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अक्षररूप से दृश्यरूप की ओर अनुभव मंडप

अक्षररूप से दृश्यरूप की ओर अनुभव मंडप

वर्ण, जाति, अश्यप्रशता से भरित समाज में संतों का नव समाज की स्थापना करने वाले विश्वगुरु बसवण्णा 12वीं शताब्दी को समानता के रूप में प्रतिष्ठापित किया। मनुष्य की प्रतिष्ठा को महत्व देने वाले बसवण्णाजी जाति-वर्ण-भेदरहित कल्याण राज्य का निर्माण किया। सभी को अपनाकर अपना बना लिया। रक्त-संबंध से भक्ति-संबंध श्रेष्ठ समझकर दुनिया के लोगों को एकता के सूत्र में बांधने की साधना बसवण्णाजी अपने विचार और आचार से कर दिखाया।

विविध सामाजिक स्तर से आने वाले श्रम-जीवी संतों के प्रतिनिधि बनकर आने वाले 770 संतों को अनुभव-मंडप में स्थान देकर जीवन-दर्शन से संबंधित चर्चा के लिए अनुमति दी गयी। अनुभव-मंडप दुनिया का प्रथम समाजो-धार्मिक संसद बन गया। संसद की मूल नींव के रूप में अनुभव-मंडप अपना अनोखा महत्व रखता है। यह हमारे गौरव की बात है। अनुभव-मंडप के अधीन जो संतों ने वचन-साहित्य की रचना की उनमें लोकतंत्र समाहित है। संविधान है। मानव के अधिकार हैं, अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य है, लिंग-भेद और जातिभेद को मिटाने के एवं समानता के तत्व इनमें समाहित है।

जगद्ज्योति बसवण्णा ने ‘अनुभव मंडप’ की स्थापना की। परम ज्ञानी अल्लम-प्रभु इसके प्रथम अध्यक्ष थे। 12वीं शताब्दी के वचनाकारों की स्वतंत्र सभा बनने वाला यह अनुभव-मंडप वर्ग-वर्ण-लिंग, जातियों को मिटाकर समानता की नींव डालने की यह क्रिया मानवता के लिए स्नेह-सेतू बनकर खड़ा हुआ। तत्कालीन जन-समुदाय के प्रथम चालक शक्ति के रूप में इसका कार्य क्षेत्र असामान्य है।

अनुभव-मंडप में चर्चा के द्वारा निर्मित’ वचन-साहित्य सुदृढ़ बनाने के लिए नये सिद्धांत सिद्ध करके दिया। कायक, दासोह, समन्वयता, अहंकार रहित सामाजिक तत्व, गुरु लिंग-जंगम-प्रसाद जैसे धार्मिक तत्वों को अभिव्यक्ति कर जीवन में प्रयोग होने लगा। धर्म याने दया से संपन्नभरित है। सामाजिक जिम्मेदारी की सीख देने वाला ज्ञान का सुक्षेत्र है। अनुभव-मंडप संतों के वचनों में’ महामने यानि बड़ा घर के पर्यायवाची नाम से अनेक संतों ने ‘अनुभव-मंडप’ का उल्लेख किया है। विचार-मंडप, विशाल-मंडप, आचार-संपन्नों का मंडप, प्रकाश-मंडप, प्रसाद-मंडप ऐसे विभिन्न अर्थों में वचनों में अनुभव-मंडप का उल्लेख देखने को मिलता है।’ शिवानुभ-मंडप के रूप में इसका उल्लेख होना एक विशादकारक है ऐसा उत्तंगी चन्नप्पाजी का कहना है। ऐसा अनुभव-मंडप बसवण्णाजी के कालावधि में अनन्य बनकर था, कल्याण क्रांति के बाद इसका स्वरूप बदल गया।

शून्य-संपादन कारों में परिलक्षित यह 16वीं सदी में तोंटद सिद्धलिंग स्वामीजी ने इसे फिर से अस्तित्व में लाये। तत्कालीन स्वामी संतों ने संचारित अनेक गांवों में संचारी अनुभव-मंडप को फिर से प्रयोग में लाये।

अनुभव मंडप में बसवण्णाजी, प्रभुदेव, चन्नबसवण्णा, शिद्धराम, अक्कमहादेवी, मडिवाळ माचिदेव, उरिलिंग पेद्धी दंपत्तियों ने, हरलय्या-दंपत्तियों ने, सत्यक्का, मादार चेन्नय्या, आयदक्की लक्कम्मा, मारय्या, आदि असंख्यात संतों ने चर्चा कर प्रथम प्रजा-धर्म को बनाया। सभी जाति के लोगों के उद्धार के लिए मानवीय मूल्यों की देन दी। त्रीकाल सत्यवाद का वचन-साहित्य हमें दी वही हमें पवित्र अनुभव-मंडप बना। इन सभी कारणों से 12 वी शताब्दी में कर्नाटक की सांस्कृतिक चरित्र में यह सुवर्ण-युग के नाम से लोकप्रिय हुआ।

