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रोटी बनाम बंदूक के दौर में किफायती वायु ताकत

रोटी बनाम बंदूक के दौर में किफायती वायु ताकत

हम ऐसे दौर में है, जब लगातार महंगी और पेचीदी हेाती जा रही वायु ताकत एक अलग ही अहमियत ले चुकी है। वायु ताकत अब सिर्फ इकलौती वायु सेना की ही कार्रवाई और जंगी जहाजों का अभियान भर नहीं रह गया है। अमेरिका में सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी ने अपनी वायु ताकत स्थापित कर ली है और उसका इस्तेमाल अफगानिस्तान, पाकिस्तान और यमन में आतंकवादियों के खिलाफ की गई। दुनिया भर में पुलिस अब निगरानी और पड़ताल के लिए मानवरहित विमानों का इस्तेमाल करती है। लेकिन, विमानों को खरीदना और उनका रख-रखाव लगातार महंगा होता जा रहा है, खासकर उन लोकतांत्रिक देशों के लिए जिन्हें वायु सेना और समाज की फौरी जरूरतों के बीच संतुलन बैठाना पड़ता है। इस तरह, भारत में रक्षा बजट लगभग दशक भर से जीडीपी का करीब 1.6 प्रतिशत पर अटका हुआ है। इसलिए सवाल यह उठता है कि बजटीय दिक्कतों के दौर में बाहरी और आंतरिक सुरक्षा की स्थितियों को कवर करने के लिए वायु ताकत कैसे बनाई जाए?

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महंगी होती वायु ताकत

पिछले तीस साल से यही रुझान रहा है कि वायु ताकत लगातार महंगी और विमान पेचीदा होते गए हैं। 1970 के दशक में अमेरिका ने हल्की वजन के एफ-16 जंगी जहाज विकसित की। यह अपेक्षाकृत कम कीमत का विमान था, जो अधिक महंगे, पेचीदे और बहुपयोगी एफ-15 ईगल से अधिक आसान था। हालांकि उसके बाद चीन का जेएफ-17 मुनासिब विमान था जो पाकिस्तान को ‘‘दोस्ताना कीमत’’ तकरीबन 2.6 करोड़ डॉलर में बेचा। लेकिन, बाकी दुनिया में जोर यही बना रहा कि पेचीदे और महंगे सिस्टम विकसित किए जाएं। इसलिए अमेरिका और उसके सहयोगी एफ-35 लाइटेनिंग महंगी कीमतों पर खरीद रहे हैं, चीन अत्याधुनिक जे-20 और जे-31 जंगी जहाज बनाने की दिशा में बढ़ गया है जबकि रूस अब धीरे-धीरे पांचवी पीढ़ी के एसयू-57 लड़ाकू विमानों को तैनात करना शुरू कर दिया है (यह वहीं सिस्टम है जिसके करार से भारत बाहर आ गया क्योंकि रूस अंतिम डिजाइन में भारत की जरूरतों के मुताबिक फेरबदल करने से ना-नुकुर कर रहा था और टेक्नॉलॉजी का पूरा हस्तांतरण करने से इनकार कर दिया था)। भविष्य में, फ्रांस और जर्मनी में छठी पीढ़ी के भावी जंगी वायु व्यवस्था विकसित करने की योजना बना रहे हैं, जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ इंसानी पायलट भी होंगे। दरअसल मौजूदा करार के तहत मानव संचालित और मानवरहित दोनों तरह वाहन विकसित करना है। लेकिन इसके बावजूद ज्यादा से ज्यादा देशों का जोर महंगे विमान खरीदने और पुराने विमानों पर निर्भर रहने पर है।

अगर मौजूदा अंतरराष्ट्रीय विमानन बाजार को देखा जाए तो सिर्फ दो देशों-अमेरिका और चीन-के पास ही अपने सशास्त्र बलों के आधुनिकीकरण के मंसूबे का एक हिस्सा खरीद पाने का बजट है। अमेरिका एफ-35 प्रोग्राम को आगे बढ़ा रहा है और साथ ही साथ ईगल एफ-15एक्स का नया संस्करण बना रहा है। एफ-15एक्स में विदेशी ग्राहकों के मुताबिक विमान को विकसित किया जाएगा और निस्संदेह एफ-35 की सभी व्यवस्थाएं शामिल होंगी।

