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भारत-विरोधी शक्तियों का पर्दाफाश

भारत-विरोधी शक्तियों का पर्दाफाश

अहिंसात्मक और शांतिपूर्ण  धरना हर एक आन्दोलनकारी का अधिकार होता है। और लोकतंत्र में इसका हमेशा स्थान होता है। आंदोलन  सरकार और लोगों के बीच के मतभेद को हटाने में भी सहायक होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, वह चाहे जेएनयू-जामिया-एएमयू में प्रदर्शन हो, या नागरिकता संशोधन कानून के नाम पर  शाहीन बाग में प्रदर्शन, या किसान आंदोलन हो, इन सभी में हिंसा व्यापक रूप में देखने को मिली। इन सभी आंदोलनों में एक समानता देखने को मिली है, इन सभी आंदोलनों में देश की राजधानी को बंधक बनाए जाने का प्रयास किया जाता रहा। लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया जाता रहा हैं। इन आंदोलनों में सडक़ रोकने, गाडिय़ों की तोड़-फोड़ करने तथा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान करते हुए देखा गया है। इन आंदोलनों ने देश की छवि को पूरे विश्वभर में खराब करने का काम किया हैं। अब इस  किसान आंदोलन ने भारत से नफरत करने वाली बाहरी ताकतों को भी मौका दे दिया हैं। इन ताकतों के भारत-विरोधी एजेंडे में शामिल होने की बात इन तथ्यों से साबित होती है की कुछ रिपोर्ट की माने तो अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों को ढाई मिलियन डॉलर तक इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए दिए गए। तथाकथित पर्यावरणविद ग्रेटा थनबर्ग ने किसान आंदोलन से सम्बंधित एक टूलकिट सोशल मीडिया पर पोस्ट कर बाद में डिलीट कर दी। और तो और सरकार ने किसान आंदोलन को भडक़ाने वाले 1178 ट्विटर अकाउंट्स को पूर्ण रूप से बंद करने के भी आर्डर दे दिए है। ऐसा माना जाता है कि ये ट्विटर एकाउंट्स खालिस्तान से जुड़े लोगो के है, जो  किसान अंदोलन को भडक़ाने का काम कर रहे हैं। हालांकि, इसपर अभी भी ट्विटर द्वारा  कोई एक्शन नहीं लिया गया है। इससे पहले भी सरकार ने ट्विटर से  257 अकाउंट्स को पूर्ण रूप से बंद करने को कहा था, जिसे ट्विटर ने बंद भी किया था, और बाद में चालू भी कर दिया।

इस पृष्ठभूमि में, यह कहा जा सकता है कि  26 जनवरी पर जो हिंसा हुई  वह सुनियोजित थी। इसलिए, यह कहा जा सकता हैं  कि  इस आंदोलन में भारत-विरोधी बाहरी और आतंरिक दोनों शक्तिया शामिल है। और यह भारत की सम्प्रभुता को चुनौती देने के बराबर है। इसके लिए बड़े पैमाने पर तैयारी की गयी थी। फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से  26 जनवरी को लोगो को भडक़ाया गया ताकि भारत में चुनी हुई सरकार के प्रति लोगों को विरोध करने के लिए उकसाया जा सके। उनकी तैयारियों का आकलन इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस आंदोलन को भडक़ाने के लिए बड़ी-बड़ी हस्तियों से संपर्क किया। किसान कानूनों के खिलाफ  दुष्प्रचार अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में खूब जोर-शोर से किया गया। इसलिए ही ग्रेटा थनबर्ग, मिया खलीफा और रिहाना जैसी हस्तियों को पैसे देकर इस मामले में हस्तक्षेप करने को कहा गया। इन हस्तियों का किसान आंदोलन के सन्दर्भ में किया गया ट्वीट किसी बेवकूफी से कम  नहीं है, क्योंकि इन  हस्तियों की बातों पर लोग तब ध्यान देते जब इन्हे एकता में विविधता वाले भारत के बारे में तथा किसान कानून के विषय में पूर्ण जानकारी होती।  ग्रेटा थनबर्ग ने जो टूलकिट सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी वह इनके षडयंत्र का भंडाफोड़ करती  है। भले ही  ग्रेटा  ने लोगो की भत्र्सना के बाद अपने ट्वीट को डिलीट कर दिया, लेकिन उससे  किसान अंदोलन में अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र का पर्दाफाश तो हो ही गया। अब सबकुछ जानने के बाद भी हम इस आंदोलन को किसान आंदोलन का नाम देते है तब यह हमारी मूर्खता होगी। एक साधारण सा व्यक्ति भी यह कह सकता है कि यह तथाकथित आंदोलन दिशाहीन हो चुका है। यदि हम अब भी नींद से बाहर नहीं आते है, तो काफी देर हो जायेगी।

 

Deepak Kumar Rath

 दीपक कुमार रथ

(editor@udyaindia.in)

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