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दत्तात्रेय होसबले दक्षिण के ‘‘गुरु’’ अब करेंगे देश का नेतृत्व

दत्तात्रेय होसबले दक्षिण के ‘‘गुरु’’  अब करेंगे देश का नेतृत्व

हिन्दू देवों में भगवान दत्तात्रेय का स्थान ‘गुरु’ का है और उनकी इसी रूप में पूजा की जाती है। उनमें ब्रम्हा, विष्णु और महेश्वर का निवास है। उन्हें ज्ञान और प्रज्ञा से मानवता को दिशा दिखाने वाला माना जाता है।

यह दैवीय संयोग ही हो सकता है कि कर्नाटक के मलनाड क्षेत्र में शिमोगा जिले के सुंदर तालुक सोरबा के निवासी मीनाक्षम्मा और शेषागिरिअप्पा होसबले दंपती ने अपने बेटे का नाम दत्तात्रेय रखा, जिसकी नियति छह दशक बाद देश का नेतृत्व करना था।

ग्रह-नक्षत्रों का संयोग को देखिए। दत्तात्रेय होसबले नाम से चर्चित हुए शिशु ने अपने जन्म के लिए तिथि चुनी: 1.12.1954; एक अंक सूर्य भगवान का है, 1+2=3 गुरु का अंक है, 1954 का योग भी एक होता है, वह भी सूर्य भगवान का अंक है! जन्मतिथि चुनकर ही शिशु ने अपनी नियति का संकेत दे दिया। छह दशक बाद दत्तात्रेय होसबले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरकार्यवाह चुने गए, सरसंघचालक मोहन भागवत के बाद यह दूसरा पद है। राजनैतिक शब्दावली में सरकार्यवाह का पद राष्ट्रीय महासचिव के बराबर है।

दत्तात्रेय होसबले सोरबा में स्थानीय सरकारी स्कूल में कन्नड़ माध्यम में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद साठ के दशक के मध्य में आरएसएस में दीक्षित हुए। उन्होंने बेंगलूरू में नेशनल कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में एमए की पढ़ाई पूरी की।

होसबले के पांच दशक के साथी एम.एच. श्रीधर ने कहा, ‘‘21 साल के दत्तात्रेय होसबले ने ही बेंगलूरू में होटल अशोक में सुबह पहुंचकर वाजपेयी, आडवाणी और अन्य नेताओं को बताया था कि इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी की घोषणा कर दी है।’’

इमरजेंसी के दौरान 21 साल के दत्तात्रेय होसबले भूमिगत होकर जनमत तैयार करते रहे, लेकिन आखिर वे गिरफ्तार किए गए और बेंगलूरू केंद्रीय जेल में और बाद में बेल्लारी केंद्रीय जेल में रखे गए।

इमरजेंसी के बाद इस तीक्ष्ण बौद्धिक क्षमता वाले नौजवान ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के जरिए अपना जीवन भारत माता के लिए समर्पित करने का फैसला किया। यह विनम्र शुरुआत थी, जिसकी नियति का फलक विराट होना था।

कई भाषाओं में अधिकार रखने वाले दत्तात्रेय होसबले ने एबीवीपी में नई सक्रियता, नया पहलू और नई ताजगी भरी और उसे राष्ट्रवादी के साथ-साथ सही अर्थों में राष्ट्रीय संगठन का स्वरूप दिया। देशभर के विभिन्न हिस्सों में छात्रों को सांस्कृति और परंपरा की विविधता का एहसास दिलाने के लिए अंतर-राज्यीय जीवन का छात्र अनुभव (एसइआइएल) कार्यक्रम दत्तात्रेय होसबले के दिमाग की ही उपज था।

अपने विचार, व्यवहार, योजनाओं और उसके अमल में निपुण, तीक्ष्ण तर्कबुद्धि संपन्न दत्तात्रेय होसबले अपने वैचारिक और व्यावहारिक ‘‘संपूर्ण शख्सियत’’ के लिए यशवंत राव केलकर, यादव राव जोशी, एच.वी. शेषाद्रि, अजित कुमार और एम.सी. जयदेव की सीख के योगदान को अहम बताते हैं।

मोर्चे पर आगे रहकर अगुआई करने में विश्वास करने वाले सत्यनिष्ठ नेता दत्तात्रेय होसबले ने 1990 में ‘चलो कश्मीर’ का कार्यक्रम दिया, जिसमें देशभर से युवकों को श्रीनगर मार्च के लिए गोलबंद किया गया। जम्मू-कश्मीर पाकिस्तान प्रशिक्षित आतंकवादियों का पनाहगाह बन गया था। आतंकवादियों ने हिंसा और खून-खगार मचा दिया था और देश की एकता को खतरे में डाल दिया था। लाखों नौजवानों के मार्च से तत्कालीन वी.पी. सिंह सरकार घबराई और नई दिल्ली की सरकार समस्या पर नए सिरे से विचार करने को मजबूर हुई।

दत्तात्रेय होसबले का तपस्या जैसा प्रयास सफल हुआ। वी.पी. सिंह के नेतृत्व में लुंजपुंज सरकार ‘‘तेजी से बिगड़ती स्थिति की समीक्षा’’ के लिए सांसदों और अधिकारियों का प्रतिनिधिमंडल श्रीनगर भेजने को राजी हुई।

आरएसएस से प्रेरित संगठनों के साथ बातचीत में दो-टूक पेशेवर अंदाज वाले दत्तात्रेय होसबले हमेशा एक ‘‘निश्चित लक्षमण रेखा’’ का पालन करते रहे हैं।