चीन की विमानों के बारे में अपना विकास बेहद प्रभावशाली है। यह 6,000 मिग-19 और मिग-21 में रिवर्स इंजीनियरिंग की गई और उसके जरिए एक विमान उद्योग की जमीन तैयार की गई, जिसके तहत जे-10 और जे-20 तथा जे-31 जैसे भविष्य के विमानों को बनाया गया है। सबसे बढक़र चीन की आर्थिक वृद्धि की वजह से नए विमानों के विकास और निर्माण में निवेश की गुंजाइश बनी है। यह सुविधा दुनिया के ज्यादातर देशों पश्चिमी गठजोड़ और एफ-35 के मामले में देखी गई है।

2020 और 2030 के दशक में नाटो की वायु ताकत की रीढ़ एफ-35 लाइटेनिंग रहने की उम्मीद है। यह विकसित लड़ाकू विमान है और गठजोड़ की वायु ताकत की साझा और आपसी प्लेटफॉर्म तैयार करेगी। समस्या यह थी कि विमानों की कीमतें काफी ऊंची उछल गईं और पश्चिमी देशों को अपनी आबादी में बढ़ती उम्र के लोगों तथा पक्के सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों के कारण यह तय करने पर मजबूर होना पड़ा कि विमानों की खरीद पर तवज्जो दें या अपने लोगों के कल्याण कार्यक्रमों को तवज्जो दें (यानी बंदूक बनाम रोटी की दुविधा)। कनाडा ने सबसे पहले घंटी बजाई। उसने कीमतें कुछ घटने के बावजूद एफ-35 की खरीद रद्द करने का फैसला किया। उसके बदले उसने ऑस्ट्रेलिया से एफ-18 की खरीद की। इटली ने भी उसके बाद यह कहकर वही रास्ता अपनाया कि वह अतिरिक्त एफ-35 नहीं खरीदेगा और अपने मौजूदा ऑर्डर को कम करना पसंद करेगा।

ऊंची कीमतों के अलावा तथ्य यह भी है कि देशों की जंगी जहाजों की मांग की बनिस्बत वायु ताकत की जरूरतें काफी पेचीदी हैं। ब्राजील और नार्वे जैसे देशों को अपनी पर्यावरणीय चिंताओं के लिए मध्यम ऊंचाई के लंबे वक्त तक टिकाऊ ड्रोन की दरकार है। ब्राजील को अपने विशाल अमेजन प्रांत की कटाई और पर्यावरण विनाश को रोकने के लिए निगरानी की दरकार है, जबकि नार्वे की चिंता यह है कि कहीं उसके समुद्री तट के करीब तेल कुंओं से भारी रिसाव न शुरू हो जाए, इसके लिए उसे निगरानी के लिए माकूल विमान की जरूरत है। दूसरे देशों को मानव तस्करी और अवैध आप्रवासियों पर निगरानी रखने के लिए यूएवी की दरकार है। लेकिन शायद वायु ताकत के मद में सबसे बड़ा बदलाव आतंक के खिलाफ जंग में यूएवी के इस्तेमाल की जरूरत है।

दरअसल सबसे पहले अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआइए ने आतंक के खिलाफ अपने अभियानों और फिर अपने वायु हमलों की निगरानी के लिए यूएवी के इस्तेमाल का फैसला किया। इस तरह सीआइए अमेरिका की छठी और आतंक खिलाफ जंग में सबसे प्रभावी वायु ताकत बन गई।

आतंकवाद और बगावतों ने आधुनिक जंगी जहाजों की सीमाएं तय कर दीं और ऐसे प्रतिबद्ध प्लेटफॉर्म की जरूरत पैदा की, जो ऐसे खतरों की काट कर सके। नाइजीरिया और अफगानिस्तान दोनों में ही यह साफ हो गया कि बागियों के खिलाफ जागुआर और एफ-16 जैसे विमानों के इस्तेमाल की सीमाएं हैं। इसलिए नाइजीरिया ने बोको हरम बागियों से लोहा लेने के लिए सुपर टुकानो टर्बोप्रॉप की खरीद की जबकि अफगानिस्तान में अमेरिकी वायु सेना ने अफगानी वायु सेना को सुपर टुकानो दी क्योंकि वे लंबे वक्त तक मंडरा सकते हैं और तालिबान से जंग में अधिक कारगर हो सकते हैं।

