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कृषि कानूनों के इंटेंट और कंटेंट पर चर्चा होती तो किसानों तक सही चीज पहुंच सकती थी

कृषि कानूनों के इंटेंट और कंटेंट पर चर्चा होती तो किसानों तक सही चीज पहुंच सकती थी

इस कोरोना काल मे तीन कृषि कानून लाए गए। ये कृषि सुधार का सिलसिला बहुत ही आवश्यक है, बहुत ही महत्वपूर्ण है और वर्षो से जो हमारा कृषि क्षेत्र चुनौतियां महसूस कर रहा है। उसको बाहर लाने के लिए हमने निरंतर प्रयास करना ही होगा और करने की दिशा में हमने एक ईमानदारी से प्रयास किया है। जो भावी चुनौतियां जिसको कई विद्वानों ने कहा हुआ है कोई मेरे शब्द नहीं हैं कृषि क्षेत्र की इन भावी चुनौतियों को हमें अभी से डील करना पड़ेगा। और उसको करने के लिए हमने प्रयास किया है। मैं देख रहा था कि यहां पर जो चर्चा हुई और विशेषकर के जो हमारे कांग्रेस के साथियों ने चर्चा की। मैं ये तो देख रहा था कि वो इस कानूने के कलर पर तो बहुत बहस कर रहे थे। ब्लैक है कि व्हाइट है, अच्छा होता उसके कनटेंट पर चर्चा करते, अच्छा होता उसके इनटेंट पर चर्चा करते,  ताकि देश के किसानों को भी सही चीज पहुंच सकती थी और मुझे विश्वास है दादा ने भी भाषण किया और मुझे लगता है कि दादा तो बहुत अभ्यास करके आए होंगे बहुत अच्छी बात बतांएगे लेकिन वो ज्यादातर प्रधानमंत्री और उनके साथी बंगाल में यात्रा क्यों कर रहे हैं कैसे कर रहे हैं, कहां जा रहे हैं उसी में लगे रहे। तो दादा के ज्ञान से हम इस बार वंचित रह गए। हम एक बात समझें जहां तक आंदोलन का सवाल है। दिल्ली के बाहर हमारे जो किसान भाई-बहन बैठे हैं। जो भी गलत धारणाएं बनाई गई, जो अफवाएं फैलाई गई उसके शिकार हुए हैं। मेरा भाषण बोलने के बाद सब कीजिए आप, आपको मौका मिला था। आप तो ऐसे शब्द उनके लिए बोल सकते हैं, हम नहीं बोल सकते। हमारे श्रीमान कैलाश चौधरी जी ने और देखिए मैं कितनी सेवा करता हूं आपकी, आपको जहां रजिस्टर करवाना था हो गया।

आंदोलन कर रहे सभी किसान साथियों की भावनाओं का ये सदन भी और ये सरकार भी आदर करती है, आदर करती रहेगी। और इसलिए सरकार के वरिष्ठ मंत्री, जब ये आंदोलन पंजाब में था तब भी और बाद में भी, लगातार उनसे वार्ता कर रहे हैं। किसानों के प्रति सम्मान भाव के साथ कर रहे हैं। आदर भाव के साथ कर रहे हैं।

लगातार बातचीत होती रही हैं। और जब पंजाब में आंदोलन चल रहा था उस समय भी हुई है। दिल्ली आने के बाद हुई ऐसा नहीं है। बातचीत में किसानों की शंकाए क्या हैं वो ढूंढने का भी भरपूर प्रयास किया गया। उनसे लगातार कहा गया कि हम एक-एक मुद्दे पर चर्चा करेंगे। नरेंद्र सिहं तोमर जी ने इस विषय में विस्तार से बताया भी है राज्यसभा में तो। क्लोज बाई क्लोज चर्चा करने के लिए भी कहा है और हम मानते हैं कि अगर इसमें कोई कमी हो और सचमुच में किसान का नुकसान हो तो बदल देने में क्या जाता है जी। ये देश देशवासियों के लिए है अगर कोई निर्णय करते हैं तो किसानों के लिए है लेकिन हम इंतजार करते हैं अभी भी इंतजार करते हैं कि वो अगर को चीज स्पेसीफिक बताते हैं और अगर वो कन्विंसिंग है तो हमें कोई संकोच नहीं है और इसलिए हम जब शुरू में वो जब पंजाब में थे। ये आर्डिनेंस के द्वारा ही तीनों कानून लागू किए गए थे। बाद में पार्लियामेंट में पारित हुए। कानून लागू होने के बाद न देश में कोई मंडी बंद हुई है, कानून लागू होने के बाद न कहीं एमएसपी बंद हुआ है। ये सच्चाई है जिसको हम छुपा करके बातें करते हैं, जिसका कोई मतलब न हीं है। इतना ही नहीं, एमएसपी की खरीदी भी बढ़ी है और ये कानून नए बनने के बाद बढ़ी है।

