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आंदोलन कहीं किसानों को ही विफल करने की नीति न साबित हो

आंदोलन कहीं किसानों को ही विफल करने की नीति न साबित हो

कहते हैं कि शंका का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था। फिर शंका के पीछे कुछ लोगों की अपनी राजनीति और अपने एजेंडे हों तो फिर इसका समाधान और भी मुश्किल है। कृषि नीति के खिलाफ आंदोलन की बुनियाद भी सिर्फ शंकाओं के आधार पर रखी गई है। कुछ लोगों की चाहत है कि सीएए और एनआरसी के विरोध पर दिल्ली में दी गई धरना का रिकार्ड कृषि आंदोलन तोड़े। इसलिए आंदोलन के दिन की गिनती जारी है। यदि कुछ लोगों की जिद नहीं होती, तो सरकार और सुप्रीम कोर्ट की तमाम पहल के बाद भी आंदोलन जारी रखने का कुछ किसान संगठनों द्वारा यूं ऐलानिया सामने नहीं आती।

मुद्दें और गतिरोध के बीच कई ऐसी बातें हैं, जिनपर ठंडे मन से विचार कर हल की ओर बढ़ा जा सकता है। पर उसके लिए जरूरी है कि मुद्दे उठाने वाले सबसे पहले यह तय करे कि इस तकियाकलाम को छोड़ देंगे जिसमें हर वार्ता से पहले कहा जाता है कि कानून वापस लिए बिना कोई समाधान नहीं हो सकता। फिर यह माने कि सरकार जो कुछ भी कर रही है किसान और देश के भले के लिए कर रही है। तरीके बदले जा सकते हैं, लेकिन लक्ष्य नहीं। लक्ष्य है 2022 तक किसानों की आय दूना करने का। जो तीन नए कृषि कानूनों को लाने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने तय किए थे और उस पर अमल करने के लिए वे लगातार प्रयासरत हैं।

अब बात करते हैं नए कृषि कानूनों के प्रावधान और आंदोलनरत किसान संगठनों के नेताओं के मन में उपजी शंकाओं पर। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि कानूनों के लागू होने पर रोक लगा दी है और एक कमेटी गठित कर दो महीने में रिपोर्ट देने की संस्तुति कर दी है तो अब पर्याप्त समय है कि इन कृषि कानूनों की बारिकी से समीक्षा कर ली जाए। यह अच्छी बात है कि सरकार ने कहा कि वह कानूनों के सभी बिंदुओं पर एक-एक करके बात करना चाहती है।

किसानों को भी यह रट छोड़ देना चाहिए कि पहले कानूनों को रद्द किया जाए और एमएसपी पर कानून बनाया जाए। जिन तीन कृषि कानूनों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी है उनमें है  कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक। यह कानून कहता है कि किसानों की उपज को बेचने के लिए ज्यादा विकल्प होने चाहिए। अच्छे दाम मिलने पर किसान एपीएमसी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज बेच सकते हैं। इस कानून में कहीं नहीं लिखा है कि एपीएमसी मंडियों को बंद कर दिया जाएगा और किसानों को सिर्फ निजी मंडियों के हवाले कर दिया जाएगा। निजीकरण के विरोधी रहे कुछ दलों जिसमें खासकर वामपंथी शामिल है, की आशंका है कि मोदी सरकार कृषि व्यवसाय को बड़े कॉरपोरेट खरीदारों के हवाले करने जा रही है। जो बाद में किसानों का सिर्फ शोषण करेंगे और एक तरह से उन्हें गुलाम बना लेंगे।

यह आशंका कितनी निर्मूल है यह इस बात से पता चलता है कि पिछले कई सालों से यह रिपोर्ट प्रकाशित हो रही है कि एपीएमसी मंडियां दलालों और बिचैलियों के चंगुल में काम रही हैं, जहां किसानों को उनकी उपज खरीदने और पैसा दिलाने के नाम पर जबर्दस्त कमीशनखोरी होती है। इस पर कई बार संसद में रिपोर्ट रखी जा चुकी है। फिर एपीएमसी मंडिया पूरे देश की कृषि उपज खरीदने की स्थिति में नहीं हैं। ना तो इन मंडियों की संखा पर्याप्त है और ना इनका प्रशासन ही चुस्त दुरूस्त है। वर्तमान में देश में लगभग 7000 ही मंडियां हैं, जबकि जरूरत 42000 मंडियों की है। जाहिर है कि अब से पहले किसी केंद्र या राज्य सरकारों ने कृषि उपज की नियोजित बिक्री के लिए कोई ढांचा बनाने पर काम ही नहीं किया। इस आंदोलन के बहाने मोदी सरकार पर हमला करने वाली कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां भी केंद्र और राज्य सरकारों में रहीं, तब उन्हें एपीएमसी मंडियों की संख्या बढ़ाने और वहां व्याप्त भ्रष्टाचार मिटाने का ख्याल तक नहीं आया।