इसके अलावा, तमाम तरह के सब-सिस्टम हैं, जो अब वायु जंग को कारगर बनाते हैं। पाकिस्तान का जेएफ-17 अपेक्षाकृत हल्की तकनीक का सस्ता विमान पाकिस्तान वायु सेना की जरूरतों के मुफीद है (इस विमान को कथित तौर पर चीन ने उसे 2.6 करोड़ डॉलर की ‘‘दोस्ताना’’कीमत पर दिया है)। लेकिन कुछ सूत्रों के मुताबिक पाकिस्तान वायु सेना अपने ताकतवर प्रहतद्वंद्वी भारतीय वायु सेना के जवाब में इसका इस्तेमाल अपने विमानों की दृश्य क्षमता में इजाफे के लिए करने में काबिल है। वायु ताकत को कारगर बनाने के लिए इस पैकेज में बेहतर डेटा लिंक और बेहतर राडार प्रणाली शामिल है।

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भारत के लिए विकल्प

सभी लोकतांत्रिक देशों की तरह भारत भी बंदूक बनाम रोटी के सवाल से मुकाबिल है और उसने अपने सामाजिक विकास योजनाओं में ही धन लगाने का विकल्प चुना है, जैसा कि असली लोकतंत्र में होता है। मनमोहन सिंह की सरकार और मोदी सरकार ने भी रक्षा खर्च को जीडीपी के 1.8 फीसदी के भीतर ही रखा, जबकि पूर्ववर्ती योजना आयोग ने ही रक्षा पर जीडीपी के 3 फीसदी खर्च की सिफारिश कर चुका था। इससे सशस्त्र बलों पर दबाव बढ़ता गया है क्योंकि वे चीन और पाकिस्तान के दो मोर्चों पर खतरे के मद्देनजर अपने रक्षा उपकरणों के आधुनिकीकरण की मांग करते हैं।

भारत हथियार खरीद में देरी जैसे तरीकों से इसका हल निकालने की कोशिश करता है, जैसा कि राफेल को खरीदने में 15 साल की देरी देखी जा सकती है। या राफेल के ही मामले में सरकार ने अपना ऑर्डर कम कर दिया, क्योंकि विमान के सभी उपकरणों को खरीदना मुमकिन नहीं हो सकता। तीसरे, सभी राजनैतिक पार्टियां इस दलील की हैं कि आधुनिक हथियार देश में ही बनाए जा सकते हैं। आखिर में लोक लेखा समिति और नियंत्रक तथा महालेखाकार के रक्षा खरीद, उत्पादन और इस्तेमाल पर अपनी रिपोर्टों में अच्छे आकलनों के बावजूद सरकार सैन्य आधुनिकीकरण प्रयासों में पुरानी लेटलतीफी बनाए हुए है।

विमान खरीद के मामले में भारत की पेचीदी, लेट-लतीफ और अंतत: आत्मघाती कोशिशें देश के रक्षा इंतजाम को कमजोर करने का कारण बनीं। उसे हॉक ट्रेनर विमान खरीदने में बीस साल लगे और इस बीच वायु सेना को अपने पायलटों को ट्रेनिंग देने का कार्यक्रम घिसटता रहा। राफेल 2012-2015 के दौरान ही खरीद लिया जाना चाहिए था क्योंकि उससे यह होता कि बालाकोट हमले में उसका इस्तेमाल हो पाता लेकिन दोनों ही मनमोहन और मोदी सरकारें खरीद से बचती रहीं। और अब 114 और विमान खरीदने के इरादे तो जाहिर किए गए हैं लेकिन देश की खरीद प्रक्रिया की लेटलतीफी को ध्यान में रखकर क्या यह कहा जा सकताा है कि ये विमान 2030 तक तैनात किए जा सकेंगे? उस समय तक खतरे का आयाम भी पूरी तरह बदल चुका होगा क्योंकि चीन का विमानन उद्योग अपनी वायु सेना को 5वीं और शायद 6वीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान मुहैया करा चुका होगा।

भारत सरकार और वायु सेना ने एक लंबी योजना तैयार की है, ताकि मिशन कारगर और किफायती हो। इसका तरीका यह तय करना है कि कौन-से हथियार और सिस्टम की फौरी जरूरत है, क्या देश में बनाया जा सकता है, और किस मामले में विदेशी सहयोगियों से साझा किया जा सकता है।

