फरवरी 1943 को जन्मे येदियुरप्पा ने चार साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया था। उन्होंने अपने पॉलिटिकल करियर की शुरुआत साल 1972 में शिकारीपुरा तालुका के जनसंघ अध्यक्ष के रूप में की थी। इमरजेंसी के दौरान वे बेल्लारी और शिमोगा की जेल में भी रहे। यहां से उन्हें इलाके के किसान नेता के रूप में जाना जाने लगा था। साल 1977 में जनता पार्टी के सचिव पद पर काबिज होने के साथ ही राजनीति में उनका कद और बढ़ गया।

 

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कर्नाटक की राजनीति में उन्हें नजरंदाज करना इसलिए नामुमकिन हो जाता है क्योंकि 1988 में ही उन्हें पहली बार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया था। येदियुरप्पा 1983 में पहली बार शिकारपुर से विधायक चुने गए और फिर छह बार यहां से जीत हासिल की। 1994 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद येदियुरप्पा को असेम्बली में विपक्ष का नेता बना दिया गया। 1999 में जब वो चुनाव हार गए तो बीजेपी ने उन्हें एमएलसी बना दिया। जिन दो महत्वपूर्ण जातियों के हाथों में कर्नाटक की राजनीति का भविष्य रहा है वो हैं लिंगायत और वोक्कालिगा। कर्नाटक में मुख्यमंत्री अमूमन इसी समुदाय से ही रहे हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में हार के बाद बीजेपी को समझ आ गया कि बिना येदियुरप्पा के कर्नाटक में कमल खिलना बेहद मुश्किलों भरा साबित होगा।

आपदा को अवसर  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना फैलाव के शुरुआती दिनों में नारा दिया था ‘आपदा को अवसर में बदलने’ का। ऐसा लगता है बी.एस. येदियुरप्पा ने इस मन्त्र को आत्मसात कर लिया था क्योंकि जैसी मुस्तैदी उन्होंने इस महामारी से निबटने में दिखाई, उससे इनके धुर विरोधियों के मुंह पे भी ताला लग गया।  कोरोना वायरस संकट ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा को अपनी पार्टी में उनके विरोधियों को जिनमें दिल्ली के भी लोग हैं, उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है। ऐसा माना जा रहा था की भाजपा आलाकमान राज्य में 78 वर्षीय मुख्यमंत्री के नेतृत्व को बदलने की कोशिश में था जो कि राज्य में पार्टी का सबसे बड़ा नेता है और जो अपने खुले मिजाज के लिए जाना जाता है। लेकिन कोविड संकट के दौरान उनके प्रबंधन ने भाजपा में कईयों को चौंका दिया। न केवल उनके प्रशासन की स्वास्थ्य संकट पर प्रतिक्रिया ने बल्कि आर्थिक संकट से निकलने के लिए बिजनेस और उद्योगों को साथ लाकर काम करने के प्रयासों ने भी।

राज्य में कोविड के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई के वे अगुआ हैं। वो सीधे तौर पर नौकरशाही के साथ मिलकर इस संकट का प्रबंधन कर रहे हैं। कोविड संकट के आने तक मुख्यमंत्री पिछले कई महीनों से, जब से ‘ऑपरेशन कमल’ के जरिए पिछली कांग्रेस सरकार को गिराया गया और 26 जुलाई को उन्होंने शपथ ली, तब से वो घिरे हुए हैं।34

उन्हें भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व में हो रही आंतरिक कलह का सामना करना पड़ रहा था जिन्हें मंत्री नहीं बनाया गया था। कांग्रेस और जेडीएस के 22 विधायक जो भाजपा में शामिल हुए थे और येदियुरप्पा पर आरोप लग रहे थे के उनका परिवार ही सरकार चला रहा है। केंद्रीय नेतृत्व से कैबिनेट विस्तार की मंजूरी भी येदियुरप्पा को जल्दी नहीं मिली। नतीजतन करीब 20 दिनों तक मुख्यमंत्री अकेले ही सरकार चलाते रहे। उस दौरान वो अकेले ही उत्तरी कर्नाटक में आए बाढ़ का सामना कर रहे थे।

 

लेकिन जब से कोविड संकट आया है तब से मुख्यमंत्री ने कुछ ठोस फैसले लिए हैं जिसने उनकी छवि बदलने में भी मदद की है। जब देश में कोरोना वायरस से मरने वाले पहले व्यक्ति की रिपोर्ट कलबुर्गी से आई तो येदियुरप्पा ने 15 मार्च को पूरे जिले को बंद करने के आदेश दे दिए और निर्देश दिए कि 76 वर्षीय मरीज के साथ जो भी संपर्क में आया था उसका पता लगाकर जांच की जाए। शुरुआत में कफ्र्यू में लोगों की तरफ से गतिरोध आ रहा था लेकिन बाद में उन्होंने देखा कि ऐसा करने से पॉजिटिव मामलों में कमी आई है।

कर्नाटक ने 25 मार्च को हुए देशव्यापी लॉकडाउन से तीन दिन पहले ही यानि की 22 मार्च को नौ जिलों को बंद कर दिया था। जिनमें बंगलुरु, बंगलुरु ग्रामीण, मैसूर, कोडागू, दक्षिण कन्नडा (मंगलुरु), धारवाड़, कलबुर्गी और चिकबल्लापुर शामिल हैं।