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ये हो-हल्ला, ये आवाज, ये रुकावटें डालने का प्रयास एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा है और सोची-समझी रणनीति ये है कि जो झूठ फैलाया है, जो अफवाहें फैलाई हैं उसका पर्दाफाश हो जाएगा, सत्य वहां पहुंच जाएगा तो उनका टिकना भारी हो जाएगा और इसलिए हो-हल्ला करते रहो, जैसा बाहर करते थे ऐसा अंदर भी करते रहो, यही खेल चलता रहा है। लेकिन इससे आप कभी भी आप लोगों का विश्वास नहीं जीत पाओगे ये मानकर चलो। ऑर्डिनेंस के बाद और पार्लियामेंट में कानून बनने के बाद किसी भी किसान से मैं पूछना चाहता हूं कि पहले जो हक उनके पास थे, जो व्यवस्थाएं उनके पास थीं, उसमें से कुछ भी इस नए कानून ने छीन लिया है क्या? इसकी चर्चा, उसका जवाब कोई देता नहीं है। सब कुछ वैसा का वैसा वो है। क्या हुआ है एक अतिरिक्त विकल्प व्यवस्था मिली है, वो भी क्या कंपल्सरी है। किसी कानून का विरोध तो तब मायने रखता है कि जब वो कंपल्सरी हो। ये तो ऑप्शनल है, आपको मर्जी पड़े जहां जाना है जाइए, आपको मर्जी पड़े वहां ले जाना है वहां जाइए। जहां ज्यादा फायदा हो वहां किसान चला जाए, ये व्यवस्था की गई है।

ये जो है कानून, किसी के भी लिए बंधनकर्ता नहीं है, ऐसा कानून है। उनके लिए ऑप्शन है और जहां ऑप्शन है वहां विरोध के लिए कोई कारण ही नहीं बनता है। हां, ऐसा कोई कानून जो ऐसे थोप दिया हो, उसके लिए विरोध का कारण बनता है। और इसलिए मैं कहता हूं, लोगों को…मैं  देख रहा हूं, आंदोलन का एक नया तरीका है। क्या तरीका है- आंदोलनकारी जो होते हैं वो ऐसे तरीके नहीं अपनाते…आंदोलनजीवी होते हैं वो ऐसे तरीके अपनाते हैं।  और वो कहते हैं ऐसा हुआ तो ऐसा होगा, ऐसा होगा तो ऐसा होगा। अरे भाई! जो कुछ हुआ ही नहीं, जो होना नहीं है, उसका भय पैदा कर-करके और पिछले कई सालों से लगातार सुप्रीम कोर्ट का एक जजमेंट आ जाये, कोई निर्णय नहीं हुआ है और एकदम से तूफान खड़ा कर दिया जाए, आग लगा दी जाए देश में। ये जो तौर-तरीके हैं..वो तौर-तरीके…जो भी लोकतंत्र में विश्वास करते हैं, जो भी अहिंसा में विश्वास करते हैं, उन सबके लिए चिंता का विषय होना चाहिए। ये सरकार की चिंता का नहीं, देश की चिंता का विषय होना चाहिए।

