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मोदी से उम्मीदें और उपलब्धि

मोदी से उम्मीदें और उपलब्धि

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार के एक साल पूरे हो गए। केवल गण माध्यम या विरोधी राजनीति दल ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व की आंखें भारत की मोदी सरकार पर टिकी हुई है। आखिर क्यों? उम्मीद उससे रखी जाती है जो सक्षम हो। यह इस बात का प्रमाण है कि आज नरेन्द्र मोदी हमारे देश को एक सशक्त नेतृत्व दे रहे हैं। इसमें कोई दो राय भी नहीं है। केन्द्र की सरकार ने क्या किया, कितना किया, कहां किया और कैसे किया यह आंकलन का विषय है। जैसे चलती का नाम गाड़ी है, वैसे ही इस प्रधानमंत्री का नाम सरकार के अनुरूप हो चुका है।

‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा….’यह कहकर उस दिन नरेन्द्र मोदी ने अटल बिहारी वाजपेयी और उनके प्रशासन की भरपूर तारीफ की थी। आज प्रधानमंत्री मोदी वास्तव में धन्यवाद के पात्र हैं, क्योंकि उन्होंने अटलजी के अटल वाक्य को कायम रखा है। मोदी ने राजधर्म और राष्ट्रधर्म को खूब निभाया, इसमें भी कोई दो राय नहीं है।

विकास पर राजनीति और राजनीति में विकास, भारतीय राजनीति के साथ खूब नाता रखता है। अगर कोई अटल बिहारी वाजपेयी के पांच साल की सरकार का अन्वेषण करें तो पता चल जाएगा कि अटलजी विकास की राह पर एक मजबूत नेतृत्व थे, परंतु भारतीय गणतंत्र और आम जनता ने उनका साथ नहीं दिया और उनके नेतृत्व में दुबारा सरकार नहीं बन पाई। नरेन्द्र मोदी विकास की बातें खूब करते हैं और भारत में निवेश के लिए 18 से अधिक देशों का भ्रमण कर आधारभूत संरचना के विकास की योजना बना रहे हैं। वे सांप्रदायिक राजनीति से दूरी बनाकर खड़े हैं। बावजूद इसके, मोदी सरकार उतनी पॉपुलर नहीं है, जैसा लोगों ने सोचा था।

‘मोदी के सपनों का भारत’ कब बनेगा किसी को पता नहीं। आम जनता मोदी से पहले भी रोती थी, महंगाई से मरती थी और मोदी के सत्ता में आने के बाद आज भी रो रही है। आम जनता चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है – ”भाषण से पेट नहीं भरने वाला।’’ इसमें सत्यता तो है ही, लेकिन गूढ़ राजनीति भी कुछ कम नहीं है।  दिल्ली विधानसभा चुनावों में धूल चाटने के बाद अब बिहार में मोदी को अग्रिपरीक्षा से गुजरना है। अब देखना है कि वह अग्रिपरीक्षा में सफल होते हैं या विलीन हो जाते हैं।

भारत का केंद्रीय तत्व उसकी विविधता है, इससे कतई इनकार नहीं किया जा सकता। भारतीय गणतंत्र इसी बुनियादी वादे पर टिका है कि उसके सभी नागरिक समान हैं, वे कहीं आने-जाने को स्वतंत्र हैं, उनकी सभी बुनियादी जरूरतें पूरी की जाएंगी और देश का कानून उनके साथ कोई भेदभाव नहीं बरतेगा। इसी मूल विचार की पृष्ठभूमि में मई 2015 में नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपना साल भर पूरा किया है। पिछले साल जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो देश के छद्म धर्मनिरपेक्षतावादियों ने शंका जाहिर की थी कि नई सरकार भारत के बारे में नए विचार के साथ आई है और उसका बहुसंख्यक प्रभुत्व का विचार उस सामाजिक-राजनैतिक दर्शन के विरुद्ध है जिसकी बुनियाद पर यह देश बना है। उन्हें आशंका थी कि यह नया विचार दंगों और ध्रुवीकरण को बढ़ावा देगा। सरकार विकास के नाम पर निजी क्षेत्र को बड़ी रियायतें देने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण मुहैया कराने के मदों से सरकारी व्यय में बड़े पैमाने पर कटौती करेगी, मजदूरों को कमजोर करेगी और प्राकृतिक संसाधनों की लूट को बढ़ावा देगी। लेकिन साल भर बाद वे पूरी तरह गलत साबित हुए और यह बात प्रधानमंत्री मोदी की देश के चहुंतरफा विकास की प्रतिबद्धता से पुष्ट होती है।