राज्य सरकार ने अपनी सीमाओं को भी सील कर दिया था जिसमें विवादित केरल सीमा भी है, जिसमें बाहर के राज्यों से इलाज कराने वाले लोगों को मना कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे बदला गया जिसमें कहा गया था कि जिसे कोविड नहीं है उन्हें तत्काल मदद दी जाए। मुख्यमंत्री ने टास्क फोर्स का भी गठन किया, जिसमें नारायण हेल्थ के डॉ. देवी शेट्टी और बायोकॉन के डॉ किरण मजूमदार-शॉ शामिल थे, और लॉकडाउन को संभालने के लिए नियमित रूप से उनके साथ बैठकें कीं।

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महामारी के बीच में, येदियुरप्पा ने भी एक मजबूत संदेश दिया, यह कहते हुए कि मुस्लिम समुदाय को बीमार बोलने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी और उन्हें तबलीगी जमात मुद्दे के दौरान वायरस के प्रसार से जोड़ा जाएगा। जबकि उनके बयान की खूब सराहना हुई, यहां तक कि विपक्षी कांग्रेस और जद (एस) से भी। इसलिए यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए की कोविड-19 ने येदियुरप्पा की पकड़ को मजबूत किया है। कर्नाटक में ये संदेश गया है कि संकट को ठीक से संभाला गया है। येदियुरप्पा ने नौकरशाही को स्वतंत्र होकर काम करने की इजाजत दी। समग्रता से देखें तो कर्नाटक ऐसे राज्य के रुप में सामने आया है जिसने इस संकट को किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले सबसे सही ढंग से संभाला है और इसका श्रेय येदियुरप्पा को जाता है।

इसके अलावा जहां देश के बाकी राज्यों ने इस महामारी के दौरान अर्थ तंत्र के डूबने का रोना रोते रहे वहीं येदियुरप्पा महामारी के दौरान राज्य की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के अपने प्रयासों में जुटे रहे। राज्य भारी मात्रा में नकदी से भरा है और मुख्यमंत्री ने केंद्र से कई बार अपील की थी कि वे ग्रीन जोन में आर्थिक गतिविधियों की अनुमति दें।

येदियुरप्पा उन पहले कुछ मुख्यमंत्रियों में से थे जिन्होंने आर्थिक गतिविधियों जैसे कि निर्माण कार्य और उद्योगों को खोलने की अनुमति मांगी थी। उन्होंने राज्य में शराब की दुकानें भी खोलीं क्योंकि राजस्व का सबसे बड़ा स्त्रोत एक्सायज ड्यूटी है।

मुख्यमंत्री ने जापान, कोरिया, फ्रांस, जर्मनी अमेरिका और ताइवान जैसे देशों के प्रतिनिधियों से मिलकर एक टास्क फोर्स का गठन किया, जो विशेष रूप से कर्नाटक में निवेश करने के लिए आकर्षित कर रहा है वो भी उस समय जब कई कंपनियों को चीन से बाहर निकलने पर विचार कर रही है।

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दक्षिण का कमल : येदियुरप्पा

बी. एस. येदिुयुरप्पा मुख्यमंत्री के तौर पर अपना डेढ़ साल का कार्यकाल इस बार पूरा कर चुके हैं। वह बीजेपी में मोदी और शाह द्वारा तय की गई 75 वर्ष की रिटायरमेंट की आयु सीमा को पहले ही पार कर चुके हैं। भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले को लेकर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का दवाब डालने पर वर्ष 2011 में कुछ वक्त के लिए बी. एस. येदियुरप्पा ने पार्टी से ही इस्तीफा दे दिया था, लेकिन वह पिछले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में लौट आए थे। बहरहाल केंद्रीय बीजेपी नेताओं से उनके रिश्ते हमेशा खटास-भरे ही रहे हैं। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल बीएसवाई को अस्थिर करने का इच्छुक नहीं है। उसके पास किसान आंदोलन, अकाली दल के एनडीए छोडऩे और पश्चिम बंगाल के आगामी चुनाव का मुद्दा पहले ही एजेंडे में है। लेकिन अब, वह नाराज हैं, क्योंकि उनका मानना है कि जिस वक्त वह राज्य में कोरोना वायरस से लडऩे में वयस्त हैं, पार्टी के कुछ नेता उनकी जड़ें खोदने की कोशिश कर रही है। मंत्रिमंडल में भी हर वक्त शिकायतें करते रहने वाले सदस्य हैं, जो उनके पक्ष में और उनके खिलाफ गुटों में बंटे हुए हैं। कर्नाटक को दक्षिण में बीजेपी का प्रवेश द्वार माना जाता है। जब तमिलनाडु में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और सुपरस्टार रजनीकांत राजनीतिक योजनाओं को लेकर इरादा बदल चुके हैं, तब बीजेपी कर्नाटक में किसी को जगह देने की बजाय अपनी स्थिति और मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करने की ओर है। रजनीकांत के पलटी मारने के बावजूद (उन्हें बीजेपी का छद्म समर्थक माना जाता था और वोट काटने का काम करते) बीजेपी तमिलनाडु में अपनी छाप छोडऩे को लेकर प्रतिबद्ध है। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा अभी हाल ही में चेन्नई में थे और जल्द ही पीएम नरेंद्र मोदी तमिलनाडु यात्रा पर जाने वाले हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा हाई कमान को येदियुरप्पा की नाराजगी बहुत भारी पड़ सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं की येदियुरप्पा ने अकेले अपने दम पर दक्षिण में कमल को खिलाया है और कुछ निहित स्वार्थी तत्वों के कहने में आ कर भाजपा को दक्षिण के महाबली को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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