कन्नड में सर्वप्रथम लोकतंत्र की परिभाषा देनेवाला साहित्य बन गया। सभी जीव-राशियों को भला चाहने वाला युग यह। बसवण्णा के द्वारा दुनिया को समर्पित अनेक उपहारों में अनुभव मंडप एक विशेष देन है।

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अनुभव-मंडप की चंद विशेषताएं ऐसी है

  • दुनिया का सर्वप्रथम संसद-भवन
  • लोकतांत्रिक चिंतन का अपूर्व सम्मेलन
  • सभी जीवधारियों को सम्मान देने वाला पहला संसद
  • अक्षर एवं ज्ञान-दासोह की देन
  • अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य का अधिकार दिया। उनका जीवन शुद्ध किया उनमें स्वाभिमान एवं कायक की शक्ति भरने वाला केंद्र बना॥
  • वैचारिक भक्तिवाद, समाज-सुधारणा, महा-मानवतावाद, नीतियुक्त धर्मवाद की विशिष्टता से संपन्न लिंगायतवाद की देन दुनिया को समर्पित करने वाला केन्द अनुभव-मंडप है।

अनुभावी संतों के दृष्टि में अनुभव-मंडप की परिकल्पना

अनुभव का विनिमय के लिए जहां शिवानुभवी सम्मिलित होने के लिए बैठते थे वही ‘अनुभव-मंडप’ है। बसवण्णा के राजदरबार में चर्चा के लिए और अपना अनुभाव बांट लेने के लिए मिलते थे उसी स्थान को अनुभव मंडप के नाम से ‘शून्य संपादने ग्रंथों में उल्लेखित है। मन की ध्यानशील स्थिति ही अनुभव-स्थल है।

1962 में अल्लमप्रभुजी ने जिस स्थान पर अलंकरित थे वही ‘शून्यसिंहासन’ वहां पर स्थित था ऐसा कहा गया है। बसवण्णा जी का ‘राजसिंहासन’ और ‘शून्यसिंहासन’ हीरे-मोतियों से अलंकरित था और सोने से सजाया गया था। गुम्मालपुर के शिद्धलिंग स्वामीजी ने शून्यसंपादने में वर्णित (1580) किया है।

12वीं सदी के वचनों में ‘अनुभव-मंडप’ और ‘शून्य-सिंहासन का उल्लेख मिलता है। कल्याण-क्रांति के पश्चात्य शिव-शरणों ने वचन-साहित्य का भंडार बांध लेकर अलग- अलग प्रदेश में चले गये। थोड़े ही समय में कालज्ञान वचनों को लिखा गया – ऐसा कहा गया है। शिव-शरणों ने ‘अनुभव-मंडप के बारे में काल-ज्ञान, वचनों में अलग-अलग नाम से जानने के लिए प्रयास किया है। डॉ. फ.गु. हलकटटीजी द्वारा संपादित ‘काल-ज्ञान ‘वचन कृति में विचार मंडप, (पृष्ठ-2) विशाल-मंडप आचार संपन्नों का अनुभव मंडप, (पृष्ठ-3), प्रकाश-मंडप, ज्ञान प्रकाश-मंडप (पृष्ठ -4) प्रसाद मंडप (पृष्ठ -12) सभी देवताओं का मंडप आदि नामकरणों से जाना जाता है। बसवण्णाजी के वचनों में’ अनुभव-मंडप’ को महा-मने (हमारे कूडल संगम का महामनेयलु मादार चेन्नय्या होलबीगनय्या-वचन 135) के रूप से संबोधित किया है। प्रभुदेवजी के वचनों में’ ‘अनुभव-मंडप’ को ‘महा-मने’ शब्द (बटुंबयल महामनेयोलगोंदु हुद्द्द, होंदद शिशुव कंडे-वचन 1007) का प्रयोग किया गया है।

हरिहर महाकविजी द्वारा रचित ‘बसवराज-देवर रगले’ में अनुभव-मंडप को ‘महा-मने’ शब्द का (बिज्जलराय नोडनाप्तवचन रचित मंत्रालोचन इंदिनितु बेगमिदुर्पोरमटटु तन्न महामनेगे बप्पल्ली-स्थल 6 वचन 30 पृष्ठ-13) प्रयोग किया है।

