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येदियुरप्पा कर्नाटक राजनीति का चाणक्य

येदियुरप्पा कर्नाटक राजनीति का चाणक्य

भाजपा की उच्च कमान ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा को 2023 तक मुख्यमंत्री रहने के लिए समर्थन कर उनके उत्तराधिकारी के होने के सारे आकलन को खत्म कर दिया हैं। भाजपा ने यह कदम उस समय लिया हैं, जब येदियुरप्पा ने कर्नाटक में भाजपा की श्रेष्ठता को एक बार पुन: स्थापित कर दिया हैं। उनके नेतृत्व में कर्नाटक न केवल कोरोना में उभरने में सफल रहा हैं, बल्कि कोरोना के केस में भी भारी गिरावट हुई हैं और मरीजो की रिकवरी भी तेजी से हो रही हैं। कमजोर तबकों की भलाई के लिए कई सारी योजनाओं का भी आरंभ हुआ हैं। उनके कुशल नेतृत्व में पहले ही राउंड में वैक्सीन लगाने का भी कार्य शुरू हो चुका हैं। कोरोना काल में 2020 में कर्नाटक इनोवेशन के क्षेत्र में कुछ चुनिंदा राज्यों की श्रेणी में उभरा हैं। राज्य इन्फार्मेशन और क्म्यूनिकेशन टेक्नॉलाजी के निर्यात के क्षेत्र में भी अपना स्थान बनाने में सफल रहा हैं। यदि राजनीति की बात करे तो नवंबर 2019 में हुए विधानसभा उप-चुनाव में 15 में से 12 विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की। उनमे से वे भी सीटें शामिल थी, जिनपर भाजपा ने सालों से कभी जीत हासिल नहीं की थी। हाल ही में हुए पंचायत चुनाव में 86,183 में से 45,246 सीटों पर भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। वहीं 2015 में भाजपा समर्थित 29,959 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। वहीं भाजपा से जुड़े 5,760 में से 3,142 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। भाजपा और येदियुरप्पा की ये जीत कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) के मजबूत क्षेत्र मैसूर में मिली। यही कारण है की भाजपा हाई कामान ने येदियुरप्पा पर विश्वास जताया है। और सच ये भी है कि वह पार्टी में अभी भी सबसे ताकतवर नेताओं में से एक है, जो भाजपा के लिए सबसे फिट बैठते है। अत: उनके रिटायर होने की बात समझ से परे है। इसलिए, अभी हाल ही में हमने देखा कि येदियुरप्पा ने भाजपा के अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और गृहमंत्री अमित शाह के साथ लंबी बैठक की। अमित शाह के घर पर हुई बैठक में येदियुरप्पा को उनका कार्यकाल पूरा करने के लिए कहा गया। अमित शाह और नरेंद्र मोदी दोनों ने उनके नेतृत्व तथा इस पूरे कार्यकाल पर भरोसा जताया है।

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पहले ऐसा आकलन लगाया जाता था कि भाजपा की उच्च कमान येदियुरप्पा की बीती उम्र को देखते हुए कर्नाटक में नेतृत्व बदलने की तैयारी कर रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस आकलन को विराम देना चाहते थे। और इसलिए ही येदियुरप्पा को उनके मुख्यमंत्री के कार्यकाल को बिना किसी आशंका के पूर्ण करने का निर्णय लिया। अमित शाह ने साफ शब्दों में कर्नाटक-भाजपा में मतभेद रखने वालों को सन्देश देते हुए येदियुरप्पा को राज्य के गवर्नेंस में खुली छूट दी। शाह ने बेलगवी के समारोह में बोलते हुए कहा कि आपको राज्य के प्रशासन में खुली छूट है। आशा करते है कि आप पार्टी के मामलों को सुलझाते हुए भाजपा को आगे ले जाने का कार्य करेंगे। अमित शाह ने कहा, नरेंद्र मोदी की केंद्र में नेतृत्व और कर्नाटक में येदियुरप्पा की सरकार डबल इंजन के रूप में राज्य के चहुओर विकास में सहायक है। राज्य में राजनितिक स्थिरता के कारण आने वाले वर्षो में राज्य और भी प्रगति करेगा। अमित शाह के इस बयान का मतलब  येदियुरप्पा को राज्य के शासन में खुली छूट देना है तथा  दल-विरोधी गतिविधि में शामिल लोगों के प्रति कड़े कदम उठाने का निर्देश देना है। इसका मतलब है कि येदियुरप्पा को बागी विधायकों द्वारा राज्य मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के दबाव के मामलों में राहत मिली है। कुछ समय से येदियुरप्पा बागी विधायकों को  मंत्रिमंडल में शामिल करने के  दबाव का सामना कर रहे थे। पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस और जनता दाल (सेक्युलर) के बागी विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए भाजपा के अंदर ही उन्हें अपनी सहयोगियो की निराशा का सामना करना पड़ रहा है।

