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कठिन है डगर चुनावों की

कठिन है डगर चुनावों की

देश के पांच राज्यों में चुनाव की औपचारिक अधिसूचना जारी हो चुकी है, रणभेरी बज चुकी है, उम्मीदवार मैदान में डट गए हैं और चुनाव प्रचार अपने अंतिम चरणों में पहुंचता जा रहा है। जिस तरह के दृश्य सामने आ रहे हैं उनसे अनायास ही कवि हरिवंश राय बच्चन की यह पंक्तियां याद आ जाती हैं की ‘यह महान दृश्य है,चल रहा मनुष्य है, अश्रु श्वेद रक्त से, लथपथ लथपथ लथपथ,अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।’ हालांकि हर चुनाव महत्वपूर्ण होता है लेकिन इस बार पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुदुचेरी के विधानसभा चुनाव के कई मायने निकल सकते हैं। असम में अभी बीजेपी गठबंधन की सरकार है तो केरल में लेफ्ट समर्थित गठबंधन की सरकार है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की टीएमसी सत्ता में है जबकि तमिलनाडु में एआईडीएमके और पुदुचेरी में कांग्रेस। अपने स्वर्णिम काल से गुजर रही बीजेपी के लिए भी पांच राज्यों में चुनावों की राह आसान नहीं है। पार्टी को पता है कि इन राज्यों के नतीजों को सीधे मोदी सरकार के कामकाज से जोडक़र देखा जा सकता है। ऐसे में उसकी चिंता चुनाव जीतने के साथ ही चुनाव नतीजों से बनने वाली छवि को लेकर भी है। चूंकि अब बीजेपी भारतीय राजनीति के केंद्र में है इसलिए अगर चुनाव नतीजे उसके पक्ष में नहीं आते तो इस बात का पोस्टमार्टम ज्यादा होगा कि यह हार बीजेपी राज्य संगठन की है या फिर केंद्र में उसकी अगुआई में चल रही सरकार की। कुल मिलाकर परोक्ष रूप में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर सवालिया निशान लगाए जाएंगे। अगले साल ही यूपी और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इन पांच राज्यों के चुनाव परिणामों से बनने वाले माहौल का असर यूपी के वोटरों को भी प्रभावित कर सकता है। स्वाभाविक ही बीजेपी इन्हें लेकर काफी संवेदनशील है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2014 में केंद्र की सत्ता में आई भाजपा ने इसके बाद होने वाले विधानसभा के चुनावों में बड़ी सफलता हासिल की थी। यह सिलसिला 2017 तक चला, लेकिन उसके बाद से भाजपा विधानसभा चुनावों में बड़ी (एकतरफा) जीत हासिल नहीं कर पाई है। अलबत्ता, लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत का अपना जलवा कायम रखा है।

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साल 2018 से लेकर 2020 तक कुल 18 राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए हैं जिसमें भाजपा 10 राज्यों में चुनाव हारी। यह अलग बात है कि बाद में कर्नाटक और मध्य प्रदेश में भाजपा विपक्षी दलों की सरकार गिराकर सत्ता में आने में सफल रही। जिन राज्यों में भाजपा ने जीत हासिल की थी उनमें भी हरियाणा में पार्टी बहुमत से दूर रह गई थी। मेघालय, मिजोरम और नागालैंड में भाजपा को दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाना पड़ा। वहीं, छत्तीसगढ़, दिल्ली और राजस्थान में भाजपा को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा। 2020 में भाजपा बिहार के चुनाव में किसी तरह से जद (यू) के साथ गठबंधन कर सरकार बना पाई और विपक्षी दलों ने उसे कांटे का टक्कर दी। इस बार बड़े सवाल ये हैं कि क्या बंगाल में बीजेपी पहली बार सत्ता की कुर्सी तक पहुंच पाएगी? क्या तमिलनाडु में वैकल्पिक राजनीति का प्रवेश होगा? क्या केरल में हर पांच साल बाद सरकार बदलने का ट्रेंड जारी रहेगा? असम में क्या बीजेपी अपना सिक्का जमाए रखेगी?

मुंह में कांटा–बंगाल

भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद पश्चिम बंगाल से है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वहां ममता बनर्जी की अगुआई में टीएमसी लंबे समय से सत्ता में है। ऐसे में वहां उसे एंटी इन्कम्बेंसी का फायदा मिल सकता है। लोकसभा में राज्य की 18 सीटें जीतने से उसके हौसले पहले ही बुलंद हैं। राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित होने के बाद पार्टी को लगता है कि अब ममता विरोधी वोट उसे ही मिलेंगे। दिक्कत यह है कि वहां अगर वोटों का ध्रुवीकरण नहीं हुआ तो बीजेपी की राह में अड़चन आ सकती है। पिछले दिनों आए ओपीनियन पोल में भी सीटें कम होने के बावजूद ममता बनर्जी आगे बताई गई हैं। 2016 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को महज तीन सीटें मिली थीं, लेकिन बीजेपी के लिए समस्या यह है कि उसके प्रदर्शन की तुलना विधानसभा चुनाव के बजाय लोकसभा चुनाव से की जाएगी। वैसे पार्टी का मानना है कि जब मोदी-शाह की जोड़ी मैदान में उतरेगी तो बीजेपी के लिए बंगाल फतह अधिक मुश्किल नहीं होगा। खासकर जिस तरह एक के बाद एक कई दिग्गज टीएमसी छोडक़र बीजेपी की ओर मुड़े हैं, उससे पार्टी का मनोबल बढ़ा हुआ है।

