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बजट घटने से प्रभावित होगा नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन

बजट घटने से प्रभावित होगा नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन

किसी भी देश की संस्कृति का आधार शिक्षा है। विशेष बात यह है कि शिक्षण संस्थाएं साधन संपन्न और गुणवत्तापूर्ण होना चाहिए। यह तभी संभव होगा, जब हर साल प्रारंभिक शिक्षा और उच्च शिक्षा का बजट बढ़ाया जाए, परंतु इस बार बजट में शिक्षा के क्षेत्र में कंजूसी दिखाई गई है। बीता साल कोविड-19  महामारी की भेंट चढ़ गया। स्कूल और कॉलेज बंद रहे। लॉकडाउन के बाद जैसे-तैसे ऑनलाइन क्लास शुरू हुई, परंतु गरीब बच्चे साधनों की कमी के कारण इस सुविधा से वंचित रहे। सभी को उम्मीद थी कि महामारी  से उपजी ऑनलाइन पढ़ाई की आवश्यकता को देखते हुए सरकार इस  ओर ध्यान देगी। इस विषय में कोई नई नीति की घोषणा बजट में करेगी, परंतु इस ओर ध्यान ना दिया जाना आश्चर्यजनक है। यहां देखने वाली बात यह है कि कोरोनाकाल में ही  सरकार ने नई शिक्षा नीति घोषित की थी। तब यह कहा गया था कि शिक्षा के क्षेत्र की अब उपेक्षा  नहीं की जाएगी। देश के शिक्षाविद काफी समय से कहते रहे हैं कि देश की जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च होना चाहिए।

बजट से पहले हुए  सर्वेक्षण में भी यह बात उभरकर सामने आई थी, कि इस बजट में शिक्षा को लेकर कई बड़े प्रावधान हो सकते हैं। पिछले वर्षों में शिक्षा पर जीडीपी का अधिकतम 3 फीसदी ही प्रावधान होता रहा है। पिछले वर्ष शिक्षा का बजट 99 हजार  करोड़ रुपए था। इस बार इस बजट में 6 हजार  करोड़ घटा दिए गए हैं। पिछले साल ही  समग्र शिक्षा योजना शुरू की गई है। सिर्फ उसी में सात हजार करोड़ रुपए घटाए गए हैं। जबकि यह योजना स्कूली शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई है। बजट में कटौती से इस योजना की प्रगति निश्चित रूप से प्रभावित होगी।

यह सच है कि देश के अनेक राज्यों में स्कूली शिक्षा के लिए अभी भी पर्याप्त भवन और शिक्षा संसाधन उपलब्ध नहीं है। जहां भवन बने हैं, वहां तक जाने के लिए कच्ची- पक्की सडक़ें नहीं बनी है। ऐसे सुदूर ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में पगडंडियों के सहारे छात्र स्कूलों में पहुंचते हैं। वर्षाकाल में उन्हें नदी -नालों  को पार करके जाना पड़ता है। वे कहीं-कहीं पर नाव से नदी-नाले पार करते हैं और कहीं ग्रामीणों द्वारा बनाए गए लकड़ी और बांस के पुलों के सहारे स्कूल आते-जाते हैं।

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कई राज्यों में छात्र और छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय अभी तक नहीं बन सके। अनेक भवनों में बिजली और पानी के पर्याप्त संसाधन नहीं है। सभी स्कूलों में किचन और पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। पर्याप्त शिक्षकों की भर्ती होनी चाहिए। समय -समय  पर प्राप्त मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में हजारों की संख्या में शिक्षकों के पद खाली हैं। ऐसी परिस्थिति में स्कूली शिक्षा का बजट बढ़ाना चाहिए। तभी हम स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व्यवस्था पूर्ण करने में सक्षम हो सकेंगे। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि शिक्षा पर व्यय एक खर्च नहीं, बल्कि निवेश है। शिक्षित होकर छात्र अच्छे संस्कारवान नागरिक बनेंगे। इससे देश मजबूत बनेगा। जिस तरह स्वास्थ्य बजट 137 प्रतिशत  बढ़ाया गया है, वह स्वागतयोग्य है, परंतु इसके विपरीत शिक्षा बजट को कम करना, कहीं से भी न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।

एक तरफ तो हम नई शिक्षा नीति में देश में विश्वस्तरीय शिक्षा के स्तर को बनाने की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ हम  शिक्षा के बजट में कटौती भी कर रहे हैं। ऐसी नीति से शिक्षा के जानकार हतप्रभ हैं। इसका प्रभाव नि:संदेह नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन पर पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि नई शिक्षा नीति में अनेक नई बातें कही गई हैं। जिनका  क्रियान्वयन किया जाना है। शिक्षण संस्थाओं के प्रबंधन व्यवस्था में भी सुधार होना है। कक्षा एक से पहले के बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था करनी है। इसके लिए शिक्षक और उनके प्रशिक्षण की व्यवस्था करना है।

मातृभाषा में शिक्षा देने के लिए शिक्षकों को पहले प्रशिक्षित करना है। जिन स्कूलों में लैब नहीं है, वहां लैब बनाना है। कक्षा छठवीं के बाद से ही वोकेशनल ट्रेनिंग की व्यवस्था करना जरूरी है। इस तरह बढ़े हुए खर्च की आवश्यकता को देखते हुए आगामी संशोधित  बजट में प्रावधान बढ़ाने होंगे। उच्च शिक्षा के लिए इस बजट में 38, 350 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसी तरह स्कूल शिक्षा के लिए 495 करोड़ रखे गए हैं। इस बजट में 10 नये प्राइमरी स्कूल खोलने, सौ स्कूल सेकेंडरी से हायर सेकेंडरी में अपडेट करने, 300 नए हायर सेकेंडरी स्कूल खोलने, 10 नए नेशनल हॉस्टल खोलने, 10 लाख स्कूलों में लाइब्रेरी सुविधा उपलब्ध कराने, 5 नए डाइट स्कूल खोलने, 30 लाख प्राइमरी शिक्षकों को ट्रेनिंग देने, पांच नए कस्तूरबा स्कूल खोलने, 3 लाख  स्कूलों में लड़कियों को स्वयं की रक्षा का प्रशिक्षण देने, स्कूलों में 100 प्रतिशत किचन बनाने, नौ विश्वस्तरीय संस्थान खोलने तथा स्कूलों में न्यूट्रीशन गार्डन बनाने जैसी बातें कही गई है।

बजट के प्रावधानों को मूर्त रूप देने के लिए राज्य सरकारों को केंद्र की गाइडलाइन के अनुसार कदमताल करने की आवश्यकता होगी। समन्वय के अभाव में योजनाएं कितनी भी अच्छी हों, दम तोड़ देती हैं। अनेक नए बदलावों को देखते हुए नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन चुनौतियों से भरा है। इसके लिए राज्य सरकारों की सहभागिता महत्वपूर्ण है।

 

 

श्रीराम माहेश्वरी

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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