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इतने वर्षों के बावजूद, 78 वर्षीय येदियुरप्पा ने यह दिखा दिया है कि वह ऐसे मुख्यमंत्री है जो राज्य के तेजी से विकास और सभी लोगों की समस्याओं का समाधान करने में सहायता करते  रहे हैं। उनसे असहमति रखने वाले नेताओं को भी इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए उनके साथ काम करना पड़ेगा। वह अगले चुनाव तक, जिसमें अभी 2 साल बाकी है, येदियुरप्पा ही भाजपा का बड़ा चेहरा रहेंगे। इसके अलावा अब येदियुरप्पा ने पूरे राज्यभर में घूमना भी आरंभ कर दिया है। और उनका लक्ष्य 140-150 सीटें जितना है। मोदी और शाह के प्रति कृतज्ञता जताते हुए, येदियुरप्पा ने भाजपा के उच्च कमान को विश्वास दिलाया है कि वह राज्य में नरेंद्र मोदी के हाथ को मजबूत करने के लिए भाजपा को 150 सीट पर जीत दिलाएंगे। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में येदियुरप्पा की नेतृत्व वाली भाजपा 104 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही। वहीं कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) 78 और 37 सीटें जीती।  लेकिन इन दोनों पार्टियों ने एक साथ आकर भाजपा को बाहर कर दिया। उन दोनों ने  जनता दल (सेक्युलर) के नेतृत्व में 14 महीनों तक सरकार में एक साथ रहे। लेकिन शासन को लेकर दोनों दल के नेताओं के बीच हुए मनमुटाव के कारण कुछ विधायक  भाजपा में चले गए, जिससे सरकार ज्यादा नहीं चली और भाजपा शासन में आ गयी। जब  येदियुरप्पा  ने राज्य  की  मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली तो भाजपा उनके नेतृत्व में स्पीकर के अलावा 225 सदस्यों वाली विधानसभा में चुनाव जीत कर 118 सदस्यों तक पहुंचने में सफल रही। येदियुरप्पा के 2018 में विश्वास मत के दौरान दिए गए भाषण को कौन भूल सकता है। उन्होंने विश्वास दिलाया था कि उनके हाथ और पैर इतने मजबूत हैं कि वह अभी भी अगले 10 वर्षों तक काम कर सकते है। और उन्होंने अपनी इस ताकत को अगले एक वर्षं में साबित भी कर दिया। सच्चाई तो यह है कि भाजपा येदियुरप्पा के नेतृत्व की अनदेखी नहीं कर सकती, जब तक वह खुद अपने भविष्य पर निर्णय नहीं लेते। येदियुरप्पा भाजपा-कर्नाटक के संस्थापकों में से एक है। दक्षिण में 2008 में पहली बार भाजपा का कमल येदियुरप्पा के ही नेतृत्व में खिला। 1985 में  येदियुरप्पा और वी. वशंत बंगरा पहली बार  भाजपा के 2 विधायक चुने गए और 2 बार खुद के बल पर सरकार बनाई। येदियुरप्पा 4 बार मुख्यमंत्री बने। कुछ लोगों का मानना है कि भाजपा येदियुरप्पा के अलावा कोई दूसरा विकल्प ढूंढ सकती थी जब उन्होंने 2012 में अपनी खुद की पार्टी बनाने का निर्णय किया। हालांकि 2014 में उन्होंने फिर भाजपा में वापसी किया। दोनो पक्षों में यह जल्द ही समझ आ गया की राजनीति में जीवित रहने के लिए एक-दूसरे की जरूरत हैं। भाजपा येदियुरप्पा के वापसी से ही कर्नाटक में एक बार फिर अपनी पकड़ बना पायी। यहां तक उनको भी समझ आ गया की उन्हें भी भाजपा के बैनर की आवश्यकता हैं। कर्नाटक में तीन सामाजिक समीकरण हैं। पहला, लिंगायत- ब्राह्मण, दूसरा, मुस्लिम-ओबीसी-वोकलीगस-दलित और तीसरा, ब्राह्मण-बील्लावस-बंट-बनिया। येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा बहू-सामाजिक गठबंधन बनाने में सफल रही हैं, जिसमें लिंगायत-ब्राह्मण मुख्य हैं। बिना येदियुरप्पा के यह गठजोड़ नहीं टिक पाएगा। फिर भी भाजपा भविष्य की अनदेखी नहीं कर सकती और येदियुरप्पा के नेतृत्व में नए नेतृत्व को तलाशने का प्रयास जारी रखना चाहिए। हालांकि, कुछ लोगों का कहना हैं कि येदियुरप्पा अपने पुत्र बी. वाई. वीजेंद्र के लिए मौका तलाश रहे हैं, जो वर्तमान में कर्नाटक भाजपा के उपाध्यक्ष हैं। वीजेंद्र येदियुरप्पा के सबसे छोटे लडक़े हैं, जो स्थानीय पंचायत चुनाव में पोल प्रभारी थे। उनकी नेतृत्व का पता इन स्थानीय चुनावों में मिली सफलता से ही पता चला।

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येदियुरप्पा उन्हें केंद्र की अनुमति से 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में टिकट दिलाना चाहते हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा उच्च कमान के निर्देश के अनुसार येदियुरप्पा को उनके नाम वापिस लेना पड़ा। लेकिन क्या वीजेंद्र के राजनीतिक भविष्य को सिर्फ इसलिए विराम लगाया जाना चाहिए क्योंकि वह येदियुरप्पा के लडक़े हैं? हालांकि भाजपा उच्च कामान को युवा पीढ़ी के महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए कोई न कोई रास्ता ढूंढना पड़ेगा। सचाई तो यह हैं कि येदियुरप्पा हमेशा के लिए नहीं रह सकते। 1980 से लेकर अब तक केवल दो सरकारों ने अपना कार्यकाल पूरा किया हैं- एक डी देवराज और दूसरा सिद्दारमैया। अब येदियुरप्पा सरकार ऐसा करने वाली तीसरी सरकार हो सकती हैं। लेकिन कर्नाटक की राजनीति बदलाव से गुजर रही हैं। भाजपा को भविष्य की चुनौती का सामना करने के लिए अवश्य तैयार रहना चाहिए।

 

शेखर अय्यर

 

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