अभी हाल ही में दिल्ली के एनडीएमसी सेंटर में जब भाजपा पदाधिकारियों की बैठक हुई तो इसमें भी इस साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर मंथन किया गया। सूत्रों का कहना है कि भाजपा के तमाम विस्तार के बाद भी पार्टी विधानसभा चुनावों में उन राज्यों में जीत से दूर रह जाती है जहां विपक्ष के पास कद्दावर स्थानीय नेता है। मसलन, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, दिल्ली जैसे राज्य इस बात की गवाही देते हैं। ऐसे में बंगाल के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी जैसी कद्दावर नेता को पछाडऩा आसान काम नहीं है। इसलिए भाजपा की कोशिश है कि बंगाल के चुनाव को ममता बनाम मोदी किया जाए। चूंकि प्रधानमंत्री का क्रेज देशभर में है और जहां भी मोदी बनाम अन्य के चेहरे पर चुनाव हुए हैं वहां भाजपा ने जीत हासिल की है। कर्नाटक, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, बिहार, ओडिशा या महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भाजपा मोदी का चेहरा आगे कर चुनाव नहीं लड़ी थी। इन राज्यों में भाजपा ने स्थानीय नेताओं का चेहरा सामने रखा था। ऐसे में इन राज्यों में भाजपा ने जहां जीत हासिल की, वहां भी विपक्षी खेमा बराबरी का टक्कर देने में कामयाब रहा। बंगाल के संदर्भ में भाजपा की सबसे बड़ी चिंता इसी बात की है।

मंजिलें और भी हैं

असम बीजेपी के लिए दूसरी बड़ी चुनौती है। वहां जब 2016 में पार्टी ने चुनाव जीता तो इसे बहुत बड़ा राजनीतिक संदेश माना गया। लेकिन असम ने हाल के सालों में नागरिकता कानून पर मजबूत आंदोलन देखा है। बीजेपी का गठबंधन भी छोटे दलों से टूट गया है। अभी चुनाव से ठीक पहले विपक्ष ने वहां महागठबंधन बनाने का ऐलान किया है। फिर भी बीजेपी असम को लेकर आश्वस्त नजर आती है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि पार्टी पिछले सालों में वहां और मजबूत ही हुई है। तमिलनाडु और केरल में भी बीजेपी ने स्थानीय दलों से हाथ मिलाया है लेकिन इन दोनों राज्यों में वह अपने दम पर सत्ता की रेस में नहीं है। फिर भी मिशन विस्तार के तहत वह यहां भी पूरी ताकत लगा रही है।

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अपनी डफली अपना राग

यह कहना कोई अतिश्योक्ति नहीं की कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए यह ‘मेक ऑर ब्रेक’ चुनाव होगा। विपक्ष को पता है कि जिस तरह नरेंद्र मोदी की अगुआई में बीजेपी चुनावी समर में लगातार बीस पड़ती रही है, अगर इस बार भी उसका वैसा ही प्रदर्शन रहा तो विपक्ष की हालत आगे और खराब हो सकती है। सबसे खराब दौर से गुजर रही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति भी इन चुनावों से प्रभावित हो सकती है। पार्टी एक बार फिर राहुल गांधी को नया अध्यक्ष चुनने की संभावना पर विचार कर रही है। हालांकि कई शीर्ष नेता हाल में नेतृत्व संकट को लेकर मुखर रहे हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम इस बार पार्टी के लिए बहुत अहम है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां बीजेपी की क्षमताओं को अक्सर हीं कम आंकती और अपनी डफली अपने राग में व्यस्त नजर आती है। उनका अपना आकलन है कि वह तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में सरकार बनाने की रेस में है और अगर ममता बीजेपी को बंगाल में रोकने में सफल हो गई तो यह बीजेपी के पतन की शुरुआत हो सकती है। लेकिन हाल के सालों में बीजेपी ने चुनाव में सबकुछ झोंक कर अपने पक्ष में परिणाम लाने का जो दमखम दिखाया है, उसे देखते हुए विपक्ष को दुगुनी  मेहनत करनी होगी।

इन पांचों ही राज्यों में अपने अलग-अलग चुनावी मुद्दे हैं लेकिन इन मुद्दों में अब केंद्रीय मुद्दे भी जगह बना रहे हैं। लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनावों में लोगों की राय अलग-अलग रहती आई है। ऐसा जनता पार्टी की सरकार के समय, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के शासनकाल में देखने को मिल चुका है। लेकिन इस बार एक तरफ बिजली, पानी, सड़क, महंगाई, बेरोजगारी जैसे बुनियादी मुद्दों के साथ-साथ रुपए की गिरती कीमत, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम, अर्थव्यवस्था की धीमी गति, सांप्रदायिक-धार्मिकता के मुद्दे भी अहम हो चुके हैं।

इस बार के विधानसभा चुनावों में देखने को मिल रहा है कि राजनीतिक दल धार्मिक प्रतीकों का सहारा भी पहले की तुलना में कहीं अधिक लेने लगे हैं। शायद भाजपा को शिकस्त देने के लिए हिन्दुत्व का मुद्दा भी प्रमुखता से उछल रहा है। यही कारण है कि कभी ममता चंडी पाठ  करती नजर आती हैं, तो कभी राहुल गांधी को शिवभक्त के रूप में पेश किया जा रहा है। ममता व अन्य राज्यस्तरीय मुद्दों को अपने भाषणों में बहुत कम छूते दीखते हैं, बल्कि उनका सारा जोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर प्रहार करने का रहता है। एक तरह से ये चुनाव नरेन्द्र मोदी को पछाडऩे की ही सारी जद्दोजहद दिखाई दे रहे हैं। यह विडंबना ही है कि हर दल एक बड़ी रेखा को मिटाने की बात तो करता है, लेकिन एक बड़ी रेखा खींचने का प्रयास कोई नहीं कर रहा है।

 

नीलाभ कृष्ण

 

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