फौरी जरूरत ऐसे नए लड़ाकू विमानों की है, जो भारतीय वायु सेना को पाकिस्तानी वायु सेना से बीस बना सकें। वायु सेना और सरकार भले चीन के खतरे की बातें ज्यादा करें, मगर हाल में बालाकोट के बाद हवाई झड़प में यह दिखा कि पाकिस्तानी वायु सेना चौंका सकती है और इस्लामाबाद में खौफ पैदा करने के लिए भारतीय वायु सेना को अपना असलहा बढ़ाना पड़ेगा। इस दिशा में पहले कदम के तौर पर और राफेल विमान खरीदना होगा क्योंकि इससे वायु सेना को बढ़त मिल जाएगी और तथ्य यह भी है कि ये विमान विजुअल रेंज मिसाइलों, खासकर मेट्योर मिसाइल की जद में नहीं आते। अफसोस कि राफेल सौदे में इतनी देरी हुई और फिर काफी कम 36 विमान (महज 2 स्वाड्रन) ही खरीदे गए। इसे कम से कम दोगुना करना ही वह कदम है, जिससे पाकिस्तानी वायु सेना के मुकाबले हम बढ़त पा सकते हैं।

दूसरे, सरकार को दुनिया की दूसरी वायु सेनाओं से मॉथबॉल्ड विमान खरीदने की तरफ देखना चाहिए। सरकार ने दुनिया के दूसरे देशों से पुराने जगुआर खरीदे हैं और अब रूस से मॉथबॉल्ड मिग-29 खरीदने पर विचार कर रही है। कोई कह सकता है कि मिग-29 क्यों खरीदी जा रही है क्योंकि विमानों के आधुनिकीकरण में रूस का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है और हाल के दौर में हमारे देश से रूस का व्यवहार अच्छा नहीं रहा है। रूस ने एसयू-57 के संयुक्त विकास कार्यक्रम में टेक्नोलॉजी हस्तांतरण से मना कर दिया था, जबकि भारतीय वायु सेना ने कहा कि उसे 2 सीट वाला विमान ही चाहिए। मिग-29 का रख-रखाव महंगा बताया जाता है और उसके इंजन से इतना धुआं निकलता है कि उसे दूर से देखा जा सकता है।

भारतीय वायु सेना को सेकेंड हैंड मिराज-2000 विमानों की ओर देखना चाहिए। कुछ साल पहले कतर ने अपने मिराज बेड़े को भारत को देने की पेशकश की थी लेकिन सरकार का दावा है कि कीमतें बहुत ज्यादा थीं। वे विमान अभी भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा, फ्रांस वायु सेना के पास पुराने मिराज हैं, जिनका रख-रखाव अच्छा है। इस विमान का युद्ध प्रदर्शन भारत और अन्य जगहों पर भी अच्छा रिकॉर्ड रहा है। अगर तब की सरकार गलतफहमी में नहीं रहती तो 2000 के दशक में हमारे पास नया बेड़ा होता। इसके अलावा वायु सेना से यह बात भी गंभीरता से होनी चाहिए कि कौन-से सब-सिस्टम से मौजूदा प्रणाली अधिक कारगर हो उठेगी। इसका एक हिस्सा तो एईएसए राडार और बीवीआर मिसाइल खरीदना होगा क्योंकि उससे वायु सेना की क्षमता तो बढ़ेगी ही, सभी विमानों में एक-सी बात हो जाएगी।

मध्यम अवधि में दो कदम वायु सेना की क्षमता बढ़ा सकते हैं। एक, दूसरा लड़ाकू विमान खरीदने का फैसला हो और सरकार इस मसले पर आगा-पीछा न करे। वायु सेना एमएमआरसीए स्पर्धा के दौरान हर विमान का आकलन कर चुकी है, इसलिए उसे सभी विमानों के आकलन में समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। 2017 में ऐसा लगा कि वायु सेना ग्रीपेन खरीदने जा रही है। विचार यह था कि उसकी टेक्नोलॉजी को एलसीए कार्यक्रम में बदल दिया जाए। वह धरा रह गया और एफ-21 खरीदने की बात चल पड़ी (भारतीयों की भावनाएं न बिगड़ें इसलिए एफ-16 का नाम बदल दिया गया) लेकिन बालाकोट के बाद भारत के खिलाफ एफ-16 के इस्तेमाल के बाद वह विचार भी शायद पीछे चला गया है। एफ-16 खरीदने में दो और समस्याएं हैं। पाकिस्तान इस विमान को उड़ाने में सिद्धहस्त हैं और हवाई लड़ाई में चौंकाने का पहलू ही अहम होता है। इसके अलावा जानकारों को यकीन नहीं है कि भारत में बना विमान तैनात किया जा सकेगा।