हरिहर कवि के समसामयिक पालुकरिके सोमनाथ (1230) तेलगु में बसव पुराण लिखा है, इसी का अनुवाद भीम कवि (1369) ने कन्नड में किया है। इसमें भी ‘अनुभव-मंडप’ शब्द को संवादीयादी ‘महा वोड्डोलगं ओलगसमिति’ ‘भवन मंडप’ इत्यादि पदों का उपयोग किया है।

अनुभव-मंडप यह एक सार्वजनिक संस्था बन गयी थी। धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, आदि नित्य-जीवन से संबंधित समस्याओं के बारे में चर्चा यहां पर चलती थी। इस संस्था में सभी को मुक्त भावना से भाग लेने की छूट दी गयी थी। जातियता, अंधश्रद्धा, अनाचार, स्त्रीस्वातंत्र्य, गरीबी, बेरोजगारी के बारे में सुदीर्घ चिंतन-मंथन यहां पर चलता था। अंत में सत्यनिष्ठता का निर्णय वचन के रूप में अभिव्यक्त करते थे। इन वचनों को ताड-पत्रों पर लिखकर संगृहित कर रखने का काम सुचारू रूप से संपन्न हुआ। इसी को सार्वजनिक ग्रंथालय भी कहा गया।

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संसद का मूल अनुभव-मंडप

बसवण्णाजी संसद की परिकल्पना देने वाले महाज्ञानी थे। महिलाओं के साथ विविध समाज के विचारधारा से आने वाले नायक 770 अमरगण शरणों के द्वारा ‘अनुभव-मंडप’ नामक समाजो धार्मिक संसद के द्वारा विश्व में पहली बार समूह नायकत्व की कल्पना निर्मित हुई। दलित और महिला के साथ सभी कायक जीवियों को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य की समझ दी गई। दुनिया के किसी देशों में संविधान का सपना न देखने से पहले आधुनिक संविधान का बीजस्वरूप के अंश का वचनों मे सृष्टि हुई। अनुभव मंडप के साथ आंतरिक दुनिया से संबंधित ‘समझ का घर’ और बाह्य दुनिया से संबंधित ‘महा-मने’ की स्थापना की गयी। ‘समझ का घर’ इष्टलिंगयोग से संबंधित है तो ‘महामने’ समाजरूपी जंगमलिंग के योगक्षेम से संबंधित रहा।

कायकजीवियों को संघटित करने के साथ-साथ बसवण्णाजी ने ‘श्रमिक वर्ग’ के प्रथम नेता बन गये। लेकिन उन्होंने अपना नायकत्व समूह नायकत्व के रूप में परिवर्तित किया। विश्व में पहली बार समूह नायकत्व की परिकल्पना साकार बनाये। तब तक दुनिया के किसी दार्शनिक ने समूह नायकत्व की कल्पना नहीं की। अनुभव-मंडप के 770 शिव-शरण (अमरगणंगल) ही इस समूह के नायक थे। यहां के अधिकांश सभी नायक विविध सामाजिक स्तर से आये हुए कायकजीवी ही शरण-शिवशरणियां थी। ये सभी अनुभव-मंडप रूपी समाजो-धार्मिक संसद के सदस्य बनकर रहे। नटुवर जनांग से आये हुए महाज्ञानी अल्लमप्रभु ही इस संसद के सभाध्यक्ष थे। ऐसे दुनिया में पहली बार संसद की परिकल्पना का निर्माण कर्नाटक में हुआ।

सन 1948 दिसंबर 10 के दिन विश्वसंस्था द्वारा घोषित मानवाधिकारों में सभी 30 अंश बसवण्णाजी के वचनों में है। बसवण्णाजी ने 12वीं शताब्दी में ही मानवाधिकारों की प्रतिष्ठापना कर सर्वोदय की परिकल्पना दी। विश्वसंस्था के मानवाधिकार के अनुसार दांपत्य के द्वारा जन्म लेने वाला। अधिकार और अनैतिक संबंध से जन्म लेने वाले बच्चे के अधिकार में कोई अंतर नहीं। ये अंश बसवण्णाजी के वचनों में समाहित है। वर्ग रहित पर्याय समाज के लिए अनुभव-मंडप सहायक हुआ है। ‘राजा कालस्य कारण रूपी पारंपरिक व्यवहार को मिटाकर राजा-प्रजा-कल्याणस्थ्य रूपी नीति को अधिकृत किया गया। अनुभव-मंडप में सेवक-राजा, गरीब-अमीर, श्रेष्ठ-कनिष्ठ इत्यादि अंतर को खंडित किया गया। ‘आनि बिज्जलगे अय्या’ आस राजा को नहीं बल्कि शिव-भक्तों को है क्या? ऐसे प्रश्नकर राजशक्ति की विडंबना, विमर्श कर निर्भय रूपी वातावरण की भूमिका सिद्ध हुई।