पुरानी मंडियों पर भी कोई पाबंदी नहीं है। इतना ही नहीं, इस बजट में इन मंडियों को आधुनिक बनाने के लिए, उनके इंफ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के लिए और बजट की व्यवस्था की गई है और उस बजट के माध्यम से, ये जो हमारे निर्णय हैं वो ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की भावना के साथ ही लिए गए हैं। आदरणीय अध्यक्ष जी, इस सदन के साथी भलीभांति इस बात को समझते हैं कि कांग्रेस और कुछ दलों ने बड़े जोर-शोर से बात अपनी कही, लेकिन जिन बातों को लेकर उनको कहना चाहिए, भाई ये नहीं ये…अपेक्षा ये होती है कि वे इतनी स्टडी करके आए हैं। इतना ही नहीं, जो लोग ये कहते हैं…मैं हैरान हूं पहली बार एक नया तर्क आया है इस सदन में कि भई हमने मांगा नहीं था तो दिया क्यों? पहली बात है कि लेना-न लेना आपकी मर्जी है, किसी ने किसी के गले मढ़ा नहीं है। ऑप्शनल है, एक व्यवस्था है और देश बहुत बड़ा है। हिन्दुस्तान के कुछ कोने में इसका लाभ होगा, हो सकता है किसी को न भी हो, लेकिन ये कंपल्सरी नहीं है। और इसलिए मांगा और देने का मतलब नहीं होता है। लेकिन मैं फिर भी कहना चाहता हूं इस देश में.., दहेज के खिलाफ कानून बने। इस देश में कभी किसी ने मांग नहीं की थी कि फिर भी देश की प्रगति के लिए कानून बना था।

ट्रिपल तलाक- इसके खिलाफ कानून बने, ये किसी ने मांग नहीं की थी, लेकिन प्रगतिशील समाज के लिए आवश्यक है इसलिए कानून हमने बनाए हैं। हमारे यहां बाल-विवाह पर रोक- किसी ने मांग नहीं की थी कानून बनाओ, फिर भी कानून बने थे क्योंकि प्रगतिशील समाज के लिए आवश्यक होता है। शादी की उम्र बढ़ाने के निर्णय- किसी ने मांग नहीं की थी, लेकिन प्रगतिशील विचार के साथ वो निर्णय बदलने पड़ते हैं। बेटियों को संपत्ति में अधिकार- किसी ने मांग नहीं की थी, लेकिन एक प्रगतिशील समाज के लिए आवश्यक होता है, तब जा करके कानून बनाया जाता है। शिक्षा का अधिकार देने की बात- किसी ने मांग नहीं की थी, लेकिन समाज के लिए आवश्यक होता है, बदलाव के लिए आवश्यक होता है तो कानून बनते हैं। क्या कभी भी इतने सुधार हुए, बदलते हुए समाज ने इसको स्वीकार किया कि नही किया, ये दुनिया पूरी तरह जानती है।

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हम ये मानते थे कि हिन्दुस्तान की बहुत पुरानी पार्टी-कांग्रेस पार्टी, जिसने करीब-करीब छह दशक तक इस देश में शासन किया, ये पार्टी का ये हाल हो गया है कि पार्टी का राज्यसभा का तबका एक तरफ चलता है और पार्टी का लोकसभा का तबका दूसरी तरफ चलता है। ऐसी डिवाइडेड पार्टी, ऐसी कन्फ्यूज्ड पार्टी, न खुद का भला कर सकती है, न देश की समस्याओं के समाधान के लिए कुछ सोच सकती है। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है? कांग्रेस पार्टी राज्यसभा में भी, कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता राज्यसभा में बैठे हैं, लेकिन वो एक बहुत आनंद और उमंग के साथ वाद-विवाद करते हैं, विस्तार से चर्चा करते हैं, अपनी बात रखते हैं और यही कांग्रेस पार्टी का दूसरा तबका…अब समय तय करेगा।

श्वक्कस्न पेंशन योजना- हमें मालूम है कभी कभी ऐसे केस में ये सामने आया, जब 2014 के बाद मैं यहां बैठा, किसी को पेंशन सात रुपये मिल रही थी, किसी को 25 रुपये, किसी को 50 रुपये, किसी को 250 रुपये…ये देश में चलता था। मैंने कहा- भई इन लोगों को ऑटो रिक्शा में वो पेंशन लेने जाने का खर्चा इससे ज्यादा होता होगा। किसी ने मांग नहीं की थी, किसी मजदूर संगठन ने मुझे आवेदन पत्र नहीं दिया था, माननीय अध्यक्ष जी। उसमें सुधार ला करके मिनिमम 1000 रुपये हमने देने का निर्णय किया था, किसी ने मांगा नहीं था। मुझे किसी भी किसान संगठन ने इस देश के छोटे किसान को कुछ सम्मानित पैसे मिलें, इसकी व्यवस्था की किसी ने मांग नहीं की थी, लेकिन हमने प्रधानमंत्री सम्मान निधि योजना के तहत उनको हमने धन सामने से देना शुरू किया।