दूसरे, तेजस अगर माकूल लड़ाकू विमान है तो उसे बड़ी मात्रा में और बेहतर टेक्नोलॉजी तथा हथियारों से लैश कर बनाया जाना चाहिए था। एचएएस की उत्पादन दर धीमी है। हर साल सिर्फ आठ विमान बनते हैं। मतलब यह कि 4 स्वाड्रन तैयार करने में 8 साल लगेंगे। इसके अलावा तेजस को बेहतर राडार, ज्यादा ताकतवर इंजन और बीवीआर क्षमता से लैश करके आधुनिक बनाना आसान नहीं है। इसके लिए विमान की डिजाइन नए सिरे से बनानी पड़ेगी। इसके अलावा एईएसए राडार फ्रांसीसी या स्वीडिश नहीं हुआ तो वह मेट्योर मिसाइल से बात कर सकेगा। लेकिन अगर कहीं और का हुआ तो सॉफ्टवेयर को मिसाइल से बात करने वर्षों लग सकते हैं। लेकिन भारत तो सस्ते विकल्प पर ही जाएगा। उस ओर नहीं देखेगा, जो जल्दी मिले और ज्यादा समझदारी भरा हो।

दीर्घावधि में वायु सेना की क्षमता बढ़ाने के लिए तीन बड़े कदम उठाए जा सकते हैं और उन सभी में कई पचड़ों से जूझना पड़ सकता है। पचड़ा यह है कि करगिल जैसा कुछ नहीं होता है तो रक्षा खर्च कम प्राथमिकता पर बना रहेगा। बालाकोट जरूरी तो था मगर ऐसा नहीं था कि सरकार रक्षा खर्च बढ़ा दे, जो सामाजिक कार्यक्रमों की कीमत पर ही हो सकेगा।

दूसरी पेचीदी समस्या यह है कि एचएएल का सरकार में काफी असर है, जहां यह सोच है कि वह देश को देसी रक्षा क्षमता मुहैया करा सकता है और बेहद पेचीदी टेक्नोलॉजी वाले हथियार भी बना सकता है। दोनों ही मामलों एचएएल अभी तक खरा नहीं उतरा है। आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की बड़ी-बड़ी बातों के बावजूद भारत में बने विमानों में बहुत हद तक विदेशी उपकरण लगे हैं। तेजस के इंजन और वैमानिकी प्रणाली विदेश से मंगाई गई है। फिर देश में बने एसयू-30 के इंजनों पर भरोसे पर भी कई गंभीर सवाल उठे हैं। तो, आप एचएएल का क्या करेंगे?

एक आसान उपाय यह है कि एचएएल को ऊंचे मानदंड पर रखें और उससे अपना उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने की उम्मीद करें। नई सरकार को इन मुद्दों पर सोचने और कठिन सवाल करने का वक्त होगा। मसलन एचएएल क्यों साल में एक तेजस विमान बना सका क्योंकि वहां एक दशक से विमान बन रहा है? इसके अलावा वायु सेना से पूछा जाना चाहिए कि वह तेजस की गुणवत्ता और क्षमता के बारे में एचएएल से न्यूनतम क्या चाहती है और वह गारंटी दे कि विमान को जगुआर और मिग-21 जैसा अपग्रेड किया जा सकेगा।

आखिर में, आपको कुछ मामलों में बेमानी टेक्नो-राष्ट्रवाद के बदले टेक्नो-वैश्वीकरण की ओर जाना चाहिए। भारत को पांचवी या छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान चाहिए और वह आपी उम्मीदें बेमतलब एसयू-57 कार्यक्रम पर लगा रखा है। फ्रांस और जर्मनी अब पांचवी या छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान बना रहे हैं, जो भविष्य की युद्धक प्रणाली है। वे सशस्त्र ड्रोन विकसित करने की भी बातें कर रहे हैं। भारत को दोनों चाहिए और रूस के उलट फ्रांस और जर्मनी ही यह मुहैया करा सकेंगे। कुल मिलकर यह कि किफायती और टिकाऊ वायु ताकत के लिए स्मार्ट सोच-समझ जरूरी है।

 

अमित गुप्ता

(अमित गुप्ता अमेरिका स्थित अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक हैं। लेख में उनके विचार निजी हैं।)

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