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अनुकूल परिस्थितियां, कठिन चुनौतियां

अनुकूल परिस्थितियां, कठिन चुनौतियां

विश्व के सबसे बड़े संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में अत्यंत शांतिपूर्ण परंतु पूरी तरह लोकतांत्रिक ढंग से नेतृत्व परिवर्तन हो गया। इसे एक आश्चर्य अवश्य माना जा सकता है कि इतने बड़े संगठन में बिना किसी हो हल्ले के कोई निर्वाचन संपन्न हो सकता है। यही संघ की विशेषता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में यह नेतृत्व परिवर्तन ऐसे समय में हुआ है, जब संगठन के लगभग सौ वर्ष पूरे होने को हैं और उसके सदस्य देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन हैं। साथ ही उससे जुड़ा राजनीतिक संगठन यानी भारतीय जनता पार्टी देश की सत्ता संभाल रही है। ऐसे में किसी भी संगठन के प्रमुख के लिए चुनौतियां काफी बढ़ जाती हैं। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व इससे कहीं अधिक चुनौतियों का सामना करता रहा है, परंतु वे विषम परिस्थितियों की चुनौतियां रही हैं। जैसे कि महात्मा गांधी की हत्या का आरोप और उसके कारण प्रतिबंध, आपात्काल में लगा प्रतिबंध जैसी विषम परिस्थितियों में संघ नेतृत्व ने अभूतपूर्व संगठन तथा नेतृत्व कौशल का परिचय दिया और संगठन को न केवल उन परिस्थितियों से उबारा, बल्कि उसे और अधिक तेजस्विता के साथ आगे बढ़ाया। परंतु इस बार की चुनौतियां विषम नहीं, बल्कि अनुकूल परिस्थितियों से उपजी हैं। इसलिए ये चुनौतियां कहीं अधिक सावधानी की मांग करती हैं।

संघ में हुए वर्तमान परिवर्तन की एक विशेषता यह भी है कि यह दूसरी बार हो रहा है कि किसी ऐसे व्यक्ति को सर्वोच्च पद पर बैठाया जा रहा है जो सीधे-सीधे संघकार्य यानी शाखा-पद्धति से निकल कर नहीं आया है। पहली बार ऐसा हुआ था, जब प्रथम सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार ने श्री गुरुजी को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हुए सरसंघचालक घोषित किया था। उस समय संघ के कार्यकर्ता भी काफी आश्चर्यचकित हुए थे। परंतु संघ के अनुशासन के कारण सभी ने उस निर्णय को स्वीकार किया और भविष्य ने डॉ. हेडगेवार के निर्णय को सही साबित किया। श्री गुरुजी ने संघ को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। इस बार भी सरकार्यवाह जैसे सर्वोच्च पद पर श्री दत्तात्रेय होसबले जी को नियुक्त किया गया है, जो संघ की शाखा प्रणाली में प्रचारक नहीं रहे। वे प्रारंभ से ही विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक के नाते कार्य करते रहे हैं। प्रचारक के नाते वे कभी भी शाखा कार्य में संलग्न नहीं रहे। इसलिए निश्चय ही यह परिवर्तन संघ के लिए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

विचारणीय बात यह है कि संघ के सामने आज जो चुनौतियां हैं, वे शाखा कार्य से अधिक अन्य क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं। शाखा तो संघ का मूल काम है और उसकी महत्ता हमेशा बनी ही रहने वाली है। परंतु देश की आज जो परिस्थितियां हैं, उनमें संघ के सामने अन्यान्य महत्वपूर्ण कार्य बढ़ गए हैं। चूंकि आज देश के सत्ता के शीर्ष राजनीतिक पदों पर संघ के स्वयंसेवक ही बैठे हैं, ऐसे में संघ का सामाजिक दायित्व और अधिक बढ़ जाता है। संघ से समाज की अपेक्षाएं भी अत्यधिक बढ़ गई हैं। अपेक्षाओं की इस बाढ़ से संगठन को संभाल कर निकालना, संघ के सामने पहली चुनौती है। अपेक्षाएं हमेशा आपके अनुसार नहीं होतीं। कई बार समाज आपसे ऐसी अपेक्षाएं भी करता है, जो सामान्यत: आपके कार्यों का हिस्सा नहीं होता। जैसे कि राजनीतिक दबाव बनाना कभी भी संघ का कार्य नहीं रहा। संघ हमेशा व्यक्ति निर्माण और उसके माध्यम से समाज में एक उपयुक्त व्यवस्था बनाने के कार्य में संलग्न रहा है। उसका यह मानना रहा है कि एक योग्य और देशभक्त नागरिक राजनीति का भी योग्य संचालन कर लेगा। इसलिए संघ ने कभी भी सीधे-सीधे राजनीतिक को प्रभावित करने का प्रयास नहीं किया।