दूसरा कानून है- कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत अश्वासन और कृषि सेवा करार विधेयक, 2020। यह कानून किसानों और निजी कंपनियों के बीच में समझौते वाली खेती के नियमन और बेहतर नियोजन के उद्देश्य से लाया गया है। इस कानून को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम फैलाया जा रहा है। आंदोलन के समर्थकों का कहना है कि किसानों की जमीन कोई पूंजीपति या ठेकेदार किराये पर ले लेगा फिर किसानों को उल जुलूल शर्तों में फंसा कर उनकी जमीन ही हड़प लेगा। यह तो किसानों को बंधुआ मजदूर बनाने जैसी बात हो गई। इस आशंका के आधार पर दिल्ली जाम करने वालों के पास इस बात का क्या जवाब है कि पहले से जो किसान कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के करारों के साथ काम कर रहे हैं, क्या उनकी जमीनें हड़प जह गईं।

देश में पिछले 30 वर्षों से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग हो रही है। इस कानून सेसे पहले भी गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग होती रही है। और तो और पंजाब में भी कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कई वर्षों से जारी है। पंजाब में तो 2013 में ही राज्य स्तर पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून लागू कर दिया गया था। पेप्सी कोला पंजाब में आलू समेत कई फसलों की खेती कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए ही कराती रही है। पेप्सी अकेले नहीं कई और कंपनियां पंजाब में आज भी ठेके पर खेती करवा रही हैं।

प्रधानमंत्री मोदी को निशाना बनाने के लिए लगातार यह कहा जा रहा है कि अंबानी और अडानी का खेती पर दबदबा बनाने के लिए ही यह कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का कानून लाया गया है। जबकि पतंजलि, डाबर, गोदरेज, एग्रोवेट आदि दर्जनों कंपनियां बड़े पैमाने पर कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग से जुड़ी हैं, और इनमें से किसी के खिलाफ यह खबर नहीं आई कि इन्होंने किसानों की जमीनें हडप ली हैं। पिछले 30 सालों में किसी भी किसान ने अपनी जमीन किसी कॉरपोरेट के हाथों गंवाई हो इसके एक भी सबूत सामने नहीं आए हैं। नए कानून में यह स्पष्ट प्रावधान है कि किसी भी सूरतेहाल में कोई कंपनी, किसान की जमीन की न तो खरीद-बिक्री कर सकती है और न ही गिरवी रख सकती है। यानी जमीन संबंधी किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं।

2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मोदी सरकार के वायदे को यदि करना है तो किसानों के लिए सबसे अधिक निवेश करना होगा। मोदी सरकार ने अशोक दलवई के नेतृत्व में डबलिंग फार्मर्स इनकम पर एक समिति की नियुक्ति की थी, जिसने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि यदि किसानों की आय दुगनी करनी है तो कृषि और  गैर-कृषि स्रोतों से प्राप्त कृषि आय का अनुपात बदलना होगा। वर्तमान में किसानों की कुल आय के अनुपात में कृषि आय 60 प्रतिशत है तो गैर कृषि आय 40 प्रतिशत, जिसे 2022 तक बदल कर गैर कृषि आय 70 प्रतिशत और कृषि आय 30 प्रतिशत करना होगा। यानी किसानों को पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मतस्य उत्पादन और अन्य व्यावसायिक फसलों की उपज से जोडऩा होगा। जाहिर है इसके लिए बहुत बड़ी पूंजी की जरूरत होगी। यदि किसानों और कॉरपोरेट के बीच खाई खोद दी जाए जो यह निवेश आएगा कहां से।

निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए ही मोदी सरकार ने उर्वरक, कृषि मशीनरी, बागवानी, बीज विकास, पशुधन खेती, मछली पालन और एफ एंड वी में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति दी है। यदि देश में निजी निवेश के खिलाफ माहौल खड़ा किया जाता है कि कौन यहां विदेशी निवेश लेकर आएगा।

ना तो किसान देश के हितों के खिलाफ काम कर सकते हैं और ना कोई सरकार किसानों के विरूद्ध काम कर सत्ता में बनी रह सकती है। यह बात किसान भी जानते हैं और वर्तमान सरकार भी भली-भांति इसे समझती है। सरकार का सारा ध्यान कृषि क्षेत्र को उन्नत टेक्नॉलाजी, बीज और समय पर उचित एवं  पर्याप्त जानकारी देने पर है। सरकार किसानों पर पहले से जारी बोझ को कम करना चाहती है। चाहे वह कर्ज का बोझ हो या पूंजी की कमी का रोना, सरकार धीरे-धीरे कृषि क्षेत्र को भी आत्म निर्भर बनाना चाहती है। इसके लिए जरूरी है कि किसान नेता इस भावना को समझे। किसानों के नाम पर राजनीति की जगह इस समय नहीं है। जितनी जिम्मेदारी सरकार की है उतनी ही जिम्मेदारी आंदोलन करने वाले नेताओं की है। किसानों को उनके खेत में वापस जाने देने और अपने व देश के लिए नए माहौल में उत्पादकता बढ़ाने और उसका लाभ परिवार और समाज को देने का अवसर बनाने का दायित्व किसान नेताओं पर भी है। नहीं तो यह एक सरकार को विफल करने की यह नीति किसानों को ही विफल करने की नीति साबित होगी।

महेश वर्मा

 

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