प्रधानमंत्री की प्रतिबद्धता इसी से जानी जा सकती है कि पिछले साल भर में उन्होंने काम से कभी छुट्टी नहीं ली। हाल में तीन देशों की यात्रा से 19 मई को देर शाम लौटने के बाद वे अगली सुबह 8 बजे उच्चस्तरीय मंत्रियों के कोर ग्रुप की बैठक में शामिल हुए। यहां यह भी गौर किया जा सकता है कि उनके नेतृत्व में भारत का जुड़ाव दुनिया से बेहतर हुआ है और धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा लौट रहा है और वे भारत को पसंदीदा ठिकाना मानने लगे हैं। आर्थिक कूटनीति का यह कौशल वे गुजरात का मुख्यमंत्री रहते भी दिखा चुके हैं। मोदी सरकार के सत्ता में पहुंचने के बाद देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। मोदी के विदेश दौरों से जब निवेश के समझौते धरातल पर उतरने लगेंगे तो देश में अप्रत्याशित कामयाबी दिखने लगेगी। मोदी को यह पता है कि मामला इतना आसान नहीं है। जिन राज्यों में इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास नहीं हो पाया है, वहां फिलहाल निवेश आकर्षित नहीं हो सकता। इसी से पता चलता है कि चीन के उनके ताजा दौरे में महाराष्ट्र और गुजरात का मामला ही आगे क्यों रहा। इसके अलावा, सरकार के पहले साल के बाद अर्थव्यवस्था से सुखद संकेत मिलने लगे हैं। वृद्धि और मुद्रास्फीति की दरों में सुधार हुआ है, चालू खाते के घाटे पर अंकुश लगा है, जो अच्छी नीतियों की वजह से भी हुआ है।

दरअसल, पिछले एक साल में मोदी ने खुद को सिर्फ केंद्र सरकार के अगुवा के रूप में ही पेश नहीं किया है, बल्कि ऐसे प्रेरणादायक राजनैतिक नेता की तरह उभरे हैं जो लोगों में बड़े पैमाने पर आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति भर देता है। हालांकि सरकार के पास अभी भी बहुत कुछ करने को है। मसलन, उसे कालेधन पर लोगों से किए वादे पर खरा उतरना है, युवाओं को रोजगार मुहैया कराना है और ऐसी व्यवस्था बनानी है जिसमें हार-जीत सभी तर्कसंगत लगे। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद सिर्फ 5.6 फीसदी पर ही पहुंच सका। हालांकि मीडिया और बौद्धिक जमातों का एक वर्ग अपने नमूना सर्वेक्षणों के आधार पर मोदी सरकार की उपलब्धियों को शून्य बता रहा है। असल में बहस का विषय यह है कि आम आदमी इस सरकार से खुश है कि नहीं। असल में, जरूरी चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं, पेट्रोल-डीजल के दाम बढऩे लगे हैं, रोजगार के अवसरों के अभाव में युवाओं का मोहभंग होने लगा है।

फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मोदी ने कई सकारात्मक कदम उठाए हैं, जिनका असर कुछ समय बाद या दीर्घावधि में दिखना शुरू होगा। मुनासिब दाम में रिहाइशी आवास, इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार, कम आमदनी वाले लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोडऩे जैसे महत्वपूर्ण कदमों का असर दिखने में कुछ समय लग सकता है। इसलिए इस मौके पर सरकार की तीखी समीक्षा जल्दबाजी ही होगी।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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