हमारे यहां ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए एग्रो-बिज इंडस्ट्री की संभावना भी बढ़ेगी। और इसलिए हमें इस पूरे क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में हमें जरूर काम करना चाहिए। कई विपरीत परिस्थितियों में भी हमारे किसान ने रिकॉर्ड उत्पादन किया है। कोरोना काल में भी रिकॉर्ड उत्पादन किया है। ये हम सबकी जिम्मेदारी है कि हमारे किसान की जो परेशानियां हैं वो कम हों। उनके सामने जो चुनौतियां हैं वो चुनौतियां कम करने के लिए हम कुछ कदम उठाएं। और इन कृषि सुधारों से हम उस दिशा में कुछ न कुछ करने का प्रयास कर रहे हैं। किसानों को एक बराबरी का प्लेटफार्म दे पाएं हम, आधुनिक टेक्नोलॉजी दे पाएं…उनके अंदर एक नया आत्मविश्वास भर पाएं…उस दिशा में सकारात्मक सोच की बहुत आवश्यकता है। पुरानी सोच, पुराने मापदंड किसानी का भला कर पाते तो बहुत पहले कर पाते। दूसरी ग्रीन रेवोलुशन की हमने बातें कर लीं। हम एक नए तौर-तरीके देंगे आगे बढऩे के और सब कोई चिंतन करिए। राजनीति का विषय नहीं होना चाहिए। ये देश की भलाई के लिए बहुत आवश्यक है…मिल-बैठ करके हमने उसको सोचना चाहिए। सभी दल चाहे सत्ता में हो या विपक्ष में…ये हम सबका दायित्व है और हमें 21वीं सदी में 18वीं सदी की सोच से हमारे कृषि क्षेत्र को, हम उसकी सोच को पूरा नहीं कर सकते हैं। उसी को हमने बदलना होगा।

कोई नहीं चाहता है कि हमारा किसान गरीबी के चक्र में फंसा रहे। उसको जिंदगी जीने का हक न मिले। मैं मानता हूं कि उसको आश्रित रहना न पड़े…उसको पराधीन न रहना पड़े। सरकारी टुकड़ों पर पलने के लिए मजबूर न होना पड़े। ये जिम्मेदारी भी हम सबकी है और जिम्मेदारी को निभाना…हमारा अन्नदाता  समृद्ध हो, हमारा अन्नदाता कुछ न कुछ और ज्यादा देश के लिए कर सके उसके लिए अगर हम अवसर देंगे तो बहुत सारी…।

सरदार वल्लभभाई पटेल एक बात कहते थे। किसानों को स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यदि परतंत्रता की दुर्गंध आती रहे तो स्वतंत्रता की सुगंध नहीं फैल सकती। जब तक हमारे छोटे किसान को नए अधिकार नहीं मिलते तब तक पूर्ण आजादी की उनकी बात अधूरी रहेगी और इसलिए बड़ा बदलाव कर-करके हमको हमारे इन किसानों को एक लंबी यात्रा के लिए तैयार करना होगा और हम सबको मिल करके करना होगा। गलत कुछ करने के इरादे से कुछ नहीं होना चाहिए, अच्छा करने के इरादे से होना चाहिए। किसी की भलाई करने के लिए होना चाहिए।

हमारी सरकार ने छोटे किसानों के लिए हर कदम पर कार्य किया। छोटे किसानों को हमने बीज से ले करके बाजार तक पिछले छह वर्षों में अनेक ऐसे कार्य किए हैं जो छोटे किसान की मदद कर सकते हैं। अब डेयरी सेक्टर और कोऑपरेटिव सेक्टर सशक्त भी हैं और उसका एक मजबूत वैल्यू चैन भी बना है। अब सरकार की दखल कम से कम है फिर भी वो मजबूती पाया है। हम धीरे-धीरे फल-फूल-सब्जी की तरफ बल दे सकते हैं। हम किसान को बहुत ताकतवर बना सकते हैं। हमारे पास मॉडल है…सफल मॉडल है। उस सफल मॉडल का हमें प्रयोग करना चाहिए। हमें किसानाके को वैकल्पिक बाजार देना चाहिए।

 

नरेन्द्र मोदी

(यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के लोकसभा में दिए उदबोधन पर आभार प्रस्ताव की चर्चा में दिए भाषण  के सम्पादित अंशों पर आधारित है)

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