परंतु आज की परिस्थितियां नितांत भिन्न हैं। आज देश के प्रमुख राज्यों में संघ से जुड़े लोग शीर्ष राजनीतिक पदों पर हैं। केंद्र में भी उनके लोग ही सत्ता में बैठे हैं। ऐसे में संघ यह कह कर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकता कि राजनीतिक दबाव बनाना उसका कार्य नहीं है। समाज उससे यह अपेक्षा करता है कि हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों पर राजनीतिक दबाव बनाना भी उसका ही कार्य है। पिछले छह वर्षों में भले ही संघ द्वारा उठाए जाने वाले ढेर सारे कार्य हुए हैं, जैसे कि अयोध्या में मंदिर निर्माण से लेकर जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को समाप्त करना तक, परंतु फिर भी गौरक्षा और मंदिरों के सरकारी अधिग्रहण जैसे मुद्दों को लेकर समाज की उससे अपेक्षाएं अभी पूरी नहीं हुई हैं। इतना ही नहीं, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का जो आरोप कांग्रेस पर हमेशा लगता रहा है, वर्तमान सरकारें उससे मुक्त रहें, समाज उससे यह अपेक्षा भी कर रहा है। वास्तव में, आज की राजनीतिक चुनौतियों का समाधान करते हुए, संगठन के मूल कार्य को निर्बाध संचालित करना, संघ के वर्तमान नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

संघ के सामने दूसरी बड़ी चुनौती है, संगठन को राजनीति के अतिरेकी प्रभाव से बचाना। सत्ता में आने से जहां कई प्रकार के लाभ मिलते हैं, वहीं दूसरी ओर उसके कारण संगठन में कई प्रकार के प्रमादों का भी विस्तार होता है। सत्ता की ताकत संगठन को आकर्षक बनाती है और उससे बड़ी संख्या में लोग जुडऩे का प्रयास करते हैं। संघ में एक बात कही जाती है कि किसी भी संगठन के जीवनकाल में तीन चरण आते हैं। पहला चरण होता है उपहास का, फिर थोड़ी शक्ति बढऩे पर दूसरा चरण होता है विरोध का और अंत में दोनों ही चरणों से सफलतापूर्वक निकल आने पर तीसरा चरण होता है प्रशंसा का। संघ वर्तमान में इसी तीसरे चरण से गुजर रहा है। यह तीसरा चरण ही अधिक चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि प्रशंसा और स्वीकार किसी को भी अहंकार से भर देती है। ऐसे में फिसलने की संभावना सर्वाधिक बनती है। संघ को ऐसे फिसलनों से बचाना और सच्चे तथा योग्य कार्यकर्ताओं को पहचान कर उनका नियोजन वर्तमान नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती है।

संभव है कि इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए शीर्ष नेतृत्व पर एक बार फिर शाखा पद्धति से बाहर के कार्यकर्ता को बैठाया गया है। उनका साथ देने के लिए जो टीम बनाई गई है, वह शुद्ध शाखा प्रक्रिया के कार्यकर्ता हैं। देखना यह है कि श्री होसबले इस अनुकूल परिस्थितियों परंतु कठिन चुनौतियों का सामंजस्य कैसे बैठाते हैं और संघ के सामाजिक दायित्वों को संपादित करते हुए शाखा पद्धति को कैसे बल प्रदान करते हैं। देखना यह भी है कि संघ की बदलती भूमिकाओं और स्थापित परंपराओं में सामंजस्य बैठाते हुए एक बार फिर संगठन में नए प्राण फूंकने में वे कितने सक्षम हो पाते हैं।

 

रवि शंकर

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