मडिवाल माचिदेवजी बिज्जल के अधिकार अवधि को मिटा दिया। कोंडगुली के शिराज भरी सभा में मंत्री पद को त्याग देना निडर वातावरण के लिए साक्षी बन गये।

अनुभव मंडप के भीतर वचनों में प्रकाशित चंद उज्वल बातें

  • समझ गये तो संत, भूल गये तो मानव – बसवण्णा
  • सरसों जैसे सुख को सागर जैसा दु:ख देखना- प्रभुदेव
  • भूल गये तो बंधन, समझ गये तो मोक्ष उरिलिंग पेद्दी
  • अस्त्र दे सकते हैं शूरता नहीं। आयदक्कि लक्कम्मा
  • समय जब आता है तब कायक कीजिए क्योंकि समय अपने अधीन नहीं है – अंबिगर चौडय्या
  • अधिक आशा ही पाप, दूसरा कोई पाप नहीं हाविनहाल कल्लय्या
  • मेरा शरीर ही भक्त मन संसारी सकलेश मादरस

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अक्षर रूप से दृश्य रूप की ओर अनुभव-मंडप

ऐसी एक विशिष्ठ और श्रेष्ठ परिकल्पना अनुभव-मंडप को अक्षर रूप से दृश्यरूप की ओर लाने वाले हमारे कलाविद, शताब्दी से पूर्व ही सुरपुर महाराजा के आस्थान कलाविद के वंशस्थ दूसरे बानय्या अनुभव-मंडप की परिकल्पना को सर्व प्रथम दृश्यरूप में लाये। उसके बाद फिर थोड़े कलाविद अनुभव-मंडप को दृश्यरुप में चित्रित कर लाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। लेकिन प्रस्तुत, सुप्रसिद्ध अनेक पुरस्कारों से सम्मानित ‘दृश्य-कला’ में सदानंद, सुखी, रहने वाले शांत, मौन रहकर चित्रकला की चरम सीमा तक पहुंचे हुए उत्कृष्ट कलाकार, कला के लिए जीवन यापन करने वाले डॉ. जे. एस. खंडेरावजी द्वारा चित्रित ‘अनुभव-मंडप’ के वर्ण चित्र केवल विषय का प्रतिपादन करने के सीमित दायर से ऊपर उठकर कल्याण राज्य की सांस्कृतिक समाजो-धार्मिक, परिकल्पना को दृश्य परिभाषा के भीतर समाहित शुद्ध-विचार एवं परमात्मा का स्वरूप निरूपित करने की इनकी अभिव्यक्ति को अत्यधिक महत्व प्राप्त होता है।

अक्षररूप में समाहित अनुभव-मंडप को दृश्यरूप में लाने की आस, सर खंडेरावाजी के मस्तिष्क में बींज के रूप में बोनेवाले हैं कलबुर्गी के शरणबसवेश्वर संस्थान के पीठाधिपति विद्याभंडारी, पूज्य डॉ. शरणबसवप्पा अप्पाजी के द्वारा 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी और उनके साथी सदस्यों के सम्मुख में एवं माननीय राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी के कालावधि में संसद के भीतर महात्मा बसवेश्वर की अश्वारुढ मूर्ति की प्रतिष्ठापन की गयी है। इस समय पर खंडेरावसर द्वारा चित्रित अनुभव-मंडप का वर्ण चित्र प्रदर्शन के लिए रखा गया था। माननीय राष्ट्रपति इस वर्ण-चित्र का मनभर कर प्रशंसा की। यही प्रशंसा खंडेरावजी को वर्ण चित्रित बनाने को नवनवीन चैतन्य से भर ही दिया नहीं बल्कि प्रस्तुत ब्रहदाकार का वर्णचित्र बनने में मूल कारण बना।

नये भारत के निर्माणकर्ता, कथनी को करनी में रुपांतरित करने वाले कर्मठ, युवाओं के आशावादी हमारे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद के अधिवेशन में और विश्व के विभिन्न देशों को जब भेंट देने जाते हैं तो वे महामानवतावादी बसवण्णाजी और उनके द्वारा बने अनुभव मंडप का उल्लेख अवश्य करते आ रहे हैं। उनकी बातें भी प्रस्तुत कृतिरचना के लिए मूल प्रेरणादायी बन चुके हैं। ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

जे. एस. खंडेराव

 

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