होसबले कहते हैं, ‘‘आरएसएस से प्रेरित सभी संगठन अपने कार्यकलाप में स्वतंत्र हैं और देशहित में अपना निर्णय लेने में सक्षम हैं। इन संगठनों में आरएसएस का हस्तक्षेप केवल वैचारिक मुद्दों पर स्पष्टता और सेवा से जुड़ी गतिविधियों तक ही सीमित है। इसके अलावा, आरएसएस का निरंतर कोई हस्तेक्षेप नहीं है और यही भाजपा के लिए भी है।‘’

वे भाजपा के प्रति आरएसएस के नजरिए को स्पष्ट करने के लिए लगातार इस रुख पर जोर देते और दोहराते रहे हैं, क्योंकि जब भी भगवा दल में स्थितियां गड़बड़ाती हैं तो लोग संघ की ओर देखने लगते हैं, जैसा कि अक्सर होता है।

धाराप्रवाह लेखक और बेहद पढ़ाकू दत्तात्रेय होसबले किसी भी कट्टर स्वयंसेवक की तरह हिंदुत्व की विचारधारा के प्रति पक्के तौर पर प्रतिबद्ध हैं, लेकिन वे दूसरे विचारों को ‘‘जानने और सीखने,’’ खासकर आधुनिक तकनीक और जीवन-शैली के बारे में उनका रवैया लचीला और व्यावहारिक है।

लगातार परिवर्तनशील समाज की बारीकियों को समझने वाले होसबले अक्सर अपने साथियों से स्वामी रंगनाथानंद की लिखी किताब ‘इटर्नल वैल्यूज फॉर ए चेंजिंग सोसायटी’’ (बदलते समाज के आंतरिक मूल्य) पढऩे को कहते हैं।

दत्तात्रेय होसबले ने बेंगलूरू में अपने संबोधन में एक बार कहा, ‘‘समाज स्थिर नहीं है, समाज सक्रिय है और समय की जरूरत के हिसाब से बदलता रहता है, उसे बदलना ही है, अन्यथा वह कुछ दूसरी सभ्यताओं की तरह धीमी मौत मर जाएगा। हालांकि, समाज बदलता है, सिर्फ इसीलिए समाज को धारण करने वाले हर काल में खरे रहे मूल्य नहीं बदलते और नहीं बदलेंगे। यह कहना गलत है कि पश्चिम का सब कुछ ही आधुनिक है। आधुनिक पहनावा और जीवनशैली नहीं, बल्कि हमारे आचार, व्यवहार, तौर-तरीके, सामाजिक समस्याओं पर सोचने का सर्वांगीण तरीका है।‘’ मैं सौभाग्यशाली हूं कि उस सभा में उपस्थित था।

इसी पृष्ठभूमि के साथ सरकार्यवाह का पद ग्रहण करने के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में दत्तात्रेय होसबले ने कहा, ‘‘आरएसएस आपसी सहमति और नेक इरादों से किसी लडक़े और लडक़ी के अंतर-धार्मिक विवाह के विरुद्ध नहीं है, लेकिन आरएसएस विवाह को धर्म परिवर्तन का धोखे से माध्यम बनाने के खिलाफ है और इसीलिए हम लव-जिहाद कानून का समर्थन करते हैं। यह एकदम दो-टूक स्पष्ट है।’’ वाकई!

आखिर दत्तात्रेय होसबले को सह-सरकार्यवाह (संयुक्त महासचिव) के पद से सरकार्यवाह (महासचिव) के पद पर पदोन्नति की क्या वजह हो सकती है? नागपुर में 1925 की विजयादशमी को अस्तित्व में आया आरएसएस 2025 में सौ साल पूरे करेगा। संघ साल भर चलने वाले शताब्दी आयोजन के लिए 2024 की विजयादशमी से 2025 तक हजारों सेवा आधारित गतिविधियां करेगा।

अब 66 वर्ष के हो चुके दत्तात्रेय होसबले को बहुआयामी कार्यक्रम के बारे में सोचना और उनका क्रियान्वयन करना होगा, यह देश ही नहीं विदेश तक के लिए होगा, जहां आरएसएस को हिंदू स्वयंसेवक संघ के नाते जाना जाता है। अगले तीन साल 2021 से 2024 के लिए कार्यक्रम तैयार करना और उन्हें उसके तीन साल तक जारी रखना महती कार्य है।

दत्तात्रेय होसबले उम्र के अलावा सुरेश भैया जोशी से आठ साल छोटे हैं और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के साथ उनके संबंध मित्रवत हैं। इस वजह से वे संघ के विचार को अधिक सहजता से रखने में सक्षम होंगे। एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव के नाते देशभर के सभी जिलों में लाखों युवाओं से उनका ‘‘जीवंत संबंध’’ है।

प्रतिबद्ध युवाओं की यह विशाल फौज आरएसएस को अपनी गतिविधियां कारगर ढंग से संचालन के काम आएगी।

कहते हैं, 15वीं शताब्दी के फ्रांसीसी संत और भविष्यवक्ता नोस्टर्डेमस ने भविष्यवाणी की थी कि ‘‘दक्षिण भारत से कोई आएगा और हिंदू राष्ट्र को गौरव के शिखर पर ले जाएगा।’’ क्या दत्तात्रेय होसबले ही नोस्टर्डेमस की भविष्यवाणी वाले शख्सियत हैं?

 

बेंगलुरू से एस. ए. हेमंत कुमार

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